विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक

डा. अरुण कुमार सिंह · 2012-06-01 · अंक 107

भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक सम्पत्ति
भाषाक उत्पति समाजमे भेल अछि आओर समाजक विकास भाषाक आधार पर होइछ। एहि तरहेँ भाषा आओर समाज दुनू अन्योन्याश्रित अछि। एहि मादे हम कहए चाहैत छी जे मैथिली भाषा कोनो जाति विशेषक सम्पत्ति नहि अपितु ई तँ सामाजिक सम्पत्ति थिक। सामाजिक व्यवहारे भाषाक मुख्य उद्देश्य अछि। भाषाक विकास आ संरक्षण समाजमे होइछ आओर एकर प्रयोग सेहो समाजमे होइछ। मैथिलीकेँ दूरगामी क्षति पहुँचाबैवला किछु लोकक कहब अछि जे घर-घरारी सदृश मैथिली सेहो हमरा सभक पैतृक संपत्ति अछि, जे कि सर्वथा अनुपयुक्त, किएकतँ सम्पूर्ण मिथिलामे रहएवला सभ वर्गक नेना जन्मेसँ अपन मातृभाषा मैथिली बजैछ।
हमसब भाषाक बलेँ असगरमे सोचैत एवं मनन करैत छी मुदा ओ भाषा एहि सामान्य यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीक पर आधारित भाषासँ भिन्न होइछ। भाषा आद्योपांत समाजसँ संबंधित होइछ।भाषा एक सामाजिक सम्पत्ति अछि। एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे कोनो साहित्यकार वा भाषाप्रेमी भाषाक निर्माता नहि भए सकैछ। भाषामे होइबला परिवर्तन व्यक्तिकृत नहि भएकें समाजकृत होइछ।
भाषाक सामाजिक स्तर पर अन्तर भए जाइछ। विस्तृत क्षेत्रमे बाजल जायवला भाषाक आपसी भिन्नता देखल जाए सकैछ। सामान्य रूपमे सम्पूर्ण मिथिलाक लोक मैथिलीक प्रयोग करैछ,मुदा अलग-अलग क्षेत्रक मैथिलीमे पर्याप्त भिन्नता होइछ। एहन भिन्नता ओकर शैक्षिक, आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक,सांस्कृतिक तथा भौगोलिक स्तरक कारणेँ होइछ। पढल-लिखल लोक जतबा साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग करैछ, साधारण अथवा बिनु पढल-लिखल लोक ओतेक साकांक्ष भएकेँ भाषाक प्रयोग नहि कए सकैछ। एहन स्तरीय बात कोनो भाषाक समय विशेषमे कएल गेल भाषा-प्रयोगसँ अनुभव कएल जाए सकैछ।
विश्वक सबटा काजक संपादन प्रत्यक्ष वा परोक्ष रूपेँ भाषेक माध्यमसँ होइछ इ तथ्य सर्वमान्य अछि। सबटा ज्ञान भाषे पर आधारित अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक संबंध वा समाज-व्यक्तिक संबंध भाषाक अभावमे असंभव अछि, इहो भाषाक सर्वव्यापकताक प्रबल प्रमाण अछि।
मनुष्यक संग-संग भाषा सतत गतिशील रहैछ। समाजक संग भाषाक आरंभ भेल आओर आइ धरि गतिशील अछि। मानव समाज जा धरि रहत ता धरि भाषाक अस्तित्व बनल रहत। कोनो व्यक्‍ति वा समाजक द्वारा भाषामे कमोवेश परिवर्त्तन कएल जाए सकैछ, परंच एकरा समाप्‍त करबाक सामर्थ्य ककरोमे नहि रहैछ। भाषाक परिवर्त्तनशीलताकेँ व्यक्‍ति वा समाज द्वारा रोकल नहि जा सकैछ। संसारक सभ वस्तु सदृश भाषा सेहो परिवर्त्तनशील अछि। जेना-संस्कृतमे ‘साहस’ शब्दक अर्थ अनुचित वा अनैतिक काजक लेल उत्साह देखाएब छल, मुदा आब ई शब्द मैथिलीमे नीक काजमे उत्साह देखैबाक अर्थमे प्रयुक्त होइछ।
भाषा परिवर्त्तनशील अछि। इएह कारण अछि जे सब भाषा एक युगक बाद दोसर युगमे पहुँचि कए बहुत फराक भए जाइछ। एहि प्रकारेँ परिवर्त्तनक कारणेँ भाषामे विविधता आबि जाइछ। जँ भाषा-परिवर्त्तन पर साफे नियंत्रण नहि राखल जाएत तँ तेजीसँ परिवर्त्तनक परिणामस्वरूप किछुए दिनमे भाषाक रूप अबोध्य भए जाएत। भाषा-परिवर्त्तन पूर्ण रूपसँ रोकल तँ नहि जा सकैछ, परंच भाषामे बोधगम्यता बनाकेँ रखबाक लेल ओकर परिवर्त्तनक क्रममे एकटा मानक रूप रहब अति आवश्यक।
अन्ततः हम कहए चाहब जे भाषा अपन समाजक संप्रेषणक अन्यतम साधन थिक। एकर माध्यमसँ वर्त्तमान एवं अतीतकेँ परखल जा सकैछ संगहि ओकर भूत एवं वर्त्तमानक पृष्‍ठभूमि पर भविष्यकेँ देखल जा सकैत अछि। भाषा मुखरित भए व्यक्‍तिकेँ सम्प्रेषित करैछ, मुदा कतेको बेर मौन रहि सम्पूर्ण समाजक भावनाकेँ अभिव्यक्‍त कए दैत अछि। भाषाकेँ भाषेक माध्यमसँ बुझल जाइछ आ तेँ ई प्रक्रिया एतेक सरल प्रतीत होइत अछि। यद्‍यपि इहो देखल जाए सकैत अछि जे हमसब एकर सही क्षमताकेँ नहि आंकि दिगभ्रमित भए जाइत छी। अंततः समाजेकेँ बहुत रास चीज गमाकेँ एकर क्षतिक आकलन करए पड़ैत छैक, जे कि कोनो भाषाक विकासकेँ अवरूद्ध ओ गतिहीन बनबैछ।
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डॉ.

Suggested citation: डा. अरुण कुमार सिंह. “भाषा जातिगत सम्पत्ति नहि अपितु सामाजिक.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 107, 2012-06-01. https://www.videha.co.in/research/2012/107/भाषा-जातिगत-सम्पत्ति-नहि-अपितु-सामाजिक.htm

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