जगदीश प्रसाद मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डलक दूटा गीत
गीत-1
गाछक रंग बदलि रहल छै
मौसम संग सुधरि रहल छै।
थल-कमल जकाँ कहियो
गाढ़-लाल-उज्जर बनै छै।
तहिना फूल-फल कोढ़ि जकाँ
झरि-झरि कोनो फलो बनै छै।
गाछक रंग बदलि रहल छै
मौसम संग.......।
आशा आश लगा-लगा
जीत अपराजित बनैत रहै छै।
सुधरि रूप बदलि चालि
कारी काजर चमकि उठै छै।
गाछक रंग बदलि रहल छै
मौसम संग.......।
लत्ती पानि रूप बदलि
थल-कमल कहबैत चलै छै
तहिना लत्ती अपराजित
गाछ बनि गछाड़ि धड़ै छै।
गाछक रंग बदलि रहल छै
मौसम संग.......।
गीत-2
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप देखैत चलू।
छाती केना दलकि रहल छै
सूर-तान भजैत चलू।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।
जिनगी जेकर जेहेन रहै छै
छाती तेहने तेकर बनै छै।
हलसि-कलशि कहैत रहै छै
पारदर्शी एना बनैत रहै छै।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।
जखने पालिस शीशा लगतै
झल अन्हार बनिते रहतै।
झल अन्हार अन्हार बदलि
एक्कभग्गु बनि शीशा कहतै।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।
देखि-देखि, सुनि-सुनि
हँसैत डेग उठबैत चलू।
मुँहक हँसी केहेन अबै छै
ठोरक रूप.......।
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डॉ॰ शशिधर कुमर “विदेह”
एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा
कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४
अप्पन नैना सम्हार !
हाय ! सहलो ने जाइछ, तीर तेज - तर्रार ।
अप्पन नैना सम्हार !
गोरी कनखी ने मार !
केओ कहइत अछि नैन जेना सागर वा झील ।
मीन युगल करय केलि वा हो कमलदल नील ।
मुदा हमरा लगैछ ई सद्यः कटार ।
अप्पन नैना सम्हार !
गोरी कनखी ने मार !
आँखि सुन्नर एहेन की पाओत हरीन ।
की तुलना करत गोरी तोरा सँ मीन ।
धन्य काजर भऽ गेल बनि एकर शिंगार ।
अप्पन नैना सम्हार !
गोरी कनखी ने मार !
थिक कारी मुदा मनोहारी ई नैन ।
दूर रहितहुँ हमर छीनि लेलक ई चैन ।
बिनु आहटिअहि कयलक हृदय आर – पार ।
अप्पन नैना सम्हार !
गोरी कनखी ने मार !
देन भगवानक तोरा ई अनमोल छौ ।
मुल्य किछु नञि मुदा बड़ एकर मोल छौ ।
एकर आगाँ निछाउर ई सौंसे संसार ।
अप्पन नैना सम्हार !
गोरी कनखी ने मार !
हम नञि रोकब
अहँ जाइ छी तऽ जाउ, हम नञि रोकब ।
किछु सुनितहि जाउ, बरु नञि टोकब ।
हम प्रेम कयल, थिक दोष हमर, सच मानल सपनहि जे देखल ।।
हम नेह लगा, गलती कयलहुँ ।
हम प्रीति जगा, गलती कयलहुँ ।
नञि दोष अहाँ केर अछि कनिञो, हम अपन विकट छवि नञि देखल ।।
हम स्नेहक धुनि मे, नञि सोचल ।
की अहाँ, की हम, से नञि देखल ।
छी दण्डक भागी हमहि सखी, हो अहँक हरेक दिन शुभ - मंगल ।।
अहँ जतय रही, सुख सदिखन ।
हो अहँक संग, सातो सरगम ।
हम्मर हिस्सा मे भलहि नोर, हो अहँक हरेक पल मधु बोड़ल ।।
तोहर जिनगी मे वसन्तक लय
तोहर जिनगी मे वसन्तक लय,
हम्मर पतझड़ परवाहि ने अछि ।
तोहर नेहक भग्नावशेष पर,
प्रेम विजय निज चाह ने अछि ।।
तोँ हमर ने भऽ सकलेँ, सरिपहु
अनकर होयबा पर आह ने अछि ।
तोहर सुख मे हम्मर सुख छी,
स्वीकार्य तोहर दुख छाँह ने अछि ।।
हम प्यासल मरु मे पानि बिना,
मरि जायब - से परवाहि ने अछि ।
बस तोहर जिनगी हो सुन्नर,
मन मे तोहर अधलाहि ने अछि ।।
छल हमरहि प्रेम मे दोष कोनहु,
तोरा पर सखि अवसाद ने अछि ।
हो पूर तोहर हर - एक सपना,
नञि भेल हमर, से आह ने अछि ।।
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१.जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल २.मुन्नी कामत
१
जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल
गजल १
हम तमसायब गजल सुनायब
अहाँ अगुतायब गजल सुनायब |
ई सौंसे आकाश हमर छी
उडि-उडि आयब गजल सुनायब |
माइक करजा माटिक करजा
हमहूँ चुकायब गजल सुनायब |
पाप कते भरि गेल मोनमे
गंगा बनायब गजल सुनायब |
लगतै आगि अहू जंगलमे
कतहु पड़ायब गजल सुनायब |
अहाँक हृदयमे घ’र हमर अछि
घुरि– घुरि आयब गजल सुनायब |
ताकब बाट अहाँक जीवन भरि
सपन सजायब गजल सुनायब |
गजल २
घरसँ होउ बहार बेटी
बाट तकैछ पहाड बेटी |
खपटा थिक सोना आ चानी
उत्तम स्नेहक धार बेटी |
गेल जमाना तिलक दहेजक
सरस्वतीक संसार बेटी |
नैहर सासुर तीर्थ धाम सब
भ’ गेल आइ बजार बेटी |
आब पताल ने जेती सीता
सुन्दर यैह विचार बेटी।
२
मुन्नी कामत
दूटा कविता
कविता-
हमर मिथिला हमर प्राण
हमर मिथिला हमर जननी
हमर इएह परान अछि
देखलौं तँ बर दुनियाँ आगू
मुदा मिथिले हमर जान अछि।
एतुक्का माटिमेे खुशबू संस्कारक
जे नै बुझै केकरो आन अछि
आनोकेँ अपना बनबैए
यएह मिथिलाक पहिचान अछि।
जतए गोबरक होइत अछि पूजा
बगरोकेँ मिलैत दुलार अछि
ई पावन धरती हमर
एतए जननी धाम अछि।
जे एलाह एतए बसि गेलाह
कखनो राम तँ कखनो उगना छेलाह
देवतो ऐ माटिसँ करैत दुलार अछि
एहेन पवित्र हमर भूमि
एहेन सुन्दर हमर गाम अछि।
नारी
िनर्मल अछि, ओ ममता अछि
िनर्मल हुनकर दुलार
ओ नारी अछि ऐ समाजक
जइमे रचल-बसल अछि संसार।
नै भेटलनि अनुकूल परिवेश हुनका
ने ज्ञानक सार
तैयो हैरत छी देखि कऽ
कतेक उच्च, आदर्श अछि हिनकर विचार
हर युगमे
दबबैत आएल हिनका अगुआए समाज।
मुदा कहि रहल अछि आइ नारी
जननी छी हम समाजक
हमहीं बदलब एकर सोच-विचार
पैदा करब अपन कृतिसँ संस्कार
िनर्मल रहब हम, ममता रखब
बाँटब जन-जनमे प्यार।
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शिवकुमार झा ‘टिल्लू’
मिथिला-पुत्र
मिथिलाक बेटीकेँ सहए पड़लनि
झमेलिया बिआहक दंश
सतभैंया पोखरिसँ पंचवटी धरि
िकसुन तकलौं
कतहु नै भेटल
सभ राकश सभ कंश
नअ मास नहि
पैंसठि बरख धरि
मयना उठबैत रहलीह
प्रसव वेदनाक टीस
तखन जा कऽ भेल
जीवन संघर्षक जीत
दिवसेमे तरेगन बहकल
विदेहक आङन जनमल जगदीश
मौलाइल गाछक फूल गमकल
तापसमे भैंटक लाबा चमकल
पूर्वाग्रहक चपेटिमे
जाति-पजातिक गेठमे
ओझरा कऽ मैथिली
भऽ गेल छलि िनर्मूल
बेदम्म गजेनक आश जागल
सुखैत गुल्लरिमे फूल लागल
रमकल जिनगीक जीत
वैयक्तिक नै-
पसिझैत गामक जिनगी
मात्र मेंहथ आ बेरमा नै
मौरंगसँ सिमरिया धरि
चमकि उठल इंद्रधनुषी अकास
केकरो नै छल विश्वास
द्विजक मुरदैयाक संग-संग
अक्षोपक सोती बहत...?
स्वाभाविक छल उपहास हएब
मुदा! तिरस्कारक क्षोश्र नै
जीवन-मरण तँ प्रकृतिस्थ लीला
तखन केकरोसँ केहेन द्वेष?
अवतारवादक सेहो होइछ पराभव
केओ पनही देत की नै
कोनो तृष्णा नै
नै उत्थानक आश
पतनसँ घृणा नै
अकाल भेल तँ बिसाँढ़ चिबा कऽ
राित-दिन समरसता दीप
जड़बैत रहल
अपन गीतांजलि गाबि
कम्प्रोमाइज करैत रहल
कोनो कलुष कम्प्रोमाइज नै
गत्र-गत्रमे समन्वयवाद
कलमे टा सँ नै
जीवन दर्शनमे सेहो
चलि गेला भोगेन्द्र
नै तँ उत्तर भेटि जइतए
यात्री, आरसी आ फजलुरसँ
सेहो कोनो तुलना नै
आन इचना-पोठीक कोन गप्प
लोक चानी नै टलहा कहए
विज्ञ नै बुड़िबक बूझए
संस्कार नै छोडब
खॉटी किसान मजदूरक रूप
ब्रह्म बेलामे कलम खियाबथि
सरल धवल बेरमाक भूप
एहन साम्यवादी-
फाँसीपर चढ़ि जाएब
मुदा बटोहीकेँ अधलाह
बाट नै देखाएब
केकरो नै सुनलक
संततिक कोन कथा
अर्द्धांगिनी सेहो सहैत रहलीह
ऐ लेलिनक सेहो देल ब्यथा
ने केकरो तर करब
ने केकरोसँ ऊपर जाएब
सबहक शोणित एक्कहि रंग
कएलक विरोध व्यवस्था बेढंग
मरल गरीबक बाप मुदा की
पुरहित-पात्रकेँ भरिगर चाही
धूर-धूर बास बिका गेल
काहि काटि लुटबैत बाहवाही
लेस मात्र नै दया अग्रजकेँ
सिहरि-सिहरि अश्रु-उच्छवास
कहियो नै अगिला पएर पुजाबथि
कतए राम धर भूत पिशाच?
सभा बजौलनि धानुक टोलक
अपनहि जातिमे पंडित देखू
भॉज पुराएब जटिल कर्मकाण्डक
माइक समान नै धरती बेचू
मात्र बाटपर आनय खातिर
करै छथि प्रतिक्षण सामान्त विरोध
सम्यक समाज मिथिलेमे बनतै
जगा रहलाह समभाव बोध
अक्षेपसँ नै गंग छुआबथि
तखन केना कऽ हाड़ छुआइत
मन: दीपसँ िहयमे तकबै
मिथिला पुत्रक स्पन्दन हएत...।
(श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीकेँ समर्पित..)
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१.किशन कारीगर२.नारायण झा-सम्मान३.श्यामल सुमन
१
किशन कारीगर
पद के दुरूपयोग
(हास्य कविता)
फेर भेटत नहि एहेन सुयोग
अपना स्वार्थ द्वारे कानून बनाऊ-तोरू
मनमर्जी सँ करू ओकर उपयोग
अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग
सत्ताक कुर्सी पर बैसल छि अहाँ
कोनो समस्या देखैत छि कहाँ
मोन मोताबिक सी.बी.आइ के करू उपयोग
अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !
अरब-खरब घोटाला करू मुदा
दाँत चिआरैत तिहर जेल सँ निकलू
फेर मंत्री पद हथिआउ आ घोटाला करू
सरकारी खजाना सुडाह क बैसू !
सत्ता कुर्सी आ सरकारी धन
जन्मजात अहाँक बपौती छि
अहाँ करू एककर खूब उपयोग
करू अपना पद के दुरूपयोग
मूलभूत समस्याक समाधान किएक करब ?
एही सँ किछु ने होयत ताहि दुआरे
एहने योजना बनाऊ जाही सँ
अहाँ अप्पन जेबी टा भरब
करू अन्याय मुदा बर्दी चमकाऊ
अपनों घुस खाऊ नेताजी के सेहो खुआउ
डरे कियो किछु बाजत कोना
दमनकारी नीति अहाँ अपनाऊ
न्यायक कुर्सी बिका गेल
देशक रक्षक बनी गेल भक्षक
कागजी पन्ना पर आर्थिक योजना
आम आदमीक कष्ट बुजहब कोना
मंत्री छि लालाबती गाड़ी में घूमूं
जनताक खोज खबरि एकदम नहि करू
एक्के बेर आब अगिला इलेक्शन में
भोंट दुआरे जनता के मुहं देखू
दंगा फसाद अहींक इशारा पर
पहिने सँ फिक्स भेल अछि
वोट बैंक पोलिसी के करू उपयोग
अहाँ करू अपना पद के दुरूपयोग !!
२
नारायण झा
कविता
सम्मान
हे जगदीश, एहेन दिन देखलौं
ऐ मण्डल बीच, मण्डल पद पएलौं
आरंभ कएल लेखन ऐ रहुआ धरतीसँ
पहिल कथा संग्रह, गामक जिनगीक कथासँ
रचना रसधार पटा जेना गंगा जट्टासँ
सुवास गमकैछ कथा, नाटक, उपन्याससँ।
हे युगपुरुष, टैगोर पुरस्कार पएलौं
रहुआवासीक संग पारसमणि पुस्ताकलयक नयना जुड़ेलौं।
अहाँक विविध विधा, जेना पसरल तरेगन
जीवनक उत्थान-पतनसँ जीवन-मरण
संग इन्द्रधनुषी अकास देखैत छी राति-दिन
आँजुरि भरि अछि पंचवटी, गीतांजलि नीमन
अपनेक लेखनी बढ़ि अकास चढ़हय सदिखन।
हे जगदीश एहेन दिन देखलौं
ऐ मण्डल बीच, मण्डल पएलौं।।
३
श्यामल सुमन
निरीक्षण
अपने सँ देखब दोष कहिया अपन
ध्यान सँ साफ दर्पण मे देखू नयन
बात बड़का केला सँ नञि बडका बनब
करू कोशिश कि सुन्दर बनय आचरण
माटि मिथिला के छूटल प्रवासी भेलहुँ
मातृभाषा विकासक करू नित जतन
नौकरीक आस मे नहिं बैसल रहू
राखू नूतन सृजन के हृदय मे लगन
खूब कुहरै छी बेटीक विवाहक बेर
अपन बेटाक बेर मे दहेजक भजन
व्यर्थ जिनगी अगर मस्त अपने रही
करू सम्भव मदद लोक भेटय अपन
सत्य-साक्षी बनू नित अपन कर्म केर
आँखि चमकत फुलायत हृदय मे सुमन
सम्बन्ध
साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
कहू माता केर आँचर मे की सुख भेटल।
चढ़िते कोरा जेना सब हमर दुःख मेटल।
आय ममता उपेक्षित कियै रति-दिन,
सोचि कोठी मे मुंह कय नुकाबैत छी।
साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
खूब नेनपन मे खेललहुं बहिन-भाय संग।
प्रेम सँ भीज जाय छल हरएक अंग-अंग।
कोना सम्बन्ध शोणित केर टूटल एखन,
एक दोसर के शोणित बहाबैत छी।
साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
दूर अप्पन कियै अछि पड़ोसी लगीच।
कटत जिनगी सुमन के बगीचे के बीच।
बात घर घर के छी इ सोचब ध्यान सँ,
स्वयं दर्पण स्वयं केँ देखाबैत छी।
साँच जिनगी मे बीतल जे गाबैत छी।
वेदना हम हृदय के सुनाबैत छी।।
बेटी
माँगू दहेज भरमार यौ,
चलू बड़का कहाबी।।
भेटल पड़ोसी कय जे किछु दहेज।
रखला एखन तक सबटा सहेज।
कम नहि करब स्वीकार यौ।
चलू बड़का कहाबी।।
बेटा अपन छी बेटी छी आन।
नहि दऽ सकै छी बेटी लऽ प्राण।
दुनियाँ बनल व्यापार यौ।
चलू बड़का कहाबी।।
बेटा आ बेटी के अन्तर मेटाबू।
बेटी जनम लियै थपड़ी बजाबू।
बेटी सुमन श्रृंगार यौ।
चलू बड़का कहाबी।।
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चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार
गजल-1
गुप्फ अन्हार, नहि हाथो-हाथ सुझैए
आनक बात कोन, परिजनो हुथैए
जकरा ले सर्वस्व अर्पण कएलहुँ
सैह हमरा मतलबी लोक बुझैए
खून पसेना बहाबी,मुदा छी दरिद्र
भिखमंगा बौसैए, धनिकहा लुझैए
कत्तौ करोट फेरै लोक सड़क पर
कतहु कुक्कुरो पलंग पर सुतैए
केओ भूखे पेट,रकटल प्राण,कानै
"चंदन" पाचकक चुर्णो खाय कुथैए
--------------वर्ण-१४-------------
गजल-2
राति सपन मे प्रियतम एलाह
कर-कौशल सँ हमरा जगेलाह
काँच निन्न टूटल,मोन कछमछ
उड़ीबिड़ी लगा अपने नुकेलाह
देहक पानि बनि बहल पसेना
अधरतिये मोन प्यास लगेलाह
कसमस आञ्गि नख लागि फाटल
चेन्ह सगर देह नह गरेलाह
हमरा संग कत खेल खेलेलाह
"चंदन" तखन जा मोन जुड़ेलाह
----वर्ण-१३-------
गजल-3
दू लबनी केर खेला देखू
लागल रेलम रेला देखू
फुसिए ठेलम ठेला देखू
बलजोड़िक झमेला देखू
मत्त गुरू संग चेला देखू
नाच करै अलबेला देखू
जीवन के संध्यावेला देखू
कानै अनाथ कोरेला देखू
विषले लागल मेला देखू
अमृत भेल करेला देखू
------वर्ण-१०------
गजल-4
फूल नै बनलौँ तऽ की,काँट बनि गड़ैत तऽ छी
प्रेम नै केलौँ तऽ की, संग हमर लडैत तऽ छी
अन्हार छै घर तऽ की, दीप बनि जड़ैत तऽ छी
सोँझा नै हँसलौँ तऽ की,परोछ मे कनैत तऽ छी
अपना नै सकलौँ तऽ की, संगमे रहैत तऽ छी
भऽनै जाइ आनक संगी,से सोचि मरैत तऽ छी
सुख नै देलौँ तऽ की, संगे दुख कटैत तऽ छी
मीत नै भेलौ तऽ की, रूसल मे बौँसैत तऽ छी
बुझि कऽ बकलेले हमरा, अहाँ हँसैत तऽ छी
छी अकछायल तऽ की, बात तैयो सुनैत तऽ छी
----------वर्ण-१७---------------
हाइकु-
बकः धेयान
नारी इज्जति पर
लगौने नर।
सगरो छैक
मड़राइत गिद्ध
मौस तकैत।
चित्त बाघिन
गिद्दर सभ मिलि
देह नोचैत ।
शक्तिस्वरूपा
चण्ड-मुण्डक पाँजे
कछमछाय ।
भीष्म आ' द्रोण
बनले धृतराष्ट्र
मूड़ी गाड़ने ।
अर्जुन भीम
पाण्डवक सैनिक
हारल योद्धा ।
लाज बचाउ
चिकरैछ द्रौपदी
हे गिरधारी !
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जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीह्टोंल, मधुबनी
१-गजल
घोड कलियुग घडी केहन आबि गेलै
एकटा कंस घर घर में पाबि गेलै
बनल अछि रक्षके भक्षक आब सगरो
विवश जनताक हक सबटा दाबि गेलै
अन्न खा ' थाह पेटक किछु नै पएलक
मालकेँ सगर भूस्सा चुप चाबि गेलै
शहर नै गाम आ घर- घर आब देखू
पूव देशक हबा में सभ आबि गेलै
आजु फेशन कए नव पोसाक में डुबि
एक गज में अरज देहक पाबि गेलै
(बहरे असम, मात्रा क्रम- २१२२-१२२२-२१२२)
------------------------------------
२-गजल
मारी माछ नहि ऊपछी खत्ता
भरि समाज घोडन केँ छत्ता
परचट्ट बनल जनता छी
खाई छी गरदनि पर कत्ता
कांकोड बिएल कांकोडे खए
भय गेल देशक लत्ता-लत्ता
सगरो नाँघल जाईत अछि
छन छन मरीयादा केँ हत्ता
रहब भरोसे कतेक दिन
भेटे एक दिन हमरो भत्ता
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-११)
------------------------------------
३-गजल
भ्रष्टाचार केँ ठेका आजुक सरकार लेने
कारी रुपैयाक करमान धर्माचार लेने
बोगला भगत छै बैसल घाट-घाट पर
खून पिबैक लेल तैयार हथियार लेने
कर्तव्य बिसरल अछि मिडिया समाज में
नीक बेजाए छोरि कमाऊ समाचार लेने
प्रेमक भाषा सिमैट गेल अछि पाई तक
पाई अछि एक दोसर सँ सरोकार लेने
सुनलौं कोयला दलाली में मुँह कारी हैछै
सगरो मुँह कारी छैक मिथ्या प्रचार लेने
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६ )
---------------------------------------
४-गजल
सोना दहेल जाइए जुनि काँटी केँ पकरू
छोरि अपन भाषा नहि खराँटी केँ पकरू
दोसर घर धेने भेटत नहि ओ सनेह
छोरि आनक बोझ अपन आँटी केँ पकरू
आदी काल सँ अपन शिक्षा लेने विश्व अछि
नवीनता केँ धार में नहि काँटी केँ पकरू
संपन्न हमर संस्कृति मधुर भाषा अछि
लात मारि टल्हा केँ अपन खाँटी केँ पकरू
छोरु दिल्ली मुंबई घुरि आऊ अपन घ 'र
आब दरभंगा मधुबनी राँटी केँ पकरू
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१६)
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–सन्तोष कुमार मिश्र
इतिहासहिन इतिहास
हवाके कलम
आ
हल्लाके मसिसँ लिखल
एकटा इतिहास
ओ इतिहास जे
शब्दहिन,
अर्थहिन,
विश्वाशहिन अछि ।
तैयो, ओ इतिहास
किताबमे सिमित
यार्थाथसँ बञ्चित
मुदा परिवर्तनक
शिल्लानास कैनिहार अछि ।
परिवर्तन
एकटा आशके,
विश्वासके,
भविश्यके आ
उच्चकोटीक परिचयके
आशा रखने अछि ।
मुदा ओ विश्वास
अनुशासनहिन,
ब्यवहारहिन,
दण्डहिन
आ ब्यवस्थापनहिन भगेल अछि ।
ओ इतिहास, जे
कामक नहि
नामक इतिहास
परिवर्तनक कल्पनाके इतिहास
किताबक पन्नामे सीमित रहिगेल अछि ।
मुदा, चलैत हवा द्वारा
सुनाइत हल्ला
पुनः प्रयासरत अछि
एकटा इतिहासके
जे अर्थहिन,
दण्डहिन,
आओर कि कि
मुदा इतिहास, एहन इतिहास
जे इतिहासहिन अछि ।
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विदेह नूतन अंक मिथिला कला संगीत
राजनाथ मिश्र
चित्रमय मिथिला स्लाइड शो
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