विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने

दुर्गानन्द मण्डल · 2012-06-15 · अंक 108

टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कारक बहन्ने
तारीख 10/6/2012 दि‍न रवि‍, ि‍नरमलीसँ पटना जेबाक हेतु, स्‍थानि‍य मि‍लानपथसँ संध्‍या 8 बजे सरकारी बस द्वारा गोसाइ-पीतरकेँ सुमरि‍, आरक्षि‍त जगहपर बैसल। मनमे सदि‍खन देव-पीतरक यादि‍, ताकि‍ यात्रा शुभ हुअए। ि‍नर्धारि‍त समैसँ बस खुजल। भुतहा, नरहि‍या, फुलपरास होइत चनौरागंजमे काका (श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल) केँ गोर लागि‍ आदरक संग बैसाओल। हुनका छोड़क हेतु बेरमा गामक कतौक लोक जेना कपि‍लेश्वर राउत, लक्ष्‍मी दास, शि‍वकुमार मि‍श्रा, अखि‍लेश, सुरेश, मि‍थि‍लेश आदि‍ आएल छलन्‍हि‍। राति‍ भरि‍ देव-पीतरकेँ सुमरैत तीन बजे भोरमे दुनू बापुत पटना पहुँचलौं। बससँ उतरि‍ पलेटफार्मकेँ गमछासँ झारि‍ बैसलौं। ओंघीसँ आँखि‍ डोका सन-सन आ रंग अरहुल सन। जाकि‍ आँखि‍ मुनलौं आकि‍ काका उठौलन्‍हि‍ जे उठु-उठु प्रात भऽ गेल। से ने तँ नदी-तदी तरगरे फीर लि‍अ। फरीच्‍छ भेलासँ सुलभ शौचालाइयोमे नम्‍मर लगाबए पड़त। सएह कएल। आँखि‍ मि‍ड़ैत डेग शौचालय दि‍सि‍ बढ़ौल। बेरी-बेरी दुनू बापुत नदी फि‍रलौं। गामक बनाओल दतमनि‍, जेकर अगि‍ला मुँह थकुचल आ पछि‍ला भाग चीरल। मुँहमे दऽ चारि‍ये घुस्‍सा ऐ कातसँ आेइ कात धरि‍ दऽ कुरूर-आचमनि‍ कऽ आगू बढ़लौं। एम्‍हर काका अखि‍यासै छलाह जे चाहक दोकान केम्‍हर छैक। जे पहि‍ने एक-हक गि‍लास चाह पीब लैतौं तखन जे होइतै से होइतै। गाँधीमैदानक उत्तरवारि‍ कातमे धुआँ होइत देखलि‍ऐ। तखन भरोस भेल। सहटि‍ कऽ लग गेलौं। चुल्‍हि‍ पजारनहि‍ छल। ब्रेंचपर बैसेत दू गि‍लास चाहक आग्रह केलौं। समए साफ भऽ गेल रहैक। काका कहलनि‍ जे से नै तँ कोनो टेक्‍सीबलाकेँ ताबत भाँजि‍ ने लि‍अ, जे ओ हवाइ अड्डा जाएत जौं जाएत तँ पाइ कत्ते लेत? एकटा मुँहसच्‍च आदमीकेँ देखि‍ हाक देलि‍ऐ। आबि‍ गछलक। भाड़ा एक साए लेत सेहो कहलक। चाह पीब दुनू बापूत टेक्‍सीमे बैसलौं, बैसि‍ते वि‍दा भेल। दुनू बापूत अनभ्‍ाुआरे रही। नै जानि‍ हमरा कहैमे गलती भेल आकि‍ ओकरा सुनैमे। ओ तँ हवाइ अड्डाक बदला मि‍ठापुर बस अड्डा लऽ अनलक। आब तँ भेल तीतम्‍हा, ओ कहए जे नै सर हमरा तँ अहाँ बस अड्डा कहलौं, हवाइ अड्डा नै। से ने तँ हमरा भाड़ा दि‍अ आ हम जाएब। कनी काल तँ केनादन लागल, मुदा फेर ओकरे कहलि‍ऐ बरनी जे लेबह से लि‍हह मुदा हमरा सभकेँ हवाइ अड्डा उतारह। ओ कहलक ओतए जेबइ तँ और एक साए टाका लेब। ऐ तरहेँ दू साए रूपैआमे हवाइ अड्डा पहुँचलौं।
हवाइ अड्डामे जइठाम परम सि‍नेही श्रीमान् गजेन्‍द्र बाबूसँ साक्षात्‍ दर्शन भेल। नमस्‍कार पाती भेलाक बाद बहुत बेसी उत्‍साहक संग हमरा लोकनि‍केँ अपना गाड़ीसँ हवाइ अड्डाक भीतर लऽ गेलाह। लऽ जाइत जनौलन्‍हि‍ जे हवाइ जहाजक यात्राक की केना नि‍अम होइत छैक। गाड़ीसँ उतरलाक बाद गजेन्‍द्र बाबू हमरा दुनू बापुतक पाँच-सात गोट फोटो खिचलन्‍हि‍। हमहूँ हुनक फोटो अपना कैमरामे लेलौं।
मोबाइलक घड़ीमे सात बाजि‍ गेल छल। हमरा लोकनि‍ एक-दोसरासँ फराक होबक स्‍थि‍ति‍मे आबि‍.....। गजेन्‍द्र बाबू अपना बासापर गेलाह आ हम दुनू बापूत अपन-अपन पहि‍चान पत्र लऽ नीक लोक जकाँ लाइनमे ठाढ़ भऽ गेलौं। जनीजाति‍ जकाँ मोटरी-चोंटरी तँ बेसी छल नै आ ने पंजबि‍या (पंजाब कमाइबला) जकाँ गरमि‍यो मासमे कम्‍मलक मोटा। तँए कोनो दि‍क्‍कतो नहि‍ये भेल। जाँच-परताल करा लेलाक बाद प्रतीक्षालय जा आरामसँ बैसि‍लौं। काकाकेँ कने चाहक खगता बूझि‍ आग्रह करैत अपनो सुतारलौं। ओना आदति‍ भलहि‍ं काकाकेँ छन्‍हि‍ आ से नि‍त्‍य दू बजे स्‍वयं बना कऽ पीबक, मुदा हमरा से नै, पहि‍नहि‍ कहि‍ आएल छी जे भरि‍ रातुक जगरना छल। तँए प्रति‍ कप चालि‍स टाका देबामे अखरल नै। ऐ तरहेँ कि‍छु कालक पछाति‍ पुन: घोषणा भेल आ फेर दुनू बापूत लाइनमे लागि‍ हवाइ अड्डाक भीतर मैदानमे गेलौं। दुइयो डेग तँ ने होइतै तइले अनेरे एकटा बड़का बस छल। जइपर चढ़ि‍ हवाइ-जहाज लग गेलौं। पहि‍ले भरि‍ मन नि‍गहारि‍-नि‍गहारि‍ कऽ देखलौं। पुन: अपना देवता-पीतरकेँ सुमरि‍ हवा-जहाजक सीढ़ीपर चढ़ि‍ भीतर गेलौं। मुँहेपर सि‍लेब रंगक चारि‍टा बच्‍चि‍या नाक-भौह चमका-चमका स्‍वागतमे हाथ जोड़ि‍ अंग्रेजीमे कहलक- वेल्‍कम सर। आ भभा कऽ हँसि‍ देलक जेना पढ़ौल सुगा हुअए। हवाइ जहाजमे सीट दुनू बापूतक एक्केठाम छल। सीट हेरि‍ दुनू बापूत पहि‍ने हबा-जहाजक भीतरक वातावरणक अवलोकन कएल। एना लगए जेना भरि‍ जहाजमे बरफ खसि‍ रहल होइ आ तइपरसँ गम-गम से करैत। बाहरमे जत्ते गर्मी भीतर ओतबए ठंढा कनि‍ये कालक बाद मन एकदम्म शान्‍त भऽ गेल। तेकर बाद दूटा वयस्‍क बालक आबि‍ अंग्रेजीमे कि‍दैन-कहाँदन कहि‍ हि‍न्‍दीमे दोहरौलक। जेकर भाव छल जे हमरा लोकनि‍सँ आग्रह करैत कहल गेल जे आब ई हाबा-जहाज अपना स्‍थानसँ ससमए मुम्‍बइ लेल उड़ान भरत। कुल तीन घंटा तीस मि‍नटक भीतर अपना स्‍थानपर पहुँचत। तँए अपने अपने लोकनि‍ अपना-अपना सीटपर राखल बेल्‍टसँ डाँढ़ बान्‍हि‍ ली। सएह करइ गेलौं। हवाइ-जहाज गुड़कए लगल। करीब बीघा दसे गुड़कलाक बाद वाया मुँहे घूमि‍ अपन दि‍शा आ दशा बना बड़ी जोरसँ गुड़कए लगल। गुड़कैत-गुड़कैत एक्केबर हबा-जहाज साफे कऽ धरतीकेँ छोड़ि‍ अकासमे उड़ए लगल। जी तँ सन् रहि‍ गेल। मुदा कि‍छु कालक बाद स्‍थि‍र भेल। खिड़कीसँ नि‍च्‍चाँ तकलौं। आहि‍रे बल्‍लैया ई तँ कि‍छु कतौ ने देखि‍ऐ। सौंसे उज्जर-उज्जर बादलेटा। बादलक संग हबा-जहाज उड़ल जा रहल छल।
हबा-जहाजक भीतर टेम-टेमपर चाह-जलखै भेटैत रहल मुदा बड़ मगह..। खएर छोड़ू। नअ पाँचमे जे हबा-जहाज खुलल ओ एक-पैंति‍समे मुम्‍बइ हवाइ-अड्डापर पहुँचलौं। करीब पनरह मि‍नटक बाद लोक सभ उतरए लगलाह। पाछू-पाछू हमहूँ दुनू बापूत उतरलौं। उतरि‍ते मुम्‍बइ हवाइ-अड्डा देखि‍ चकबि‍दोर लगि‍ गेल। सभटा तँ देखलो सुनलो नहि‍ये। काकाक सह पाबि‍ कल्‍लौ करबाक लेल एकटा होटल पहुँचलौं। भोजन-साजन कऽ पुन: घूमि‍ हवाइ-अड्डापर आबि‍ लाइनमे लागि‍ सामान चेक-चाक करा टीकट लऽ भीतर प्रवेश कएलौं। काकाक चाह पीबाक समए सेहो भऽ गेल रहनि‍। ई हमरा बूझल छल जे गाममे अपनेसँ बना साढ़े तीन बजेक लबधब पीबै छथि‍न। जहाज तँ चारि‍ चालि‍समे छल। हाथमे एक घंटा समए देखि‍ एक-कप काैफी चारि‍ बीस दस टाकामे कि‍न दुनू बापूत पीबलौं। कनि‍ये कालक पछाति‍ घोषणा भेल पटने जकाँ लाइनमे लागि‍ मुम्‍बइसँ कोच्‍चि‍ लेल भीतर जा बैसलौं। बैसि‍ते अपन घरक गोसाइ आ देव-पीतरकेँ सुमरब सहजहि‍ मनमे आबए लगल। पहुलके जकाँ सभ अनुभव करैत कोच्‍चि‍ पहुँचलौं समए होइत रहै छह चालि‍स। मोबाइलक सुइच ऑन केलौं होइते एकटा संदेश अाएल जे अंग्रेजीमे छल जेकर मैथि‍ली रहए- हम प्रवीन कुमार सहयोगी मोहि‍त रावत दि‍ल्‍ली, उज्जर आ नील रंगक कमीज पहि‍र निकास द्वार लग ठाढ़ छी। हमरा दुनू बापूतकेँ धोती-कुर्ता देखि‍ ओ पुछलनि‍- “अपने जगदीश प्रसाद मण्‍डल? हम प्रवीण कुमार। आउ अपनेक लोकनि‍क गाड़ी ठाढ़ अछि‍ जे होटल छोड़ि‍ देत।”
गाड़ीक चालक आगू बढ़ि‍ दुनू बैंग लऽ सम्‍हारि‍ कऽ रखलनि‍। दुनू बापूत गाड़ीमे बैसलौं आ गाड़ी आगाँ ससरल। करीब चालि‍स मि‍नटक उपरान्‍त एकटा दस मंजि‍ला मकान पूर्णत: वातानुकुलि‍त, गोकुलम पार्क होटल कोच्‍चि‍, लग रूकल। यूनीफार्ममे सजल दरमान होटलक दरबज्‍जा खोलि‍ ठाढ़ छल। गाड़ीक ड्राइवर बाहरक दरबज्‍जा खोललक। दुनू बापूत बहर भेलौं। दरमान झुकि‍ कऽ स्‍वागत केलनि‍। भीतर गेलौं आकि‍ नजरि‍ एकटा अठारह बर्खक नवयौवना अति‍ वि‍लक्षण स्‍वभाववाली हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे नीपुण अपन परि‍चए अंग्रेजीमे देलक। जेकर भाव छल, हम पूर्णिमा सैमसंग कम्‍पनीक तरफसँ सेवामे ठाढ़ छी। कहू हम अपनेक की मदति‍ कऽ सकैत छी? पूर्णिमाक दुनू हाथ जोड़ब, नि‍च्‍चा उज्‍जर तंग जीन्‍स आ ऊपर सुगापाखि‍ रंगक टीसर्ट, नम्‍हर-नम्‍हर कारी भौर केशक कि‍छु लट दहि‍ना कातक छातीपर खसल। ति‍लकोरक फड़ सनक दुनू ठोर लाल टुहटुह। भरि‍ आँखि‍ काजर। खूब नम्‍हर-नम्‍हर हाथ आ पोरगर-पोरगर ओगरी सभ जे कोनो नीक कम्‍पनीक चमकीबला नहरंगासँ रँगल। दुनू हाथ जोड़ि‍ मूर्ति जकाँ ठाढ़ छल। देखि‍ते मन गद्गद् भऽ गेल। जे एहि‍ वयस्‍क वालि‍का एतेक शालीन! हमरा अपनो भाग्‍यपर गौरव भेल जे धनि‍ हमर मि‍थि‍ला, धनि‍ हम मैथि‍ल आ धन्‍य हमर मैथि‍ली। जइ प्रतापे हम दुनू बापूत टैगोर साहि‍त्‍य पुरस्‍कार प्राप्‍त करबाक हेतु मि‍थि‍लाक गाम बेरमा, भाया तमुरि‍या, जि‍ला मधुबनीसँ चलि‍ कोच्‍चि‍ पहुँचलौं।
रि‍सेप्‍सनपर उचि‍त आदर-भावोपरान्‍त रूममे नम्‍बर चारि‍ साए छह केर कुंजी जे ए.टी.एम कार्ड जकाँ छल। पूर्णिमा हमरा सबहक संग आइ ओइ कुंजीसँ रूम खोलल। संगे ओही कार्ड रूपी कुंजीकेँ एकटा दोसर खोल्हि‍यामे पैसौलक तँ भरि‍ घर इजोत पसरि‍ गेल। दू बेडक रूप। उज्जर धप्-धप् गद्दा-तोसक तकि‍या आदि‍ अत्‍याधुनि‍क छल। सामने टेबुलपर एकटा एल.सी.डी, फोन आ चाह बनेबाक सभ सरमजाम छल। चाहक सरमजान देखि‍ते काका तँ गद्गद् भऽ गेलाह कहलनि‍- “दुर्गानन्‍दजी, सभसँ पहि‍ले एकटा चाह पीबू।” सएह कएल।
चाह पीबैत टीबी खोलि‍ कने काल देखलौं। तात् पूर्णिमा मन पड़लीह हुनकासँ हमरा एकटा बेगरतो छल। ओ अपन नम्‍बर देने छलीह डायल केलौं पाँचे मि‍नटक पछाति‍ भीतर एलीह ओही अदाक संग। आग्रहपर बैसलीह। खगता कहलनि‍यनि‍ जे हमर कैमराक बेटरी डॉन भऽ गेल अछि‍ कने चार्ज होइतए। पूर्णिमा हर्षक संग बेटरी लऽ रातुक भोजनक वि‍षयमे सेहो बता देलनि‍। आ ई कहैत बाहर जेबाक अनुमति‍ चाहलनि‍ जे हम अही फ्लोरपर रूप नम्‍बर चारि‍ साए दूमे छी। अपने लोकनि‍केँ कोनो खगता हुअए तँ नि‍:संकोच बजा लेब। हम अहीं सबहक सेवार्थ आएल छी। धन्‍यवाद कहैत दुनू ठोरकेँ वि‍हँुसबैत पूर्णिमा रूमसँ बाहर भेलीह। लागल एना जेना बि‍जली चल गेल हुअए आ रूम अन्‍हार गुज-गुज भऽ गेल हुअए। पछाति‍ थोड़ेकालक, काका मोन पाड़लनि‍ जे भोजनो करबै? हम कहलि‍यनि‍- नि‍श्‍तुकी।
अपन-अपन कुर्ता पहि‍र दुनू बापूत भोजनक लेल द्वि‍तीय तलपर पहुँचलौं। एक नजरि‍ घुमा चारू कात देखलौं। अलग-अलग टेबुल आ कुर्सी लागल। सभ टेबुलपर कनि‍ये टा-टा तोलि‍या, प्‍लेट, उज्‍जर धप्-धप् गि‍लास, पानि‍क बोतल आ काँटा चम्‍मच राखल छल। कने काल धरि‍ दुनू बापूत गुमसुम रहलौं। जे पूछि‍-पूछि‍ परसि‍-परसि‍ खुआओत। मुदा ओतए तँ अपने-अपने परसि‍ खाइबला हि‍साब छल। बड़नी बड़ बेस। एकहक टा प्‍लेट लऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं। जे चीज-बौस चि‍न्‍है छेलि‍ऐ ओ एकाधटा टुकड़ी उठा-उठा अपनो प्‍लेटमे राखी आ कक्कोकेँ दि‍यनि‍। मुदा जे अनचि‍‍न्‍हार चीज-वौस छल तइमे पूछए पड़ए। सेहो हि‍न्‍दीमे नै कि‍एक तँ हि‍न्‍दी तँ कि‍यो बुझबे ने करए। मैथि‍ली कथे कोन जे मैथि‍लो आब टाटा-बाइ-बाइ करैए। तखन पूछि‍-पाछि‍ अपन-अपन पसि‍नक सभ सामग्री लऽ भोजन केलौं। भोजनक तँ वि‍न्‍यासे जुनि‍ पूछू, उत्तर भारतसँ लऽ दक्षि‍न भारतक सभ कि‍थुक पूर्ण बेवस्‍था छल। भरि‍ पोख भोजन दऽ दुनू बापूत आगाँ बढ़लौं देखलौं जे एकटा कराहीमे खीर सन कि‍छु खाद्य पदार्थ छलैक। अपना जोगरक लेलौं। खाइते मन गद्गद् भऽ गेल। तत्‍पश्चात आइसक्रीम लऽ भोजन सम्‍पन्न करि‍ते रही ताबत् मोहि‍त रावत जी हमरा लोकनि‍क खोज-पुछाड़ि‍ करैत लग पहुँचलाह। हाल-चाल भेल। आराम करए गेलौं।
भीनसर तरगरे उठि नहा धो कऽ तैयार भेलौं। जलपान केलाक बाद दुनू बापूत होटलक नि‍चला तलपर आबि‍ सामाचार पत्र आदि‍ देखि‍ रहल छलौं तखने रेणुका वातरा जी एलीह। सबहक कुशल-छेम जानि‍ आनन्‍दि‍त भेलीह। एक-दोसरक परि‍चए-पात भेल। आ हमरा लोकनि‍ ए.जे हाॅलक लेल वि‍दा भेलौं। हॉल देखि‍ मन गद्गद् भऽ गेल। ए.जे.हॉल पूर्णत: वातानुकुलि‍त बैस पैघ हॉल। जइमे हजारक-हजार वि‍द्वान लोकनि‍ बैस सकैत छथि‍। बेस ऊँचगर मंच। जइपर दहि‍नासँ चढ़क लेल आ वायसँ उतरक हेतु सीढ़ी बनल छल।
कथाकार-साहि‍त्‍यकार लोकनि‍क बैसैक बेवस्‍था, मि‍डि‍याबलाक आ आमंत्रि‍त अति‍थि‍क सबहक अलग‍-अलग बेवस्‍था छल। दि‍नक तीन बजे पत्रकार लोकनि‍क संग भेँटवार्ता छल। एक कात सातो वि‍द्वान, कथाकार, उपन्‍यासकार आ कवि‍ लोकनि‍ आदि‍क बैसैक बेवस्‍था छल जि‍नका आगाँ नाओं लि‍खल नेमप्‍लेट छल। आही दीर्घामे रेणुका वात्रा सेहो बैसलीह। बेराबरी सभ वि‍द्वान लोकनि‍ अपन-अपन पोथीक एक झलक अंग्रेजीमे रखलनि‍। तकर पछाति‍ काका अपन पोथी संबंधी वि‍चार मातृभाषा मैथि‍लीमे रखलनि‍। पूरा कक्ष वि‍भि‍न्न प्रकारक कैमराक फ्लैशसँ चमकि‍ रहल छल जेना साओन-भादवक बद्रीमे रहि‍-रहि‍ बि‍जलोका चमकैत रहैत। वि‍चार रखलाक बाद सभ वि‍द्वान लोकनि‍सँ वि‍भि‍न्न प्रकारक प्रश्न लऽ लऽ पत्रकार लोकनि‍ लूझि‍ पड़ला। सौभाग्‍यसँ हमहुँ वि‍देह प्रथम ई पाक्षि‍क पत्रि‍काक सह सम्‍पादकक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करबाक हेतु उपस्‍थि‍ति‍ रही। आ पत्रकार लोकनि‍केँ मैथि‍लीसँ हि‍न्‍दी आ अंग्रेजीमे भरि‍ पोख संतोष प्रदान कएल। पाँच केम्‍हर दऽ कऽ बजलै सेहो नै बूझि‍ पेलौं। सभ कि‍यो ए.जे. हॉलक सभाकक्षमे प्रवेश कएल। अपन-अपन स्‍थान ग्रहण केलौं। आ शुरू भेल टैगोर लि‍टरेचर अवार्डक कार्यक्रम। ई तेसर पुरस्‍कार समारोह छल जेकर आयोजन ऐबेर कोच्‍चि‍मे भेल रहए। जइमे वि‍भि‍न्न भाषामे साहि‍त्‍यक योगदान हेतु सातटा भारतीय भाषाकेँ चुनल गेल, अंग्रेजी, कोंकणी, मैथि‍ली, मलयालम, मणि‍पुरी, नेपाली आ सि‍न्‍धी रहए। जे पुरस्‍कृत कएल गेल। कोच्‍चि‍क बारह जूनक संध्‍या सैमसंग इण्‍डि‍या आ साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा साहि‍त्‍यमे स्‍वोत्तम योगदानक लेल सातो भाषाक लेखककेँ पुरस्‍कृत करबाक लेल तैयार छल। जेकर चयन साहि‍त्‍य अकादेमीक पंच-परमेश्वर द्वारा भेल छल। एक झलक ओइ महान वि‍भूति‍क लेल जे क्रमश: ऐ तरहेँ उपस्‍थि‍ति‍ छलाह- 1. श्री अमि‍ताभ घोष, अंग्रेजी, सी ऑफ पॉपि‍ज, 2. श्रीमती शीलाकोलम्‍बकर, कोंकणी गैर्र, 3. श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल, मैथि‍ली, गामक जि‍नगी, 4. श्री अॅकि‍थम अच्‍युतम् नामबुदरी, मलयालम- अंथि‍मानाकालम, 5. श्री एन. कुंजमोहन सि‍ंह, मणि‍पुरी, एना कैंगे केनवा माटे, 6. श्रीमती इंद्रमणि‍ दरनाल, नेपाली, कृष्‍णा–कृष्‍णा आ 7म श्री अर्जन हसीद, सि‍ंधी, ना अएना ना।
एे कार्यक्रमक मुख्‍य अति‍थि‍, डॉ. एम. वि‍रापा मोइली, ओ.एन.भी कुरूप, एम.पी. वि‍रेन्‍द्र कुमार, श्री अग्रहारा कृष्‍णमूर्ति, सचि‍व साहि‍त्‍य अकादेमी दि‍ल्‍ली आ श्री बी.डी. पार्क प्रेसीडेन्‍ट एण्‍ड सी.ई.ओ. साउथ-वेस्‍ट एसि‍या, मुख्‍य कार्यालय एच.क्‍यू, सैमसंग इलेक्‍ट्रॉनि‍क्‍स छलाह। कार्यक्रमक दौरान नोवेल पुरस्‍कारसँ पुरस्‍कृत महाकवि‍ रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोर केर संबंधमे अपन-अपन बहुमुल्‍य वि‍चार रखलनि‍। कार्यक्रमक उद्-घोषि‍काक रूपमे साहि‍त्‍य एवं कलाक दुनि‍याँक प्रसि‍द्ध टी.भी. एंकर, मॉडल रजनी हरि‍दास द्वारा जबर्दस्‍त प्रस्‍तुति‍ सबहक मनकेँ मोहि‍ लेलक।
कार्यक्रममे पुरस्‍कार वि‍तरण हेतु उद्घोषणक पछाति‍ वि‍जेता वि‍द्वान लोकनि मंचासीन होथि‍ आ पुरस्‍कृत भऽ अपन-अपन स्‍थानपर आपस आबथि‍। पुरस्‍कारक रूपमे गुरूदेव रवि‍न्‍द्रनाथ टैगोरक एकटा बेस कि‍मती मूर्ति, एकटा चि‍क्कन साल एवं एकानबे हजार रूपैयाक चेक प्रदान कएल गेल। बीच-बीच मि‍डि‍याक कैमरा बि‍जलोका जकाँ लौकैत रहल। पुरस्‍कार पाबि‍ श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलजी अपन लि‍खल पोथी गामक जि‍नगीक वि‍षयसँ पूर्व पोथी प्रकाशक श्रुति‍ प्रकाशनकेँ धन्‍यवाद दैत वि‍स्‍तारसँ मातृभाषामे अपन वानगी प्रस्‍तुत कऽ मि‍थि‍ला आ मैथि‍लीक मर्यादाकेँ बढ़ौलनि‍।
कार्यक्रमक समापन भरत नाट्यमक प्रसि‍द्ध नरर्तकी, कलाकार पद्मश्री शोभनाचन्‍द्र कुमार द्वारा भयंकर उत्‍साहपूर्ण स्‍तरीय नृत्‍यक संग भेल। पाँच बजे संध्‍यासँ दस बजे राति‍ धरि‍ बूझू जे छओ आंगुर घीऐमे छल जकर सफलताक श्रेय सुश्री रूचि‍का बत्ता, रेणुका भान, सैमसंग इण्‍डि‍या, बी.डी.पार्क आदि‍केँ छन्‍हि‍। जे समस्‍त कार्यक्रमक दौरान काग चेष्‍टा आ बकोध्‍यानम् रूपमे रहला/रहलीह।
ऐ सबहक पश्चात हमरा लोकनि‍ होटल आबि‍ स्‍वरूचि‍‍ भोजन कऽ आराम केलौं। प्रात: भने चारि बजे भोरमे अभि‍वादनक संग हाथ हि‍लबैत गाड़ीमे बैसलौं। मुदा अखनो ओ हमरा मने अछि‍......। ताबत गाड़ी कोच्‍चि‍ हवाइ-अड्डाक लेल प्रस्‍थान‍ कऽ चुकल छल। राति‍ दस-बजैत-बजैत यात्राक सम्‍पूर्ण आनन्‍द लैत दुनू बापूत गाम बेरमा-गोधनपुर आबि‍ गेलौं।
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चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार
१. बिहनि-कथा - ठकबुद्धि२.आलेख-

Suggested citation: दुर्गानन्द मण्डल. “टैगोर साहित्य पुरस्कारक बहन्ने.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 108, 2012-06-15. https://www.videha.co.in/research/2012/108/टैगोर-साहित्य-पुरस्कारक-बहन्ने.htm

मूल विदेह अंक / Original issue