विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

भीड़तंत्र बनाम भ्रष्टतंत्र

चंदन कुमार झा · 2012-06-15 · अंक 108

भीड़तंत्र बनाम् भ्रष्टतंत्र
भ्रष्टचारक विरूद्ध वर्तमान सामाजिक आंदोलनक "प्रतीक पुरुष" श्री अन्ना हजारे जखन सरकार के अपन कर्तव्यबोध करौलन्हि तखन सत्ता पर बैसल तथाकथित जनसेवक सभके ई आंदोलन संविधान विरूद्ध लागय लागल. सांसद के संसदीय गरिमा पर आघात बुझाय लागल. लोकतंत्र के "तंत्र"क वचाव मे सत्तातंत्र संविधानक दोहाइ देबय लागल. मुदा, लोक के सभ बिसरि गेल. लोकक पीड़ा के सभ महत्वहीन बुझय लागल.
चौहत्तरि बर्षक बुजूर्ग के मात्र एक आह्वान पर जखन देशक कड़ोरो जनता सड़क पर आबय लागल आ' अपन अधिकारक हेतु लड़य लागल तऽ "सत्ता"क नजरि मे ई "भीड़" बनि गेल. सत्तासीन लोक कहय लागल जे देश मे लोकतंत्र अछि भीड़तंत्र नहि. कानून बनयबाक अधिकार मात्र संसद के छैक. मतलब साफ जे चुनावक बाद जनप्रतिनिधि अपना के शासक बुझैत छथि और जनता पर अपन हुकूम चलायब संविधान प्रदत्त अधिकार.जनसेवाक सपथ धय सिंहासन धरि पहुँचला उपरांत ओ सेवा आ शासन मे भेद बिसरि जाइत छथि.ओ बिसरि जाइत छथि जे लोकतंत्र मे लोक प्रधान होइत छैक तंत्र नहि.
यैह भीड़ जखन कोनो चुनावी रैली मे कोनो राजनैतिक दलक झण्डा उठौने एकठ्ठा होइत अछि तखन ई मतदाता बनि जाइत अछि, तखन ई देशक जनता रहैत अछि.नेता एकरा अपन भाग्य-विधाता बुझैत छथि और राजनैतिक रैली मे गेल जनताक प्रत्येक उचित-अनुचित कृत्य जनभावनाक द्योतक कहबैत अछि किएक तऽ यैह मतदाता प्रत्येक नेताक लेल सत्ता-प्राप्तिक साधन होइत अछि.वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य मे राजनीतिज्ञक दृष्टिकोण सँ "मत"क मतलब मात्र चुनाव दिन एकटा वोट सँ अछि.मतदाता के चुनावक बाद अपन अभिमत प्रकट करब चूनल प्रतिनिधि के बर्दाश्त नहि होलइत छैक. ओ एकरा अपन अधिकार मे हस्तक्षेप बुझैत छथि.
जनता जखन नेताक जय कहैत अछि तखन ई देशक जागरूक नागरिक कहबैत अछि. राजनेता सभकेँ ई तखन लोकतंत्रक कर्णधार बुझना जाइत छन्हि.लेकिन यैह जनता जखन सरकारी तंत्रक तन्द्रा तोड़बाक हेतु "भारत माताक जय" कहैत अछि किंवा "वंदे मातरम्" के नारा लगबैत अछि और हाथ मे राष्ट्रध्वज लय कुव्यवस्थाक विरोध मे आवाज उठबैत अछि तखन ई सरकार आ राजनेताक नजरि मे असभ्य, उदण्ड, आ लोकतंत्रक ओ संविधानक विरोधी बनि जाइत अछि.
बात सत्य छैक जे जनता अपन प्रतिनिधि के चुनाव करैत अछि आ बहुमतक आधार पर चुनल एहि प्रतिनिधि सभके भारतीय संविधान जनहित मे नियम-कानून बनयबाक अधिकार दैत छैक मुदा जखन जनप्रतिनिधि आ सरकारी तंत्र अपन एहि संवैधानिक अधिकार के समुचित उपयोग नहि कऽ पबैत अछि और जनहितार्थ कानून बनेबा मे विफल भऽ जाइत अछि तखन जनता अपन अस्तित्व बचेबाक हेतु, अपन भविष्यक निर्माणक हेतु एवं लोक कल्याण हेतु स्वयं ठाढ़ हेबाक लेल बाध्य होइत अछि आ फेर जनभावना आंदोलनक रूप धारण करैत अछि.सामजिक सरोकार लोकतंत्रक आधार होइत छैक लेकिन जखन सरोकारक अर्थ सरकारी शब्दकोषमे संकुचित भऽ जाइत छैक अथवा किछु खास वर्गक लोकक विशेषाधिकार बनि जाइत छैक तखन वंचित समाज अपन सरोकारक हेतु लड़बा लेल मजबूर भऽ जाइत अछि.
भ्रष्टाचारक विरूद्ध वर्तमान जनभावना, यथास्थितवादी भऽ चुकल जनता मे नव-चेतनाक प्रतीक अछि. खास कऽ एहि मे युवावर्गक सहभागिता भ्रष्टतंत्रक लेल स्पष्ट चेतावनी अछि जे आबय बला समय सामाजिक परिवर्तनक समय अछि. समाजक मध्यम एवं निम्नवर्ग मे आयल जागृति ई संकेत दऽ रहल अछि जे लोकतंत्र मे राजा आ प्रजाक बीच कोनो भेद नहि होइत छैक, ई एकटा समतामूलक एवं विकसित समाजक निर्माणक दिशा मे एकटा पैघ एवं महत्वपूर्ण संकेत अछि. सामाजिक न्याय, समानता एवं वंचित समाजक उत्थान, जे एखन धरि मात्र नारा तक सीमित अछि एवं विभिन्न राजनैतिक दलक वोटबैंक-राजनीति के शिकार अछि, एहि दिशा मे आब जन-जागृतिक प्रवल आशा कयल जा सकैत अछि. संभबतः राजनैतिक दल सभ सेहो एहि बदलैत व्यवस्था सँ किछु सिखत और राजनीति मे जनताक सेवा के सर्वोपरि बूझल जायत.
स्वतंत्रता प्राप्तिक बाद एखनधरि समाज के जाति-धर्म, अमीर-गरीब, ईत्यादि विभिन्न वर्गक आधार पर बाँटि प्रत्येक राजनैतिक दल सत्तासुख प्राप्त कयलक अछि. निजी स्वार्थ भारतीय राजनीति के एखन धरि मूल भावना रहल अछि और दिनानुदिन आम जनता एकात होइत गेल अछि. वर्तमान आंदोलन के तोड़बाक हेतु सेहो सत्ता लोलुप समाजक दिस सँ प्रयास कयल गेल मुदा एहिबेर एकर मार्ग मे जे कोनो बाधा-विघ्न आकि कानूनी दाँव-पेचक तिकड़म आयल सभटा घोटाला आ घुसखोरी सँ तंग जनाक्रोशक ज्वारि मे बहि गेल संगहि एकबेर फेर साबित भेल जे दृढ़ इच्छाशक्ति, आत्मबल, आ संयम लक्ष्यप्राप्तिक अमोघ अस्त्र अछि. ई तखन और आसान भऽ जाइत छैक जखन केयो एहन मार्गदर्शक समाज के भेटि जाय जकरा पर सभ के विश्वास हो.
एहना मे जखन देशक प्रधानमंत्री, देशक सर्वोच्च संवैधानिक संस्था, संसदक पटल सँ एहि आंदोलन और आंदोलनकारी के सलाम ठोकैत छथि और देर-सवेर समस्त जन-प्रतिनिधि जनता के अपन मालिक मानय लेल बाध्य भऽ जाइत अछि तखन " जनताक इच्छा संसदक इच्छा" बनि जाइत छैक. संगहि सत्तालोलूप और चाटुकारी सभके संकेत दैत अछि जे जनआंदोलन लोकतंत्रक कारक होइछ संहारक नहि.
करीब एकबर्ख पहिने "मिथिला समाद " मे प्रकाशित
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Suggested citation: चंदन कुमार झा. “भीड़तंत्र बनाम भ्रष्टतंत्र.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 108, 2012-06-15. https://www.videha.co.in/research/2012/108/भीड़तंत्र-बनाम-भ्रष्टतंत्र.htm

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