मैथिली युवा रचना-धर्मिता :: परंपरा परिवर्त्तन आ भविष्य
“रचनाक धर्मिता, साहित्य सृजनक धर्म एवं ओकर भविष्य” कतेक महत्वपूर्ण विषय अछि। प्रतिपाद्य विषयपर जतबा रचना पढ़ल गेल संभव, विचारणीय अछि। सन्दर्भक मूल अछि इमानदारीसँ, निष्पक्ष भऽ रचना करब, रचना एवं रचनाकारक धर्म-कर्म यएह थिक। धर्म-कर्म, काम-धाम दुनूक प्रयोग अपना सबहक बीच होइत आएल अछि, सभ बजैत आएल छी, रहै छी। विचारणीय अछि जे जहिना कर्म-धर्म, ओहन काजकेँ कहल जाइत जे धर्मक रास्तासँ चलैत अछि। आ कर्मक अर्थ काम सेहो होइत अछि। जेकरा संग धाम शब्दक प्रयोग होइत अछि- काम-धाम। धाम अलंकार रूपमे प्रयोग होइत अछि जेकर तात्पर्य स्थानसँ होइत अछि जेना वैद्यनाथ धाम। स्पष्ट अछि अपना सबहक धाम मिथिला थिक, मिथिला धाम। आ मिथिलाक विकास उद्देश्य।
जइ देशमे अनेको भाषा, अनेको जाति-सम्प्रदय एक संग डेग-मे-डेग मिला चलैत आबि रहल अछि। हमरा सभकेँ ओइ शक्तिकेँ चिन्हबाक अछि, पकड़बाक अछि एवं मजगूतीसँ पकड़ि रखबाक अछि। जे एतेक पैघ देशकेँ एक तागमे बान्हि कऽ रखने अछि। आ ई चीज कोनो आइये नै भेल, अदौसँ आबि रहल अछि। उदाहरण लेल अहाँ कोनो गामकेँ लऽ लिअ। गामक श्रेष्टता ओइ गामकेँ होइ छैक जइ गाममे छत्तिसो वर्णक बास अछि। ऐ छत्तिसो वर्णकेँ आर्थिक आ वौद्धिक रूपमे देखल जाए तँ गरीबसँ गरीब (भिखमंगा) आ अमीरसँ अमीर छथि। जहिना निम्नसँ निम्न जाति एवं उच्चसँ उच्च जाति सेहो गाममे समाजमे बसै छथि। मुदा सामाजिक बंधन ओहन अछि जे सभ अपना-अपना सीमामे स्वतंत्र रूपसँ जीब रहल छथि। देखि सकै छी, सोचि सकै छी जे एक्के गामक एक धरतीपर भिन्न-भिन्न सम्प्रदायक उत्सव-समारोह साले-साल होइत आएल अछि, होइत रहैए।
हमरा सभकेँ ऐ सभ महत्वपूर्ण विन्दुपर विचार कऽ ओइ शक्तिकेँ अक्षुण्न रखबाक दायित्व बनैत अछि। जइसँ मात्र वर्त्तमाने नै भविष्य सेहो सशक्त रहत एवं दुनियाँक समक्ष जइ विशेषताक लेल अपन सबहक पहिचान अछि सेहो बनल रहत।
समस्या जटील जरूर बूझि पड़ैए मुदा समाधानक उपाय सेहो समाजेमे अछि। समाजेक भीतर अछि। जे सनातनी पद्धति माने परिवत्तनीय पद्धतिसँ समाधान कएल जा सकैए। हँ एहेन जरूर भऽ गेल अछि जे आकाश-पातालक दूरी बीचमे बनि गेल अछि। मुदा की हम सभ हाथ-पएर समेटि थुसुकुनिया मारि ली? सीरा नै भट्ठा दिसि दहाइत रही? अपना महत्वकेँ बिसरि जाय? नै। बल्कि, कान ठाढ़ कऽ सुनबाक, बुझबाक एवं किछु करबाक लेल अपनाकेँ तैयार करबाक चाही। अपन मिथिलाक वैदिक पद्धतिपर नजरि लऽ जाए इमानदारीसँ बुझबाक अछि। भारतीय चिन्तनधारामे पातालोसँ आकाश आ आकाशोसँ पाताल आबि जाए तकर संवाद परिचालन होइत रहल अछि। दृढ़ता अनबाक लेल ऐठाम एकटा कहावत मोन पड़ि रहल अछि जे कहबी छै ‘बिना कारणे टिटही नै लगै छै।’
मूल प्रश्न अछि- समाज केना सशक्त बनए, देश केना सशक्त बनए। ऐ दायित्वकेँ बूझि रचनाक सृजन हेबाक चाही। तँए साहित्य की? साहित्य दर्पण आकि दर्शन?
साहित्य दर्पण थिक, मात्र कहने व्यापकताक अभाव बनल रहि जाइत अछि। दर्पणक शीशाक एक भागमे पॉलिश कएल रहैत अछि। जेकर परिणाम होइत अछि जे ओ एकभगाह भऽ जाइए। युवा साहित्य सृजक भाय-बहिन, अपना सभकेँ विचार करबाक आवश्यकता अछि जे साहित्य आखिर छी की? दर्पण आकि दर्शन? जइमे चारू दिशा देखल जाइत अछि।
भौगोलिक भाषामे दिशा िनर्धारित अछि, पूब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचा इत्यादि। मुदा दर्शानिक भाषामे वएह चीज विचारधारा कहबैत अछि। जे परिवक्व भेलापर दर्शनसँ दिग्दर्शन बनि जाइत अछि। आ वएह विचारधार रूपमे आगू सेहो बढ़ैत अछि। अहीठाम हम सभ विचार करी जे हमरा सबहक लक्ष्य केहेन हेबाक चाही ओइ पॉलिश कएल एकभग्गु शीशा सन जे मात्र एक दिशा देखि एकभग्गु भेल रहत? नै। बल्कि ई सोचबाक अछि जे चारू दिशा केना देखब, चौमुखी एवं सर्वांगिन विकास केना होएत। तइ लेल ओहन दर्शन, ओहन दृष्टिकोण या फेर ओहन विचारधारकेँ पकड़ि चलबाक अछि आ रचना करबाक अछि। जइमे हमर सबहक विविधता, व्यापकताक रक्षा भऽ सकए। साहित्य समाज वा देशक ओहन सम्पति छी जे कठीन-सँ-कठीन परिस्थितिक रस्तो बतबैत अछि आ आगू बढ़ैक उपाए सेहो करैत अछि। मुदा तइ लेल समाज आ देश-दुनियाँक गहन अध्ययन, चिन्तन-मननक संग रचनाक जरूरति अछि।
भारतीय चिन्तनधारा ओहन िचन्तनधारा थिक जेकरा समुचित ढंगसँ रखलापर केहनो अन्हर-तुफान किएक ने उठौ मुदा ओहन डोलान नै डोलत जेहन डोलैत रहैए या फेर डोलबाक भय बनि गेल अछि। मुदा तइ लेल हमरा सभकेँ थोड़ेक व्यापकता दिसि बढ़ए पड़त, समाज दिशि बढ़ए पड़त। व्यक्तिवादी आ जातिवादी सोचसँ ऊपर उठि सामाजवादी एवं साम्यवादी सोचक पूजारी बनबाक खगता अछि।
हमरा अहाँक मात्र नै जन-जनक दायित्व अछि जे संग-संग चलि दुनियाँक बीच अपन मातृभूमि, मातृभाषा, साहित्य, संस्कृतिकेँ ओइ रूपेँ जीवित बना कऽ राखी जे समृद्धशाली देशक मुख्य पहिचान अछि।
आब अपन वक्तव्यमे विराम दैत एक फराक प्रसंगपर विचार करब आवश्यक बूझि आदेश लिअए चाहब आ कहब चाहब जे आजुक ऐ संगोष्ठिक आयोजक साहित्य अकादेमी अछि। जे प्राय: साहित्य समृद्धि लेल गोष्ठी-संगोष्ठि करबैत रहल अछि। किछु दिन पूर्व कोलकातामे सेहो भेल छल। आ होइते रहैत अछि। से प्राय: राजधानी, नगर-महानगरमे होइत रहैए। ओना प्रवासी मैथिली सेवी लेल हेबाको चाही। जे सभ जनै छी। मुदा गोष्ठी गामो-घरक शहर-कसबामे हुअए जेना झंझारपुर, मधेपुर, सकरी, धनश्यामपुर, मधुबनी, जयनगर, लोकहा, फुलपरास, िनर्मली, कुनौली, भपटियाही, सरायगढ़, या फेर पूर्णिया-समस्तीपुरक गामक कसबामे। ई सभ मैथिलीक नेटिव स्पीकर क्षेत्र छी। ऐ सभ क्षेत्रमे सेहो गोष्ठी-संगोष्ठी हेबाक चाही। ऐसँ आरो साहित्यकार सभ सोझा औताह। संभव, जे दिल्ली-मुम्बइ, कोलकाता आ पांडीचेरीक गोष्ठीसँ बेसी लाभदायक सिद्ध हुअए। खरचो कम आ लाभो बेसी, जइसँ एकान्त बासक साहित्य सृजक लोकनि मात्र नै अपितु पाठाकोक संख्यामे अप्रत्याशित वृद्धि होएत। जन-जनमे उत्साह सेहो जगत जइसँ हम सभ मजगूत हएब।
काल्हियो कवि गोष्ठीक आयोजन हुअएबला अछि संभत: अही परिसरमे। ओइमे एकैसम शताब्दीक पहिल दसकक सर्वश्रेष्ठ कवि राजदेव मण्डल आ आन-आन कतेको कविकेँ कोनो सूचना नै छन्हि। जे दुखत अछि। आ ऐ तरहक सूची बनौनिहार लोकनिक सोचमे कि छन्हि से वएह सभ बता सकताह। ओ लोकनि गामक माटि-पानिमे लटा कऽ जीवकोपार्जनक संग साहित्य सृजन करैत रहलाहेँ। हुनको सभकेँ सूचना हेबाक चाहैत छल। ओतबे नै, अझुको गोष्ठीमे बहुतो युवा रचनाकार जेना उमेश पासवान, आशीष अनचिन्हार, चन्दन झा, संजीव साफी, विनीत उत्पल, संजय कुमार मण्डल, ज्योति सुनीत चौधरी, मुन्नी कामत, अमित मिश्र, अखिलेश कुमार मण्डल, सुमित आनन्द आ मनोज कुमार आदिकेँ कोनो सूचना नै देल गेलनि।
अंतमे, प्रसंगसँ हटि चरचा कएल जे आवश्यक छल। जौं ऐसँ किनको दुख पहुँचल हेतनि तइ लेल क्षमा मंगैत एकबेर फेर साहित्य अकादेमीक संग अपने लोकनिक प्रति सादर आभार व्यक्त करैत अपन वाणीकेँ विराम दैत छी।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।