विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

उजड़ैत गाम: बसैत शहर?

डा. अरुण कुमार सिंह · 2012-07-15 · अंक 110

उजड़ैत गाम : बसैत शहर?
की कहू, बहुत दिन पर 1जून 2012केँ महावीर हास्पीटल गेल रही। हास्पीटल की गेलहूँ, मित्र मंडली संग कोशी कात जएबाक अवसर परि लागि गेल। अवसरो एहन जे नागो बाबू सेक्रेटरीक नातिक जन्म-दिन पटनासन शहरकेँ छोड़ि कोशीक कछेर पर बसल ‘बलुआहा’ आ पूर्वी तटबन्धक कात मे स्थापित महिषी प्रखंडक एकलौता कॉलेज, माने शिक्षकक, छात्रक, समाजक कॉलेज नहि अपितु सेक्रेटरीक वैयक्तिक सम्पत्ति, मे मनाओल जा रहल छल। एहि अवसर पर शिक्षित आज्ञाकारीक फौजमे हमहूँ समाहूत छलहुँ। जहिना ओहि ठाम पहुँचलहुँ कि सेक्रेटरीक नजरि हमरा पर पड़तहि कहि उठलाह, “ओ अरूण बाबू! कहिया अएलहुँ, खोजो- खबरि नहि रखैत छी। अपनेतँ मैसूर जाएकेँ हमरा सबकेँ बिसैरियै गेलहुँ। आब हम हिनका सभक लेल कतेक खटू। आब हमरो उमैरि भेल। अहाँ तँ जनितै छियैक, जे काज टाकासँ हैतेक ओ तँ टकै करतै ने। देखियौ ने टाकाक अभावमे कॉलेजक छतक ढलाई रूकल अछि आ, एकटा बात बुझलहुँ कि नहि, एहि बेरसँ फस्ट पार्ट मे एडमिशन सेहो होएत।” तखनहि हुनक नाति आबि कहैत छनि जे- “नानाजी हमरा पैसाब लागल अछि, हम कतए पैसाब करब, एहि ठाम कतहुँ बाथरूम कहाँ देखैत छियैक? ताहि पर ओहि ठाम जमकल बैसल एम.ए. पाससभमे सँ केओ बाजि उठलाह- ‘एतेकटा फील्ड अछि कतहु अहाँ पैसाब कए लिअ।’ ओ बच्चा कनेक काल चुप रहल आ सोचैत बाजि उठल- ‘एना कतहुँ खूजलमे बाथरूम कएल जाइत छैक, जँ इन्फेक्शन भए जाएत तँ?’ नामी-गिरामी विश्वविद्यालयसभसँ प्राप्त डिग्रीधारीक लेल एहि प्रश्नक कोनो उत्तर नहि छल। अच्छा छौड़ू, हमहूँ कोन फेरामे फँसि गेलहुँ, आधुनिकता - वैज्ञानिकता एवं प्रकृति - परंपरामे ओझराएल जा रहल छी। अखन जन्म-दिनक केक कटबामे एवं मासुक भोजमे बिलम्ब छल। भगवान जी, अरबिन्द जी, प्रांजलभाइजी एवं विजय जीक विचार भेल जे किऐक नहि एहि बीचक समयमे कोशी पर बनैत पूल देखल जाय। सभगोटे ए.सी.सँ सुसज्जित गाड़ीमे बैसि कोशी बान्ह दिस बिदा भेलहुँ जे कॉलेजसँ मात्र एक किलोमीटर पर छल। ‘बलुआहा’ बाजारमे ओ लोकनि अपन-अपन पसिन्नक हिसाबसँ खएबा-पिबाक लेल वस्तु-जात किनैत गेलाह। गाड़ीकेँ बान्ह पर लगा सबगोटे ओतुका दृश्य एवं बनैत पूलक कार्यकेर गतिशीलताक आनन्द खाइत-पीबैत लेब प्रारंभ कएल। एहि ठाम हम एकटा बात कहि दी जे विजय जी, जे अपन पंचायतक प्रधान (मुखिया) सेहो रहि चुकल छथि, सहरसा जिलाक महिषी प्रखण्डक सबसँ पैघ जमींदार स्व. गंगा बाबूक एकलौता पुत्र थिकाह। करीब सतरह वर्ष पहिने प्रो. (डॉ.) सुभाषचन्द्र सिंह (मैथिली प्राध्यापक, ए.एन.कॉलेज, पटना)जीक आवास बहादुरपुरमे हुनकासँ परिचय भेल छल एवं परिचय आत्मीयतामे परिवर्त्तित भेलोपरांत ओ कहने छलाह कहियो अहाँ हमर गाम चलू; हम अहाँकेँ कोशी नदीमे नाह पर बैसा झिलहरिक संग कोशीक ओहि पारक अपन कचहरी (कामत, बासा) देखाएब। समय सापेक्ष नहि भेलाक कारणेँ एहन संभव नहि भए सकल छल। मुदा आइ कोशी बान्ह पर गप्पक क्रममे ओतेक वर्ष पहिलुका बात चलि पड़ल। ओ बाजि उठलाह- ‘अरूण जी आब हमर कचहरी पर चारि चक्का चलि जाइत अछि।’ हम ई सुनि विस्मिततँ भेवे कएलहुँ, अविश्वसनीयता सेहो हुलकी मारि रहल छल। बान्हे पर सबगोटेक बिचार भेल जे तेसर दिन हम सब कोशीक ओहि पार कचहरी पर जाएब एवं ओहि ठाम दिन-रातिक भोजन कए रातिएमे आपस भए जाएब। विजय जी ओतहिसँ मोबाइलक माध्यमे अपन कचहरीक मैनेजरकेँ बीस-पच्चीस गोटेक दिनुका एवं रतुका भोजनक व्यवस्था करबाक लेल आवश्यक निर्देश दए देलन्हि। पछाति हम सब कॉलेज आबि भोजनोपरांत सहरसा घुरि गेलहुँ।
पूर्वनिर्धारित कार्यक्रमक अनुसारेँ कोशीक पूबरिया एवं पछबरिया धारक बीच अवस्थित झारा पंचायतक शिशौना गाम जएबाक जे तिथि निश्चित छल ओकरा प्रति हम कनेक उदासीन छलहुँ, किएकतँ सूर्य भगवानक प्रकोपक कारणेँ प्रचण्ड गरमीमे घरसँ बहराएब लू केँ आमंत्रण देब सन छल। की कहू! निर्धारित तिथिकेँ फोनक घंटी बाजब प्रारंभ भए गेल एवं हमरो जाइऐ पड़ल। सहरसासँ जाइबलाक लेल दूटा ए.सी. युक्त स्कारपियो लागल एवं हम सब ओहिमे सबार भए बिदा भए गेलहूँ ‘उजड़ैत गाम आ बसैत शहर’क वास्तविकताक अवलोकनार्थ। ए.सी.युक्त गाड़ी एवं ढण्ढ़ा पेय पदार्थक कारणेँ यात्रामे कोनो बेसी तकलीफ नहि भए रहल छल। हम सब बलुआहामे कोशी पर बनै वला पूल टपि ओहि पार शिशौना गाम दिस बढ़लहुँ। ओहि पंचायतक प्रधान (मुखिया) श्री अरूण यादव जनिक पैतृक गाम शिशौने छनि, सेहो हमरा सभक स्वागतार्थ एवं रस्तामे कोनो तरहक तकलीफ नहि हो, ताहि लेल हमरासभक संग छलाह। कामत पर शीघ्रताशीघ्र पहुँचबाक लेल सड़क मार्गकेँ छोड़ि कोशी नदीक काते कात गाड़ी बढ़ए लागल। बाढ़ि अएबासँ बहुत पहिनहि कोशीक कटनियाँ एवं ओहिसँ उपटैत लोकक दृश्यसँ हृदयतँ द्रबित भेवे कएल, अपितु कोशी मैयाक एहन ताण्डवसँ डरो भेल जे कहीं हमरहुँ सभक गाड़ी कटनियाँक कारणेँ नदीमे नहि समा जाय। ओहि ठामक लोकक जीवनकेर मार्मिक चित्रण मैथिली साहित्यकेँ के कहय, भारतक आनेको साहित्य मध्य विद्वान लेखक लोकनि प्रस्तुत कए चुकल छथि, तेँ ओतुका दुरूहताक हम की बखान करू, एहन शब्द-सामर्थ्य हमरामे नहि अछि। ए.सी. युक्त गाड़ी रहलोपर हमसब सुरूज भगवानक प्रकोपक पूर्ण अनुभव कए रहल छलहुँ, परंच ओहि ठामक नेना-भुटका, वृद्ध-वणिता सभ केओ अपन-अपन काजमे मस्त छल। कोशीमैयाक धारमे छोट-छोट नेना-भुटकाकेँ उमकैत देखलहुँ तँ हमर देहक रोइयाँ डरसँ भुटकए लागल जे कही ई सब भासि ने जाए। ओ सबतँ जेना एहन स्थितिसँ अनभिज्ञ अपनामे मस्त भए कोशीमैयाक धारमे निश्चित भए उमकैत छल जेना मायक कोरामे नेना।
खेत वा खेतक बीच टायर गाड़ी एवं ट्रैक्टरक लीख पर चलैत हमरहुँ सभक गाड़ी धूरा उड़बैत, खीरा, ककरी, परोड़, सजमनि, कदीमा, मुंग एवं मकईक भुट्टाक ठाम-ठाम लागल ढ़ेरीक अनुपम दृश्य देखि लागल जेना अनपूर्णा स्वतः एहि ठाम बास करैत होथि, गंगा बाबूक कचहरी एवं युवा प्रधान अरुण यादवक गाम पहुँचि गेल। शिशौना पहुँचतहि सम्पूर्ण गामक लोक स्वागतार्थ एवं जिज्ञासार्थ आबि गेलाह। महपुरा निवासी श्री रामनरेश सिंह उर्फ ‘मुखियाजी’ आकाशवाणी पटना, विजयजी, प्रांजल भाईजी एवं अरबिन्दजीकेँ ओतुक्का लोक पहिनहिसँ चिन्हैत छलतेँ हुनका सभकेँ ओ लोकनि नाम एवं सम्बन्धक आधार पर प्रणाम करैत गेलाह। हम, मदनेश्वर ठाकुर उर्फ ‘भगवान जी’ (महिषी), मिथिलेश, लक्ष्मण एवं सिकन्दरकेँ औपचारिकता एवं आतिथ्यवश प्रणाम करैत बैसाओल गेल। अरूण यादव जे ओहि गामक बेटाक अतिरिक्त विकासपुत्र प्रधान (मुखिया) एवं विजयजी, जे ओहि गामक जमीन्दार छथि, दुनूक लोकप्रियता ओहि ठाम एकत्रित ग्रामीणक आवभगतसँ बुझना गेल। किछु समयोपरांत विजयजीक इशारा पर खस्सीक मासु, भात, रोटी, सलाद एवं दहीक संग भोजन लगाओल गेल एवं हम सब भोजनोपरांत आरामक मुद्रामे आबि गेलहुँ। पाँच-छओ बजे साँझक लकधक हम सब कोशीक पछबरिया धार, जे बेलदाबर नदीक नामसँ जानल जाइछ एवं एहि नदीमे कोशीक कोनो धारसँ पैघ माछ पाओल जाइछ, क कात गेलहुँ, जतए हटिया लागल छल। हम सब ओहि बेलदाबर नदीक कछेर पर छोट-छीन हटियाक अवलोकन कएलहुँ एवं पान खाइत ओतुक्का स्थिति पर बात करैत रहलहुँ। हम एवं मुखिया जी (आकाशवाणी, पटना)केँ छोड़ि सभ गोटे बेलदावर नदीमे उतरि खूब उमकैत गेलाह एवं भगवान जी ओहि क्रममे अपन गरक सोनाक बनल मायतारा मैयाक चकती सेहो गमा देलनि।
झलफल भेलोपरांत हम सब कचहरी पर आपस अबैत गेलहुँ। गरमीक अधिकताक कारणेँ ओहि गामक दुइ मंजिला स्कूलक छत पर ओछाओन लगाओल गेल एवं हमसब ओहि ठाम आराम करए लगलहुँ। शिशौनाक पूव भागमे एकटा पैघ भवनक निर्माणकार्य देखि हम पूछि बैसलहुँ जे एतेक पैघ पक्का के बनबा रहल अछि, ताहि पर ओतुक्का मुखियाजी अरुण यादव कहलनि जे ई बाढ़ि राहत सेन्टरक रूपमे सभ गाममे बनाओल जा रहल अछि। कोशीक ढ़ेबमे बसल गाममे दू महला स्कूल, बाढ़ि राहत भवन, कतहु सौलिंग युक्त सड़क तँ कतहुँ-कतहु कच्ची सड़क, जे एक गामसँ दोसर गामकेँ जोड़ैत, एतबे नहि गामक बीचो-बीच सिमेन्टसँ ढ़ालल सड़क देखि एवं ओतुक्का लोकक मुँहसँ नीतिश राज्यक सुशासनक बखान सुनि बिहारक कल्याणक संभावना जगैत देखलहुँ। रातिमे हमसब फेर भात-रोटी, माछ, सलाद एवं दहीक संग भोजन कएलहुँ एवं पान खाए सहरसा आपस जाए देबाक आग्रह कएल तँ ओहि ठामक लोक कहए लगलाह जे एना कतो भेले यै, जे एतेक रातिकेँ द्वारि परसँ अतिथि बिदा होएत। गौंआ सबकेँ मनबैत हम सभ बिदा भए सहरसा अपन-अपन आवास पर पहुँचि गेलहुँ । मुदा हमर मनमे बसल‘उजड़ैत गामःबसैत शहर’क संगक संग, जे ओही ठाम सभ तरहेँ खारिज होइत प्रतीत भेल, सद्यः देखल कोशीक बीच बसैत गाम शिशौना, ओहि ठाम निवास करैत निश्च्छल लोकक सम्पूर्ण विकास दिस उठाओल सरकारक डेग आओर तेज कोना हो ताही बीच ओझरा गेल।
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चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार

Suggested citation: डा. अरुण कुमार सिंह. “उजड़ैत गाम: बसैत शहर?.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 110, 2012-07-15. https://www.videha.co.in/research/2012/110/उजड़ैत-गाम-बसैत-शहर.htm

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