विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा

डॉ. अरुण कुमार सिंह · 2012-09-01 · अंक 113

मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा
किछु समयसँ देशमे उच्चशिक्षाक माध्यम एवं विषयवस्तुकेँ लए कए विमर्श चलि रहल अछि। एक दिस बाबा रामदेव अनशनक समय अपन मांग मे भारतीय भाषाक माध्यमसँ उच्च शिक्षाक मांग रखलन्हि, तँ दोसर दिस मुंबई उच्च न्यायालयक एक गोट फैसलामे कहल गेल अछि जे लोक सेवा आयोगक अंतिम परीक्षा अर्थात् साक्षात्कारमे परीक्षार्थी अपन मातृभाषामे जबाब दए सकैछ। एक तरहेँ ई कार्यपालिका पर दुईतरफा दबाब अछि । एक दिसतँ लोकतांत्रिक दबाब जनसमूहक रूपमे रामलीला मैदानमे जमा भएकेँ, तँ दोसर दिस न्यायपालिका भारतीय भाषाक पक्षमे निर्णय दए केँ। विश्वमातृभाषा दिवसक अवसर पर दिल्लीमे बुद्धिजीवी एवं लेखकक प्रतिनिधिमण्डल सरकारकेँ एक गोट विज्ञापन देने छलाह, जाहिमे कहल गेल छल जे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी नियमावलीमे पी.एच.डी.क लेल अनिवार्य दुई शोध-पत्रमे सँ एक मातृभाषामे हो। एहि तरहेँ देखल जा रहल अछि जे अंग्रेजीकेँ कात करैत भारतीय भाषाकेँ प्रश्रय देबाक बात शुरु भए चुकल अछि । मातृभाषा ओहन भाषा होइछ, जकर माध्यमसँ कोनो नेता अपन घर, परिवार आओर समाजकेँ बुझि पबैछ। पहिल भाषा होएबाक कारणेँ मातृभाषे कोनो व्यक्तिक चिंतन-प्रक्रियामे कार्य करैछ। एहि लेल प्रतिभाक सभसँ पैघ अभिव्यक्ति पहिल भाषे मे होइछ। जँ कोनो व्यक्ति बहुभाषी अछि तँ ओ पहिल भाषाक पृष्ठभूमि पर कोनो दोसर भाषा सीखैछ आओर एक तरहेँ चिंतन-प्रक्रियाक बीचे मे मातृभाषा आओर दोसर भाषाक बीच अनुवाद करैत रहैछ। एहि स्थितिमे ओ दोसर भाषामे कतबा निपुण अछि ई एहि पर निर्भर करैछ जे ई मानसिक अनुवाद ओ कतबा कम समयमे कए पबैछ। संविधान स्वीकृत 22 भाषामे जतबा उच्च शिक्षण कार्य भए रहल अछि, ओहिसँ बहुत बेसी एक मात्र अंग्रेजी भाषाक माध्यमसँ भए रहल अछि। आब प्रश्न उठैछ जे जाहि शिक्षण-पद्धतिकेँ मैकालेक विरासत एवं आओर अंग्रेजी साम्राज्यक विस्तार कहल जाइछ, ओकर कोनो ठोस विकल्प आइ धरि किएक नहि उभरि पाओल? एकर प्रमुख कारणमे भारतीय भाषाक आपसी संघर्षकेँ नजरअंदाज नहि कएल जाए सकैछ। दोसर ई जे एहि भारतीय भाषाक ज्ञान-परंपरामे कतए धरि पहुँच अछि? की आइ प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, चिकित्सा, विधि, प्रबंधन आदि विधाक उच्चतम रूपकेँ भारतक कोनो क्षेत्रीय भाषामे सहजतासँ अभिव्यक्त कएल जाए सकैछ? हमरा बुझने कठिन अछि। एहन बात नहि अछि जे भारतीयभाषाक क्षमता संदिग्ध अछि, जखनकि लोकभाषाक शब्द-सामर्थ्य बहुत रास भाषाक तुलनामे समृद्ध अछि। मुदा विषयवस्तुक उपलब्धता एकटा पैघ समस्या अछि। एहि बातकेँ सहर्ष स्वीकार कएल जएबाक चाही। ओनाहूँ कोन भाषामे कीसब सामग्री रहबाक चाही ई भाषा नहि, अपितु समाजक जिम्मेदारी होइछ। जँ भाषा दरिद्र अछि, तखनो आर समृद्ध अछि तखनो।
विकासक अपन परिवेश आओर अपन शब्दावली होइछ, जकरा दोसर भाषामे सम्पूर्ण रूपसँ घुलि-मिलि जएबामे सालक-साल लागि जाइछ। उदाहरणस्वरूप ‘हेलो’ शब्दकेँ लेल जाए सकैछ। कहल जाइछ जे अमेरिकी आविष्कारक थॉमसन पहिल बेर टेलीफोनसँ ई जानबाक लेल जे ओकर आबाज पहुँचि रहल अछि कि नहि ताहि लेल ‘हेलो’ शब्द बजने छल। तहियासँ आइ धरि टेलीफोनक कतेक स्वरूप सोझ आएल, मुदा पहिल बेर बाजल शब्द ‘हेलो’ मे कोनो परिवर्त्तन नहि आएल। जँ इएह आविष्कार भारतमे भेल’ रहैततँ ई पहिल शब्द कोनो-ने-कोनो भारतीय भाषाक शब्द रहल होएत।
जँ आत्मालोचनक दृष्टिसँ देखल जाए तँ भारतीय भाषाक वैज्ञानिकता पर कोनो संदेह नहि अछि। मुदा ओहिमे अभिव्यक्त विज्ञानकेँ संदिग्धताक घेरासँ बाहर नहि लाबल जाए सकैछ। किएकतँ विज्ञान एहि भाषामे जन्म नहि लैछ, अपितु अनुदित होइछ। आय जँ एक दिस विश्व बजार पर स्थापित होएबाक प्रतिस्पर्धा चलि रहल अछि तँ दोसर दिस अपन क्षेत्रीयताक पहचान समाप्त नहि भए जाए तकर दबाब सेहो देखल जाए रहल अछि। एहन परिस्थितिमे भारतमे उच्च शिक्षामे स्थानीय भाषाक प्रयोगक चहुँदिस मांग एक स्वागतयोग्य डेग भए सकैछ। परंच ओकर स्थायी स्तित्व तखन रहत जखन मूल एहि भाषामे पल्लवित-पुष्पित हो। भाषा अभिव्यक्तिक साधन होइछ; आत्माक अभिव्यक्तिक आओर सत्ता अभिव्यक्तिक सेहो। वर्त्तमान मांगक फलस्वरूप जाहि लोकभाषासँ भूख आओर प्रतिरोध अभिव्यक्त होइछ एवं एकरा माध्यमेँ सत्तामे घूसपैठक चर्चा सेहो भए सकैछ। की ई प्रयास सत्तासीन वर्गकेँ मंजूर भए सकैछ? तेँ ई देखब बेस उत्सुकताक विषय होएत जे कोर्टक फैसलासँ लाभान्वित होइत छात्र मातृभाषामे साक्षात्कार दए केँ चयनित होएबामे कतबा सफल होइछ।
भारत एक बहुभाषिक देश अछि, जतए 1652 मातृभाषा अछि। संविधान जाहि 22 भाषाकेँ मान्यताक देलनि अछि ओहो कोनो अंतिम भाषा नहि अछि। संवैधानिक मान्यताक लेल बहुत रास भाषा-भाषीक एक पैघ समूह बरोबरि सक्रिय अछि, आओर कोनो एहन तर्क नहि अछि जकर आधार पर एकर सक्रियताकेँ नजरअंदाज कएल जाए सकैछ। जखन कोनो भाषा रोजगारसँ जुड़ैछतँ एहि तरहक प्रयासकेँ आर बल भेटैछ। ओनातँ मैसूर स्थित भारतीय भाषा संस्थानक अन्तर्गत भारतीय भाषाक भाषा वैज्ञानिक सांख्यिकी संकाय’मे नेचूरल लेंग्वेज प्रोसेसिंगक माध्मयमे मैथिलीकेँ मशीनसँ जोड़बाक काज प्ररांभ भए गेल अछि संगहि राष्ट्रीय अनुवाद मिशन ज्ञानपरक पोथीक भारतक 22 भाषामे अनुवादक योजनापर काज कए रहल अछि। एहि सबसँ माध्यम भाषे मे बदलाव आओत, जखनकि आवश्यकता एहि बातक अछि जे एहि भाषासभमे ज्ञानपरक सामग्री उपलब्ध हुए जाहिसँ समाजक आग्रह स्वतः एहि भाषासभक प्रति बनए आओर उच्च शिक्षामे भारतीय भाषाक संग-संग मैथिली सेहो अपन वृहत्तर दायित्वक सामंजस्यपूर्वक निर्वहन कए सकए। ई सब तखन संभव भए सकत जखन मैथिल (मिथिलामे निवास करए वला सभ जाति, वर्ग, धर्म एवं सम्प्रदायक लोक) अपन मौलिक चिंतन एवं शोधक माध्यमसँ एकर नेतृत्त्व करताह।
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Suggested citation: डॉ. अरुण कुमार सिंह. “मातृभाषाक माध्यमसँ उच्चशिक्षा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 113, 2012-09-01. https://www.videha.co.in/research/2012/113/मातृभाषाक-माध्यमसँ-उच्चशिक्षा.htm

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