विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली उपन्यास साहित्यक विकासमे हरिमोहन झाक योगदान

शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ · 2012-09-15 · अंक 114

शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’
मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यक वि‍कासमे हरि‍मोहन झाक योगदान
मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यक इति‍हास बेसी प्रचीन नै अछि‍। ऐ भाषाक पहि‍लुक मान्‍य उपन्‍यासकार जनसीदन छथि‍। ओना तँ हरि‍मोहन झा बि‍म्‍व ओ शि‍ल्‍पाच्‍छादि‍त आवरणसँ युक्‍त कथाकारक रूपेँ चर्चित छथि‍, कि‍एक तँ चर्चरी सन हास्‍य ओ मर्मक समागम हि‍नक अन्‍य वि‍धाक कृति‍मे नै भेटैछ, परंच साहि‍त्‍यक जगतमे हि‍नक पदार्पण पाठकगणकेँ जइ कृति‍सँ झंकृत केलक ओ थि‍क सन् 1933 ई.मे हि‍नक लि‍खल उपन्‍यास कन्‍यादान ओ सन 1945 ई.मे हि‍नक दोसर उपन्‍यास- द्वि‍रागमन।
जखन उपन्‍यास वि‍धामे हरि‍मोहनक पदार्पण भेलनि‍ तँ ई वि‍धा काँच छल। अखन धरि‍ जनसीदनक ि‍नर्दयी सासु, शशि‍कला, कलि‍युगी सन्‍यसी, पुनर्विवाह, द्वि‍रागमन रहस्‍य जीवछ मि‍श्रक रामेश्वर, पुण्‍यानंद झाक मि‍थि‍ला दर्पण आ डाॅ. काँची नाथ झा कि‍रणक चन्‍द्रग्रहण सन कि‍छु जनप्रि‍य आ साहि‍त्‍योपयोगी उपन्‍यास सभ पाठक लग पसरल गेल छल। मुदा कोनो उपन्‍यासमे ओ शक्‍ति‍ वा आकर्षण नै छल जेकरा मैथि‍ली पाठक पूर्णत: आत्‍मसात करथि‍। कि‍एक तँ पोथी कीनि‍ कऽ पढ़बाक दृष्‍टि‍सँ जौं मूल्‍यांकन कएल जाए तँ मैथि‍लीकेँ आन भाषाक पाठकसँ बेसी उदासीन मानल जाए। जइ भाषा साहि‍त्‍यक प्रति‍ पाठकमे ओ भक्‍ति‍-समागम नै ओइ भाषामे हरि‍मोहन सन उपन्‍यासकारक पदार्पण अवश्‍य क्रांति‍कारी मानल जाए कि‍एक तँ हि‍नक रचना शैलीमे ओ आकर्षण तँ अवश्‍य अछि‍ जेकरा कारणें उदासीन पाठक वर्ग सेहो पोथ्‍ज्ञी कीनि‍ कऽ पढ़बाक लेल वाध्‍य भऽ जाइत छथि‍।
कथा बि‍म्‍वक आधारपर जौं ि‍नर्णए लेल जाए तँ कन्‍यादान कोनो वि‍शेष कथाक वाचक नै। मि‍थि‍ला समाजक एकटा वि‍कट मुदा सभसँ महत्‍वपूर्ण संस्‍कार वि‍अाहकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु बना कऽ लि‍खल गेल ऐ उपन्‍यासमे कथानक बड़ कमजोर अछि‍। बेटी जन्‍म लैत देरी मायकेँ ओकर वि‍आहक चि‍न्‍ता भऽ जाइत छन्‍हि‍। तँए संभवत: वर भेटल नै मुदा कनि‍याँ माइक ओरि‍आओनसँ उपन्‍यासक आदि‍ भेल।
बारह अध्‍यायमे वि‍भक्‍त ऐ उपन्‍यासकेँ कनि‍याँ माइक ओरि‍आओन, सभागाछीक दृश्‍य, तार केना पढ़ल गेल, जहाज परक गप्‍प-सप्‍प, गोसाँओनि‍क गीत, मि‍स्‍टर सी.सी. मि‍श्रा जटि‍ल समस्‍या, गुप्‍प परामर्श, कौतुक, कन्‍यादान, चतुर्थीक राति‍ आदि‍ शीर्षकमे बॉटल गेल अछि‍। अंति‍म शीर्षक प्रश्नवाचक कि‍एक तँ दर्शनशास्‍त्रक ज्ञाता हरि‍मोहन झा धरि‍ एकटा प्रश्न छोड़ि‍ उपन्‍यासक इति‍ श्री कएलनि‍।
लालकका आ लालकाकीक कन्‍या बुचि‍या उपन्‍यासक नायि‍का छथि‍ जनि‍क बि‍आह चण्‍डीचरण मि‍श्रा सन मात्र कहबाक लेल मैथि‍लसँ होइत अछि‍। सी.सी. मि‍श्रा अपन संस्‍कृति‍सँ वि‍लग वहसल एडभान्‍स लोक छथि‍। जि‍नका अपन अर्द्धांगि‍नीसँ बहुत रास आश छन्‍हि‍। बुचि‍याक जेठ भाय रेवती रमण ई जनैत छलाह, मुदा अपन बहि‍नक भवि‍ष्‍य उज्जलव करबाक लेल मि‍थ्‍याक डोरि‍मे लटकि‍ सी.सी. मि‍श्रासँ अपन बहि‍नक पाणि‍ग्रहण तँ करबा लेलनि‍, मुदा चतुर्थीक राति‍मे नव वि‍वाहि‍त दंपति‍ बि‍नु आत्‍मि‍क वरण केने वि‍लग भऽ जाइत छथि‍।
सी. सी. मि‍ज्ञा जे अपनाकेँ कखनो कान्‍ट तँ कखनो कालि‍दास सन वद्वत मानैत छथि‍ सत्‍य जानि‍ लेलाक बाद बुचि‍याकेँ छोड़ि‍ भागि‍ गेलाह। कोबरघरमे रहि‍ गेलीह कनैत बुचि‍या ओइ पत्रक संग जे सी. सी. मि‍श्रा रेवती रमणक नाओंसँ लि‍खि‍ छोड़ि‍ गेलनि‍। पत्रमे अशि‍क्षि‍त कन्‍याक संग शि‍क्षि‍त पुरुषक वि‍ष्‍ज्ञमताकेँ लि‍पि‍त कएल गेल अछि‍। ऐ तरहेँ अंत करबाक लेल हरि‍मोहन जीक बड़ आलोचना भेलनि‍ तँए समाधान करैत द्वि‍रागमन लि‍खबाक लेल उपन्‍यासकार वि‍वश भऽ गेलखि‍न।
हरि‍मोहनजी मि‍थि‍लाक सामाजि‍क अवस्‍थापर प्रहार करैत बुचि‍या सन अशि‍क्षि‍त नारीमे चेतना अनबाक प्रयास तँ करैत छथि‍, मुदा ई बि‍सरि‍ गेलखि‍न जे सी. सी. मि‍श्रा सन पात्र आ ओकर संवादक जे रूप ऐ उपन्‍यसमे प्रस्‍तुत कएल गेल ओ “मैथि‍ली”पर आधार मानल जाए। ओहेन पात्रकेँ नायक बनेबाक कोनो प्रयोजन नै जेकरा मैथि‍ली संस्‍कृति‍सँ लेस मात्र सि‍नेह वा ऐठामक बेवस्‍थाक कोनो ज्ञान नै हुअए। हि‍नक “ग्रेजुएट पुतोहु” कथाक नायाि‍का सेहो वि‍दुषी आ एडभान्‍स महि‍ला छथि‍ परन्‍च हुनक संवाद सभठाम खँटी मैथि‍लीमे छन्‍हि‍। सी.सी. मि‍श्रा अंग्रेजी आ हि‍न्‍दी मात्र बजैत छथि‍। मैथि‍ली उपन्‍यासमे आन भाषक एतेक बेसी प्रयोगसँ एकर अपन संस्‍कार केना बाँचत....? हरि‍मोहनक सभसँ पैघ कमी ऐ उपन्‍यासक महतपर अवश्‍य ग्रहण लगा देलक।
कि‍छु मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारक ई प्रवृत्ति‍ रहल छन्‍हि‍ जे जौं हि‍न्‍दीक प्रयोग कएल जाए तँ रचना आर सारगर्भित मानल जाएत आ लोक योग्‍य बुझताह। हरि‍मोहन वि‍षय मर्ममे झाँपल यथार्थक हृदैस्‍पर्शी साहि‍त्‍यकार छथि‍ तँए हि‍नकासँ पाठक ई अपेक्षा तँ कथमपि‍ नै रखलक। हास्‍य समागमसँ युक्‍त कन्‍यादानक संवाद उच्‍च कोटि‍क अछि‍। सी. सी. मि‍त्रा हि‍न्‍दू वि‍श्ववि‍द्यालयक साहि‍त्‍यक शोधार्थी तँ छथि‍ मुदा कन्‍यादानमे हुनक स्‍थान एकटा पाश्चात्‍य संस्‍कृति‍केँ जानय बला जोकरसँ बेसी नै। बुचि‍या तँ बुचिये छथि‍। मि‍. मि‍श्र जखन जि‍ज्ञाशा केलनि‍ जे क्‍या तुम नर्सिग जानती हो...? बुचि‍या मनमे सोचलीह नरसि‍ंह तँ गामक कोतबालक नाम छैक, देखू तँ भला हमरा कोतबाल लगा कऽ गारि‍ पढ़ैत अछि‍....।
ऐ अज्ञ अवलाकेँ रेवती रमण सन भाय केना सी. सी. मि‍श्रा सन “पाश्चात्‍य-जोकर”क हाथमे सौंपि‍ देबाक ि‍नर्णए केलक। ऐ लेल रेवती रमण जीकेँ अपन अर्द्धांगि‍नी बड़गामवाली सन नारी द्वारा मि‍. मि‍श्राक संग छल करबए पड़ैत छन्‍हि‍। ऐ तथ्‍यमे सत्‍यता झलकैत अछि‍। हमरा सबहक समाजमे बड़का गामवाली सन नारीकेँ कतेक बालाक पैतराखनि‍ बनए पड़ैत छन्‍हि‍।
एक अर्थमे ई उपन्‍यासक सबल स्‍थि‍ति‍ सेहो मानल जाए जे सन् 1933 ई.मे जखन पुरुष वर्गक अधि‍कांश लोक हमरा सबहक समाजमे अशि‍क्षि‍त छलथि‍ ओइ कालक नारीमे शि‍क्षा-वि‍कासक एहेन कल्‍पना हरि‍मोहनसँ पूर्व मैथि‍लीमे नि‍श्चि‍त नै भेल।
हि‍नक कथा वा उपन्‍यास कि‍छु हुअए एकटा बड़ सकारात्‍मक तथ्‍य भेटैछ जे हि‍नक कृति‍क महि‍ला पात्र सदि‍खन गति‍शील रहैत छथि‍, बैसि‍ कऽ सोचैत नरीक चर्च बड़ कम ठाम देखएमे आएल। कन्‍यादानमे सेहो लालकाकी झट दऽ आवेश रानीक पैरक कनगुरि‍या आंगुरकेँ दाबि‍ देलखि‍न, मुनि‍याँ माय चमकि‍ कऽ घैल उठेलक आ लालकाकी द्वपसि‍ कऽ मोटरी खोलय लगलीह सन क्रि‍याशील महि‍ला समाजक दर्शन हरि‍मोहन झाक मैथि‍ल संस्‍कृति‍क आत्‍म आवलोकनक संग-संग नारी चेतनाक दर्पण मानल जाए।
ठुनमुनकाकी आ लालकाकी दुनू दि‍आदि‍नी खूब लड़ैत छथि‍। भोलानाथ झाक पत्नी ठुनमुनकाकी गर्भवती छथि‍न। लड़बाक क्रममे गर्भ लगा कऽ शप्‍पत सेहो खाइत छथि‍न, मुदा बुचि‍याक बि‍आहक लेल ओरि‍आओनमे हुनक सहभागि‍ता कने कनि‍याँ मायसँ कम नै। एकटा “संयुक्‍त परि‍वारक” महत्‍वपूर्ण सक्‍ल पक्ष मानल जाए। लालकाकीक पुतोहु बड़कागामवाली शि‍क्षि‍त नारी छथि‍ सदि‍खन कि‍ताबे संग लटपटाएल रहैवाली बड़कागाम वाली कनि‍याँ बि‍आहक लेल चंगेरा नै साँठतीह। आ ने चूल्हि‍ये लग बैसतीह, मुदा जखन महीन काज अर्थात् सी. सी. मि‍श्राकेँ बि‍आहक पूर्व कनि‍याँसँ गप्‍प करेबाक लेल नाटक करबाक आवश्‍यकता भेल तँ रेवती रमण हि‍नकेसँ कनि‍याँक अभि‍नय करेलनि‍।
ठकबा जे ऐ उपन्‍यासक अदना पात्र अछि‍ ओकर माथक मोटरीमे भोलानाथ झाक पनही सेहो बान्‍हल छन्‍हि‍। ई समाजक कटु सत्‍रू केकरो पएरक पनही केकरो माथपर ई समन्‍वयवाद समाजक लेल कलंक कि‍ए नै मानल जसए। तखन जौं वएह ठकबाक पुत्र जखन अधि‍कारी बनि‍ भोलानाथ झाक संतानक संग बदला लैत अछि‍ तँ अग्र आसनपर बैसल लोक अकुला जाइत छथि‍। ओना एहेन बदलल परि‍स्‍थि‍ति‍ तँ हरि‍मोहनक उपन्‍यासमे कथपति‍ नै भेटत कि‍एक तँ हरि‍मोहन झाक कृति‍ ब्राह्मवादी समाजक वृत्ति‍चि‍त्र छन्‍हि‍। ऐमे समाजक कात लागल वर्गमे मुनि‍याँ माय सन पैनभरनी आ ठकवा सन खबास मात्र अछि‍ तँए हि‍नक उपन्‍यास सम्‍पूर्ण समाजक प्रति‍नि‍धि‍ कृति‍ कथमपि‍ नै भऽ सकल।
उपन्‍यासकार दलि‍त वा परदलि‍तक मर्मक स्‍पर्श तँ नै केलनि‍ मुदा ब्राह्मणेमे ऊँच-नीच आ उत्तर-दक्षि‍णसँ क्षुब्‍ध अवश्‍य छथि‍। हरि‍मोहन जीक मातृक अवश्‍य भलमानुषक गाममे छन्‍हि‍ मुदा पैतृक भूमि‍ कुमर बाजि‍तपुर वैशली भदेसमे, तँए भदेसक मर्मसँ आकुल तँ अवश्‍य छथि‍। सभागाछीक दृश्‍मे टुन्नी झा कनेक खखसि‍ कऽ बजलाह-
“मानि‍ लि‍यऽ वरक घऽर दक्षिणे भर छन्‍हि‍ तऽ हर्ज की...?‍ सेहो बेसी दूर नहि‍- दलसि‍ंह सराय सँ चौदह कोसपर घऽर छन्‍हि‍।” मूलक चर्च भेलापर बि‍आहक अगुआ अर्थात सभागाछीक दलाल कहैत छथि‍ जे मानि‍ लि‍अ शुरगने छथि‍..., ऐ सभ कटु सत्‍यसँ प्रमाणि‍त होइत अछि‍ जे जखन ब्राह्मण-ब्रह्मणक मध्‍य मौलि‍क वि‍षमता तँ मि‍थि‍लामे समन्‍वयवाद केना आबय...?
गंभीर चि‍न्‍तनयोग्‍य वि‍षयकेँ हरि‍मोहन जी हास्‍यक माध्‍यमसँ चर्च कऽ उपन्‍यासकेँ लोकप्रि‍य तँ अवश्‍य बना देलनि‍ मुदा गंभीर चि‍न्‍तनकेँ हास्‍यक बोरि‍सँ लि‍प्‍त कएलासँ एकर उद्देश्‍य अवश्‍य लुप्‍त भऽ गेल। एकरा सुयोग्‍य उपन्‍यासकारक अदूरदर्शिता मानल जाए।
कि‍छु समालोचकक तर्क भऽ सकैत छन्‍हि‍ जे हरि‍मोहन जीक ऐ कृति‍क उद्देश्‍य समाजक वि‍कृति‍केँ नागट करबासँ बेसी “हास्‍य समागम” करबाक लेल छलनि‍, मुदा ऐ तर्कसँ हम सहमति‍ नै रखैत छी। कोनो हास्‍य जे समाजि‍क आ पारि‍वारि‍क समता आ शांति‍केँ बाधि‍त करए ओ समाजक लेल कखनो स्‍वीकारर्य नै भऽ सकैत अछि‍। कालीदासचरित्रसँ प्रभावि‍त सी. सी. मि‍श्रा बुच्‍चीदायकेँ “वि‍धोत्तमा” बना कऽ स्‍वीकार करताह, ई परि‍स्‍थि‍ति‍ उपन्‍यासक कमजोर पक्ष थि‍क। कहबी छैक- “बड़ो से ने कीजि‍ए ब्‍याह-प्रति‍ और वैर” ऐ वि‍स्‍मयकारी उपन्‍यासमे वि‍षम परि‍स्‍थि‍ति‍ जौं मात्र हास्‍य समागमक लेल अाएल तैयाे उचि‍त नै। एक उपन्‍यासमे समस्‍या आ दोसरमे जा कऽ ओकर नि‍दान ई रचनाकारक कलात्‍मक कृति‍ कखनो नै मानल जा सकैछ। मात्र हँसबाक लेल झारखण्‍डीनाथ, बटुक आ तोतराह पंडि‍त नमोनाथ झा सन पात्रक उपस्‍थि‍ति‍ तँ प्रासंगि‍क मुदा हँसीक पात्र बना कऽ बुचि‍याकेँ कोवरमे कनैत छोड़ि‍ उपन्‍यासक अंत देखाएब नारी जाति‍क अपमानसँ बेसी कि‍छु नै।
ऐ सभ कमजोर तथ्‍यसँ भरल रहलाक बादो “कन्‍यादान” मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखैत अछि‍ कि‍एक तँ पाठकगण ऐ कृति‍केँ हि‍आसँ स्‍वीकार कऽ नेने छन्‍हि‍।
कन्‍यादानक लोकप्रि‍यताक मौलि‍क कारण थि‍क ग्राम्‍य जीवनक आधारभुत घटनाक चि‍त्रणमे सहज मौलि‍कताक अनुपालन। हास्‍य समागम तँ स्‍वाभावि‍क कि‍एक तँ ई रचनाकारक प्रकृति‍ ओ प्रवृित रहल छन्‍हि‍। हास्‍यक क्रममे गंभीर दर्शन तँ हँसीमे उधि‍या गेल मुदा कोनो ठाम साहि‍त्‍यि‍क मर्यादा ओ अनुगासनपर ग्रहार नै देखए मे आएल। ई उपन्‍यासकारक प्रांजल आ प्रवीण रचनाशीलताक द्योतक मानल जाए। जखन वर अर्थात् सी. सी. मि‍श्रा महि‍ला मंडलीक मध्‍य बि‍आहसँ पूर्व परीक्षण हेतु अबैत छथि‍ तँ अपन नाओं सी. सी. मि‍श्रा कहैत छथि‍न। क्षणेमे महि‍ला मंडलीक एकटा बालि‍का सदस्‍याक चुटकी... तखन तँ बापक नाओं बोतल मि‍श्रा हेतन्‍हि‍। अति‍वादी प्रवृति‍क लोक पर हास्‍यक माध्‍यमसँ अनुशासि‍त प्रहार गामक रीति‍-रि‍वाजक अति‍क्रमणक प्रयासपर सहज रूपसँ कएल गेल। कनि‍याँ माइक ओरि‍आओन अध्‍ययाय पूर्णत: सहज मैथि‍ल नारी समूहक झलकि‍ देखबैत अछि‍। ऐठाम ई पूर्णत: मौलि‍क आ वास्‍तवि‍क लगैछ। संवादक भाषा आ शैलीसँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइछ जे हरि‍मोहनजी अपन संस्‍कृति‍ आ रीति‍-रि‍वाजकेँ आत्‍मसात केने छथि‍।
क्रमश......।

Suggested citation: शिवकुमार झा ‘टिल्लू’. “मैथिली उपन्यास साहित्यक विकासमे हरिमोहन झाक योगदान.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 114, 2012-09-15. https://www.videha.co.in/research/2012/114/मैथिली-उपन्यास-साहित्यक-विकासमे-हरिमोहन-झाक-योगदान.htm

मूल विदेह अंक / Original issue