विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक

विजय मस्त · 2012-10-01 · अंक 115

सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक

की भेलै, मम्मी ? कोनो पहाड़ टूटि गेलै, कथिलाए दुखित छेँ । ककरो मृत्यु भऽ गेल छै । हम डाक्टर लग जाइत छी, एक घण्टाक बात अछि, बस्स सभ किछु नरमल । जिद्दी कथाक नायिका गिन्नीद्वारा वाजल गेल ई वाक्य आजुक आधुनिकताक नामपर सिगरेट, दारु आ यौन सम्बन्धके फैशन रुपमे अपना रहल मैथिल समाजक युवा युवतीक कथा व्यथाके कथाकार सुजीत कुमार झा वहुत सरल तरीकासँ प्रस्तुत कएने छथि । २०६९ साउनक अन्तिम सप्ताहमे बिमोचित पत्रकार आ साहित्यकार सुजीत झाजीक तेसर कृति जिद्दी कथा संग्रहक १२ गोट कथा हम बहुत रोचक आ जिज्ञासु भऽ पढलहुँ । ओना हुनक पहिल कृति चिडैं सेहो पढवाक अवसर भेटल छल, वहुत रोमान्चित लागल रहए । एकटा साहित्यके विद्यार्थीक नजरिसँ सुजीत जी मिथिला समाजमे व्याप्त पौराणिक परम्परासँ लऽकऽ आधुनिकताक छोट—छोट विषयसभके अपन कलमक माध्यमसँ सुसज्जित करयमे सफल छथि ।
यदि सुजीतजी अपन पाठकक विचारके सम्बोधन करैथि तऽ हमर ईच्छा अछि जे ओ अपन तेसर कृतिक लाल डायरी आ जिद्दी कथाके उपन्यासक रुपमे आगामी दिनमे रचना करथि ।
लाल डायरी आ जिद्दी पढैत काल हम कथामे एनाक डुवलहुँ जे एकर कथाक रुपमे अन्त हमरा दुःखीत कऽ देलक । ताहि कारणे ई प्रतिक्रिया लिखवाक लेल हम विवश भऽ गेलहूँ । ओ दूनु कथाक कथ्य गजब छल आ तहिना शिल्प ।
जिद्दी कथा संग्रहक पहिल कथा “फूल फुलाइएकऽ रहल” मे जाहि तरिकासँ नायिका अपना आगु आएल समस्याके समाधान कयलक अछि एहि समाजक महिलासभक लेल एकटा उपदेश अछि । दोसर कथा “नव व्यापार”क महिला क्लब आ साधनाके अपना परिवार मे रहिकऽ एतेक वेशी स्वतन्त्रता मैथिल समाजमे जूनि भेटैय । तहिना तेसर कथा “खाली घर” आई काल्हि अपनाके आधुनिक बुझनिहार महिला जिनका अपने निर्णयसँ पाछतावा हुए, ताहिके कथाकार चित्रण करएमे सफल भेल छथि । चारिम कथा “लाल डायरी” । मुदा जतेक सत्य अछि यादवजीकें मृत्यु १७ गते भेल अछि, ओतवे निर्र्विवाद सत्य अछि फागुन १८ गते सांझ हमरा घरपर यादवजीके आएब जेकर प्रमाण लाल डायरी अछि । वाक्य हमरा झकझोरि देलक आ लागल वास्तवमे आदमीके शरीरे मरैत अछि आत्मा नहि । विज्ञान युगमे सेहो एहिबात के एहसास कराओल गेल अछि । एकर प्रस्तुति एहिमे सजिवता आनि देने अछि । तहिना पांचम कथा जिद्दी प्रत्येक परिवारक माता पिताके अपना धियापुताक देलजाएवला स्वतन्त्रताके सँग—सँग हुनका प्रति आओर जिम्मेवारीक उपदेश दैत अछि । सुुजीतक जादूक ओ सामान बेचनिहार युवती वास्तवमे हमरो सम्मोहित कऽ देलक । सातम कथा आदर्श हमरा कोनो खासे प्रभावित नई कऽ सकल । मुदा अर्थहीन यात्रामे नेहा, जिनकर व्यक्तित्व एक चुम्बक जेका छलैन्हि कोनो पुरुष स्वयं खिचाक चलि अबैत छल ताहिके ओ मात्रै नहि समाजक बहुतो नेहा सभ दुरुपयोग करैत छथि । जाहिके कारण हुनक वैवाहिक जीवन अस्वस्थ रहल । ई कथा मात्र नई समाजक ऐना अछि ।
व्यर्थक उडानक सम्बन्धमे एक्कहिटा बात कहब कि सुजीत जी मानव जातिक ओ उड़ान जे बहुत कम समयमे बहुत बड़का होइत छैक, जे बहुत थोर लोक बुझि सकैया ताहिके अत्याधिक चतुरताक संग प्रस्तुत कएने छथि । नवम कथामे नीमाद्वारा अपना पति सोहनक लेल कएल गेल व्यवहार पर जेना श्रीनाथ चिन्तित छलथि, हमरो मोनमे स्याह प्रश्न आएल कि सोहनक पत्नीक व्यवहार निष्ठा छल कि देखावा ? सङ्गग्रह एगारहम कथा केहन सजायक चमेलीक प्रश्न — कोन अधिकारसं ओ हमरा पोसलन्हि आ फेर हमरा जनसागरमे भंसा देलन्हि, हम जन्मसँ अनाथ छी , ओतही पलितहुँ एहि गन्दा वातावरणक असरि तऽ नहि पडितए । हमर विश्वास किए तोड़ल गेल ? प्रश्न मात्रे चमेलीक नै भऽ समाजक प्रत्येक बच्चाक अछि, जे पोसपुत वा सतवा माता पिताकसंग रहैथ छथि आ दुःख भोगैत छथि । अन्तिम कथा मेनकाके हमर ह्ृदयसं धन्यवाद अछि । की आब तऽ अहँु नीना बनि गेल छीक जवाफ नहि ओ चिचएलहि आ एकटा सुखी परिवार विध्वंश होबए सँं बचि गेल ।
ई कृतिक रचनाकारक विषयमे कहलजाए त हमरा चिन्हल जानलमे सुजीतजी सन बहुत कम छथि जिनका मुहसँं कहियो अपशब्द नहि सुुनलहुँ आ सदिखनी हँसैंत रहैत छथि ।
समग्रमे जिद्दी कथा संग्रह एकबेर सभके पढबाक चाही हमर तऽ इहे सल्लाह अछि । किताबक प्रिन्टिङ्ग, डिजाइन सेहो बढिया अछि । प्रकाशकके सेहो धन्यवाद देब जे बढिया किताब पढबाक अवसर देलन्हि ।
लेखक राजनीतिकर्मीक अतिरिक्त युवा कवि छथि ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.ओम प्रकाश-विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ २.पंकज चौधरी (नवलश्री)-विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक

ओम प्रकाश
विहनि कथा- प्रोग्रेसिभ
शर्माजी आ हुनकर कनियाँ पूरा समाजमे प्रोग्रेसिभ कहाबैत छलथि। एकर कारण ई छल जे दूटा बेटीक जन्मक उपरान्त शर्माजी बिना बेटाक लालसा केने फैमिली पलानिंगक आपरेशन करा लेने छलाह आ दूनू बेकती बेटी सभक लालन पालनमे कोनो कसरि नै छोडने छलखिन्ह। बेटी सबकेँ पढेबा लिखेबामे पूरा धेआन देने छलखिन्ह आ ओकरा सभकेँ तमाम सुख सुविधा देबामे पाँछा नै रहैत छलखिन्ह। समाजमे शर्माजी दूनू बेकती बहुत आदरणीय आ उदाहरण छलथि। बेटी सभकेँ आ शर्माजीक कनियाँकेँ कोनो दिक्कत नै होई, ऐ लेल शर्माजी किछो करबा लेल तैयार रहैत छलाह। घरक काजमे मदतिक लेल एकटा दाई राखल गेल छल जे चौबीसो घण्टा हुनकर घरे पर रहैत छलैन्हि। ओकर नाँउ छलै मीतू आ ओ बयसमे बारह-तेरह बरखक छल। ऐ हिसाबेँ ओ एखन बच्चे छलै आ पेटक मजबूरीमे हुनकर घरमे काज करबा लेल बाध्य छलै। घरक पूरा साफ सफाई, पोछा, बासन माँजनाई आ कपडा धोनाई ओकरे जिम्मा छलै। दिन भरि खटिकऽ ओ थाकि जाईत छल आ साँझुक बाद झपकी लेबऽ लागैत छल। जखने ओकरा झपकी आबै की मलकिनीक प्रवचन ओकर निन्न तोडि दैत छलै। रातिमे सभक खएलाक उपरान्त ओ सभटा बासन माँजि लैत छलै आ तकर बादे खाई लेल बैसै छलै। खएबामे सबहक बचल खुचल ओकरा नसीब होईत छलै।
शर्माजी अपन बेटी सभक सब फरमाईश पूरा करैत छलखिन्ह आ कोनो वस्तुक माँग भेला पर बाजारसँ तुरंत ओ वस्तु आनैत छलथि, चाहे ओ कोनो खेलौनाक फरमाईश होई वा कोनो भोज्य सामग्रीक। जँ कखनो मीतू बाल सुलभ लालसामे ओइ वस्तु सभ दिस ताकियो दैत छलै की शर्माजीक कनियाँ अनघोल उठा दैत छलखिन्ह जे आब हमर बेटी सभकेँ ई वस्तु सब नै पचतै, देखू कोना नजरि लगा देलक ई निराशी। एकर अलावे आरो ढेरी गपक प्रसाद मीतूकेँ भेंट जाईत छलै, तैं बेचारी ऐ सब फरमाईशी वस्तु दिस धेआन नै देबाक प्रयास करैत छल, मुदा बच्चे छलै तैँ कखनो कालकेँ गलती भइये जाईत छलै।
एकदिन शर्माजीक बडकी बेटी गुलाबजामुनक फरमाईश केलकै। शर्माजी साँझमे घर आबैत काल बीसटा गुलाबजामुन सबसँ नीक मधुरक दोकानसँ कीनिकऽ नेने अएलाह। पहिने तँ दूनू बेटी आ हुनकर कनियाँ दू-दूटा गुलाबजामुनक भोग लगेलखिन्ह आ तकर बाद बचलाहा मधुरकेँ फ्रिजमे राखि देल गेलै। मीतू कुवाचक डरे ऐ मधुर दिस ताकबो नै केलक आ नै ओकरा खएबा लेल भेंटलै। मुदा मधुरक सुगंध ओकरा बेर-बेर अपना दिस आकर्षित करऽ लागलै। ओ एकटा योजना मोने मोन बनेलक आ चुपचाप घरक काज करऽ लागल। रातिमे भोजन कएलाक उपरान्त शर्माजीक कनियाँ ओकरासँ बासन मँजबेलखिन्ह आ एकर बाद ओकरा खएबा लेल बचलाहा सोहारी आ तरकारी दैत ई ताकीद केलखिन्ह जे हम सुतै लेल जाई छियौ, तूँ खा कऽ अपन छिपली माँजि सुतै लए जइहैं। ओ स्वीकृतिमे अपन मुडी हिलेलक आ खएबा लेल बैसि गेल। शर्माजीक कनियाँ तकर बाद सुतै लए चलि गेलीह। आब मीतू मधुर खएबाक अपन योजना पर काज शुरू केलक। पहिने तँ जल्दीसँ सोहारी तरकारी समाप्त कएलक आ तकर बाद नहुँ नहुँ डेगे फ्रिज दिस बढल। एकदम स्थिरसँ ओ फ्रिजक फाटक खोललक आ फ्रिजसँ मधुरक पैकेट निकालि कऽ एकटा गुलाबजामुन मुँहमे राखलक। फेर ओ सोचऽ लागल जे जखन एकटा खाइये लेलौं तखन एकटा आर खा लेबामे कोनो हर्ज नै छै। तैँ ओ एकटा आर गुलाबजामुन निकालि मुँहमे धरिते छल की पाँछासँ शर्माजीक कनियाँ ओकर केश पकडि घीचि लेलखिन्ह। असलमे खटपटक आवाज सुनि हुनकर निन्न टूटि गेल छलैन्हि। आब तँ मीतूक जे हाल भेलै से जूनि पूछू। मुँहमे गुलाबजामुन ठूँसल छलै तैँ ओ गोंगिया लागल। शर्माजीक कनियाँ ओकरा पर थापड आ लातक बौछार कए देलखिन्ह। संगे अपशब्दक नब महाकाव्यक रचना सेहो करैत पूरा घरकेँ जगा देलखिन्ह। सब मिलिकऽ मीतूक अपशब्द आ थापडक खोराक दए गेलखिन्ह। जखन ओ सब गारिक पूरा शब्दकोश पढि गेलखिन्ह आ मारैत हाथ दुखाबऽ लागलैन्हि तखन ओ सब हँपसैत ठाढ भऽ गेलथि। शर्माजीक कनियाँ मीतूक झोंटा घीचैत कहलखिन्ह जे हम सब प्रोग्रेसिभ छी, तैं छोडि देलियौ नै तँ आन रहितौ ने तँ बलि चढेने बिना नै छोडितौ। ई कहि ओ सब अपन बेडरूम दिस विदा भेलथि आ मीतू कानैत अपन बोरा लेने ओसारा दिस सुतै लेल बढि गेल।

पंकज चौधरी (नवलश्री)
विहनि कथा - ई नोर छै गरीबीक

दक्षिण-पूब भरसँ अटूट मेघ घेरैत देखि बुधनी पूवैर बाधक एकपेरिया बाट पर नमहर-नमहर डेग झटकारने घर दिश विदा भेल. माथ पर घासक छिट्टा, कांख तऽर थोड़ सुखैल राहटक जारैन आ खोइंछ में नुका धेने छल सात-आठ टा रस्फट्टू आम जे अबैत काल बाट में बिछने छल अल्हुआ वला खेत लगका कलकतिया आमक गाछ तर सँ.. गाम परहक चिंता जान खेने जा रहल छलै. सात वरखक बेटा बंटी के घरे पर छोड़ि आयल छल. ओना ओ तऽ छाल छोड़ेने छल बाध अबै लेल मुदा रौद तेहन ने चंडाल उगल छलैक जे बुधनी के मोन नहि मानलकै आ ओकरा सुगिया काकी अंगना छोडि आयल छल. बुधनी के सभ सँ बेशी चिंता अहि गप्पक छलै जे जों ओकरा घर पर पहुंचै सँ पहिने वरखा शुरू भ गेलै तऽ जुलुम भऽ जेतै. चिपरी सभ बाहरे में सुखाइत छलै आ अंगना में खुद्दी सेहो पसारल छलै...आ हाँ चार पर बिरियो तऽ देने छलै बना कऽ सुखाई लेल, सभटा चौपट भऽ जेतै.. विचारक अहि उथल-पुथल में अगुताइल भागल जैत छल घर दिश.
घर पहुँचते देरी छिट्टा अंगना में पटकि पहिने बंटी के सोर पारलक. ता धरि तऽ एकदम गुप्प अन्हार भऽ गेल छलैक आ जोड़-जोड़ सँ बिजलोका लोकय लागल छलै. संगहिं मेघ सेहो ढन-ढन गरज लागल छलै. बुधनी हडबडा कऽ सभटा काज करय लागल. आ बंटी... ओहो पाछू कियैक रहत..! ओहो छोटकी पथिया में चिपरी समेट कऽ उठाब लागल. कने कालक बाद खूब जोड़ सँ वरखा शुरू भऽ गेलै. बुधनी बंटी के लऽ कऽ दौड़ कऽ घर दिश भागल...मुदा ताहि सँ की..? घर की कोनो अंगना सँ नीक छलै..! सड़ल खऽर... मोनो नहि जेऽ कैऽ वरख भऽ गेल छलै छड़वेला. कोरो-बाती सेहो सड़ल-गलल. ओहिना टुक-टुक मेघ देखाइत...! राति कऽ बंटी घरे में बैसले-बैसल चंदा मामा सँ बतिया लैत छल आ तरेगन सँ खूब लुका-छिपी खेलैत छल. सौंसे घर में गर-गर पाइन चुबैत. कनिए काल में घर पाइन सँ भरि कऽ डबरा भऽ गेल. बुधनी छिपिया लऽ पाइन उपछ लागल. ओ पाइन उपछैत-उपछैत अप्सियांत भेल छल. आ बंटी.... ओकरा लेखे केहनो सन नहि....आ रहबे कियैक करतैक...? ओ तऽ कागतक नाह बना घर में अई कोन सँ ओई कोन धरि बहा कऽ आनंद सँ विभोर भऽ रहल छल.
कने कालक पश्चात जहन खेलाइत-खेलाइत बंटी थाकि गेल तऽ नाह के ओहिना पाइने में हेलैत छोडि बुधनी के कोरा में जा बैसल आ बाजल माय गे भूख लागल अछि, किछु खाई लेल दे ने...! बुधनी एक दू बेर तऽ अन्ठेलक मुदा जहन बंटी छाल छोड़बय लागल तऽ बुधनी चिनवार पर बासन सभ के उनटा-पुन्टा कऽ देख लागल. किछु नहि भेटलैक...किछु रहतैक तहन ने भेटतै. मुदा बंटी कियैक मानत..आ फेर जे माइन गेल से नन्ने की..? बुधनी अकबकैल ओकर मूंह तकैत छल तखने कोठिक गोड़ा पर राखल मरुआ रोटिक एकटा टुकड़ी पर ओकर नजरि गेलै. बुधनी मोन पारय लागल जे कहिया के छियैक.... हाँ मोन पड़ल परसुए भोर में तऽ बनने छलियैक.. बुधनी ओ मरुआ रोटी पर थोड नून आ सुखायल अचार धऽ बंटी के दऽ देलकै. बंटी मगन भऽ खाय लागल. नेनाक चंचल मोन तऽ देखू…खाइत-खाइत बंटी बाजल माय गेऽ दू टुकड़ी पियाउज दे ने..! बुधनी सौंसे घर ढुरलक तऽ आधा टा पियाउज भेटलै.. ओ पियाउज सोहि बंटी के देबय लागल....! बुधनिक आंखि में नोर भरि गेलै. बंटी माय के मुंह दिश तकलक तऽ बाजल…की भेलऊ माय कियैक कने छिही. नहि तऽ कहाँ कनैत छी हम. नहि-नहि फेर नोर कियैक बहि रहल छौ. मोन खराब छौ की.. माथ दुखाई छौ, हम जाइंत दियौ...? नहि बउआ किछु नहि भेलै हमरा. हमरा कियैक माथ दुखैत…? ई सुनि बंटी चहकि कऽ बाजल... ओहो आब बुझलियौ तों पियाउज कटलहिन्ह हैं तैं तोरा आंखि सँ नोर बहैत छौ - छैऽ नेऽ..? बुधनी मोने-मोन सोचे लागल जे बउया तोड़ा कोना कहियौ जेऽ ई नोर माथ दुखेबाक कारणे आ की पियाउज कटबाक कारणे नहि बहि रहल अछि.... इ नोर...इ नोर तऽ गरीबी केर छैक. मुदा बुधनी सभटा दर्द अपना मोन में समेटने विरोगे लोल कोंचियाबैत आ जबरदस्तिये कनी मुस्कियैत बाजल "हाँ बउया पियाउज कटलियै तहि दुआरे नोर बहय लागल...! बंटी मायक ई गप्प सुनि ठिठिया कऽ हंसल आ मरुआ-रोटी-नून-अचार पियाउजक टुकड़ी संगे खाय में मगन भऽ गेल. गाल पर नोरक सुखायल धार नेने बुधनी के ओकर नेनपनक सत्य आ सुन्दर छवि देखि अजीब सन संतोषक अनूभूति भऽ रहल छलय..!!!
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. अरुण कुमार सिंह, एल.डी.सी.आई.एल., भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर कर्नाटक

Suggested citation: विजय मस्त. “सुजीतक सम्पूर्ण कथा एकटा नया स्वाद देलक.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 115, 2012-10-01. https://www.videha.co.in/research/2012/115/सुजीतक-सम्पूर्ण-कथा-एकटा-नया-स्वाद-देलक.htm

मूल विदेह अंक / Original issue