विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नेना लेल सुन्दर चित्रकथा

दुर्गानन्द मण्डल · 2012-10-15 · अंक 116

नेना लेल सुन्दर चि‍त्रकथा

श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक दू गोट चि‍त्रकथा (पहि‍ल गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा, दोसर मैथि‍ली चि‍त्रकथा) मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त भेल। दुनू चि‍त्रकथा एक संग श्री उमेश मण्‍डल जीक माध्‍यमे भेटल। एक-आधटा पन्ना उनटैबि‍ते मन गद्-गद भऽ गेल। लागल जे आब हम मैथि‍ल दरि‍द्र नै सभ कथुसँ सम्‍पन्न भऽ रहल छी। साहि‍त्‍यक तँ अनेको वि‍धा होइ अछि‍ जइमे कथा एक वि‍धा थि‍क तहूमे चि‍त्रकथा तँ बाल साहि‍त्‍य लेल प्रमुख। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ अपन भूलल-बि‍सरल संस्‍कृति‍क झलक सेहो भेटैत अछि‍। नि‍श्चि‍त रूपे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे एकर अभाव बहुत दि‍नसँ खटैक रहल छल। जेकरा श्रीमती प्रीति‍ ठाकुर अपन चि‍त्र कथा मैथि‍ल समाजक बीच राखि‍ एकटा असीम प्रति‍भाक परि‍चय देलनि‍ अछि‍।
बुझना जाइ छल जेना हम अपनेकेँ स्‍वयं वि‍सरि‍ गेल छी। वि‍सरि‍ गेल रही ओइ समैकेँ जइ समैमे मैयाँ अपन पोता-पोती लऽ जा कऽ घूड़ लग बैसि‍ गोनू झाक खि‍स्‍सा सुनबैत छलीह जे अति‍ मनोरंजक आ गोनूक तीव्र बुधि‍क परि‍चायक छल। तहि‍ना आनो आनो कथा जेकरा प्रीति‍ जी चि‍त्रवत् कऽ हमरा लोकनि‍क साेझामे रखलीह। जइमे रेशमा-चूहरमल, नैका बनि‍जारा, ज्‍योति‍ पंजि‍यार, महुआ घटवारि‍न, राजा सलहेस, छेछण महराज आ कालि‍दास छथि‍। जे कहि‍यो आम छल, आब लुप्‍त प्राय: भेल जा रहल छल, ओकरा एकबेर पुन: परि‍चि‍त करौलनि‍। जइमे लोक जनलक जे रेशमा के आ चूहड़मल के?
एतबे नै, प्रेमक पराकाष्‍ठाक परि‍चयक रूपमे जे लोकक ठोरपर हीर-रांझा वा लैला-मजनू रहैत छल, की ओकरासँ कम निस्‍वार्थ प्रेम रेशमा आ चूहड़मलक छल ई देखेबाकमे साकांक्ष रहलीह। जतए चुहड़मल दुधवंशी दुसाध जाति‍क तँ दोसर तरफ रेशमा भुमि‍हार ब्राह्मण जाति‍क बेटी। जखन जुहड़मलकेँ दंगल जीत कऽ अबैत देखलक तँ दुनूक भेँट गंगाक तटपर, ओतहि‍ प्रेमकथाक प्रारम्‍भ भेल। अर्थात् प्रेममे जाति‍-पाति‍सँ कोनो लेन-देन नै अपि‍तु प्रेम तँ प्रेम थि‍क। प्रेम कएल नै जाइ छै अपने भऽ जाइ छै। तहि‍ना नैका बनि‍जारा सेहो प्रेमेक पराकाष्‍ठाक परि‍चायक छी। भगता ज्‍योति‍ पंजि‍यार अपन वीरता आ पराक्रमक कारणे पूजि‍त भेल। आइ जँ धर्मराजक पूजा तँ ज्‍योति‍ पंजि‍यार सेहो पूजि‍त छथि‍। धर्मराजक भक्‍त ज्‍योति‍ पंजि‍यार बारह बर्खक तपस्‍याक बाद कंचन काया लऽ कऽ घूमि‍ घर एलाह। माइक कोखि‍ पवि‍त्र भेल। जे एहेन पैघ भगता ओकरा कोखि‍सँ जनमल।
तहि‍ना महुआ घटवारि‍न सेहो अपन इज्‍जत बचाबए खाति‍र कौशि‍की धारमे जान गमा अपन सतीत्‍वकेँ अकिंचन बना कऽ रखलीह। राज सलहेसक कथा तँ नाचो रूपमे प्रसि‍द्ध अछि‍। जेकरा प्रीति‍जी चि‍त्रवत् कऽ इति‍हास बना देलनि‍। एकटा धरोहरक रूप दऽ देलथि‍। अनचि‍न्‍हार जकाँ छेछन महराज कथाक संग कालि‍दासक चि‍त्र कथा आ हुनक यादव कुलमे जन्‍म हएब, हुनक यर्थाथ परि‍चए भेल। बहुतोकेँ ई बूझल हेतनि‍ जे कालि‍दास तँ कर्ण-कायस्‍थ छलाह। ऐ लेल सेहो प्रीति‍ जीकेँ धन्‍यवाद।
प्रीति‍ जीक दोसर रचना मैथि‍ली चि‍त्रकथामे कुल दस गोट कथा वर्णित अछि‍। जइमे राजा सलहेस, बोधि‍ कायस्‍थ, दीना-भदरी, नैका-बनि‍जारा, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान प्रमुख अछि‍। ऐ प्रकारे दुनू चि‍त्रकथा पढ़लापर एहेन लागल जे ई कथा सभ ऐति‍हासि‍क महत पाओत। ऐ प्रकारक रचनाक सर्वथा अभाव सन छल। जेकरा प्रीति‍जी हमरा सबहक समक्ष राखि‍ एकरा धरोहरि‍ स्‍वरूप महत देलनि‍। ऐ पोथीकेँ नैना-भुटुकाक पहि‍ल पसि‍न कहल जा सकैत अछि‍। खास कऽ जे बच्‍चा नंदन, वालहंश, वा अन्‍य पोथी पढ़बाक हि‍स्‍सक लगौने छल आब ओ लेखि‍का द्वारा रचि‍त रचनासँ लाभ उठाओत। पोथीक प्रत्‍येक चि‍त्र तथ्‍यात्‍मक आ उद्देश्‍यपरक अछि‍। चि‍त्रकथाक माध्‍यमसँ प्रीति‍जी मि‍थि‍लाक वि‍लुप्‍त प्राय भेल वि‍षय-वस्‍तुकेँ कथाक रूप दऽ जीवंत कऽ देलनि‍। मैथि‍ली प्रेमी ऐ तरहक रचनाकेँ नजरअंदाज नै कऽ सकैत छथि‍। आबैबला पीढ़ीक लेल ऐ प्रकारक रचना नै मात्र मनोरंजक अपि‍तु प्रेरणादायक सेहो सि‍द्ध हएत। पोथीक सभसँ पैघ बात ई अछि‍ जे प्रत्‍येक चि‍त्र एकटा वि‍शेष अंदाज आ दशाकेँ प्रस्‍तुत करबामे सफल भेल अछि‍ जे लि‍खल गेल पाँति‍क भाव स्‍पष्‍ट कऽ रहल अछि‍। प्राय: सभ जाति‍क लोकक चि‍त्रण ऐ चि‍त्रकथामे समाएल अछि‍। जे प्रीति‍ जीक समन्‍वयवादी सोचक परि‍चायक अछि‍। प्रगति‍शील वि‍चार तँ सहजहि‍। मि‍थि‍ला सभ दि‍नसँ उदारक परि‍चायक रहल मुदा कि‍छु लोक बेवसायि‍क एवं जाति‍वादी सोचक लाड़नि‍ बीचमे चलौलनि‍ आ चलाइयो रहल छथि‍। हमरा हर्ख भऽ रहल अछि‍ ऐ चि‍त्रकथाक लेखि‍कापर जे एतेक सुन्‍दर, सुगम, आ प्रगति‍शील डेग बढ़ा मैथि‍ली साहि‍त्‍यक वि‍कासमे एकटा बेछप स्‍थान बनौलनि‍ अछि‍।
हमर शुभकामना सतत रहत जे प्रीति‍जी ऐ प्रकारक रचना करैत रहती आ श्रुति‍ प्रकाशन प्रकाशि‍त करैत रहत तँ नि‍श्चि‍त रूपेँ मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लामे रहनि‍हार सभ पूर्णत: समृद्ध भऽ जेताह।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.अमित मिश्र- विहनि कथा- परिभाषा २.सन्दीप कुमार साफी दूटा विहनि कथा ३.राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा ४.वीरेन्‍द्र कुमार यादव-लघुकथा- बाबाक गाछी

अमित मिश्र
विहनि कथा
परिभाषा
माएक मोन एकाएक बड खराप भऽ गेल ।गाममे एहि रोगक डाँक्टर नै छथि तँए एकटा
मित्रक संग शहर एलौँ ।रवि दिन ,क्लिनिक बंद ।डाक्टर साहेबक डेरापर जाएबाक
योजना बनल ।मुदा . . . ।
पिछला दू घंटासँ गली-गली भटकि रहल छी ।जालमे फँसल माछ जकाँ मोहल्ला भरिमे
अहुरिया काटि रहल छी ।लोक सबसँ पूछि रहल छी ,मुदा . . .। डाँक्टर साहेबक
डेरा नै भेटल । मोन खौंझा गेल ।
मित्र बजलनि ,"जानबरसँ पूछि रहल छी तँए जबाब नै भेटैत अछि ।"
ई सुनि एकटा लड़का रूकि गेल आ कहल ,"भाइजी एकरे नाम तँ शहर छै ।गामक लोक
अगल-बगलकेँ दस गामक लोककेँ चिन्हैत अछि मुदा शहरमे बायाँ हाथ, दायाँ हाथकेँ नै चिन्है छै। एक फ्लैटमे जन्मदिन होइ छै आ दोसरमे श्राद्ध, ककरोसँ कोनो मतलब नै। शहर तँ शमसान थिक जतऽ तांत्रिक बनि लोक अपन स्वार्थपूर्तिक लेल तपस्या कऽ रहल छथि । किओ ककरो खोज-खबरि नै लै छथि, नै तँ तपस्या भंग भऽ जेतै। ईएह तँ थिक शहरक परिभाषा।"
इम्हर सह-सह करैत मनुखक बीच डेरा खोजबामे असमर्थ भेलहुँ आ उम्हर माएक
साँसक डोर टूटल ।
२.
सन्दीप कुमार साफी
दूटा विहनि कथा

साउस पुतोहु
-कनियाँ, घरमे छी यै?
-की भेलनि माए?
-आँइ यै छौँकावाली, एतेक निचेनसँ सितै किए छी यै? दुपहरक काज-राज अहिना पड़ल छै। कनी म्हिसोकेँ पानि देखा ने दियौ, पियासल महीस खुट्टा तोड़ि रहल छै। एतेक कहूँ मनुख सुतए। कतेक नीन आबैए अहाँकेँ यै।
-तँ की करू, सुतबो नै करू। भरि दिन खटैत-खटैत हाथ-पएर कारी-झामर भऽ गेल। ओम्हर चिलका तंग करए, इम्हर भानससँ तंग। हिनका होइ छै, हम भरि दिन खटैते रही, हमरासँ नै हएत महीसकेँ पानि पिआए। हमर माथ बड़ जोर दुखाइए, डाँर-पिट्ठी सेहो तोड़ने जाइए। एखन हमरासँ किछु नै हएत कएल।
-आँइ यै, एतेक कहूँ पुतोहु बानसब्बर हुबए। सुनियौ यै ढुकरीक माए। अहाँ सभ कहबै जे साउसक दोख। हम की बैसल छी। भरि दिन गोरहा पाथैत-पाथैत दुपहर भऽ गेल, एक टाएर गोबर छल हन। एखन तक पूजो नै केलौं। कखैन खाएब कोनो ठीक नै। ऐ महरानीकेँ देखियौ जे हमरेपर हाथ-पएर चमकाबैए। बड़का छोटका कऽ आइयक कनियाँ कोनो माने-मतलबे नै राखैए। अपन जएह मोन भेल वएह केलक। के खेनहारकेँ देखैए, जे ससुर भैंसुर खेलक की नै, अपन पेट भरि गेल, दोसर आब जेना रहए। अपन भूख तँ चुल्हा फूक, दोसरक भूख तँ माथा दुख।भगवान हमरे बेटाक कपाड़मे ई नसिनियाँ बथाए छल। जाइ छी नहाइ लए, एकरासँ मुँह लगाएब तँ अपने मुँह खराब हएत। मुदा एकरा जाबे तक बेटासँ पिटबाएब नै ताबे तक हमहूँ सुख-चैनसँ नै रहब। हमहूँ ऐ कनसिनियाँकेँ देखा कऽ रहब, जँ बेटा वशमे रहत तँ ऐ जनानीकेँ केहन होइ छै। साउससँ जबाब-सवाल केनाइ सभ हम देखा देबै। महीस जेना नाथि देबै।
पुतोहु- देखियौ यै मकरा काकी। हम सभ सुनि रहल छी। साउस कहूँ पुतोहुपर एतेक आगि-बाउल ढारै अइ यै। खिखरी माए, हमर साउस पहिने पुतोहु नै छलै की, जे पुतोहुकेँ एना सताबै छै। जँ ई बुढिया बेटासँ हमरा मारि खिया देलकै तँ घरमे यएह रहत की हमहीं रहब। झोँटा-केस हम नै उखाड़ि लेलिऐ तँ फेर की।
साउस- यै, सुनियौ यै टोल-पड़ोसक लोक सभ। ऐ भत खोखरीकेँ हम कोन आगि-बाउल ढारि देलिऐ जे ई हमर झोटा-केस उखारत। कोनो हमरा कियो देखनाहर नै अए। आइ आबऽ दही बुढ़बाकेँ, नै किछु कहलकौ तँ फेर की।
पुतोहु-हाँ-हाँ, देखब ने अहाँ हमर की बिगाड़ि लेब। जँ बेसी ओम्हर-आम्हर करब तँ हम छोटका भाएकेँ फोन कऽ के नैहरे चलि जाएब। तखन अहाँ अहिना असगरे चुल्हा फुकैत रहब। कहिया मरतै ई बुढ़िया, हमरा जानपर अछि।

सगुन
ठकोकाका-हर्षित बाबू। एना माथपर हाथ धेलासँ काज-राज चलैबला नै अछि। किएक तँ अपन मिथिलामे भऽ एलैए जे परम्परा, तेकरा तँ निभाबैए पड़त। किएक तँ अखुनका जइ मनसूबे चलि रहल अछि, तेकरा संग हमरा लोकनिकेँ चलऽ पड़त ने। अच्छए, खएर बात अपन समाजमे गरीब होइए वा धनिक, मुदा बेटी विवाह कोनो धरानीए भइए जाइत अछि। तइ लेल घबड़ेबाक कोनो बात नै। सभ बाबा उगना ठीक कऽ देथिन। ठीक छै तँ जाइ छी हर्षित बाबू, ठीक छै।
हर्षित बाबू-आ ठको काका। हाँ कहू, की कहै छी। देखियौ जे चढ़ैत शुद्धमे बेटीक कन्यादान कऽ के हम सभ दिल्ली जल्दी जाए चहै छी। तइ दुआरे काका हम अहाँकेँ सलाह लिअ लए आएल छी। जल्दीसँ कतौ भाँज लगेबै।
ठकोकाका-हर्षित बाबू। ओना हम सखबारमे एगो लड़का देखने छलिऐ, हमरा बड पसन्द आएल। लड़का बंगलोरमे इन्जीनियरिंगक तैयारी करैत अछि। बुझबामे आएल, लड़का नीक गोत्रसँ संलग्न अछि। भाव-विचार बड मधुर आ स्वभाविक सेहो छै। मुदा हर्षित बाबू, लड़का कऽ माय-बाप नै अछि, ओकरा मामा-मामी आ नाना-नानी पालने अछि।
हर्षित बाबू-ठकोकाका, जँ अहाँ ओ भाँज लगबितौँ तखन तँ बुझु जे सभ ठीके-ठाक रहितै।
ठकोकाका-ओ लड़का बुझु जे अहाँकेँ सेट भऽ गेल। सगुन ठीक अछि अहाँक यौ हर्षित बाबू।
हर्षित बाबू-शुभ लगनमे देरी की। जे नगद लेता अओर लड़का जे लेतहिन। हम सभ देबनि दै लेल। चैनकेँ गलामे देबनि, मोटर साइकिल देबनि। मुदा ओ लड़का हमरा बड पसन्द आएल। ठकोकका, अहाँ जल्दीसँ ई चक्कर चलाउ। हमर कन्यादान भऽ जाए। जल्दीसँ सगुन लऽ कऽ जाउ, गोर लगै छी।

राम वि‍लास साहु दूटा ि‍वहनि‍ कथा
इमानदारीक पाठ
ननुआँ पुछलक कनुआँसँ- “भैया आइ-काल्हि‍ तँ गामोक स्‍कूलमे बड़ सुवि‍धा पढ़ाइ होइ छै तैयो वि‍द्याथी सभ शहरक स्‍कलमे कि‍अए पढ़ै छै?”
कनुआँ जबाब देलक- “गामक इस्‍कूलमे इमनदारीक पाठ आ शहरक इस्‍कूलमे रोजगारक पाठ पढ़बै छै।”
“से केना?” -ननुआँ पुन: पुछलक।
कनुआँ उत्तर देलक- “गामक इस्‍कूलमे एहेन पाठ पढ़बै छै जे कहुना साक्षर भऽ जाए, गाए-भौंस चराबए आ नमहर भेलापर हर-फार जोतए, खेती करए। अन्न उपजा कऽ अपनो खाए आ आनोकेँ खि‍याबए। ई छि‍ऐ ने इमानदारीक पाठ मुदा शहरक इस्‍कूलमे वि‍द्यार्थी सभकेँ रोजगारक पाठ पढ़बै छै। ओ सभ पढ़ि‍-ि‍लखि‍ रोजगार लेल आन-आन शहर चलि‍ जाइ छै। अपन घर-परि‍वार आ समाज सेहो छुटि‍ जाइ छै। समाजसँ बेमुख भऽ जाइ छै। आब तोहीं कह जे इमानदारीक पाठ के पढ़तै?”
बौआ बाजल
पढ़ल-लि‍खल बेरोजगार छी मुदा दि‍न केना कटै छल तकर कोनो सुधि‍-बुधि‍ नै छल। ऊपरसँ परि‍वारक बोझ, आगू पढ़बाक इच्‍छा रहि‍तो कि‍छु नै कऽ सकलौं। एक दि‍न मनमे फुराएल जे कि‍छु नेना-भुटकाकेँ पढ़ाएल जाए। अहुना तँ हम बुड़ि‍आएले छी औरो बुड़ि‍या जाएब।
एक दि‍न भोरमे बौआ-बुच्‍चीकेँ ओसारपर पढ़बै छलौं। दुनू बेरा-बेरी प्रश्न पुछए आ हम उत्तर दइ छेलि‍ऐ। अहि‍ना स्‍थि‍ति‍मे बौआ पुछलक-
“लोक एत्ते मेहनतसँ कि‍अए पढ़ैए, जे पढ़ैए सेहो आ जे नै पढ़ैए ओहो तँ एक ने एक दि‍न मरि‍ऐ जाइए?”
बौआकेँ हम समझबैत कहलि‍ऐ-
“जीवन-मरण तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। ओ नि‍रंतर होइत रहैत अछि‍।”
बौआ फेर पुछलक-
“तखनो लोक कि‍अए पढ़ैए?”
“मनुख पढ़ि‍-लि‍ख ज्ञान अर्जित करैए आ ओइ ज्ञानसँ अपन जि‍नगीकेँ सुलभ बना असली जि‍नगी जीबैए। लोक पढ़ि‍-लि‍खि डाक्‍टर-इंजि‍नि‍यर, औफि‍सर, कवि‍ लेखक आ उपदेशक इत्‍यादि‍ बनैए। अच्‍छा ई कहह जे तूँ की बनबऽ?‍”
बौआ बाजल- “हम पढ़ि‍-लि‍ख कोनो काज कऽ सकै छी मुदा कवि‍-लेखक नै बनब। सभ कमा कऽ सुख-मौजसँ जि‍नगी बि‍तबै छथि‍ मुदा कवि‍-लेखककेँ कोनो कमाइ नै होइत छन्‍हि‍।”

वीरेन्‍द्र कुमार यादव
लघुकथा
बाबाक गाछी
आमसँ लदल गाछ। बि‍नु ओगरबाहक गाछी तुलसि‍या चाँपक कछेरमे। तुलसि‍या गाममे अभि‍जात वर्गक लोक सबहक संगे एक घर अक्षोप सेहो छल। राजू मल्लि‍क ओइ अछोप परि‍वारक पढ़ल-लि‍खल युवक छल।
सरकार आरक्षणक पक्षमे ओही गाम-पंचायतकेँ सुरक्षि‍त कए लेलक। गामक प्रमुख लोक सभ वि‍चार कए कऽ राजूकेँ मुखि‍या आ मोहि‍नीकेँ प्रति‍नि‍धि‍ चुनलक। मोहि‍नी ओही गामक पैघ शशि‍बाबूक पुत्र वधु छलीह। मोहि‍नीक पति‍ भरि‍-दि‍न गाँजा-भांग पीबैत, बि‍नु धि‍या-पुताक जवानि‍येमे स्‍वर्ग चलि‍ गेल।
नव ि‍नर्वाचि‍त प्रति‍नि‍धि‍ सबहक सम्‍मेलन भेल, जइमे पहि‍ल बेर मोहि‍नी आ राजूक भेँट भेल। आ ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पथ्थर जकाँ गड़ि‍ गेल। दुनूक मोनमे एक-दोसरकेँ अपनेबाक आग सुनगए लगल।
पि‍रि‍तक आतुरतामे मोहि‍नी चैत-बैसाखक रौदमे बाबा गाछी दि‍स‍ वि‍दा भेल। बाबा गाछीक बगलमे चाँपमे राजू मल्लि‍क अपन सुगर टहलाबए गेल छल।
राजूपर मोहि‍नीक नजरि‍ पड़ि‍ते मोहनीक प्रीति‍ उमड़ि‍ पड़ल। मोहि‍नी जोरसँ बाजि‍ उठल-
“राजू, एम्‍हर गाछक छाँहमे आउ, ओतए रौदमे कि‍एक खून सुखबै छी?”
एतेक सुनि‍ते राजू दौग कऽ मोहि‍नी लग आबि‍ गेल। मोहि‍नी राजूक हाथ पकड़ि‍ कऽ लगमे आनए चालहक, मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बूझि‍ अलग भऽ गेल। मोहि‍नी एकटा फकड़ा सुनबैत राजूकेँ अपना लगमे खींच लेलक-
“प्‍यास ने मानए धोबी घाट, नीन ने बुझए टुटल खाट आ प्रीति ने मानए ओछी जात।‍”
राजूक देहपर मोहि‍नीक हाथक स्‍पर्शसँ राजूक हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेलै जे ई चमत्‍कार केना भऽ गेलै जे एतेक पैघ घरक पुत्र-वधुक लगमे हम बैस गेलौं।
मोहि‍नी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदैमे छी। हम अहाँकेँ ईश्वरसँ आगू मानै छी। हमर जीवनक संगी बनबाक लेल स्‍वीकार करू।”
एतेक बात सुनि‍ते राजू बाजल-
“ई केना होएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँक नजरि‍ पड़ि‍ते हमहूँ ई सूधि‍ बि‍सरि‍ जाइ छी जे हम अक्षोप छी। मोहि‍नी बाजल इंसान अछोप नै होइत अछि‍। कर्मसँ लोक ऊँच आ नीच होइत अछि‍। बाबा साहेब अम्‍बेदकर जाति‍सँ अछोप छलाह मुदा ओ अपन शि‍क्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलक जे समाजक आगूक पाँति‍मे हुनक स्‍थान छन्‍हि‍।”
मोहनी आ राजूक प्रेम-प्रसंग बीचेमे कलुबा जे शशि‍ बाबूक मुँह लगुआ आ चालि‍सँ चुगला छल, कि‍छु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि दि‍स जाइत छल।
कलुआ अपन नजरि‍ पड़ि‍ते राजू डरसँ सहमि‍ गेल आ इशारासँ मोहि‍नीकेँ देखौलक। मोहि‍नी राजूकेँ हि‍म्‍मत बन्‍हैत अलग भऽ गेलीह। आ फेर भेटबाक समए नि‍श्चि‍त केलक।
ऐ प्रेम-प्रसंगक चर्चा सौंसे गाममे होमए लागल। हिम्मत बान्‍हि‍ कलुआ शशि‍बाबूसँ ई बात कहैत रहनि‍ ओही समैमे गामक औरो पैघ लोक सभ आबि‍ गेल आ शशि‍बाबूकेँ उतार-चढ़ाउक बात कहए लागल। शशि‍बाबू बाजलाह-
“रजुआक बाप रामा डोमकें बोलाबा भेजू।”
बोलाबाक लेल गेल धीरू रामा डोमकेँ सभटा बात बतौलक। रामा डोम दारू पीब कऽ मस्‍त छल। मालि‍कक बोलाबापर रामा दौगल आएल आ दुनू हाथ जोड़ि‍ बाजल-
“मालि‍कक जे हुकुम हेतै हम मानब।”
कलुआ बाजल- “रे राम तूँ चारि‍ दि‍नमे ऐ गामसँ आन गाम चलि‍ जो, फेर घुरि‍ कऽ ऐ गाम नै अबि‍हेँ।”
रामा डोम मालि‍कक हुकुम मानैत बाजल-
“मालि‍क अहाँक हुकुमक पालन अवस्‍स करब।”
ई कहि‍ रामा डोम ओइठामसँ वि‍दा भऽ गेल। घर पहुँचि‍ रामा, पुत्र राजूकेँ थप्‍पड़ मारैत कहलक-
“तोरा होश-हवाश नै, एतेक जुलुम कि‍एक केलेँ।”
राजू कनैत बाजल- “बाबूजी, हमर कोनो दोख नै, हम ि‍नर्दोष छी। रामाक गुस्‍सा शान्‍त भेल।”
भोरबाक चारि‍ बजि‍ते बगलक गामसँ अजान सुनि‍ते मोहि‍नी घरसँ भऽ बाबा गाछी आएल। ओही गाछीमे राजू छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि‍ चलि‍ गेल।
भोर होइते ई खबरि‍ सौंसे गाम आगि‍ जकाँ पसरि‍ गेल। शशि‍बाबू गामक लोकसँ वि‍चार केलक आ थानामे अपहरणक रपट लि‍खैलक जइसँ राजू आ रामाक नाम देलक।
ओम्‍हर राजू मोहि‍नीक संगे कोर्ट मैरेज केलक आ कि‍छु दि‍न अनतए रहबाक नि‍श्चय केलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलि‍ससँ पकड़बा देलक। पुलि‍स मारि‍-पीट कऽ रामाकेँ जहल पठा देलक। ई खबरि‍ सुनि‍ते राजू मोहि‍नीक संग कोर्टमे हाजि‍र भेल। रामाक जमानत करौलक आ गाम दि‍स वि‍दा भेल। राति‍मे रामा, राजू आ मोहि‍नी गाम आएल।
भोर होइते सौंसे गामक लोक शशि‍बाबूक दुआरि‍पर जमघट लगा देलक। कि‍यो बाजैत-
“ई डोमरा छातीपर मुँग दररि‍ रहल अछि‍।” तँ कि‍यो बाजए-
“एहेन हुलुम कहि‍यो नै भेल रहए।”
ऐ तरहेँ चुपचाप शशि‍बाबू सुनैत रहला। कि‍छु कालक बाद बजलाह-
“हे यौ समाजक लोक सभ परि‍वर्त्तन दुनि‍याँक नि‍अम छी। काल्हि‍क ऊँच आइ गहींर, काल्हि‍क पैघ आइ बरोबरि‍। बदलैत कालक चक्रसँ कि‍छु सि‍खबाक चाही। आब अपना सभकेँ कोनो चारा नै अछि‍। मोहि‍नी ि‍वधवा पुत्रवधु छी, जन-प्रति‍नि‍धि‍ सेहो बना देलि‍यनि‍। समाजकेँ सही आ नव दि‍शा देबाक लेल प्रति‍नि‍धि‍ होइत अछि‍। अपना सभ रूढ़ि‍वादी वि‍चारक ति‍याग करू। वि‍धवा वि‍वाह होबाक चाही। संगहि‍ ऊँच-नीचक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक ईश्वरक संतान छी। कि‍यो ऊँच-वा-नीच नै होइत अछि‍। सभकेँ समान बुझबाक चाही। अंतरजातीय वि‍आहकेँ सरकार प्रश्रय दऽ रहल अछि‍। ऐ अवसरपर समाजक लोककेँ हम आइ साँझक ि‍नमंत्रण दइ छी। साँझमे सामाजि‍क रि‍ति-रेबाजक अनुसार मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह होएत।”
ई सभ गप्‍प कहैत शशि‍बाबू उठि‍ गेलाह आ कलुआ केर संग रामा डोमक घर दि‍स वि‍दा भेल।
साँझमे राजू दुल्‍हा बनि‍ बरि‍आतीक संग शशि‍बाबूक दुआरि‍पर पहुँचल मोहि‍नी आ राजूक बि‍आह भेल। शशि‍बाबू अपन दोसर टोलक कामत परहक घर-दुआरि‍ आ जमीन मोहि‍नी आ राजूकेँ देबाक घोषणा केलनि‍।
ऐ तरहेँ आधुनि‍क समता-मूलक लोक जकाँ राजू आ मोहि‍नी जीवन-बसर करैत ग्राम-पंचायतक प्रति‍नि‍धि‍त्‍व करए लगलाह।
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Suggested citation: दुर्गानन्द मण्डल. “नेना लेल सुन्दर चित्रकथा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 116, 2012-10-15. https://www.videha.co.in/research/2012/116/नेना-लेल-सुन्दर-चित्रकथा.htm

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