ह्वेन सांगसं चीनमे भेंटघांट
हमसभ हाइस्कूलक पाठ्यक्रममे ह्वेनसांगकेँ सम्बन्धमे पढैत छलहुँ । चिनी यात्रीसभ भारतधरि पहुँचि बौद्धधर्मक ग्रन्थसभकेँ संकलन कऽ चीन लऽ गेल छल । विकट वाट–अथक यात्री । महिनोक सफर ।
हमसभ चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियानमे आबि गेल छी । विजिंगसं दूघंटाक उडानक बाद काल्हिए एत्त आएल रही । आसीन ७ गतेसं नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल सात दिनक चीन भ्रमणमे अछि । सात गते काठमाडौसं चायना ईस्टर्न एयरलायन्ससं हमसभ कुनमिंग आयल रहीआ ओत्तसं ओही दिन विजिंग पहुंचल रही राति ११ बजे करिब । विजिंगमे तीन दिन रहि क काल्हि चीनक सांस्कृतिक राजधानी सियान आयल रही । आ आई सियानक बासी रहल ह्वेन सांगक विशिष्ट कृतित्वक अध्ययनमे लागल छी ।
सरिपहुं आइ एकटा विशिष्ट व्यत्तित्वक कृतित्वसँ साक्षात्कारक समय छल । हमर चुलबुले गाइड मोनिका (पश्चिमी नाम) हमरासभकेँ डा.सीन टेम्पलमे लऽ जा रहल छली । एतय ओकरे शब्दमे सियान जौैंग अर्थात हमसभ जकरा ह्वेन सांग कहैत छिएै,क बासस्थान, कृतिसभसँ परिचय कराबय लेल ओ बेसब्र छलीह, मन्दिर बनौल गेल जत्त ओ बौद्ध कृतिसभक चिनी अनुवाद कएलन्हि । हुनक अनुवाद कएल किछु कृति ओतहि राखल अछि । भारतसँ घुरलाक बाद तत्काले सम्राटद्वारा कएल गेल स्वागत आ अन्य क्रियाकलापसभ देवालपर लिखल भव्य चित्रसभ बताबि रहल छल । प्रकोष्ट भितर ह्वेन सांगकेँ भव्य प्रतिमा सेहो स्थापित अछि । तहिना बाहर कम्पाउण्डमे सेहो हुनक विशाल प्रतिमा राखल गेल अछि । ओ सियानके बासी छलाह । तएँ सियानवासी हुनका बहुत बेसी सम्मान करैत अछि आ हुनका स्मृतिकेँ सम्बद्र्धन करएमे दत्तचित्त भऽ लागल अछि ।
११९ ई सन पूर्व सियानमे बेस्टर्न हान डाइनेस्टी समय दिस सिल्क कारोबार ओतय होइत छल । पाछु इएह सिल्क व्यापार सियान होइत समुद्रतट धरि पसरल । ई व्यापारिक बाट पाछु सिल्करोडक नामसँ प्रसिद्ध भऽ गेल । जखन चीनमे सन २५ दिस इस्टर्न हान पिरियडक समयमे भारतीय बुद्धिज्म चीनमे प्रवेश पौलक , सम्भवतः ओकर बाट सेहो इएह सिल्करोडे छल ।
तांग राजवंशक प्रारम्भिक समय ६२९ सन दिस ह्वेन सांग ओएह सिल्करोड होइत भारतधरिक यात्रा कएने छलाह —बुद्ध साहित्य,दर्शन प्राप्त करबा लेल ।ओ सन ६४५ मे सियान घुरलाह आ बडका ध्ष्मि नययकभ एबनयमब या म्ब ऋष्भल त्झउभि कँ निर्माण भेल ।
ह्वेनसांग सन ६०० मे जन्मल छलथि , ६१३मे बौद्ध भिक्षु बनलान्ह, ६२९ सँ ६४५ धरि भारत भ्रमण कएलन्हि, ६४५ सँ ६६४ धरि बौद्ध साहित्यक अनुवाद कएलन्हि , सन ६६४ मे हुनक देहाबसान भ गेलन्हि ।
हमरासभकेँ विस्तारपूर्वक ओहि पैगोडाकेँ जानकारी प्राप्त भेल । मनमे उठल अनेको जिज्ञाशाकेँ सेहो शान्त करबाक अवसर पौलहुँ ।
चीनमे देखय लायक बहुत चीज अछि । आठ हजार ई.पूर्वधरिक अवशेषसभ संग्रहालयमे देखलहुँ तऽ ३००० सँ ५००० हजारधरि ई पूर्वक साबूत आ विकसित सामग्रीसभ देखलाक बाद सभ्यता आ संस्कृतिक विकासमे चिनियां भूमि अन्य क्षेत्रसँ आगां आ बेसी सम्पन्न किए अछि से आभास होइत अछि । आव विश्वास होइत अछि जे लिपिक विकास किया चीनेमे भेल छल ।
चीन भ्रमणक एहि प्रसंगमे अनेकौं ऐतिहासिक तथ्यसभसं साक्षात्कार करबाक अवसर भेटल । तखन लागल चीन मात्र सातम् आश्चर्यक लेल मात्र नहि, अपना भितर अनेकौ आश्चर्यसं भरल सामग्रीसभ संरक्षित क रखने अछि, जकरा देखा क एखन आर्थिक उपार्जन मात्रे नहि अपन परम्परा आ सांस्कृतिक सम्पदाकें विश्वकें अगाडी समधानि क प्रस्तुत करबाक पैघ काजसेहो क रहल अछि ।
चीनक विकासक गति ठीके प्रशंशायोग्य मानल जएबाक चाही ।
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जगदीश प्रसाद मण्डल
पाँचटा विहनि कथा-
पुरनी भौजी
बीस दिन बरिसाइत भेनौं धुर-झाड़ आम पाकब शुरू नै भेल अछि।
बिनु बरखाक गरै जकाँ मेघक रूखि पकड़लक। दसो पोता-पोतीकेँ नेने पुरनी भौजी रोहनिया आमक झमटगरहा गाछ लग बैस दसोकेँ कहलखिन-
“जे पहिने पाओत से मीरा, जे दोसर पाओत से दोहल, जे तेसर पाओत से तेहल आ जे चारिम पाओत से चौहल।”
पुरनी भौजीकेँ तीनटा बेटा छन्हि। बिनु गहबर गेनौं पोती-पोतीक ढवाहि लागल छन्हि। बच्चा देखि माएक ममता तँ स्वाभाविक अछि। बाप तँ भरि दिन बोनाएले रहै छथि।
दस बर्खक पोता जे मिड्ल स्कूलमे पढ़ैए; टेटियाह सुग्गा जकाँ टाहि मारलक-
“मीरा माने कि भेल?”
बिहाड़ि तँ बिड़हा गेल मुदा हवाक सिहकी उठल। ढेनुआर जकाँ धऽ कऽ भरभड़ा गेल। के पहिने पौलक तेकर ठेकाने ने रहल।
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पोखला कटहर
पान सए रूपैआ खर्च भेला पछाति झबरी काकीकेँ आधा छूटपर एक हजार रूपैआ बैंकसँ लोन भेटलनि। अखन धरिक जिनगी बोनि-बुत्ताक रहलनि तँए ओहन रोजगार चाहैत रहथि जे कए सकथि। ओना घरे लग रोजगरिनी सभ छन्हि मुदा जातिक विभाजन काजेाकेँ कम सक्कत विभाजिन नै केने अछि। तँए लगमे रहितो अनाड़ीक-अनाड़िये झबड़ी काकी। मुदा पुछबो केकरा करथिन। एक हजार रूपैआक बात अछि। के केना झपटि लेतनि तेकर ठीक नै।
काकीक घरक आगू रस्तापर देने श्याम जाइत रहथि हुनका देखिते काकी टोकि देलखिन-
“बौआ सियाम, तोहीं सभ ने बेटा-भातीज भेलह। रोजगार करैले एक हजार रूपैआ लोन देलक हेन।”
झबड़ी काकीक बात सुनि श्याम नजरि खिरौलनि। बगलेमे देखि कहलखिन-
“पचहीवालीकेँ सोर पाड़ियौ।”
पचहीवालीकेँ अबिते श्याम कहलखिन-
“भौजी, अहाँ अपना संगे तरकारी बेचैक लूरि सिखा दिऔ। अपनो किछु पूँजी भइये गेलनि। एेबेर तत्ते आम फड़ल अछि जे कटहरकेँ के पूछत। ओना बेसी फड़ने पौखुलाहे कटहर बेसी अछि मुदा चौथाइ कमाइ लऽ कऽ बेचि लिअ।”
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सरही सौबजा
दिन भरि सात गोटेक संग झंझरपुरिया-बेपारी आम तोड़ि, काँच-पाकल, फुटल बेरा टोकड़ी बना, ट्रकक प्रतिक्षामे टहलैत गामक चाहक दोकानपर आबि अनेरे बजैत-
“एहेन ठकान जिनगीमे नै ठकाएल छलौं, जेहेन आइ ठकेलौं?”
चाहे दोकानक छर्ड़ा बूझि आनो-आन छर्ड़ा छोड़ैत-
“झंझरपुरिया तँ इलाकाकेँ ठकैए, ओकरा ठकि लेत हमर गौआँ?”
बेपारियोकेँ मनमे किछु रहै तँए पाछू हटैले तैयार नै। बत-कटौवलि एहेन चलि गेल जे ने एकोटा ऐ गामक नीक अछि आ ने झंझरपुरिया। बोलीक मारि तँ धुड़-झाड़ होइत, मुदा आगू बढ़ैक साहस कियो ने करए। एकटा गामक प्रतिष्ठा बूझि दोसर घोड़न-कटान बूिझ।
ओना चौकक रोहानी ठीक रहै किएक तँ सूर्यास्तक समए रहए। जटा भाय चौकक रोहानी देखिते चाहे दोकानपर बैसलाह। सामाजिक प्रश्न तँए हस्तक्षेप कएल जा सकै छै। बजलाह-
“कथीक घोंघाउज छी?”
झंझारपुरबला-बेपारी- “अहीं गाममे लखनजी सँ पाँच हजारमे सौबजा आमक एकटा गाछ लेने छलौं तइमे ठकि लेलनि।”
अपन चर्च सुनि लखनजी सेहो मोबाइलिक दोकानपर सँ चाहक दोकानक आगूमे आबि ठाढ़ भेला। बेपारीक प्रश्न उठिते लखनजी पुछलखिन-
“कि ठकि लेलौं, बाजू।”
बेपारी- “कलमी बूझि लेने छलौं, सरही दऽ ठकि लेलौं?
लखनजी- “कत्तेमे नेने छलौं कत्ते के आम भेल?”
“से तँ नफगर अछि, पाँच हजारमे लेने छलौं। खर्च-बर्च काटि कहुना पाँच हजार बचबे करत?”
जटा भाय- “तखन जे एना बजै छी से उचित भेल?”
बेपारी- “हमर बात दोसर अछि। सौबजा कलमी होइ छै। हिनकर अॅठिआहा छियनि, माने सरही छियनि। ओना साइजोमे ठीक छन्हि।”
जटा भाय- “अहाँ केना बुझै छी जे मुँह-नाक एक रहितो सरही छी?”
बेपारी- “जटा काका, अहूँ भासि जाइ छी। कहुना भेलौं तँ बेपारी भेलौं कि ने। कुमारि-बिऔहितीक भाँज जँ नै बुझबै तँ घटकैती कएल हएत।”
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तेरहो करम
अबेर कऽ भाँज लगने कनटीर काका खेत देखए नै गेला। ओना मनमे उठलनि मुदा भदवारि जानि नै गेला। विचारि लेलनि जे इजोरिया छीहे भोरगरे देखि लेब।
छगाएल मन साढ़े तीनिये बजे नीन टूटि गेलनि। नीन टुटिते नजरि दौड़ कऽ काज पकड़ि लेलकनि। तीन-हत्थी ठेंगा लऽ बाध दिस विदा भेलाह।
श्रीविधि खेती लेल जे धानक बीआ भेटल छलनि वएह धान। रौदीक किरतबे विधि तँ भंग भऽ गेलनि मुदा सए रूपैये घंटा पटा बीघा भरि खेती केलनि। संयोगो नीक बैसलनि। कोसी नहरिक पहिल पानि हाथ लगने सुतरलनि।
नबे दिनक पाकल धानमे भरि जाँघ पानि, चुट्टी-पीपड़ीसँ लदल सीस देखि कनटीर काकाक मन चोटसँ चोटाए लगलनि। असहाज होइते बमछैत घर दिस घूमि गेलाह। मोहनलालक घर लग अबिते आरो बमकि-बमकि बमछी छोड़ए लगलाह। आँखि मीड़िते मोहनलाल अंागनसँ निकलि लगमे आबि पुछलकनि-
“काका, एना किअए भोरे-भोर बमकै छिऐ?”
ओना कनटीर काका आ मोहनलालक उमेरक दूरी बीस बर्खसँ बेसी हटल मुदा विचारक दूरी लगीच बनौने तँए दुनूक बात दुनू सुनबो करै छथि, कहबो करै छथिन आ मानवो तँ करिते छथि।
बमकी सुनि कनटीर काका ठमकि गेला। ठमकैत बजला-
“की कहियऽ बौआ, परसू धान काटि तोड़ बागु करैक विचार केने छलौं। तोहूँ तँ खेती करिते छह, तोहीं कहह जे धानक-नारक कि गति हएत, छनुआमे कते भीड़ होइ छै से कि कोनो नै बुझै छहक। तइपर कहिया खेतक पानि सूखत आ कि फेर दोहरा कऽ पानि औत तेकर कोन ठेकान छै?”
कनटीर काकाक दहलाइत छातीकेँ खढ़ फेक असथिर करैक विचार मनमे उठिते मोहनलाल बाजल-
“डुमैक कोन अाशा करै छी उगैक आस करू।”
मोहनलालक तोष जते संतोष देलकनि तइसँ बेसी असंतोष बनौलकनि। मनमे एलनि जे एक तँ ठेकानि कऽ नहरक पानि नै अबैए तइपर जे छहरक बान्ह-छेक नियमित नै अछि। सरकार कहत जे कानून अपना हाथमे नै लिअ। बजलाह-
“एको कर्म बाकी नै रहत। तेरहो कर्म भइये जाएत। सबहक नजरि दैछने खाइपर लटकल छै से केना उतरतै?”
मोहनलाल- “काका, कूदै-फानै तोड़ै तान, से राखए दुनियाँक मान’ बिसरि गेलऐ?”
किछु मन पाड़ैत कनटीर काका बजलाह-
“हौ छोड़ियो केना देब, अकाल मृत्यु केना हुअए देब।”
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डुमैत िजनगी
डुमैत कारोबार देखि झड़ीलाल डुमैत जिनगी, जहिना ओछाइनपर पड़ल चारक कोरो-बत्ती लोक देखैत तहिना देखि रहल छथि। तड़पैत मन बेथित भऽ दुनियाँ निहारिते बुदबुदेलनि-
“एतेटा दुनियाँमे अपन किछु ने रहल।”
मुदा लगले मन ठमकि गेलनि। जिनगी तँ परती खेत जकाँ नै अछि जे जेमहरसँ तेमहर जेबाक हुअए तिम्हरे-सँ-तिम्हर कोना-कोनाी रस्ता बना लिअ। जिनगीक तँ नाप अछि।
ओना पचास बर्खक झड़ीलाल अखन धरि हारि मानैले तैयार नै छलाह मुदा एकाएक मृत्युक समीप देखि थर-थरा गेलाह। हारि नै मानैक कारण छलनि जे जे गौरव गाममे केकरो नै देखैत छलाह ओ अपनामे देखैत छलाह। ओ छियनि समैया फसिल जकाँ भिन्न-भिन्न नाओं। अनेको नाओंसँ अपन प्रतिष्ठा बनौने छथि। कियो बेपारी भाय, तँ कियो डाक्टर भाय, कियो दिलीप भाय कहैत छन्हि। मुदा स्त्रीगणक बीच झड़-झड़हा नाओं चलैत। यएह छलनि झड़ीलालक जिनगीक मान-प्रतिष्ठा। मुदा जे होउ झड़ीलाल अपनाकेँ मेहनती बेपारी जरूर बुझै छथि।
सालमे तीन-चारि जोड़ मुइल-टुटल बड़द (गाड़ीक टुटल, घास-पानिक टुटल, रोगाएल इत्यादि) सस्तामे आनि, दुनू परानी जमि कऽ सेवा करै छथि आ डेढ़िया-दोबरमे बेचि अपना जीविकाक आधार बनौने छथि। घूमै-फिड़ैबला छथिये तँए तीनू बेटीक बिआह एहेन नजरिये कऽ लेने रहथि, जे कहियो भार नै बुझलनि।
अंतिम खेप माने ऐ खेपमे ठका गेलाह। आठे दिन खूँटापर बड़द अनला भेलनि कि पाँचे दिनक बीच जोड़ो भरि बड़द मरि गेलनि।
खूँटापर पड़ल मरल बड़द लग बैसल दुनू परानी झड़ीलाल। अक-वक बन्न। तरसैत मन कलपैत देवसुनरिक, जहिना रौद, पानि वा शीतमे सिताएल चिड़ै पाँखि फड़फड़बैत; तहिना मन फुड़फुड़ेलनि-
“भगवान हाथक काज छीन लेलनि?”
पत्नीक बातक उत्तर झड़ीलालकेँ नै फुड़लनि। फुड़बो केना करितनि, जिनगीमे कहियो पहरनियाँ देवीक पूजा पहाड़पर चढ़ि नै केने छलाह। मुदा तैयो घिंघियाइत स्पष्ट उत्तर देलखिन-
“दुनियाँ बड़ीटा छै, एकटा काज छिनाएल दोसर-तेसर-चारिम ताकि लेब।”
पतिक उत्तरसँ देवसुनरिकेँ झॅपन-तोपन बरसाती सूर्य जकाँ अाशाक किरण फुटलनि, मुदा लगले फेर तोपा गेलनि। बजली-
“काज ले तँ लूरि चाही, से....?”
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नागेन्द्रकुमार कर्ण