विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण—भाग ३

गजेन्द्र ठाकुर · 2012-11-01 · अंक 117

विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण (भाग-३)

फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक।
आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत
गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।

मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा:
वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल।
वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल।
प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)।
जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि।
वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि।

शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा:
ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल।
शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।

१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।

विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार!!
दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पदावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पदावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पदावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)।
गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि।

रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ!! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि।
संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पदावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पदावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत।
तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “हिस्ट्री ऑफ नव्य-न्याय इन मिथिला” मे लिखै छथि- “The family which was inferior in social status is now extinct in Mithila…Gangesha’s family is completely ignored and we are not expected to know even his father’s name.” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह!
आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल।
गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।

शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पदावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।

श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि। लखिमा ठकुराइन पदावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि। कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि। “रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि। धूर्त समागम सेहो दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

जगदानन्द झा मनु

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण—भाग ३.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 117, 2012-11-01. https://www.videha.co.in/research/2012/117/विद्यापति-किछु-प्रचलित-कुप्रचारक-निराकरण-भाग-३.htm

मूल विदेह अंक / Original issue