कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली- राजा टंकनाथ चौधरी
कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापनक प्रारम्भक होएबाक सदर्न्भमे डा. जयकान्त मिश्र (मैथिली साहित्यक इतिहास, साहित्य अकादेमी ) लिखने छथि - स्वर्गीय सर आशुतोष मुखर्जी कलकत्तामे मैथिलीक महान सम्पोषक कहल जाए सकैत छथि। कुमार गंगाानन्द सिंह, बाबू गङ्गापति सिंह, ब्रजमोहन ठाकुर, विद्यानन्द ठाकुर आदि महानुभाव लोकनिक प्रयाससँ तथा दुर्गागंज पुरनियाँक राजा टंकनाथ चौधरीक उदार वित्तीय सहायतासँ 1917 ई. मे कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिली चेयर स्थापित भेल।
डा. सुभद्र झा (मैथिली: वृत्त ओ परिधि, चेतना समिति) तात्कालिक स्थिति आ सहयोगकेँ स्पष्ट करैत लिखल अछि जे मैथिलीक अध्यापनक हेतु दू टा प्राध्यापक नियुक्त भेल छलाह। एहिमे एक गोटेक वेतन रजौरक राजा स्व. टंकनाथ चौधरी द्वारा देल द्रव्य राशिसँ तथा दोसर गोटेक वेतनक राशि बनैलीक स्व. राजा कीर्त्यानन्द सिंह प्रभृति द्वारा देल द्रव्यसँ देल जाइत छल तथा ई लोकनि क्रमशः रजौर तथा बनैली व्याख्याता कहल जाथि।
एहि प्रसंग ब्रजमोहन ठाकुर (विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेश, चेतना समिति) लिखल अछि- जखन हम पूर्णियाँसँ घूरि के ँकलकत्ता पहुँचलहुँ तखन ज्ञात भेल जे राजा श्रीटंकनाथ चौधरी सेहो उदारदातापूर्वक साढ़े तीन हजार टाका देबाक सूचना सर मुखर्जीके ँ देलथिन्ह अछि। ओ ‘टंकनाथ चौधरी चेयर’ स्थापित करबाक अनुरोध कएलन्हि अछि। एहि तरहे ँ दूनू (राजाबहादुर कीर्त्यानन्द सिंह) मिलाके ँ एगारह हजार टाका तात्कालिक कार्य चलएबाक हेतु संगृहीत भए गेल। अर्थात् विश्वविद्यालयमे मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ होएबाक निमित्त आवश्यक निधि उपलब्ध करेबाक हेतु जे दू उदारमना मातृभाषा अनुरागी आर्थिक सहयोग कएल आ कलकत्ता विश्वविद्यालयमे सर्वप्रथम मैथिलीक अध्यापन कार्य प्रारम्भ भए सकल एवं जाहिसँ मैथिली शिक्षणक बाट खूजल, ओहिमे एक छथि राजा टंकनानाथ चौधरी।
राजा टंकनाथ चौधरी राजा बुद्धिनाथ चौधरीक पुत्र छलाह। हिनक जन्म 11 नवम्बर 1884 ई. के ँदुर्गागंज, कटिहारमे भेलनि। ओ अपन बेमात्रोय भाए कुमार छत्रानाथ चौधरीसँ मात्रा छओ मास छोट छलाह। हिनक पिता राजा बुद्धिनाथ चौधरीक देहान्त जेष्ठ 1885 ई. मे भए गेलनि। ओहि समयमे दूनू भाए नावालिग छलाह। जेना महाराज महेश्वर सिंहक देहावसानक उपरान्त हुनक दूनू पुत्रा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह एवं महाराज रमेश्वर सिंहक अल्पवयस्कताक कारणे ँ दरभंगा राज ‘कोर्ट ऑफ वार्ड्सक अन्तर्गत चल गेल छल, ओहिना राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी कोरट लागि गेलनि।
राजा टंकनाथ चौधरीक प्रारम्भिक शिक्षा नवद्विप जिलाक कृष्णनगरमे भेलनि। 15 वर्षक अवस्थामे ओ कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ प्रथम श्रेणीमे इंटर पास कएल। प्रेसिडेंसी कालेजसँ अङरेजी तथा दर्शन विषयक संग स्नातक भेलाह। अग्रिम शिक्षाक हेतु दर्शनशास्त्रा लए एम. ए. मे नाम लिखाओल। किन्तु 1904 ई.मे जखन जमीनदारी कोरट मुक्त भेलनि तँ औपचारिक शिक्षा समाप्त कए जमीनदारीक प्रबन्धक दायित्व सम्हारि
लेल। राजा बुद्धिनाथ चौधरीक जमीनदारी बिहार आ बंगााल- दूनू राज्यमे छलनि। ओकर सुप्रबन्धक हेतु बिहार क्षेत्रक प्रबन्ध कुमार छत्रनाथ चौधरी तथा बंगााल क्षेत्रक प्रबन्ध राजा टंकनाथ चौधरी सम्हारल। राजा टंकनाथ चौधरीक विवाह कोइलख, मधुबनी ग्राम निवासी पण्डित जानकीनाथ झाक कन्यामे छलनि। राजा साहबके ँ तीन पुत्र एवं तीन कन्या भेलथिन। हिनक परिवारमे कतेको खाढ़ीसँ पिताके ँ कन्यादानक सौभाग्य नहि होइत छलनि। राजा साहबके ँ ई सौभाग्य भेटलनि। राजा टंकनाथ चौधरी यद्यपि स्वयं उच्चशिक्षा प्राप्त नहि कए सकल छलाह मुदा, समाजमे शिक्षाक व्यापक प्रचार हो, तदर्थ आजीवन प्रयत्नशील छलाह। एहि हेतु 1915 ई. मे अपन पिताक नाम पर रामनगरमे स्कूल स्थापित कएल। शिक्षाक क्षेत्रामे हिनक अवदानक उल्लेख करैत मिथिला मिहिर (16 जून, सन 1928 ई.) लिखैत अछि- ‘शिक्षा प्रचार में आप सदा आगे रहते थे। अपनी राजधानी रामगञ्ज में अपने स्वर्गीय पिता के स्मारक में बुद्धिनाथ इन्सटिच्यूशन नाम से एक हाईस्कूल स्थापित कर उसमें अनेको विद्यार्थियों को अपनी ओर से सब खर्च देते थे।’
ओहि स्कूलमे मैथिल छात्रक निःशुल्क शिक्षाक व्यवस्था छलैक। खगल आ मेधावी छात्रक आवास आदिक प्रबन्ध राजक दिशिसँ होइत छल। बंगालमे रहितो हुनक समस्त पारिवारिक सम्बन्ध आ सरोकार मिथिलासँ छल। ते ँ ओतय मैथिल छात्रक संख्या पर्याप्त रहैत छल। ओ मैथिल छात्र संघक स्थापना कएल जकर नियमित बैसार होइत छलैक। ओहि बैसारमे मैथिली निबन्ध तथा कविता पाठ होइत छल। मिथिलासँ गेल
ओहने एक छात्रमे छलाह काशीनाथ झा जे पछाति मैथिलीक कवि कथाकारक रूपमे ख्यात भेलाह। पं. काशीनाथ झा जखन मैट्रिक पास कए लेलनि तँ ओही स्कूलमे हुनक नियुक्ति एक शिक्षक रूपमे भए गेलनि। तदुपरान्त, ओ अपन अनुज काञ्चीनाथ झा (डा. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’) के ँ गामसँ आनि लेलनि। किरणजी ओतहिसँ मएट्रिक एवं राजा टंकनाथ चौधरीक आर्थिक सहयोग पाबि कलकत्ता विश्वविद्यालयसँ इण्ट्रेंस
पास कएलनि। एहि तथ्यके ँ स्पष्ट करैत राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र रुद्रनाथ चौधरी (देहावसान, 2004 ई.) लिखैत छथि-
At Ramganj, he established a High School in 1915, in the memory of their father. The Maithil Students from
Mithila area were taught free of tuition fee, they were allowed free food and seats in the Maithil Hostel of the school.
Poor students of the area were also allowed teaching free of fees. A Maithil Chhatra Sangha was established in which
essays and verses were read. Late Pandit Kashinath Jha, who passed Matriculation from there was appointed as a teacher
of the school. Pt. Kashinath Jha was the elder brother of Mithila's eminent writer and thinker, Dr. Kanchinath Jha
"Kiran", took great interest in Maithili literature. The students were encouraged to write more and more and read them in
the weekly gathering. Movements for Mithilakshar type was done. (चेतना समिति स्मारिका, 1988)।
राजा टंकनाथ चौधरीक व्यक्तित्व सहज छल। ओ मिलनसार छलाह। पैघ-छोटक भेदभाव मनमे बिना अनने लोकसँ भेंट करैत छलाह। हिनक व्यक्तित्वक एहि विशेषताक प्रसंग ‘मिथिला मिहिर’ लिखने अछि - ‘हमारे राजा साहब बी.ए. होने के अतिरिक्त सुवक्ता, कार्यकुशल, अथक परिश्रमी, निरभिमानी, शिक्षाप्रेमी, तथा मिलनसार थे। आप बड़े से बड़े और छोटे से छोटे तक में दिल खोलकर बातें करते थे।’ हुनक पुत्र
रुद्रनाथ चौधरीक निम्नलिखित कथनसँ सेहो एहि बातक पुष्टि होइत अछि। ओ लिखैत छथि -
When at Ramnagar, he used to sit in the maidan in front of the palace for about one and half hour with some
officials and relations. where the general public and tenants were free to talk to him about their grievances, if any, which
were noted down and redressed as far as possible. (चेतना समिति स्मारिका, 1988 ई.)।
राजा टंकनाथ चौधरी उदार प्रवृतिक लोक छलाह। मिथिला मिहिरसँ स्पष्ट होइछ हिनक एहि उदारताक प्रतिकूल प्रभाव पड़ैत छलैक तथा ओ कर्जमे भए गेल छलाह। तथापि सामाजिक कार्यसँ किंचितो विमुख नहि भेलाह। राजा साहबक उदारताक एक ज्वलन्त उदाहरण अछि जे 1926 ईमे सितावगञ्ज आ ठाकुरगाँव बाटे दिनाजपुरसँ रूहिया धरि जखन रेललाइन बनय लागल, जे हुनक जमीन बाटे जाइत छल, तँ राजा टंकनाथ चौधरी रेलवेके ँनिःशुल्क जमीन दए देलथिन। राजा टंकनाथ चौधरी दिनाजपुर जिला वोर्डक गैर-पदाधिकारी अध्यक्ष तथा दिनाजपुर म्युनिसिपल बोर्डक 15 वर्ष धरि अध्यक्ष रहलाह। बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिलक गठन भेला पर ओकर सदस्य निर्वाचित भेलाह। हिनक अवदानक प्रसंग मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘बहुत दिनों तक आप दिनाजपुर डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन रहे और इस अवधि में आपने अच्छे-अच्छे काम किये जिनके लिये दिनाजपुर जिला बोर्ड में आज भी आप का नाम आदर के साथ लिये जाते हैं। आजकल आप कदमा थाना की ओर से पूर्णिया जिला बोर्ड में मेम्बर थे। और बंगाल कौंसिल का भी मेम्बर थे। बंगाल के भूतपूर्व गवर्नर ने आपकी उदारता और शिक्षा-प्रेम की कई वार प्रशंसा की थी। और ‘राजा साहब’ की उपाधि से सम्मानित किया। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि -
Being pleased at his devotion for public welfare the British Government honoured him with the title of Raja on
Nov. 25, 1925 in a Durbar held by the Governor of Bengal.
राजा टंकनाथ चौधरी नित्यपूजा आ देवीभागवत पाठ कएल करथि। किन्तु दोसर धर्मक प्रति असहिष्णु नहि छलाह। 1926 ई.मे कलकत्ताक संगहि आनोठाम जखन साम्प्रदायिक दंगा पसरि गेलैक एवं ओकर पसार दिनाजपुर धरि होअए लागल तँ राजा साहेब तत्काल पण्डित एवं मौलवीकेँ आमन्त्रित कएल। दूनू गोटाके ँ एकठाम बैसाय धर्मशास्त्र पर प्रवचन दिआओल। ई कायक्रम एक मास धरि चलल छल। राजा साहबक एहि प्रयाससँ धार्मिक साहिष्णुता बढ़ल एवं शान्ति व्यवस्था भंग नहि भेलैक। ओतय कटिहार हाट लगाओल, जे अद्यावधि लागि रहल अछि। रामगञ्जमे ओ भगवतीक एक मन्दिरक निर्माण कएल। भारत विभाजनक उपरान्त 1951 ई. मे राजा टंकनाथ चौधरीक पुत्र आदि पूर्वी पाकिस्तानसँ जान बचाए पडे़लाह, ताधरि ओतय दुर्गापूजा खूब धूमधामसँ होइत छल। राजा टंकनाथ चौधरी दुर्लभ पुस्तक तथा पाण्डुलिपिक संग्रह कए विशाल पुस्तकालयक स्थापना कएने छलाह। जखन हुनक एक प्राध्यापक सेवानिवृतिक उपरान्त बिलेंत जाए लगलथिन तँ हुनक समस्त संग्रह राजा साहेब कीनि लेल। रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि - Huge collections
of manuscripts on Talpatra, Bhojapatra and thick papers on different subjects, collected by his ancestors were being
transcribed by eminent pandits for years. He spent hours in reading books in night.
राजा साहब संगीतक बड़ प्रेमी छलाह। बेतिआक संगीतकार मल्लिक लोकनि हुनक दरवारमे अबैत रहैत छलथिन। शतरंज एवं फोटोग्राफी हुनक हॉबी छल। छात्र जीवनमे फुटबाल, हेलब एवं घोड़सबारी प्रिय छलनि। ओ एक कुशल शिकारी सेहो छलाह। जखन कोनो सरकारी अमला अथवा बंगालक गर्वनर अबैत छलथिन तँ हुनक सम्मानमे विशेष शिकार अभियान होइत छलैक। एहि लेल हुनका अपन जमीनदारीसँ बाहर नहि जाए पड़ैत छलनि।
मिथिला मिहिर एवं मिथिलामोदक ‘मैथिल महासभा’ विषयक रिपोर्ट एवं समाचारमे राजा टंकनाथ चौधरीक उल्लेख निश्चित रूपसँ भेटैत अछि। एहिसँ स्पष्ट होइछ जे ओ मैथिल महासभाक अधिवेशनमे नियमित रूपसँ सम्मिलित होइत छलाह। ईहो स्पष्ट होइछ जे ओ समाजोपकारी, सुधारात्मक प्रयास एवं प्रस्तावक समर्थक छलाह। ओ एक नीक वक्ता छलाह जे मिथिला मोद (उद्गार, 61 1911 ई.) मे मैथिल महासभाक तेसर
अधिवेशनक (3-5 नवम्वर 1911 ई. दरभंगा)क प्रकाशित निम्नविवरणसँ स्पष्ट होइत। ओ लिखैत अछि - द्वितीय दिन (4 नवम्बर 1911 ई.) 2 बजे श्रीमान कनिष्ठ रजौराधीश टंकनाथ चौधरी (B.A.) महोदयक सुन्दर वक्तृता भेल। सर्वज्ञात अछि जे राजा टंकनाथ चौधरी कलकत्ता विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक लेल उदारतापूर्वक दान देल। किन्तु मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक विकास एवं संरक्षणक क्षेत्रमे हुनक इएह टा अवदान नहि अछि। जखन ओ अपन पिताक नामपर स्कूल स्थापित कएल तँ ओहिमे मैथिल छात्रक लेल विशेष व्यवस्था छल। मैथिल छात्र संघक तत्त्वावधानमे रचनाक पाठ कराए ओ सर्जनात्मक प्रतिभाकेँ प्रोत्साहित करैत छलाह। मिथिलाक्षरक संरक्षणक लेल प्रशिक्षण अभियान चलौने छलाह। ओहिना जखन मैथिल महासभामे वा ओकर बाहर समुद्र यात्रा पर घर्मथन होइत छल तँ एहि विषयक निबन्ध लेखन प्रतियोगिता आयोजित कराओल। एहि सम्बन्धमे पण्डित जानकीनाथ झा, व्याकरणतीर्थक नामसँ एक निवेदन मिथिलामोद, उद्गार - 61, शाके 1833, सन 1319 सालमे प्रकाशित अछि। निवेदन अछि - 50 टाका पुरस्कार श्रीमान रजौराधीशसँ - आधुनिक कालमे मैथिल ब्राह्मणके ँ उन्नत्यर्थ विलायत जाएब अनुचित - एतद्विषयमे मिथिला भाषा मध्य जे मैथिल ब्राह्मण विद्वज्जन प्रमाण सहित सर्वोत्तम लेख लिखताह, तनिका 50 टाका मूल्यक पदक (मेडल) देल जैतन्हि।’ लेख 15 दिसम्बर 1911 ई. सँ पूर्व निवेदकके ँपठा देबाक अनुरोध अछि। समुद्र यात्राक पक्ष-विपक्षमे मिथिलामोद(1911ई.) मे अनेक लेख प्रकाशित भेटैत अछि। सम्भव थिक जे ओही प्रतियोगिता हेतु लिखल गेल हो। समाज सुधारक संग मातृभाषा मैथिलीक विकासक प्रति राजा
साहब कतेक साकांक्ष छलाह, से एहि निबन्ध प्रतियोगिताक आयोजनसँ स्पष्ट होइत अछि। समस्यापूर्ति प्रतियोगिता तँ होइत छल, मुदा मैथिलीमे निबन्ध लेखन प्रतियोगिताक आयोजन प्रायः सर्वप्रथम राजा टंकनाथ चौधरी, सएह आरम्भ कराओल। राजा टंकनाथ चौधरी महाराज रमेश्वर सिंहक प्रियपात्र छलाह। ओ समय-समय पर मिथिला, मैथिल एवं जमीनदारीक समस्यापर विचार करैत रहैत छलाह। ओ जखन कोनो गम्भीर समस्याक समाधानक लेल गवर्नर वा वायसरायसँ भेंट करबाक हेतु जाइत छलाह, तँ राजा टंकनाथ चौधरी
हुनक संगमे रहैत छलथिन। आर जखन हुनक देहावसान भेलनि तँ महाराज रमेश्वर सिंह राजा टंकनाथ चौधरीके ँ Mouthpicee of North Bengal कहि अपन शोक संवेदना व्यक्त कएल। एहन मातृभाषा अनुरागी राजा टंकनाथ चौधरीक, मात्रा 44 वर्षक अवस्थामे जेठ पूर्णिमा रवि, प्रातः काल 3 जून 1928 केँ देहान्त भए
गेलनि। राजा साहबक रोग आ देहावसानक प्रसंग मिथिला मिहिर, लिखैत अछि - ‘बहुमूत्र रोग से ग्रस्त रहने पर भी स्वास्थ्य, सबल और प्रभावशाली जान पड़ते थे। मृत्यु से कई दिन पहले उसी के उपसर्ग से कुछ अस्वस्थ्य हो गये, जिसके निवारणार्थ दिनाजपुर में ‘इन्जकशन’ कराये! काल बली था, बुरा होने वाला था; इन्जकशन से फायदा नहीं पहुँचा, उलटे बाँह फूल गया, चित्त विकल हुआ, दिनाजपुर से कलकत्ते आये, बड़े-बड़े डाक्टरों ने देखा, दबा की; परन्तु निष्ठुर काल के आगे किसका चलता है, उसका दबा कौन कर सकता है? गत रविवार ता. 3 जून, 1928 ई. के भोर में दुखी परिवारों को रोते हुये छोड़ कर इस संसार से सदा के लिये चल बसे!’
राजा साहब पुत्रा नवालिग छलथिन। परिणामतः फेर हुनक जमीनदारी कोर्टस आफ वार्डक अन्तर्गत चल गेल। मैथिलक एक केन्द्र समाप्त भए गेलैक। एहि प्रसंग रुद्रनाथ चौधरी लिखने छथि - With his passing away hundreds of relations, employees and dependents became unsettled, and the Estate being
taken over by the court of wards, they all went away to other places or their home. The family shifted to Calcutta for the
education of the children.
बंगलादेश निर्माणक बाद बनल सौहार्दपूर्ण वातावरणमे रजौरक एक विश्वासपात्र दुर्गागंज आबि राजा साहेबक पुत्र (देहावसान 2004 ई.)सँ घूमि चलबाक अनुरोध कएने छलनि जे बंगबन्धु मुजिवुर रहमानक हत्याक उपरान्त भारत विरोधी वातावरणमे विलीन भए गेल। राजा साहेबक पुत्रबधु जे हुनक नवजात पौत्र (प्रो. जी.एन. चौधरी, पूर्व अध्यक्ष, स्नातकोत्तर समाजशास्त्रा विभाग, ल.ना.मि.वि.वि. दरभंगा) के ँ अपन आंचरमे नुकाके ँ पड़ाएल छलीह, अपन आँखिमे मैथिली भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रभावशाली केन्द्रक उत्कर्ष आ त्रासदीक चित्रके ँ आँखिमे जीवन भरि (देहावसान 2009 ई.) जोगौने रहलीह। एहि संग राजा साहेबक परिवारक भावात्मक सूत्रा रामगञ्जसँ भङ्ग भए गेलैक। जेना रुद्रनाथ चौधरी लिखल अछि जे राजा साहबक देहावसानक बाद कतेको मैथिल परिवार आश्रय विहीन भए गाम वा अन्यत्र चल गेलाह, ओहिमे काशीनाथ झा वा कांचीनाथ झा ‘किरणे’ टा नहि छलाह, कोइलख ग्रामवासी पण्डित गोवर्द्धन झा, प्रसिद्ध गोनू बाबू सेहो छलाह। गोनू बाबू पुत्र श्री सुधीर कुमार झा, आइ.पी.एस. (सेवानिवृत्त) जखन 2006 ई. मे अपन पिताक आश्रय स्थलक अन्वेषणमे रामगञ्ज बंग्लादेश अपन पुत्रक संग पहुँचलाह तँ ओतय मन्दिर देखल। हुनक कलमबाग देखल। खेत-पथार देखल, जाहि पर हुनक मैनेजरक सन्तानक गौर-कानूनी अधिकार छैक। आ बिना केबार-खिड़कीक ठाढ़ लूटाएल एवं खण्डहर बनल राजा साहबक महल देखल। राजा साहबक लुटाएल एवं खण्डहर भेल महल प्रत्येक अनुरागीके ँ मैथिली भाषा साहित्यक विकास-गाथा ठोहि पारि कहैत रहैत अछि। राजा साहबक देहवसान पर शोक व्यक्त करैत मिथिला मिहिर लिखैत अछि - ‘आँखें भर आती है, कलेजा फटा जाता है, लेखनी थर्रा रही है। न रोये बिना कलेजा हल्का नहीं होता, इसलिये मेरा लिखना रोना समझिये। काल! तूँ सचमुच काल ही नहीं, क्रूर और निष्ठुर भी हो। अभी पण्डित राधाकृष्ण झा की मृत्यु शोक जरा भी मलिन होने नहीं पाया था कि हमारे समाज गगन के ज्वलन्त नक्षत्रा राजा टंकनाथ चौधरी बी.ए. को उठा ले गया।’ किन्तु जाधरि मैथिली भाषा साहित्य रहत एवं विश्वविद्यालयमे मैथिलीक प्रवेशक सन्दर्भ जखन-जखन आओत, राजा टंकनाथ चौधरीक नाम पहिल श्रेणीक मातृभाषा अनुरागीक रूपमे आदरक संग स्मरण कएल जाइत रहत।
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नवेंदु कुमार झा