जगदीश प्रसाद मण्डल: एकटा बायोग्राफी (आगाँ)
1978 ई.मे पंचायत चुनाव भेल। सीधा मुकाबला (दुइये उम्मीदवारक) भेल। बहुमत-अल्पमतक परिचय गामक सभ बुझैत छल। एकटा कनीटा उदाहरण- जखन विरोधी नीक जकाँ ओझरा गेला, तइ बीच भोगेन्द्र जीक मध्यस्थतामे पनचैतियो मानि लेल गेल। मुदा पंचेक बीच विवाद फँसि जाए। अंतमे ई भेल जे ने कम्युनिस्ट पार्टीक बहरबैया पंच औता आ ने प्रमुखजी (विन्ध्यनाथ ठाकुर) क बहरबैया पंच अबैले तैयार रहलखिन। मुदा पनचैती तँ पछुआएले अछि। जखन सभ छोड़ि देलनि तखन गामेक पंच बनथि। जइमे एकटा शर्त्त लागल जे दुनू पक्षक बीच जे नै सम्बन्धित होथि ओ पंच हेता। तकतियान भेल तँ एको गोटे शेष नै बँचलाह। ओहने शेष बँचला जे भीम जकाँ अभिमन्युक संग रहथिन।
पंचायत चुनावसँ पूर्व 1977 ई.मे दिल्लीयो सरकार आ पटनो सरकार बदलि गेल। एक नव परिस्थिति पैदा लेलक। गामोक पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) अनेको लड़ाइ लड़ि चुकल छल। जइसँ गुण-अवगुण बूझि चुकल छल। तँए चौगुणा उत्साह रहबे करै। टुटैत सामंती बेवस्थाक एकोटा घृणित काज पंचायत चुनावमे शेष नै रहल। एकटा उदाहरण- बहुमत अल्पमतमे नामो बदलि देल जाइत छल। जहिना कतौ राक्षसक अर्थ रक्षा केनिहार छल, सुरक अर्थ सुरापान करैबला। काज करैमे फल्लाँ राक्षसे छी। असगरे लहासकेँ पीठपर लादि असमसान लऽ गेल।
चुनाव घोषणाक विरोधमे मुखियो आ सरपंचोक मामला कोर्ट पहुँचल। सरपंचक मामला निचले कोर्टसँ फड़िया गेल। मुखिया चुनावक मामला हाइ-कोर्ट पहुँचल। चुनाव अवैध भेल। जहिना ठाकुरक बरिआती ठाकुरे-ठाकुर तहिना बिनु पंचायतीक मुखिया बिना सभ मुखिये मुखिया। मुखिया-सरपंचक काजो तहिना। मात्र गामक पनचैती। सरपंच भेने सेहो बदलि गेल। ओना पार्टीक भीतर किछु दरारि बनि गेल। दरारि ई जे जिनका सरपंचक उम्मीदवार बनौल गेलनि ओकरे खिलाफ दोसर नोमीनेशन कऽ देलनि। पार्टी अपन िनर्णए आपस करैत चुनाव लड़ल।
गामक वातावरणमे गुमराहट रहए। नीक-नीक अपराधीक गाओं बेरमा। एक ग्रुप छह-छह बर्ख जेल काटि चुकल छलाह। ओहो सभ जीविते। जे चुनाव (पंचायत चुनाव) मे बूथपर लाठी हाथे किछु गोटे बैसलो आ किछु गामोमे घुमैत। कसमकस रहने चुनाव शान्तिसँ भेल। मुदा गिनती काल एक गोटे (प्रमुखक गिनती एजेंट) दस-बारहटा मोहर देल बाइलेट हाँइ-हाँइ कऽ खा गेल। तही बीच पार्टीक एजेंट देखलक कि हाँइ-हाँइ कऽ पान-सात थापर मुँहमे लगा देलकनि। थापर लगिते मुँहसँ उगललक।
छह बर्ख जहल कटलाहा एक गोटे एकटा खस्सीक चोरिमे पकड़ा गेल। खस्सी शिवलाल महतोक। चोर-मोट पकड़ाएल। मारि-पीट शुरू भऽ गेल। आदति छोड़बै जोकर मारि लगलनि। संग-संग ईहो भेल जे पकड़ि कऽ थाना पहुँचा देल गेल। तहिना दोसराक संग (दोसर अपराधीक) सेहो भेल। ओना खुदरा-खुदरी झंझट होइते रहैत छल, मुदा से सभ कमल।
पंचायतक विधि-विधानक जे किताब छल सेहो तेहने छल। लोक-सभामे भोगेन्द्र जीक प्रस्तावकेँ स्वीकृति भेटल। गाँधी जीक कल्पना आ मगध जनतंत्र वैचारिके दुनियाँमे छल बेवहारिक जमीनपर नै छल।
अही बीच (1977 ई.मे) एकटा मित्र जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ भेटलन्हि। ओ रहथि स्व. काली कान्त झा, आइ.पी.एस।
बेरमाक बगले पूब कछुबी गाम छै। काली बाबू कछुबीयेक। 1969 ई.क बैचक आइ.पी.एस। ओ गाम आएल रहथि। झंझारपुर बजारक कोनो काज रहनि। बेरमा कछुबीक बीच बाधक अड़िपेरियासँ लऽ कऽ पक्की सड़क धरि कतेको रास्ता अछि। अपना घरसँ सीधा पूब हुनकर घर छन्हि। असकरे पएरे झंझारपुर जाइत रहथि तँए सोझ-साझ रस्ता हिया-हिया बढ़ैत रहथि। जखन बेरमा मुसहरी लग एला तँ रस्ता दू दिशिया बूझि पड़लनि। दुनू घूमि कऽ आगू मिलैत अछि जइठाम सँ झंझारपुरक रास्ता सोझ भऽ जाइ छै। मुसहरी बगले गामक डिहवारक स्थान। स्थान रहने चारू दिससँ लोकक आवाजाही तँए चारू कात रास्ता अछि। ओइठाम आबि जखन आगू हियौलनि तँ सोझका पछिम मुँहेँ बूझि पड़लनि। डिहवार स्थान घरक बगलेमे पूबारि भाग अछि। ओही रस्तासँ आगू बढ़लाह। तँ दरबज्जेपर चलि एला। ओना चेहरासँ जगदीश प्रसाद मण्डल िचन्हैत रहथिन। मुदा एक स्कूलमे पढ़ैक कहियो अवसर नै भेटलनि। तेकर कारण छल, शुरूमे ओ गाममे किछु दिन पढ़ि नवानी विद्यालयमे नाओं लिखाैलनि आ जगदीश प्रसाद मण्डल गामक स्कूलसँ टपि कछुविये अपन प्राइमरीमे नाओं लिखेलनि। अखन तँ मिड्ल स्कूल धरि मिलि गेल अछि मुदा ओइ समए मिड्ल स्कूल अलग छल। सभ बेवस्था अलग छलै।
मध्यमा पास कऽ जखन धुड़झाड़ संस्कृत पढ़ए-लिखए आबि गेलनि, पिताकेँ संतोष भऽ गेलनि। तखन ओ (काली बाबू) तमुरिया हाइ स्कूलमे दसमामे नाओं लिखौलनि। ओइ समए बिनु सर्टियो फिकेटक दसमा धरि एडमीशन होइ छल। दसमा-एगरहमाक मिश्रित सिलेवस छल। साल भरिक पछाति दसमाक परीक्षा होइत छल जे स्कूलेमे होइत छल। नहिये जकाँ विद्यार्थी फेल करैत छलाह। जेना आन-आन बहुत देशमे अखनो अछि। दसमा-एगरहमाक बीच एसेसमेंट प्रथा सेहो छल। दू सए नम्बरक होइत छल। जइसँ मैट्रिकक बोर्ड परीक्षामे अस्सिये-अस्सिये नम्बरक विषय होइत छल। असिसमेंटक नम्बर विद्यालये (स्कूले) सँ पठाओल जाइ छलै जे बोर्डक (मैट्रिकक) रिजल्टमे जोड़ि होइ छल। मुदा एकटा बात बीचमे जरूर छलै जे बाइस-बाइस नम्बर एलापर पास होइत छल। मुदा तहू भीतर एकटा आरो छलै जे समाज अध्ययन दसे नम्बरमे पास होइत छल। एकर माने ई नै जे दस नम्बर असान भेल। अधिकांश विद्यार्थी बीस नम्बरक भीतरे रहैत छलाह, गोटि-पङरा आगू बढ़ैत छलाह। आर्ट विषय (फैक्लटी) लऽ कऽ नाओं लिखौलनि। मुदा साले भरिक पछाति (दसमाक परीक्षा) स्कूले नै आनो-आन स्कूलमे चर्चाक पात्र कालीबाबू बनि गेला। कारण भेल जे अखन धरि हाइ स्कूलमे अठमासँ लऽ कऽ बोर्ड धरिक परीक्षामे साइंसक विद्याथीक रिजल्ट अगुआएल रहैत छल। दसमामे फस्ट (पहिल स्थान) भेलनि। आर्ट विषयमे एकटा धक्का लागल। धक्का ई लागल जे अखन धरि परीक्षाक नम्बर दइक बेवहार छल ओ दोसर रंगक छल। घुसुकुनियाँ कटैत आर्टक नम्बर घुसुकैत छल, जखन कि साइंसक विषयमे सए-मे-सए छल। कनीटा उदारहण- जखन हाइ स्कूलक सम्बन्धमे चर्च भेल तखन ओ कहलनि- “खा कऽ स्कूल विदा होइ काल हाथक तरहत्थीपर पाँचटा अंग्रेजी शब्द वा एकटा प्रश्नक उत्तर लिखि लइ छलौं आ स्कूल पहुँचैत-पहुँचैत रटि लइ छलौं। जाइयो काल आ अबैयो काल करै छलौं। स्कूल पहुँचते पहिने कलपर जा बढ़िया जकाँ हाथ धोइ लइ छलौं, तखन बैसै छलौं। ओना शिक्षा पद्धतिमे सेहो किछु अन्तर अछि। रटैक चलनि सभ रंग अछि।” प्रथम श्रेणीसँ मैट्रीक पास केलनि। मुदा घरक स्थिति ओते नीक नै तँ खराबो नै। कारण जे ओ महापात्र परिवारक छलाह। से जमीनदारिये जकाँ पसरल अछि। तहूमे महापात्रक कम जन-संख्या रहने अखनो धरि अबादे छन्हि। ओइ समए सी.एम कओलेज बहुत नीक कओलेज बूझल जाइत छल। नीक विद्यानीक एडमिशनो होइत छल। 1959 ई.मे चारिटा कओलेज खुजल जइमे जनता कओलेज झंझारपुरो आ सरिसो कओलेज सेहो खुजल। मैट्रीक केला पछाति सी.एम. कओलेज नै जा, ओना आर.के. कओलेज सेहो नीक छल, मुदा दुनूक बेवहारिक पद्धतिमे किछु अन्तर छल। जइठाम आर. के. कओलेजमे सबहक गुनजाइश छल तइठाम सी.एम. कओलेजमे नै छल। दोसरो कारण छल सी.एम. कओलेज सरकारी बनि चुकल छल। छात्र प्रवेशक सीमा िनर्धारित छल। सी.एम. कओलेजक इच्छा रहितो काली बाबू सरिसो कओलेजमे नाओं लिखौलनि। कारण भेलनि जे एकठाम दूटा विद्यार्थी पढ़बैक बदलामे रहै-खाइक जोगार लगि गेलनि। परिवारक आमदनी ओते खराब नै जइसँ सी.एम.कओलेज नै जा सकै छलाह मुदा सहयोगक अभाव रहलनि। लिटरेचर इंग्लीशक संग प्रथम श्रेणीमे आइ.ए. पास केलनि। दरभंगामे रहैक गर लागि गेलनि। अंग्रेजी आनर्सक संग सी.एम. कओलेजमे नाओं लिखौलनि। आनर्स ग्रेजुएट भऽ निकललाह। एकटा कनीटा बात- जगदीश प्रसाद मण्डल जइ समएमे जनता कओलेजमे पढ़ैत रहथि तइ समए आनर्सक पढ़ाइ नै होइत रहै। खाली मैथिलीमे तीन शिक्षक रहथि, जइसँ मैथिलीमे होइत रहै। जगदीश प्रसाद मण्डल हिन्दी, राजनीति शास्त्रक विद्यार्थी रहथि। प्राइवेटे सँ हिन्दी आनर्सक तैयारी केलनि। ओना दू गोटे (दूटा शिक्षक) कओलेजमे रहथि मुदा पढ़ाइ नै होइत रहै। बी.ए.क फार्म धरि जनते कओलेजसँ भरलनि, परीक्षा सी.एम. कओलेजमे भेल।
जगदीश प्रसाद मण्डल डिहवार स्थानक पछवरिया रस्ता पकड़ने दरवज्जापर आबि गेला। आइ.पी.एस. अफसरक आएब अपनाकेँ सौभाग्यशाली बुझलनि। पकड़ि कऽ दरवज्जापर बैसौलनि। पुछलनि तँ कहलनि जे झंझारपुर जाइ छी, काज अछि। कहलखिन जे अहाँ असकरे छी, तहूमे पाएरे छी दिक्कत हएत। कहलनि जे कोनो दिक्कत नै हएत। फेर कहलनि जे हमहूँ संग भऽ जाइ छी। किछु गप-सप करैक मौका सेहो भेटत। मुदा ओ पुलिस नजरिबला। कहलनि जे साइकिल दिअ घुमैकालमे दऽ देब।
साइकिलसँ झंझारपुर गेला। जिनगीक तेना कऽ पहिल भेँट दुनू गोटेक बीच भेल छल। ओइ दिन ई अंदाजमे नै आएल छलनि जे सम्बन्ध एते गाढ़ आ जिनगी भरि निमहतनि। अंदाजमे नै अबैक कारण छलनि जे कतेको पुरान हित-अपेछित टूटि गेल छलनि। ओना नवको बढ़बो कएलनि। एकटा उदाहरण- एकटा गामेक संगी छलखिन, कओलेजमे संगे पढ़ने रहथि। मुदा जाइतक सीमा घेरने छलनि। स्टेट बैंकमे हुनका नोकरी भेलनि। नीक दरमाहा। अनधुन आमदनी। विचार एते बदलि गेलनि जे गाम एलापर भेँट-घाँट नै होइ छलनि। कुसंयोग एहेन भेलनि जे दसे-बारह बर्ख पछाति स्कूटर एक्सीडेंटमे जखमी भेला आ गाम आबि किछु दिनक पछाति मरि गेला। अखनो दुख होइ छनि जे मुइला पछाति देखए (जिज्ञासा) नै गेलखिन। मुदा विचार एहेन बनि गेल छलनि, जिनगीक अनुभवसँ, जे दोस्त-दुश्मनक बीचक दूरीक फलाफल कि होइ छै से बूझि गेल छला। कनीटा उदाहरण- एक गोटे नजदीकी रहथिन। हुनका ऐठाम बिआह रहनि। दिन-राति रहला। मुदा हुनका (जिनकर काज रहनि) दोस्त-दुश्मनक बुझैक नै रहनि। सभ रंगक लोक काजमे लागल छल। एक गोटे जिनका बदनाम करैक विचार मनमे रहनि, चाहे जे पछिला कोनो कारण होउ, दालिमे दोहरा कऽ नून दऽ देलखिन। पछाति जखन दालि नुनगर भऽ गेलै तखन जगदीश प्रसाद मण्डलक नाओं लगा देलखिन। एहिना दोसरठाम भेल। बिनु अदहन देने बरतनमे सुखले दािल दऽ नाओं लगा देलकनि। तहूसँ एकबेर भेल जे गामक दुर्गापूजामे कार्यकर्ता छला, नाचक भार भेटलनि जे नीक नाच हुअए। तइ समए गाम-घरमे नाटक-नौटंकी कम छल आ नाच बेसी अनेको तरहक छल। एक गोटे नाच अनैक भार लऽ लेलनि। बढ़ियाँ नाचक खूब प्रचार भेल। जखन नाच आएल तँ जेहने नीकक प्रचार भेल रहए तेहने हहासो भेल। मुदा जखने कियो परिवारसँ निकलि समाजमे डेग उठबैए तँ ओ ई मानि चलैए जे नमहर काजमे बेशियो आ भारियो, दुनू काज होइ छै अपना भरि लोक परियासे करैए, मुदा किछु त्रुटि रहि जाइ छै, तखन कि कएल जाएत। हँ एते जरूर जे अधिक-सँ-अधिक काजक सभ पहलूपर नजरि राखक चाही। एहिना कोनो घटनोक होइ छै। कियो बेमार छथि वा कोनो दोसरे कारण छन्हि, रंग-बिरंगक सुझाव लोक दैत अछि। नीको रहै छै अधलो रहै छै, तइठाम एहने समस्या उठबाक संभावना रहै छै।
स्वर्गीय काली बाबूक पहिल बहाली डी.एस.पी.क रूपमे अगरतला (त्रिपुरा)मे भेल रहनि। चारि सए रूपैया महीना दरमाहा। समैयो सस्त रहए। अन्त तक ई बात बजैत रहलाह जे सिगरेट आ दारू पीबैत छलौं। करीब पाँच बर्ख पीलौं। परिवारमे मतभेदक उभरि गेल रहनि। उभरैक कारण स्पष्टे छल। एक साधारण थाना सिपाही दस बीघाक प्लॉट कीनि, तीनि मंजिला मकान बना, पाँच लाखक बेटियो बिआह कऽ लइए तइ संग समांगो सभकेँ नोकरी लगा लइए तइठाम ई (काली बाबू) छुच्छे हाकिम छथि। मुदा ओ परिवारकेँ बुनियादी ढंगसँ बदलए चाहै छला। अपन खनदानी वृत्तिकेँ अधला वृत्ति कहै छलाह। परिवार कर्जमे डुमल छल। दियादीक झगड़ा कोर्टमे चलैत छलनि। ओइ विवादकेँ जेना-तेना काली बाबू िनपटौलनि। कर्जसँ परिवारकेँ मुक्त केलनि। पछाति घर बनबैक विचार केलनि। भट्ठा लगा बनौलनि। अपनासँ छोट भाए माझिल भाएकेँ अगरतलेक हाइ-स्कूलमे काज धड़ौलनि।
सालमे एक बेर निश्चित रूपे अबिते छलाह। मास दिन गाममे रहैत छलाह। तइ-बीच तीन-चारि भेँट जगदीश प्रसाद मण्डलसँ भऽ जाइ छलनि। मुदा मात्र तीन-चारि भेँटमे साल भरिक किरिया-कलापक कि हएत। हुनक अपन रूटिंग छलनि। काजो-उदेम ठेकना कऽ अबैत छलाह। आठ दिन होइत-होइत काज निबटबै छलाह। पछाति कुटुमारे (सासुर-मात्रिक-बहिन इत्यादि) करै छलाह। मास दिन पुरैत-पुरैत काजो निबटि जाइ छलनि। आ छुट्टियो बीत जाइ छलनि। काजक दौड़मे काजे गप-सप करैक मौको दैत छै। एकटा काजक भार अपनो ऊपर रखै छलाह आ समांगो सभकेँ लगबैत छलाह। सम्बन्ध बढ़लनि। एनाइ-गेनाइक संग खेनाइ-पीनाइ सेहो बढ़ि गेलनि।
हाइ स्कूलमे फस्ट करैमे भूगोलक योगदान बेसी छलनि। एक दू नम्बर कम होइ छलनि। पूर्वाचलक ित्रपुरा, मणीपुर, मिजोरम, अरूणाचल, नागोलैंड इत्यादिक नीक अध्ययन छलनि। ओना धार्मिक प्रवृत्ति दिस बढ़लाह। पूजा-पाठ दिस बढ़ि गेला। डी.एस.पी. सँ एस.पी. भेला पछाति अपन बदली ट्रेंनिग कओजेलमे करा लेलनि। ता एस.पी. ओहीमे रहलाह। तीन-चारि साल पछाति (अपेछा भेलापर) जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ त्रिपुरा अबैले कहए लगलाह। मुदा जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ दोहरी ओझरी लागल रहनि। परिवारसँ लऽ कऽ मुकदमाक खर्च धरिक। ने कोट-कचहरी अबै-जाइसँ छुट्टी आ ने दोसर दिस जाइ-अबैक छुट्टी।
जगदीश प्रसाद मण्डलकेँ १९९८ ई. धरि अबैत-अबैत पूर्वांचल देखैक एते जिज्ञासा बढ़ि गेलन्हि जे अपनाकेँ ओ नै सम्हारि पेलन्हि। ओना समैक पलखति भेट गेलनि आ से भेटलनि दुर्गापूजाक जिम्मासँ अलग भेलापर। दोसर कारण ईहो भेलनि जे पचासो सँ ऊपर मुकदमा निवटि गेल छलनि जइसँ काेट-कचहरीक आवाजाही सेहो कमि गेलनि। दूटा सेशन केश (३०७ आ ४३६ अर्थात् मृत्युक प्रयास आ अगिलग्गी।) मात्र बचि गेल छलनि। तहूमे ४३६ (अगिलग्गी) केश हराइये गेलै। हरा ई गेलै जे झंझारपुर-मधुबनीक बीच जे कोर्टक बदला-बदली भेलै ओइमे ई केस हरा गेलै। ओना कते गोटे मुँहेँ सुनने रहथि जे कोटसँ केशक फाइलो गाइब होइ छै। आ ईहो सुनने रहथि जे केशो हरा जाइ छै। ओना दुविधा रहबे करन्हि। जइसँ खुशियो होइन्हि आ चिन्तो। दोसर ३०७ (एटेम्प टू मर्डर) रहन्हि ओइमे तँ सजा भऽ गेल रहनि मुदा खुशी ई रहन्हि जे जते सजाए कानूनी दौड़मे हेबाक चाही रहै से नै भेल रहै, तँए मजगूतो डोरी भत्ता तोड़ि-तोड़ि टूटि जाइ छै, लाभ-हानि मुकदमासँ (३०७सँ) जे भेल होइन्हि मुदा एकटा अनुभव जरूर भेलन्हि जे भ्रष्ट न्यायालयक कुरसी केना डोलैत रहै छै। ओना कोट-कचहरीसँ निसचिनती जकाँ जरूर भेला। मुदा चिन्ता तँ रहबे करन्हि। हजार देवी-देवतासँ जहिना एक जगदम्बा तगतगर, तहिना दुनू केश रहन्हि। एक दिन जखन सभ केशकेँ मन पाड़ि आइ.पी.सी.सँ मिलेलन्हि तँ बूझि पड़लन्हि जे जँ शुरूहे सँ सजाए होइत अबैत रहितन्हि तँ भरिसक सभ दिन जहलेमे अगिला केशक फैसला सुनितथि। मुदा केहेनो फड़ल आमक गाछ किअए ने हुअए मुदा पकलापर बा बिहाड़िमे हहरि एक्की-दुक्की गिनतीमे चलि अबैए तहिना भेल रहन्हि। भीम जखन अभिमन्युकेँ सातक फाटक तोड़ैक भार लऽ लेलनि तेहने मनमे उठलनि। फेर ठमकल सभ केशक सजाए जोड़लन्हि तँ १०७ बर्ख पुरैत रहन्हि। जिनगी दिस तकलनि तँ बूझि पड़लन्हि जे सए बर्खक काज तँ पुरिये गेलन्हि। जँ नै केने रहितथि तँ दोखी केना भेला? साउनक साँप जकाँ केचुआ छोड़ैक मौसम देखि जिनगी बदलैक विचार केलनि। पैछला जिनगी तँ अगिला जिनगीक सोंगर बनि गेल छलनि। साहित्य-दिशामे बढ़ैक विचार उठलनि। मुदा साहित्यक विद्यार्थी तँ रहि चुकल छला, सूर-पता तँ बूिझ चुकल छला। टेबिया-टेबिया किछु साहित्यकारक साहित्य पढ़ए लगला, मुदा मन फेर ठमकि गेलनि। मन ठमकि गेलनि ई जे किताब बात जँ आँखिक देखल हुअए ओ बेसी नीक होइए। किताब किनैक खर्चक कटौती कऽ घूमैक विचार केलनि। देशक केरल, कर्नाटक, कश्मीर छोड़ि सभ राज्य देखलनि। मुदा जून २०१२ ई.मे केरलक धरतीपर कोच्चिमे जखन “गामक जिनकी” लघुकथा संग्रह लेल टैगोर साहित्य पुरस्कार प्राप्त भेलनि तँ केरल सेहो घुमि लेलनि। १९५७ ई.मे केरलमे वामपंथी सरकार बनल छल। देशक ओ राज्य जइठाम शत-प्रतिशत पढ़ल-लिखल छथि। खुशी भेलनि।
अखन धरि भूगोल एतबे बुझै छला जे देशक पूर्वी भाग असाम छी। आन-आन राज्य जे बनल ओ पछातियो बनल आ चर्चो संक्षेपे छल। हायर सेकेण्ड्री धरि भूगोल पढ़ने छला। पछाति नहिये पढ़लनि। तहूमे किछु घटबिये भऽ गेलनि, घटवियो स्वाभाविके भेलनि। स्वाभाविक ई जे जहिना एम.ए. पास, हाइ स्कूलक शिक्षक बनि, हाइ स्कूल पास मिड्ल स्कूल भेलोपर बरदास कइये लइ छथि तहिना ईहो केलनि।
आसीन मास, दुर्गापूजाक समए। जगदीश प्रसाद मण्डल एटलस निकालि अजमबए लगला। घरसँ बिराटनगर पहुँचि जेता, बिराट नगरसँ सिलीगुड़ी। ओतौ रहैक ठौर छन्हि, ओतए सँ असाम आ गौहाटीसँ त्रिपुरा। मुदा दुनूमे बहुत अंतर भेल। गौहाटीसँ अगरतलाक बस चारि बजे अपराहनमे जे खुजलनि ओ दोसर दिन डेढ़ बजे अगरतला पहुँचल। जहिना भेड़ी जेरमे हूड़ार चलि अबैए तहिना बससँ उतरलापर बूझि पड़लनि। भाषाक दूरी, जहिना हिन्दी जननिहार तहिना अंग्रेजी। बस धरि तँ हिन्दीसँ काज चलि चुकल छलनि, बससँ उतरिते, भुखाएल रहबे करथि, पहिने हाेटलमे जा खेलनि। मुदा एकटा स्पष्ट अंतर ई बूझि पड़लनि जे जे सस्त खेनाइ सिलीगुड़ीमे भेटलनि ओ आगू कतौ ने भेटलनि। कनीटा उदाहरण- बरपेटा असाम रातिक एक बजे बस एकटा होटलक आगूमे लागि गेल, अकड़ल यात्री सभ उतरि होटल पहुँचल। हॉल जकाँ होटल जइमे तीन बसक यात्रीक बेवस्था। चारि रोटी-तरकारीक दाम बीस रूपैया लेलकनि। मुदा देखलनि जे एक प्लेट माछ वा मांसबला रहै तँ ओकरा सभसँ एक-एक सए रूपैया लेलकै जे सिलीगुड़ीमे दू रूपैया पचास पाइमे खुअबैत रहै। होटलसँ निकलि थानापर गेला। कियो हिन्दी बुझनिहार नै। काली बाबूक नाआें कहिते एकटा सिपाही डेरापर पहुँचा देलकनि।
जारी...
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्डल
विहनि कथा-
१
छूटि गेल
तृतीयाक साँझ भगवती स्थान दऽ सावित्री बाबा लग आबि फुदकैत बाजल-
“बाबा, एकटा बात बुझलौं हेँ?”
मद भरल पोतीक बात सुनि आगू सुनैक आशामे आस काशीनाथ ओइ संगीत प्रेमी जकाँ जे एकक पछाति दोसरो सुनए चाहैत, मुँह बाबि पोती दिस देखए लगलाह। मुँह रोकि सावित्री महराइक ओइ पलगाँ जकाँ प्रतिक्षा करए लगली। काशीनाथक मन फड़फड़ेलनि जे भरिसक चुप्पा-चुप, धुप्पा-धुप खेल ने भऽ गेल। हमरा उठलेसँ काज तँ हमरा बैसलेसँ काज।
सावित्रीकेँ काशीनाथ पुछलखिन-
“की सुनलौं?”
“अबै छलौं ते अहाँ दे लोक सभ बजै छलाह जे ओ आब ककरो नै गरिअबै छथिन!”
गाइरिक नाओं सुनि सावित्रीकेँ अनुकूल बनबैत काशीनाथ बजलाह-
“बुच्ची, कते के गरिआएब। अपने मुँह दुखा जाइए। छोड़ि देलिऐ तँए छूटि गेल।”
२
अकास दीप
दिवालीक एक दिन पहिने गाममे रंग-बिरंगक अकासदीपक खूँटा गड़ल देखि मनोहरोक मनमे उठल जे अपनो ऐठाम जराबी मुदा लगले मन घेड़ा गेलै जे पावनि-तिहार तँ परम्पराक हिसाबे चलैत अछि, जँ से नै तँ एके समाज माने (एक जातिक) एकेटा पावनि किछु गोटेकेँ होइत छन्हि, किछु गोटेकेँ नहियो होइत छन्हि। कारणो स्पष्ट अछि जे जाति दियादमे बँटल अछि। जँ िदयादीक भीतर पावनिक दिन अशौच भऽ जाइत तखन टूटि जाइत। किछु गोटे खंडित बूझि जोड़ि लैत छथि, किछु गोटे छोड़ि दैत छथि। तइ संग ईहो होइत रहै छै जे बहरवैया आमदनीपर जिनका नहियो होइत छलनि ओहो नव शिरासँ शुरूहो करैत छथि। ओझराइत मनोहर बाबासँ पुछैक विचार केलक।
मनोहर हाइ स्कूलमे पढ़ैत अछि। घरक कोनो काज करैसँ पहिने बाबासँ पूछब जरूरी बुझलक।
सात बजे साँझ। चाह पीब पान खाइते श्यामलाल गप करैक मूडमे एला। केकरो नै देखि चौक दिस जाइक विचार करिते रहथि आकि मनोहर आबि बाजल-
“बाबा, एकटा विचार मनमे भेल?”
श्यामलाल- “की?”
“ऐबेर अपना गाममे सइयोसँ बेशी अकास दीप दिवाली दिन बड़त!”
“ई तँ नीक बात भेल।”
श्यामलालकेँ अनुकूल होइत देखि मनोहर बाजल-
“बाबा, अपनो दरबज्जापर...?”
काँच कड़ची वा पघिलल काचकेँ जेहेन साँचामे देल जाइत तेहने ने वस्तुओ बनैत अछि। मनोहर बच्चा अछि हलहोड़िमे मन उड़ि गेलै। श्यामलाल कहलखिन-
“बौआ, जइ गाममे मटिया तेल, जेकर उपयोग गाममे खाली डिबिये टामे होइ छै, तहूक हाहाकार मचल रहै छै। तइठाम तू भरि राति मासो दिन डिबिया बाड़वह से केहेन हएत?”
३
कनमन
साढ़े चारि बजैत। हाइ स्कूलसँ अबिते सुधीरक नजरि दरबज्जापर बैसल बाबा श्याम सुन्दरपर पड़लनि। दरबज्जा-अंगनाक बीच मोड़पर सुधीर तेकठी जकाँ ठाढ़ भेल। केम्हर डेग बढ़ौत से फड़िछेबे ने करैत। बाबाकेँ पुछियनि जे किअए मन खसल अछि, आकि किताब रखि कपड़ा बदलि आबी। रस्तेसँ भूखो-पियास लगले अछि। नबे बजेक खेलहा छी।
तेकठीक तीनू खूँटाक बीच अपनाकेँ सुधीर पौलक जे दूटाक कनोत तेकठी नाओं धड़बैत अछि जखन कि तेसरक नाआें गोरी भऽ जाइ छै, जेकरा ऊपर लाद लादि लदाना दइ दइ छै। बाबाक बात बूझब सभसँ जरूरी अछि, मुदा बरदाएल हाथे कइये कि सकबनि। कपड़ा बदलब ओते महत नै रखैत अछि तँए एना करी जे बाबाकेँ कहियनि जे हमहूँ आबि गेलौं जइसँ जाबे ओ अपन बात बजता ताबे किताव राखि आएब। कनी डेगमे झाड़ अानए पड़त। सहए केलक। बाजल-
“बाबा, किअए मन खसल अछि?”
कहि किताव राखए आंगन गेल। किताव राखि श्याम सुन्दर लग आबि सुधीर बाजल-
“बाबा, मन खसैत कारण कि अछि?”
आस-निआसक बीच श्याम सुन्दर ओझड़ाएल रहथि, तँए नजरि खसल छलनि। पोताक जबाव भारी पबैत छलाह। चालीस बर्खक संगी हेरा-फेरीमे जहल चलि गेल छलनि, तेकरे सोग। मुदा बाल-बोध लग बाजी वा नै बाजी। छिपाएब झूठ हएत नै छिपाएब सेाहे तँ नीक नहिये हएत। नीकक चर्च हेबाक चाही, अधलाक तँ फलो अधले हएत। एहनो तँ भऽ सकैए जे छिपबैत-छिपबैत छिनारक छिनरपनिये छीप जाए। मुदा एहनो तँ भऽ सकैए जे एक-दोसराक अधला छिपबैत-छिपबैत छिपारकेक समाज बनि जाए। तत्-मत् करैत श्याम सुन्दर बाजल-
“बौआ, अखने सुनलौं जे रूपलाल जहल चलि गेल। मिरचाइक झाँझ जकाँ ओहए मनकेँ मलीन केने अछि।”
श्याम सुन्दर जे कहि अपनाकेँ हटबए चाहै से लगले नै हटलनि। कारण भेलनि जे जहलक नाओं सुनि सुधीर दोहरा देलकनि-
“किअए रूपलाल बाबा जहल गेला?”
सुधीरक प्रश्न श्याम सुन्दरकेँ ज्वर आनि देलकनि मुदा ज्वार नै बनि तुड़छैत ज्वारि तँ आबिये गेल रहनि। बुझबैत बजलाह-
“एते पुरान रहितो रूपाला समैकेँ ठेकानबे ने केलक। पुरना चालिसँ आब काज चलैबला छै! बुझथुन जे केहेन दादासँ पल्ला पड़ल।”
४
खिलतोड़
आकाशवाणी केन्द्रक कार्यक्रमक कृषि विभागसँ दयाकान्त तीस बर्ख पछाति सेवा-निवृति भेला। खेली-पथारीक कार्यक्रमक चिन्हार चेहरा बनौने रहला। नोकरी पाबि जिनगीमे बहुत किछु केलनि। तीनू बेटो आ दुनू बेटियोकेँ पढ़ा-िलखा, नोकरी धड़ा नेने छथि। अपनो रहैक बेवस्था शहरेमे कऽ लेलनि। सेवा-निवृत्तिक चारि बर्ख पछाति मन उविएलनि जे शहरमे नै रहब, बाप-दादाक बनाओल बामेमे रहब। मन उविआइक कारण भेलनि जे पुरना संगी सभमे किछु गोटे आन शहर, तँ किछु गोटे गाम आ किछु गोटे मरियो गेलाह। पछाति जे संगी भेटलनि, हुनका सभसँ तेहेन सम्बन्ध नै बनि सकलनि जेहेन पहिलुका सबहक संग छलनि। दूर रहने परिवारोक (बेटा-बेटीक) सम्बन्ध पतराये गेल रहनि। पत्नियो संगी नै बनि सभ दिन भनसिये रहि गेलनि।
खंडहर जकाँ घर-घराड़ी। गाम अबिते पहिने घर-अंगना, बीस बर्खसँ परता पड़ल चापाकल उड़ाहलनि। दरबज्जापर अबैत-अबैत मास दिन लगि गेलनि। दरबज्जापर अबिते देखलनि जे अगिला बाड़ी परती पड़ल अछि। जँ एकरा चौमास बना लेब तँ सालो भरि परिवारक तीमन-तरकारी तँ चलबे करत जे किछु बाँटियो-खोंटि लेब।
सहए केलनि। कहिया कतए सँ परता पड़ल खेतकेँ गहींरसँ ताम करबा दयाकान्त चौमास बनौलनि। अल्लूक खेतीक केलनि। अखन धरि जे अल्लूक खेतीक सम्बन्धमे बुझै छलाह तही हिसाबसँ तैयारो केलनि आ खाद-कीटनाशक दऽ रोपबो केलनि।
बीस दिन रोपला पछाति खेतमे चारि आना गाछ देखलनि। मुदा घबड़ला नै, सबूर केलनि जे अखन जनमइयोक समए छै। तीस दिन पछाति जखन ओहो चौअन्नी गाछमे सँ आधासँ बेसी जरिये गेलनि तखन माथ ठमकलनि। मुदा पुछबो किनकासँ कएल जाए। तहूमे जिनगी भरि अपने दोसरकेँ बुझेलौं। ओना ओझरी मनमे लगए लगलनि मुदा चेत गेलाह। जे खेतीक मर्म बुझैत होथि तिनकासँ बूझब नीके छी। बूझब, गहराइसँ बूझब आ मर्म बूझब भिन्न होइत अछि।
ठेहिआएल दयाकान्त दीनानाथ ओइठाम पहुँचलाह। दयाकान्तकेँ देखिते दीनानाथ बजला-
“आऊ-आऊ, लाल भाय।”
रेडियो स्टेशनमे लाल भाइक नाओंसँ दयाकान्त छला तँए लाले भाइक नाओंसँ जनैत छन्हि।
चाह पीब दयाकान्त बजला-
“दीना भाय, अल्लू रोपलौं से गाछे ने भेल?”
जहिना सौरखीक पात देखि डाँट पकड़ि सौरखी उखाड़ल जाइत तहिना दीनानाथ पकड़ि पुछलखिन-
“अल्लू खुनि कऽ देखलिऐ जे सड़ि गेल आकि जीविते अछि?”
“हँ, सभ सड़ि गेल।”
“खेतमे हाल केहेन अछि?”
“से तँ बढ़िया अछि। ओते नै अछि जे अल्लू सड़ि जाएत।”
“तखन?”
“सएह नै बुझै छी।”
“बीआ काटि कऽ रोपने छलौं कि सौंसे?”
“गोटगरहा सौंस रोपने छलौं। तइ संग खादो आ कीटनाशको भरपूर देने छलौं।”
खादक मात्रा सुनि दीनानाथ बजला-
“देखियौ कहिया कतए सँ जमीन पड़ता छल खिलतोड़ भेल। ओकरा अपनेमे ओते शक्ति छै जे सुभर उपजा दऽ सकैए। तइमे तते खाद दऽ देलिऐ जे बीये जरि गेल।”
५
मुँह-कान
काल्हिये बैंकक मैनेजर आबि सुनरलालक गाएकेँ सेहो देखि गेल छलाह। एक्कैस हजारक गाए। गामक किसानक बीच एकछाहा चर्च। कियो सिलेब रंगक चर्च करैत तँ कियो सिंह-सिंगहौटीक। कियो थुथुनक चर्च करैत तँ कियो गरदनिक अगिलाक।
जइठाम मनुष्योकेँ उचित अन्न नै भेट रहल अछि तइठाम मवेशी पालन धीया-पुताक खेल छिऐ। कते दूधक जरूरत अछि, तइले कते मवेशीक जरूरत पड़त मूल प्रश्न भेल।
एक तँ एक्कैसक हजारक गाममे आएल अछि। अखन धरि जे नै आएल छल। बैंकक लाभ जरूर भेल। मनधनो काका गाए देखए सुनरलालक ओइठाम एला।
गाइक रंग-रूप देखि मनधन काका चैन होइत तमाकू खाइले बैसलाह। खुशीसँ खुशिआएल भेल सुनरलाल बाजल-
“काका, बहूदिनसँ हीक गड़ल छल जे एकटा नीक गाए खुँटापर बान्हब, से भगवान पूर केलनि।”
भवधारमे बहैत सुनरलालकेँ देखि मनधन काका कहलखिन-
“बड़ सुनर गाय छह। मलकार की सभ कहलकह?”
काजक जड़ि दिस बढ़ैत सुनरलाल बाजल-
“चारि मास पछाति एक संझू भऽ जाएत आ छह मास लागत।”
“कते दूध होइ छह?”
“दू किलो भिनसर आ डेढ़ किलो साँझमे।”
दूधक नाओं सुनि मनधन काका चौंक गेला जे बाप रे कतए सँ बैंकक कर्ज चुकाओत, कतए सँ गाइक खर्च जुटाओत आ कतए सँ अपने गुजल करत। बात आगू नै बढ़ा मनधन काका सुनरलालकेँ चरिअबैत कहलखिन-
“छब दे तमाकुल खुआबह। एकटा काज मन पड़ि गेल।”
“एना अगुताइ किअए छह?”
मुदा मनधन काकाकेँ कोनो जबाब नै फुड़लनि। मनमे नचैत रहनि युग तँ आर्थिक मोड़ लऽ रहल अछि। मुदा घिड़नीक चालि किमहर छै वस्तुक गुण दिस आकि सुआद दिस?
६
बुधनी दादी
जहिना कुमहारकेँ भादवक रौद बादलमे झपा गेने दुर्दिन आगूमे नाचए लगैत तहिना बुधनी दादीकेँ साल भरिसँ भऽ रहल छन्हि। साल भरि पहिने तक, जाबे पति जीवैत छलनि ताबे दिल्लीक कमाइसँ जे सुख केलनि, रहितो आब नै भऽ पाबि रहल छन्हि। सोलह कोठरीक हथिसार जकाँ मकानमे असकरे रहैत डर होइ छन्हि जे कहीं सुतली रातिमे भूमकम भेल आ घर खसल तँ महीनो दिनमे ऊपर हएब िक नै। तरेमे सड़ि कऽ महकि जाएब।
जहियासँ बुधनी दादी नैहरसँ सासुर एली तहियेसँ कहू आकि नैहरोमे तइसँ पहिनेसँ कहू, नहेला पछाति हनुमान चलीसा पढ़िते छथि। किताब देखि कऽ नै मुँह जुआनिये। गामक तीन टोलक आबा-जाही बुधनी दादीक छन्हि। कोन-पावनि कहिया हएत आ कोन उपास कहिया पड़त से हिसाव जोड़ए अबै छन्हि। तइ संग ईहो छन्हि जे सामाक गीत टोलक कोन बात जे गामेमे सभसँ बेसी अबै छन्हि।
छठिक भिनसुरका अर्ध पड़ि गेल आइसँ सामाक गीत हएत। दसमी श्रेणीक राधा बुधनी दादी लग पहुँचल। पहुँचिते राधा बुधनी दादीकेँ गोड़ लागि बाजल-
“दादी, अपन मोबाइल नंबर दऽ दिअ। जखन अबैक छुट्टी हएत एबो करब नै तँ मोबाइलेपर लिखि देब।”
मोबाइलिक नाओं सुनिते बुधनी दादीक मन गाछसँ खसल कटहर जकाँ आँठी उड़ि कतौ, नेरहा उड़ि कतौ, छहोछित भऽ गेलनि। बजलीह-
“बुच्ची, आब तोरा सबहक जुग-जमाना एलह। बेटा मोबाइल पठा देलक जइसँ कहियो काल धीयो-पुतो आ बेटो-पुतेाहुसँ गप-सप होइ छलए। सेहो केदैन चोरा लेलक। मरि दिन अंगनेमे बैसल रहब से पार लागत। मूस तते भऽ गेल अछि जे ने नुआ-विस्तक सेखी रहए दइए आ ने खाइ-पीबैक।”
राधा- “दादी, एहिना जिनगी चलै छै।”
बुधनी दादी- “बुच्ची, जीवैक मन होइए मुदा तेहेन-तेहेन आपैत-विपैत सभ अछि जे हाेइए तइसँ नीक भरमे-सरमे मरि जाइ।”
७
अनदिना
शिक्षक अमरनाथकेँ देखिते रामकिसुन बाजल-
“मास्सैव, अनदिना गाममे देखै छी?”
रामकिसुनक प्रश्नसँ अमरनाथ अचंभित भऽ गेला जे एहेन बात किअए पुछलनि। मुदा बाजबो तँ उचित नहिये हएत। रंग-बिरंगक जहिना शिक्षक छथि तहिना विद्यार्थियो अछि। जेहने चलबैबला अछि तेहने चलौनिहारो अछि। कि हमरा कहने झूठ भऽ जेतै जे शिक्षक सभ दरमहे टा उठबए विद्यालय जाइ छथि, तँए कि ईहो झूठ भऽ जाएत जे सरकारी दहिन गबैया जकाँ महिने-महिने दरमाहा देब छोड़ि सालक-सालेक पाहि लगबै छै। अमरनाथक मन ठमकलनि। अनदिना गाममे देखै छी, अहाँ गामसँ हटि नोकरी करै छी, बिनु छुट्टीक दिन गाममे छी कि समाजक एतबे दायित्व बनै छै जे फल्लाँ भाइक सातो बेटा गुरुजी बनि गेलखिन। अधभर मुस्की दैत अमरनाथ कहलखिन-
“भाय, की कहै छी, जुगेमे भूर भऽ गेलै। अमैया छुट्टीमे गाम एलौं हेन आ ऐठाम देखै छी जे फैजली सभ कोशेबो ने कएल हेन।”
दिन ठेकनबैत रामकिसुन बाजल-
“कते दिनक छुट्टी अछि जे एना हदिया गेलौं।”
“आब कि ओ जुग-जमाना रहल जे रोहनियासँ फैजली तक खाइक छुट्टी होइ छै। आधासँ बेसी छुट्टी कटियो गेल अछि। जब हमर स्कूल खुजल तेकर पछाति आन-आन स्कूलमे छुट्टी हेतै।”
रामकिसुन- “ई तँ अजगुते भेल?”
दहिना हाथसँ चानि ठोकि अमरनाथ बाजल-
“अहाँ अजगुत कहै छिऐ। एतबे अछि। पहिने सरकारियो ऑफिसमे आ आनो-आनो ठाम किरानी होइ छलै अखनो अछि। तहिना स्कूलमे शिक्षक होइ छला अखनो छथि। मुदा आबक शिक्षक सालो भरिक नै छह मसिया बनि गेलाह। छह मास धिया-पुताकेँ पढ़ाउ आ छह मास ऑफिसक काज कररू। जहिना नाचमे लेबरा सभ नै लेबराइ करैए तहिना ने हमहूँ सभ कखनो माल्थस रॉविनसन करै छी तँ कखनो आबि घरे-घर बकरी-छागरक गिनती करै छी।”
अमरनाथक बात सुनि रामकिसुन ओल जकाँ कबकवेला नै, मुस्की दैत बजलाह- “होउ, अहीं सबहक जुग-जमाना छी, जे काटब से काटि लिअ।”
रामकिसुनक काटब सुनि अमरनाथ अह्लादित होइत बजलाह-
“ठीके ने अहाँ कहै छी। अपना सभकेँ जे सभसँ छोटका दिन होइए, ओइमे कथीक छुट्टी होइए से बूझल अछि?”
“नै।”
“बड़ा दिनक!”
८
अपन काज
तेजीसँ समए अगुएने, विकास भेन महगियोक वृद्धि धकधका गेल। तहूमे तीमन-तरकारीक तेजी भेने, बाड़ी-झाड़ीसँ टपि खेत-पथार दिस बढ़ल। जइ चौमासमे अंडी-बगहंडीसँ लऽ कऽ भाँग-धथुरक बिरदावन रहैत आएल छल ओ कटि-खोंटि चौमासो दिस घुसकुनियाँ कटलक।
अखन धरि कपलेसर परिवार धरिक तरकारी उपजबैत छल सेहो कोनचरमे सजमनिक गाछ, आ गौसारपर अल्लू-कोवी, मिरचाइ, भट्टा उपजबैत छल ओ चारि कट्ठा कोवी खेती करत। ओना पाँच बीघा जोतक किसान कपलेसर, मुदा खेतमे खादक हिसाब धाने-गहुमक बुझैत अछि।
मिरचाइ बाड़ीकेँ कड़चीसँ भोला बतिअबैत रहथि आकि कपलेसर अबिते पुछलकनि-
“भैया, चारि कट्ठा कोवी खेती करब, तइमे कते खाद लगतै?”
कपलेसरक प्रश्न सुनि भोला तारतममे पड़ि गेला। रंग-बिरंगक प्रश्न मनमे उठलनि। जइ खेतमे पहिल बेर खेती हएत आ जइ खेतमे साले-साल होइ दै, उपजैक दृष्टिसँ दुनू एक केना भेल। कोवीक पछिला फसिल कि छलै, सिरो तँ रंग-रंगक होइ छै। कोनो छह आंगुर ऊपरे धरिक तँ कोनो बीत भरिक, कोनो तोहूसँ गहींरक। जँ खेत खसले अछि तँ कते दिनसँ खसल अछि तही हिसाबसँ ने रसेबो करत। तहूमे पृथ्वीक रस तँ आरो एकभग्गु छै। भोलाक मनमे लगले उठलनि जे जखन बेचारा पूछए आएल सेहो ओहिना नै देखबो करैए। तखन किछु नै कहिऐ से केहेन हएत। किछु कहैले ठोर चटपटेलनि मुदा मनमे उठि गेलनि जे कोन खादक नाओं कहबै। ओहोमे तँ करामतिये अछि। एक्के खादमे कथूक मात्रा बेसी रहै छै तँ कथूक कम। मन अकछए लगलनि। जे अनेरे अपनो काज बरदा मगजमारी कऽ रहल छी। मुदा धाँइ दऽ किछु कहियो देब केहेन हएत। मन घुमलनि अपन जबाब अपने उठलनि जे काज बरदाइए आ कि दोसर काज ठाढ़ करैए। असथिर मन होइते पोखरिक पानिमे जहिना हवा पाबि हिलकोर लगैए तहिना हिलकोर उठलनि। प्रकृतिक हिसावसँ मौसम बनै-बदलैत अछि। फसिलक अपन गति छै। तइठाम क्षेत्र-क्षेत्रक मिलान नै हएत तँ उपजाक कते भरोस कएल जाएत। दुनियाँ घर अंगना बनि गेल अछि दुरसक बात बेसी बूझै छी आ घरक बात बुझिते ने छी। गहुमेक बाउगक समए इलाका-इलाकामे अलग-अलग तिथिसँ होइत अछि, तेकरा केना बूझब। अपन बात सहजे शीतगृहमे रखि देने छी नइ तँ जयंती बाबड़ीमे थोड़े वनहाएत। मन थीर होइते भोला बाजल-
“कपले, पढ़ल-लिखल जेहेन छी से तहूँ जनिते छह, आब तोरो उमेर कम नहिये भेलह। खेती करै छी पुछलह तँ कहै छिअह। चारि किलो डी.ए.पी. तीन किलो पोटाश, कीटनाशक संग खेतमे मिला दिहक। नवका किश्मक बीआ छेबे करह सवा-हाथ, डेढ़-हाथपर रोपिहह।”
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
गोविन्द झा
(नाटक) गाम जएबै गाम जएबै गाम जएबै ना
(आरम्भ 23.09.2012 ---- समाप्ति 17.10.2012)
पहिल दृश्य
[बूढ़ा खाट पर बैसल छथि। दूर सँ हल्ला सुनि पड़ैत अछि ---पकड़- पकड़। दौड़-जैड़। कोम्हर रौ। हे ओम्हर गाछी दिस। बूढ़ी दौड़ि कें अबैत छथि।]
बूढ़ी – अएँ, ई कथीक हल्ला भए रहल छै ?
बूढ़ा – के कहत कथी।.
तान्त्रिक – (बाहरहि सँ) इएह हम कहब जे कथीक हल्ला थिकैक।
बूढ़ी – आउ-आउ। हमरा तँ बड़ डर भए गेल।
[ तान्त्रिक प्रवेश कए कुरसी पर बैसैत छथि ]
तान्त्रिक – कोनो डरक बात नहि। एहि गाम मे तँ कोनो-ने-कोनो हल्ला-फसाद होइतहि रहै छै।
बूढी – एखन कथीक हल्ला भेलै।?
तान्त्रिक – फटफटिआ पर सबार चारि-पाँच टा छौंड़ी सब हुड़हुड़ करैत अएलै आ ओ रंगदार छौंड़ा रघुबिरबा अछि ने तकरा पकड़ि कें लए गेलै।
बूढा – अपहरण ?
तान्त्रिक – नहि, अपहरण नहि।
बूढ़ा – तखन की?
तान्त्रिक – एकटा छौंड़ी औकरा सँ बिआह करतै।
बूढी – बलजोरी ?
तान्त्रिक – हँ, सएह बूझू।
बूढ़ा – विचित्र बात।
तान्त्रिक – आजुक युग मे कोनो बा त विचित्र नहि। सुनू, बुझा दैछी। आजुक पढुआ छओंड़ा सभ हठे बिआह नहि करत। माए-बापक कथा के सुनैए। बाप एक सँ एक उत्तम कन्या तकैत रहथु, बेटा कें कोनो मतलब नहि। जखन जबानी जोर मारतै तँ बाट-घाट मे लुचपनी करैत फिरत।
बूढ़ा – ठीके कहैछी अहाँ।
तान्त्रिक – छौंड़ा कें एहि मे कोनो खतरा नहि। खतरा छै खाली छौंड़ी कें। तें छौंड़ी सभ एकटा दल बना कए अभियान चलओलक अछि जे एहन-एहन छुट्टा कुकुर सब कें एक-एक लड़ाकू छौंड़ी लगा नाथि देल जाए जे जीवन भरि टीक पकड़ने रहैक।
बूढ़ा – ओ, आब बूझल। एही अभियान मे एखन ई रघुबिरबा पकड़ाएल। उचित सजाए भेटलैक।
बूढ़ी – की करतै ओकरा?
बूढ़ा – नहि बुझलिऐ? आर की, मन्दिर मे लए जा कए बिआह करा देतै।
तान्त्रिक – अस्तु, छोड़ू अनकर गप। एखन हम एकटा शुभ संवाद लए आएल छी।
बूढ़ा – केहन संवाद ?
तान्त्रिक – हमरा हाथ मे एकटा एहन वस्तु आएल अछि जे पाबि कें अहाँ धन्य-धन्य भए जाएब।
बूढ़ा – एहन कोन वस्तु से तँ कहू।
तान्त्रिक – एक टा कन्यारत्न। परिचय सुनब?
बूढ़ा – ( गम्भीर साँस लए ) कन्यारत्न. (गुम)।
तान्त्रिक – (प्रतीक्षा कए) एना गम्भीर किएक भेलहुँ ?
बूढ़ा – हमर सब हाल अहाँ कें बुझले अछि, तखन कहू की।
तान्त्रिक – तैओ एक बात बूझि लिअ। गाम मे एखन जे घटना भेल अछि से गामहु सँ बेसी विदेश मे भए रहल अछि, तरीका भनहि किछु भिन्न हो।
बूढा – जनै छी।
बूढ़ी - जनै छी ताहि सँ की। किछु सोचहु पड़त।
तान्त्रिक – सोचल जाए। एखन आज्ञा हो। फेर भेट होएत।
[ तान्त्रिकक प्रस्थान।]
बूढ़ा – सुनलहुँ?
बूढ़ी – सुनब की कपार। हम कहैत-कहैत हारि गेलहुँ जे बिमारिऔक लाथें बौआ कें बजा लिऔ, नहि तँ पछताएब।.
बूढ़ा – की हैत बजा कए। अएले तँ छल परुकाँ कि तेसरुकाँ। की कहलक से मन पारू।
बूढ़ी – मने अछि। बिसरत कोना। मुदा एक बेर जे हारए से कि फेर....?
बूढ़ा – चुप रहू। हमर टूटल मन कें आओर नहि तोड़ू। जेहन हमर-अहाँक मन तेहन आजुक जनमल ओकर मन कोना हेतै। हम-अहाँ चुप्पे रही सएह उचित।
बूढ़ी – अहाँ तँ कोनो बात मे तेना जिद पकड़ि लै छी जे हमरा किछु नहि
फुरैए। जँ एक बेर बजाइए लेबै तँ कोन अनर्थ ...।
बूढ़ा – हँ, भए जएतै अनर्थ। अहाँ नहि जनै छी जे आइ-काल्हि नीक नोकरीक की हाल छै। केहनो जरूरी काज रहए, जँ छुट्टी लेलहुँ तँ बूझू नोकरी गेल। हम अपन मोह-ममता देखू कि बेटाक कल्याण। अपना भरोसें जिबैत रहलहुँ, अपना भरोसें जिबैत रहब। अहाँ घबराउ नहि।
बूढ़ी – जहिना अहाँ कें बेटाक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरा अहाँक बिमारीक चिन्ता।
बूढ़ा – हम ठीक भए रहल छी। कोनो चिन्ता नहि।
[ अचानक डाक्टरक प्रवेश ]
बूढ़ा – आउ-आउ, बैसू। बुझबिऔन हिनका।
डाक्टर – (बूढ़ीक प्रति) ठीके कहलनि जनार्दन बाबू, कोनो चिन्ता नहि। क्रमशः निकें भए रहल छथि। (आला लगाए देखि कें) ठीक छी। चित्त प्रसन्न राखू। एखन आज्ञा दिअ। मरीज सब बाट तकैत हैत। (बूढ़ा उठए लगैत छथि) अहाँ उठू नहि, बैसले रहू। फेर आएब दबाइ लेने। (जाइत छथि)।
बूढी – (ठाढि भए अरिआतैत) एक कप चाहो नहि देलहुँ।
डाक्टर – (बूढ़िक कान लग) हृदय किछु कमजोर भए गेल छनि। हिनका हरदम प्रसन्न रखबाक प्रयास करू। हम तकर उचित उपाय कए रहल छी।
बूढ़ी - कोन उपाए ?
डाक्टर – से एखन नहि कहब। पछाति अपनहि बूझि जएबैक।
[ डाक्टर जाइत छथि। बूढ़ी घुरि कें बूढ़ा लग आबि कें बैसैत छथि।]
बूढ़ी – (बूढा कें माथ पर हाथ देने देखि) एना माथ पर हाथ किएक देने छी ?
बूढ़ा – नहि पूछी सएह नीक। जँ मनक बात कहब तँ अहूँ हमरहि जकाँ माथ पर हाथ देब।
बूढ़ी – ई कोना हैत जे अहाँ कनैत रही आ हम हँसैत रही ?
बूढ़ा – अहूँ कनबा मे संग देबहि चाही तँ सुनू छाती कें मजगूत कए कें। (कनेक रुकि कें) एखन जे ओ घटना सुनल तकर की अर्थ से अहाँ नहि बुझलिऐ। सुनू हम बुझा दै छी हुनक पेटक बात। पहिल बात ई जे ओ हमरा चेतओलनि, जँ हम बेटा कें बजाए चटपट ओहि कन्यारत्न सँ विवाह नहि कराए देबैन तँ गामक वा विदेशक छौंड़ी सभ ओएह हाल करतनि जे रघुबिरबाक कएलक।
बूढ़ी – ओ कोन बेजाए कहलनि।
बूढ़ा – बात तँ बड़ सुन्दर, मुदा एना धमकी दए डर देखाए कुटुमैती होअए ? आ असल बात ई जे की बेटा अहाँक बात मानि कें दौड़ल आओत आ अहाँक बात मानि केँ ओहि कन्यारत्न केँ अपन अर्धांगिनी बनाए लेत ?
बूढ़ी – तँ साफ-साफ जबाब दए दिऔन। एहि लेल मथा हाथ किएक ?
बूढ़ा – हमरा मन कें अहाँ जतेक खोधब ततेक नव-नव राक्षस बहराइत जाएत। हमरा तँ लगैए जे अहाँक बेटा ओतहि विवाह कए चुकल अछि। तहिं दू-तीन बरख सँ आबि नहि रहल अछि। तेसराँ आएल रहए तँ अहाँ बड़ आग्रह कएने रहिऐक, मुदा टस सँ मस नहि भेल। किएक ?
बूढ़ी – अहीं कहू किएक।
बूढ़ा – हमरा तँ लगैए जे ता ओ विवाह कए चुकल छल।
बूढ़ी – अहाँ तँ अनेरे किदन-कहाँदन सोचैत रहै छी। छोडू ई सभ चिन्ता।. चलू भोजन करए।
[ दूनूक प्रस्थान ]
दोसर दृश्य
[ ड्रॉइङ रूम मे एक उच्च अधिकारी आदित्य सिंह, हिनक यूरोपिअन पत्नी जेन क्रिस्टल उर्फ प्रभाक संग सोफा पर बैसल आ पाँच वर्षक बालक वरुण फर्श पर खेलाइत।]
आदित्य – (मोबाइल कान मे लगबैत) आदित्य स्पीकिङ।
मोबाइल – हम अपनेक गाम सँ बाजि रहल छी।
आदित्य – की बात ?
मोबाइल – अपनेक पिता बाबू जनार्दन सिंह....।
आदित्य – कुशल छथि ने ?
मोबाइल – हँ, जिबैत छथि। मुदा स्थिति नीक नहि छनि। अपनेक माता बेर-बेर कहैत रहलथिन जे बौआकें बजाए लिऔक। मुदा ओ नहि बजओताह। अपने यथासंभव शीघ्र आएल जाए।
आदित्य – पिताजी अपने किएक नहि सूचित कएलनि ?
मोबाइल – पुछै छिअनि तँ कहै छथि, अपना भरोसें जीलहुँ, अपनहि भरोसें जिअए दिअ। एक चिकित्सकक रूप मे हम अपन कर्तव्य बूझल जे अपने कें सूचित कए दी।
आदित्य – ( मोबाइल कात कए पत्नीक प्रति) सुनलहुँ ? कनिआँक आँखि मे नोरे ने, पड़ोसिनि भोकारि पारथि। (प्रतिक्रिया जनबाक हेतु प्रभाक मुँह निहारै छथि)।
प्रभा – हमर मुँह की निहारै छी। चलबाक इन्तिजाम करू। हमर फादर इन लॉ बड़ स्वाभिमानी आ स्वावलम्बी छथि। अन्तिमो अवस्था धरि ओ नहि बजओताह। क्षमा करी तँ तकर कारणो कहि दी।
आदित्य – कहबाक प्रयोजन नहि। हम अपन अपराध स्वयं जनै छी। बेर-बेर बजबैत रहलाह, मुदा.....।
प्रभा – मुदा अहाँ कें फुरसति नहि। लगैए जे अहाँ बाप केँ आगिओ नहि दए सकब। अहाँकें कोन ? अहाँ खूब भोगि चुकल छी माए-बापक दुलार। हम तँ ने माइक मुँह देखल ने बापक। सुनैत रही जे अहाँक देश मे सासु अपन पुतोहुक आबेस बेटिअहु सँ बेसी करैत अछि। इएह सोचि कें अहाँक संग धएलहुँ। मुदा अहाँ तीन वर्ष सँ ठकैत-फुसिअबैत रहलहुँ। अहाँक दोख नहि. हमर कपारक दोख।
आदित्य – ( तेज अबाज मे ) अहीं सुनबैत रहब कि हमरो बात सुनब ?
प्रभा – ( आओर तेज अबाज मे ) नहि सुनब अहाँक बात। सुनैत-सुनैत कान पाथर भए गेल। ( कनै छथि)।
प्रवीण – (बाहरहि सँ) ई कोन नाटक भए रहल छै. मैडम ?
आदित्य – प्रवीण , आबह-आबह।
प्रवीण – (प्रवेश कए सविस्मय) अएँ. श्रीमतीजीक आँखि मे नोर ?
आदित्य – ई एकटा विकट समस्या ठाढ़ कए देलनि अछि।
प्रवीण – कोनो समस्या नहि। मैडम, एना नोर ढारने ई पाथर नहि पसिजत। पहिने नोर पोछू आ मन प्रसन्न करू। तखन देखू जे कोना ई मिस्टर सोल्यूशन छन भरि मे अहाँक सभ समस्याक समाधान कए दै छथि। (आदित्य दिस आङुर देखाए) एकरा कानि-खीजि कें अहाँ नहि सोझ कए सकै छी। ( आदित्य सँ ) हओ, हमर कहल मानह आ तुरन्त गाम जएबाक तैआरी करह। एकसर नहि, तीनू एक संग।
आदित्य – मुदा छुट्टी ?
प्रवीण – मूर्ख छह तों। हौ, आइ-काल्हि नोकरी मे छुट्टी देल नहि जाइ छै, छुट्टी लेल जाइ छै। केवल सूचना दए निकलि पड़ह। हम छी ने, कोनो खतरा नहि। छुट्टीक मंजूरीक प्रतीक्षा करबह तँ बापक सराधो नहि कए सकबह।
आदित्य – एकटा आओर विकट समस्या अछि तोहर मेम साहेब कें लए। कट्टर पुरना विचारक लोक हमर माता-पिता हिनका घरो नहि टपए देथिन।
प्रवीण – हओ, एतेक दिन संग रहलह तैओ तों चीन्हि नहि सकलह हमर मेम साहेब कें। जे तोरा सन बेकूफ कें नाथि देलनि से अबस्से छन भरि मे सासु-ससुर कें रिझाए लेतीह। की से आत्मबल अछि ने, मेम साहेब ?
प्रभा - पुछलहुँ तँ जड़ि सँ सुनू। हमरा सन अभागलि दोसर नारी नहि भेटत। हम ने माए कें देखलहुँ ने बाप कें। एकटा अशरण वृद्ध शरण देलनि। जखन हिनका सँ विवाह भेल, मनहि मन प्रसन्न भेलहुँ जे आब सासु-ससुर सँ ओ दुलार भेटत जे माए-बाप सँ भेटैछै। एही लेल भारतीय पड़ोसी सँ साड़ी पहिरब सिखलहुँ। एही लेल बड़ जतन सं मैथिली सिखलहुँ।
प्रवीण – बाह. अहाँ तँ मैथिली बजबा मे प्रवीणहु सँ प्रवीँण भए गेलहुँ।
प्रभा – अहाँक मित्र कें अङरेजी सँ बड़ अनुराग।
प्रवीण – तखन सिखलहुँ कोना ?
प्रभा – ओ अङररेजी बाजथि तँ हम कान मूनि ली। एखनहु से जिद ठनने छी। मुदा....।
प्रवीण – आब मुदा की ?
आदित्य – हम एकसर तँ जएबा लेल तैआर छी, मुदा हिनका लए जएबा मे एकटा बाधा अछि।
प्रवीण – केहन बाधा ?
आदित्य – हम विवाह कएलहुँ से बात माए-बाप सँ आइ धरि छिपओने रहलहुँ। तखन कोना हिनका लेने....?
प्रवीण – हम तोहर मनक सभ बात जनैछिअहु। तों बापक तीन–तीन टा बड़का अपराध कएने छह। पहिल – तीन बरख सँ माए-बाप कें मुह नहि देखओलह। दोसर – चुपेचाप विवाह कए लेलह। तेसर – इसाइ कन्या सँ विवाह कएलह।
प्रभा – ठीक कहैछी अहाँ। एही लाजें...।
प्रवीण – तों पढ़ि-लिखि कें लोढ़ा भए गेलह। हओ, जनै नहि छह, सभक बाप धृतराष्ट्र होइछै, पक्का धृतराष्ट्र। लाख अपराध माफ। तखन डर कोन ? बड़ क्रोध हेतनि त कहथुन, कान पकड़ि कें दस बेर उठह-बैसह। बस, सभ क्रोध निपत्ता।
वरुण – ( खेलाएब छोड़ि कान पकड़ि कें उठब-बैसब सुनि कें स्वयं करैत ) डैडी, अहूँ एहिना करू ने। (हाथ पकड़ि घिचैत अछि। आदित्य संग दैछथिन।)
प्रवीण – बाह रे बौआ, बाह ! एक्सेलेन्ट ! देखह, हओ. बापक हृदय केहन हइछै। एहिना तों बापक आगाँ कान पर हाथ देने ठाढ़ भए जएबह कि बस, आनन्दे आनन्द। (प्रवीण सँ) बाउ. तों सब गाम जएबह।
वरुण – सत्ते गाम जएबै ?
आदित्य आ प्रभा – हँ, सत्ते गाम जएबै।
[ वरुण नाचि-नाचि गबैत अछि। ताहि मे माए, बाप आ प्रवीण तीनू संग दैत छथिन ]
गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना
दही खएबै चूरा खएबै आम खएबै ना
गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना
दादा के देखबै दादी के देखबै भैया के दखबै ना
गाम जएबै गाम जएबै जाम जएबै ना
प्रभा – बस, नाच खतम। आब चलैचलू डिनर मे।
[ सभक प्रस्थान ]
तेसर दृश्य
[ पुरान-सन पक्का मकान। नमहर बरंडा। बामा कात एक कोठली। बरंडा पर खाट, ताहि पर रोगग्रस्त बूढ़ा जनार्दन ठाकुर पड़ल। बूढ़ी पाएर जँतैत। खाटक एक कात किछु कुरसी ]
बूढ़ा – अहाँ किछु कहए लागल रही ?
बूढ़ी – हँ, ठीके।
बूढ़ा – कहलहुँ नहि .
बूढ़ी – हँ, मुह सम्हारि लेलहुँ। मनक बात मनहि राखल।
बूढ़ा – से किएक ?
बूढ़ी – कहैत-कहैत थेथर भए गेलहुँ। सभ बेकार। तखन फेर कहि कें कोन फल ? जेहने बाप चंठ तेहने बेटा।
बूढ़ा – (उठि कें बैसैत क्रोध सँ) हे, हमरा जे कहब से कहू, हमर बेटा चंठ नहि अछि। कोना बुझाउ अहाँ कें जे नीक नोकरी केहन वस्तु थिकैक। की हमर मुह आ अहाँक मुह देखैत रहने ओकर मुह भरतै ?
बूढ़ी – हमहूँ कोना बुझाउ अहाऎ कें। जेना अहाँ कें बौआक नोकरीक चिन्ता अछि तहिना तँ हमरहु अहांक प्राणक चिन्ता।
बूढ़ा – देखू, पाँच-पाँच टा डाक्टर-वैद्य तत्परतापूर्वक इलाज कए रहल छथि। हम स्वस्थ भेल जा रहल छी। तखन कोन चिन्ता ?
[ वाम दिस सँ आदित्य, प्रभा आ वरुणक प्रवेश। तीनू अलक्षित रूपें कात मे ठाढ़ छथि। ]
आदेत्य – (कातहि सँ) इएह, इएह थिक हमर घर।
बूढ़ी – (अबाज सुनि कें झटकारने आगाँ बढ़ैत कचकाए) अएँ, के ? बौआ ? आबि गेल, आबि गेल हमर बौआ !
बूढा – (हड़बड़ाए उठि कें दौड़ैत) अएँ, अचानक आबि गेल !
आदित्य – बाबूजी, बाबूजी, एना नहि दौड़ू। खसि पड़ब। (बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए पिता आ माता कें प्रणाम करैत छथि) ।
बूढ़ा – (माथ पर हाथ दए पँजिअबैत) जहाँ रहह, निकें रहह।
बूढ़ी – जुगजुग जीबह, निकें रहह।
प्रभा आ वरुण – (दूरहि सँ कर जोड़ि कें) प्रणाम बाबूजी, प्रणाम माताजी।
बूढ़ा – (दूनूक मुह निहारि सविस्मय) अएँ, ई के ?
आदित्य – ( अचानक बूढ़ाक आगाँ ठाढ़ भए) बाबूजी, बाबूजी, हमरा ओहिना कान ऐंठू जेना नेना मे ऐंठै छलहुँ। ऐंठू, ऐंठू ने। (आँखि मे नोर )।
बूढ़ा – (अकचकाए) अरे, तोरा ई की मोन पड़लहु। (मुह निहारि) अएँ, हँसीक जगह नोर किएक ?
आदित्य – अहाँ नहि ऐंठब तँ हम अपनहि ऐंठैछी।
[ आदित्य कान ऐंठैत उठैत -बैसैत छथि। वरुण नकल करैत अछि। प्रभा पकड़ि कें कोर लए लैछथिन। ]
बूढ़ा – ( आदित्य कें पकड़ि खाट पर अपना लग बैसाए) एना नहि करह, बाउ। बात की थिकै से कहह।
आदित्य – आइ, बाबूजी, अहाँक आगाँ आ माए, तोरो आगाँ हम लाज-बीज कात कए अपन अपराध कबूल करैछी आ तकर जे दण्ड हो से ......।
बूढा – पहिने ई तँ कहह जे तों कोन अपराध कएलह।
आदित्य – एक नहि, तीन-तीन टा अपराध। नम्बर एक – तीन वर्ष सँ गाम नहि अएलहुँ। नम्बर दू – अहाँ कें बिनु पुछनहि चुपेचाप विवाह कए लेलहुँ। नम्बर तीन – अहाँक प्रस्तावित कन्यारत्नक उपेक्षा कए एहि क्रिश्चन कन्या सँ विवाह कए लेल। आइ अहाँ एहि सभ अपराधक दण्ड दिअअ. हम सहर्ष भोगि लेब।
[ आदित्य, प्रभा आ वरुण तीनू कर जोड़ने एक पाँत मे ठाढ़ होइछथि। एक मिनट सभ स्तब्ध भेल एक दोसराक मुह अपलक तकैत छथि। ]
प्रभा – हम हिनकर पुतोहु दूरहि सँ गोड़ लगैछिऐन। ( आँजुर माटि धरि झुकाए प्रणाम करैत छथिन)।
बूढी – (सहसा आगाँ बढ़ि कें कोर करैत) अहोभाग, अहोभाग हमर। केहन सुन्नर पोता आ केहन सुन्नरि पुतोहु। दूधे नहाउ पूते बिआउ। (बूढ़ा सँ) लछमी घर अइलीह। लग आबि कें आसिख दिऔन। ( प्रभा कें आशीर्वाद देबाक लेल हुनक माथ दिस हाथ बढ़बैत लग जाइत छथि।)
प्रभा – (पाछु हटैत) हाँ-हाँ। हमरा छूबथु नहि।
बूढ़ी – ( अकचकाए ठमकि के) अएँ, से किएक ?
प्रभा – हम अङरेजक बेटी, अछोप।
बूढ़ी – (मर्माहत भए दू डेग पाछु हटैत) अएँ, मे......म !
[ बूढ़ा अचानक बेहोस भए ठामहि पडि रहैछथि। ]
बूढ़ी – ( छाती पिटैत) दैबा गे दैबा !
प्रभा – माइ गॉड ! हमरा सभक अबितहिं ई की भए गेलनि।
आदित्य – दीज ओल्ड फोक कुड नॉट टोलरेट आवर प्रेजेन्स। लेट अस फ्लाइ बैक ऐज सून ऐज पॉसिबुल।
प्रभा – प्लीज हैभ पैशेन्स ए मोमेन्ट। ( बूढ़ी सँ ) माजी, लग मे कोनो डाक्टर छथि ?
बूढ़ी – हँ, लगहि मे छथि। चारिए-पाँच घर बामा दिस।
प्रभा – हम डाक्टर कें बजा अनैछिऐन। ई पंखा हौंकैत रहथुन। किछु टोकथुन नहि।
[ कनेक काल सभ स्तब्ध। प्रभाक संग डाक्टर अबैछथि। ]
बूढ़ी – डाकदरबाबू. देखिऔन. की भए गेलनि हिनका।
डाक्टर – घबराउ नहि। लगले ठीक भए जएतनि। (जाँच कए छाती पकड़ि कें डोलबैत) जनार्दन बाबू, मन केहन अछि ?
बूढ़ा – ( अस्पष्ट ध्वनि मे ) म.....म, मम...ता....।
डाक्टर – की कहलहुँ ?
बूढ़ा – ध....धर...धर।
डाक्टर – डेलिमा. क्लिअर केस ऑफ डेलिमा। एक दिस ममता आ दोसर दिस धर्म – दूनूक प्रबल आघात सहि नहि सकलाह।
आदित्य – एकर प्रतिकार ?
डॉक्टर – पहिने ई कहल जाए जे अपने के ?
आदित्य – ई हमर पिता, ई माता आ ई...।
[ तीनूक बीच नमस्कार ]
डाक्टर – तखन तँ एकर प्रतिकार अपनहि दूनूक हाथ मे अछि। खास कए अपनेक श्रीमतीजीक हाथ मे।
प्रभा – से कोना ?
डाक्टर – ममता कें ततेक जगाउ जे ओ धर्म पर विजय पाबए। अपने कें फोन हमही कएने रही। नीक कएल जे आबि गेलहुँ। आब कोनो चिन्ता नहि। होस आबि रहल छनि। कनेक काल मे नॉर्मल भए जएताह। एखन आज्ञा हो।
[ डाक्टर जाइत छथि। आदित्य, प्रभा आ वरुण फेर ओआआहिना पाँती लगाए ठाढ़ भए जाइछथि। बूढ़ी भारी दुबिधा मे पड़लि बकर-बकर पुतोहुक मुह तकैछथि। ]
आदित्य – बाबूजी होस मे आबि गेलाह । आब की कएल जाए।
प्रभा – लेट मी प्ले ए ट्रिक नाउ। ( बूढाक लग जाए कें ) बाबूजी, आब हिनक मन केहन छनि ?
बूढ़ा – ठीक अछि।
प्रभा – कहथु तँ, ई के थिकाह ?
बूढ़ा – बेटा।
प्रभा – हम के छी ?
बूढ़ा – हमर पुतोहु।
प्रभा – आ ई ?
बूढ़ा – ई हमर पोता।
प्रभा – हम एतेक दूर सँ किएक अएलहुँ।
बूढ़ा – अपन सासु, अपन ससुर आ अपन घर-आङन देखए।
प्रभा – से तीनू देखि लेल। आब आज्ञा हो, जाइछी।
बूढी – ( अकचकाए) अएँ, से किएक।
प्रभा – हम अछोप मेम छी। हमरा रहने हिनकर घर छूति जएतनि। (कनैत) हाए रे हमर कपार। बड़ मनोरथ छल, नहि माए-बाप तँ सासु-ससुर सँ माए-बापक दुलार भेटत। ......तेहन पुरुखक हाथ धएलहुँ जे सासुओ-ससुर देखि कें दूर पड़ाइत छथि।.......हिनका लोकनिक भाखा सिखलहुँ, साड़ी पहिरब सिखलहुँ। सब बेकार, सब बेकार।
बूढ़ी – ( दौड़ि कें जाए प्रभा कें पँजिआए आँचर सँ नोर पोछैत ) नहि बाजह, एहन कथा नहि बाजह हमर बेटी ( मुह चूमैछथि)।
बूढ़ा – (उठि कें प्रभा कें डेन धए घिचैत) बेटी, पहिने बाप कें गोड़ लागह, तखन माए कें।
प्रभा – ( ठेहुनिआँ दए बूढ़ाक पाएर पर माथ दए) प्रणाम,बाबूजी।
बूढ़ा – (दूनू डेन पकड़ि कें उठबैत) कल्याणवती भव, सौभाद्यवती भव।
प्रभा – बाबूजी, आब ई पड़ि रहथु ( बाँहि पकड़ि कें खाट पर बैसाए ओहिना बूढ़ी कें प्रणाम करैत छथि। छन भरि बूढ़ीक मुह निहारि कें ) मा, तों सत्ते हमरा अपन बेटी बुझैछें ?
बूढी – सत्ते नहि तँ फूसि।
प्रभा – हमरा तखन विश्वास हैत जखन तों हमर हाथक छूअल खएबें।
बूढ़ी – खोआ दे जे खोअएबाक होउ।
प्रभा – (बैग सँ टिफिन बॉक्स निकालि ओहि सँ एक-एक चमचा लए सभक हाथ मे दैत छथि, वरुण कें भरि प्लेट ) खो दही-चूरा-आम भरि पेट।
वरुण – (खाइत आ नाचि-नाचि गबैत अछि)
गाम जेबै गाम जेबै गाम जबै ना दही खेबै चूरा खेबै आम खेबै ना
गाम जेबै गाम जबै गाम जेबै ना
( माए-बाप कें हाथ पकड़ि कें घिचैत) प्लीज ऐकम्पनी मी ।
आदित्य – नहि मानत.। बड़ जिद्दी अचि ई छओंड़ा। ( तीनू नचैत-गबैत छथि।)
[ तान्त्रिक, जोतखी, वैद्य आ होमिओपैथक प्रवेश। नाच समाप्त कए तीनू यथास्थान बैसैत छथि।]
तान्त्रिक – सुनल जे अपने अचेत भए गेल रही, तें हमरा तोकनि पहुँचि गेलहुँ। एतए तँ आनन्दे-आनन्द देखैछी।
बूढ़ा – ठीके छन भरि अचेत भए गेल रही। डाक्टर साहेब कहलनि, अधिक आनन्द भेला पर एना होइछै। आब ठीक छी। आनन्द कोना नहि हो। एतेक दिन पर ई पुत्ररत्न अएताह अछि।
आदित्य – नमस्कार।
बूढ़ा – आ तनिका संग ई पुत्रवधूरत्न
प्रभा – नमस्कार।
बूढ़ा – आ तनिका कोर मे ई पौत्ररत्न।
तान्त्रिक – एना अचेत होएब नीक नहि थिक। फेर नहि हो तकर उपाए हम कए दैछी। ( बूड़ाक माथ पर हाथ दए फुसुर-फुसर मन्त्र पढि ) बस. मा दुर्गाक प्रसादें फेर कहिओ नहि हैत।
जोतखी – औजी, ग्रह विपरीत रहतै तँ अहाँक मा दुर्गा की करतीह ? ग्रहक महिमा आब बड़का-बड़का वैज्ञानिको सब मानैत छथि। मूर्छा थिक मनक रोग। मनक मालिक थिकाह चन्द्रमा। सतत चानीक औंठी पहिरने रहू, फेर कहिओ एना नहि हैत।
होमिओपैथ – कनेक मुह बाओल जाए ( बूड़ा मुह बबैछथि, डाक्टर चारि-पाँच गोली खसा दैछथि।)
आदित्य – अपने किछु बजलहुँ नहि?
होमि. - हमर बोलीक काज हमर गोली करैत अछि।
वैद्य – मन तँ आनन्द-आनन्द भए गेल मुदा बल ?
बूढ़ा – बल एखनहु नहि आएल अछि।
वैद्य – ( एक पुड़िआ दैत) हमर ई भीमपराक्रम रस बकरीक दूध मे घोरि तीन दिन खाए लेल जाए। अपने भीमहि कें पछाड़ि देबनि ओहिना जेना जबानी मे पछाड़ैत रहिऐन।
आदित्य – अपने लोकनिक फीस ?
वैद्य – राम-राम! हमरा लोकनि कारनीक ओतए कहिओ एक टुक सुपारिओ नहि लेल!
तान्त्रिक – हँ, तैओ जँ सत्कार करबाक हो तँ मा दुर्गाक प्रसादक संग एक साँझ....।
वैद्य – धुरजी! एना घिनाउ नहि। आब चलैत चलू एतए सँ। हिनका बेटा-पुतहु सँ गप करए दिऔन।
( सभ चिकित्सक जाइत छथि।)
आदित्य – बाबूजी, सुनल तान्त्रिक महोदयक प्रस्ताव?
बूढ़ा – वैद्यजी भनहि धुरजी कहि देथुन, हमरा तँ बड़ आनन्द भेल।
आदित्य – से किएक?
बूढ़ा – सुनह। हमरा आशंका छल जे समाज बारि ने दिअए। समय बहुत बदलि गेलै। परन्तु समस्या अछि जे सम्हरत कोना.? हम सब अथबल आ तों सब परदेसी।
बूढ़ी – ब्राह्मन मुह खोलि कें भात मङलनि तँ कोना नहि देबनि? जेना हैत तेना हम सम्हारि लेब।
प्रभा – गुड आइडिआ! सुनैछी मिथिला मे खूब भोज होइए आ ताहि मे खूब व्यंग्य-विनोद. हास-परिहास होइए।
आदित्य – ठहाका पर ठहाका चलैए। जे सुनैत रही से देखिए लिअअ। ( बूढ़ीक प्रति) माए, तों कोनो चिन्ता नहि कर। देखैत रह, आइए साँझ खन भोजक सभ सामग्री हबा गाड़ी पर आबि जाएत।
बूढ़ा – भोजक ओरिआओन पछाति, पहिने भोजनक ओरिआओन होअओ।
आदित्य - आइ पाँचो गोटए एक संग भोजन करब। माए, तोरहु हमरा सभक संग खाए पड़तौ।
बूढ़ी – ( विस्मय सँ दाढ़ी पर हाथ दए ) गे मैया ! एहनो कतहु भेलैये।
प्रभा – ओना नहि मानबें त हम पकड़ि कें अपना संग बैसा लेबौ।
बूढ़ा – ( बूढ़ीक प्रति ) अहाँ जाउ पूआ-पकमान छानए ।
बूढ़ी – बेटी, चल हमरा संग. तोरा अपन घर-आङन, बाड़ी-झाड़ी देखा दैछिऔ।
आदित्य – ( विनोदक मुद्रा मे ) तोहर घर छुततौ नहि ?
बूढ़ी – छूतत किएक? लछमीक पाएर पड़त तँ अन-धन सँ भरल-पूरल रहत।
[ बूढ़ी, प्रभा आ वरुणक प्रस्थान ]
बूढ़ा – तोंहू ओहि कोठली मे विश्राम करह गए। बाट-घाटक थाकल-ठेहिआएल छह। हमरहु आब विश्राम करक चाही।
[ दूनूक प्रस्थान। ]
चारिम दृश्य
[ दूनू कात चारि-चारि कुरसी। बीच मे चौकी। एक कातक कुरसी पर तान्त्रिक आ जोतखी। शेष खाली।]
तान्त्रिक – मा दुर्गे, मा दुर्गे। देखू तँ अशिष्टता ! अतिथि आबि गेलाह आ घरबैआ घरहि मे सुटकल छथि।
वैद्य – औजी, ई भोज नहि थिकैक, ई थिकैक पार्टी। पार्टी मामूली लोक नहि दए सकैए। आदित्य बाबू सुट-बूट, स्नो-पाउडर लगओने ने एक सेकेंड पहिने, ने एक सेकेंड लेट ठीक घड़ीक सुइ पर उपस्थित भए जएताह।
तान्त्रिक – आ भानस-भात तकरो कतहु धुआँ-धुकुर नहि देखैछिऐ।
वैद्य – बड़ भूख लागल अछि? जमाइन फाँकि कें आएल छी की? धैर्य धरू। समय पर सभ सामग्री पहुँचि जएतै।
[ डाक्टर आ होमिओपैथ अबैछथि आ दोसर कातक कुरसी पर बैसैछथि।]
होमिओ. – देखू तँ तमासा, एतेक दिन बापक कोनो खोजे नहि। बाप-पुरुखाक बनाओल मकान ढहल-ढनमनाएल जा नहल छनि तकर सुधिए नहि, आ पहुँचि गेलाह पार्टी कए कें अपन बड़प्पन देखबए।
डाक्टर – पहुँचलाह कोना आ किएक से लग आउ, कानमे कहैछी। हम फोन कएलिऐन जे बाप मरै पर छथि तखन अएलाह। ने बाप कें बेटा सँ मतलब, ने बेटा कें बाप सँ। उँच्चा चढि-चढि देखा घर-घर एके लेखा। बूढ भेला पर हमरो-अहाँक इएह दशा हैत।
वैद्य – आ पार्टी किएक भए रहल छै से बुझलिऐ ?
तान्त्रिक – हम मुह खोलि कें बजलहुँ तें।
वैद्य – मा दुर्गा अहाँ कें जीह तँ बड़ सुन्दर देलनि, मुदा बुद्धि देबा मे कने कंजूसी कएलैन। एकरा पार्टी नहि, बूढ़ाक श्राद्ध बूझू।
तान्त्रिक – धुरजी ! बापक जिबितहि कतहु श्राद्ध भेलैए?
वैद्य – जीबी तँ की-की ने देखी। आब इहो चललैए। बाप कें सन्देह जे मुइला पर बेटा श्राद्ध करत कि नहि। बेटा सेहो सोचलथिन श्राद्ध करए फेर आबए नहि पड़त।
तान्त्रिक – ( घड़ी देखि ) आब गप बन्द। पार्टीक समय भए गेल। जे घड़ी ने साहेब पहुँचलाह।
[ आदित्य, प्रभा, बूढ़ा, बूढ़ी आ तनिक कोर मे वरुणक प्रवेश। आदित्य ठाढ़ रहैत छथि, आओर सभ सोफा पर बैसैत छथि।]
आदित्य – हम अपना दिस सँ आ पूज्य पिताजीक दिस सँ अपने लोकनिक अभिवादन आ स्वागत करैत छी। अपने लोकनि हमर पूज्य पिताजीक प्राणरक्षा कएल तदर्थ हम अपने सभक सदा आभारी रहब। हमरा ई जानि कें बड़ प्रसन्नता भेल जे चिकित्सा मे अपने लोकनिक प्रवीणता आ सेवापरायणताक प्रसादें हमर ई गाम आदर्श स्वस्थ ग्राम घोषित भेल। आइ हमरा अपने लोकनिक श्रीमुख सँ ई सुनबाक लालसा भए रहल अछि जे कोना-कोना अपने लोकनि हमर गाम कें ई सौभाग्य प्राप्त कराओल आओर कोना-कोना हमर पिता कें रोगमुक्त करैत गेलहुँ। धन्यवाद। ( प्रभाक लग बैसैछथि।)
तान्त्रिक – ( ठाढ़ भए ) ओं नमो दुर्गायै। आदरणीय जनार्दन बाबू, आ आदित्य बाबू, एहि गाम कें ई सौभाग्य आन ककरो कएने नहि, मा दुर्गाक कृपा सँ प्राप्त भेलैक। हम घर-घर, गाम-गाम चन्दा माङि-माङि....
वैद्य – ( बीचहि मे ) अपन मकान बनओलहुँ।
तान्त्रिक – ( तमसाए कें ) चुप ! पहिने हमरा बाजए दिअअ, पछाति जतेक बकबाक हो बकब। की कहैत रही ? हँ, मन पड़ल, चन्दा कए-कए ग्रामवासीक कल्याणक संकल्प कए तीन बेर सहस्रचण्डी महायज्ञ कएल। तहिआ सँ एहि गाम मे हमर चण्डीपाठे सभ रोगक रामबाण भए गेल। तैओ केओ-केओ आतुरतावश चण्डीपाठक संग-संग डाक्टर-बैदक औखधो भकसि लैत अछि, भनहि ओहि मे जहर-माहुर रहओ।
डाक्टर – (ठाढ भए) की बजलहुँ, की बजलहुँ ?
वैद्य – मुह सम्हारि कें बाजू !
डाक्टर – कृपया सुनल जाए एहि दूनू धन्वन्तरिक एक प्रसिद्ध कथा। एक दिन ई तान्त्रिकजी आ बैदजी अपना मे की गप करैत रहथि से सुनल जाए। तान्त्रिकजी पुछलथिन बैदजी सँ, अओ, ने अहाँ चण्डीपाठ कएलहुँ. आ ने हम ककरहु कोनो दबाइ देलिऐक; तखन चिता किएक जरैत अछि ?
वैद्य – चुप रहू। अहींक, अहींक इंजेक्शन तँ ओकर जान लेलकै।
तान्त्रिक – एहन मुह रहत तँ बाट-घाठ मे मारि खाएब।
होमिओ. – गरहत्ता दए गाम सँ बैलाउ एहि डाकू डकडरबा कें।
डाक्टर – माफ कएल जाए। हम स्वयं पड़ा जाए चाहैछी । अपने सभ शतमारी वैद्य आ सहस्रमारी वैद्यराज थिकहुँ। भुजैत आ भजबैत रहू एहि स्वस्थ ग्राम कें।
तान्त्रिक – जनार्दन बाबू, कान खोलि कें सुनि लिअअ। गरहत्था दए कें एतए सँ निकालू किडनीक सौदागर एहि डकदरबा कें। नहि तँ खाउ अपम पार्टी अपनहि। चलैत चलू सभ केओ एतए सँ।
प्रभा – हाए रे हमर कपार ! की करैत की भए गेल। जलदी पड़ाउ एहन गाम सँ। हमरा बड़ डर होइए।
आदित्य – अहाँ घबराउ नहि। कने काल धैर्य धरू।
प्रभा – माइ गॉड ! ( ठाढ़ि भए लग जाए कान मे ) एहि भयंकर आगि कें अहाँक चुरू भरि पानि किन्नहु मिझाए नहि सकत। जलदी पड़ाउ।
आदित्य – कोनो डर नहि। छन भरि धैर्य धए देखू तमाशा। हम जनैछी, एहन सिचुएशन कें कोना कन्ट्रोल कएल जाइत अछि।
प्रभा – बेस, लड़ैत रहू अहाँ एहि सिचुएशन सँ। हम आँखि मूनि लैछी। ( आबि कें बैसैछथि।)
आदित्य – आदरणीय अतिथि गण, कृपया हमर दू शब्द सुनि लेल जाए, तखन जनिका जे करबाक हो से करैत जाएब। अपने लोकनिक एहि अनुपम प्रतिस्पर्धा कें देखि कें हमरा अपार आनन्द भेल। किएक तँ एकर मूल लक्ष्य रहल गामक लोक कें स्वस्थ राखब। तें हम सभ अतिथिक हृदय सँ प्रशंसा करैत छी। अपने सभ एक सँ एक आगाँ बढ़ि कें हमर पूज्य पिताक प्राणरक्षा कएल ताहि हेतु हम अपने सभक प्रति आजीवन कृतज्ञ रहब। अपने सभक पाएर पकड़ि प्रार्थना करैत छी जे जेना हमर पिताक प्राण बचाओल तहिना हमर प्रतिष्ठा बचाओल जाए।
वैद्य – बाह ! अपने बड़ कौशल सँ एहि विषम परिस्थिति कें सम्हारि लेल।
तान्त्रिक – वैद्य जी भनहि सन्तुष्ट भए जाथु, हमर समाधान नहि भेल। हम अपनेक पूज्य पिताजीक मुह सँ ई सुनए चाहैछी जे ओ ककर चिकित्सा सँ स्वस्थ भेलाह।
[ किछु काल सभ बूढ़ाक मुह तकैत अछि। ]
बूढ़ा – ( किछु काल सोचि कें ) हमरा पुछैछी तँ हम एतबे कहब जे हम ककरो चिकित्सा सँ नहि, बेटा सपरिवार आबि गेलाह तकर ततेक, ततेक आनन्द भेल जे सभ रोग-बलाए बिलाए गेल।
[ सभ चकित भए एक दोसराक मुह तकैत छथि। ]
डाक्टर – आब मुह की तकैछी। भेटि गेल उचित बिदाइ। चलैत चलू अपन-अपन घर। खाथु आदित्य बाबू अपन बापक श्राद्धक पिण्ड अपनहि।
आदित्य – ( घबराए कें दूनू हाथ जोड़ि ) हम सभक पाएर धरैछी। एहन कठोर दंड देबा सँ पहिने एहि अपराधीक मुह सँ दू शब्द सुनि लेल जाए।
बूढ़ा – ( आयासपूर्वक ठाढ़ भए कें ) एक बूढ़ आ ताहि पर चिर रोगी। हमरा होस नहि रहल जे की बाजी की नहि। माफ.....मा..(बोल लटपटाइत छनि आ खसैत जकाँ बैसि जाइत छथि।)
आदित्य – पिताजीक एहन स्थिति कें देखैत कृपया अपने लोकनि छन भरि बैसि गेल जाए। ( सभ बैसैत छथि। ) सुनल जाए जे पिताजीक मुह सँ एहन कथा किएक बहरएलनि। ( प्रभा सँ ) कने पानि। (दू घोंट पानि पीबि कें ) सुनल जाए। हम आजुक दुनिआँक चकाचौन्ह मे पड़ि कें आ ( प्रभा दिस संकेत कए ) हिनक मायाजाल मे फँसि कें....
प्रभा – आ हमरा अपन मायाजाल फँसा कें।
आदित्य – चुप रहू। एखन मजाक नहि। हमरा कनेको होस नहि रहल जे पिताक हृदय आ माताक ममता केहन होइछै। हम माए-बाप कें सालक साल कलपबैत-कनबैत रहलहुँ। धन्यवाद डाक्टर साहेब कें जे हमर ओ मोह निद्रा तोड़लनि। धन्यवाद एहि ( प्रभा दिस संकेत) ममतामयी नारीरत्न कें जे हमरा मानू कान पकड़ि कें एतए घीचि अनलनि। बहुत-बहुत वर्ष पर एक संग बेटा, पुतोहु आ पोताक मुह देखितहि आनन्दक लहरी मे सभ रोगव्याधि दहा गेलनि । तहिं ओहन कथी मुह सँ बहराए गेलनि। एहि सभ दुखद घटनाक अपराधी हम छी। क्षमा करू अपने तोकनि। क्षमा करू बाबूजी। क्षमा कर माए। ( माए-बापक पाएर पकड़ि कें कनैत छथि। माए आँचर सँ नोर पोछैत छथिन। )
बूढ़ा – ( डेन धए उठबैत ) बाउ, ई अहाँक दोख नहि। ई एहि घोर कलिकालक दोख थिक। उठू आ सभ कें आदरपूर्वक भोजन करबिऔन गए।
तान्त्रिक – आब वितम्ब किएक ? मा दुर्गाक प्रसादें बीझो होअओ।
( आगाँ आदित्य आ प्रभा, तनिक पाछाँ सभ चिकित्सक जाइत छथि.। )
बूढ़ी – बाउ, आँखि खोलह। आब भोज हेतै। चलह देखैले।
वरुण – ( झट उठि कें हर्ष सँ हँसैत नचैत )
भोज हेतै भोज हेतै भोज हेतै ना
भोज खेबै भोज खेबै भोज खेबै ना
गाम जेबै गाम जेबै गाम जेबै ना
भोज खेबै भोज खेबै भोज खेबै ना
भोज खेबै भोज खेबै भोज खेबै ना
[ बूढ़ी आ वरुणक प्रस्थान। ]
बूढ़ा – ( शून्य दृष्टि सँ चारू दिस ताकि ) चारू दिस सुन। सभ चल गेल, सभ। एहि सुन मे कतेक काल, कतेक काल एना बैसल रहब ? कतेक काल ? हमरहु आब जएबाक चाही। कोम्हर ? कतए ?
नेपथ्य सँ – जतए सँ फेर केओ घुरैत नहि अछि।
यद् गत्वा न निवर्तते। यद् गत्वा न निवर्तते
-
रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
मुन्नी कामत
एकांकी -हत्यारा समाज
प्रथम-दृश्य
सूर्यकला- काकी...... हयइ लवकी काकी, कतऽ छेतहिन?
लवकी काकी- की कहै छिऐ कनियाँ! अतऽ पुबरिया घरमे छी आउ।
सूर्यकला- काकी, रमकलिया मै कऽ सुनै छिऐ फेर किछु छै, आइ भोरका गरी सँ रमकलिया बाबू लऽ कऽ गेलैए अल्ट्रासाउण्ड करबै लऽ दरभंगा।
लवकी काकी- धैउररर उंउंउंउं पापी नरकी कऽ की बात करै छी... छौरा तँ जान सँ मारि देतै मौगीकेँ। देखियौ, देहमे कोनो जान छै जेे फेर गेलै खुुुुनमा-खून होइ लऽ।
सूर्यकला- की करतै काकी बेटी जनमा कऽ जे मै-बाप सब दिन मरतै, से बलू एक्के बेर मरि जा, वएह ठीक ने। आब तँ ई पाप घरही होइ छै। अकरा कोनो पाप नै समझदारी कहल जाइ छै। देखतुुहुन, अतेक दिन छेलै जे बेटीकेँ नै पढ़बै छी तैं उ बोझ अछि। आब तँ पढ़बैयोमे खर्चा आ बियाहोमे खर्चा होइत अछि। केना कऽ हम गरीब बेटी जनमैब। बेटा जनमा कऽ चौराहा पर राखि देब तँ दू साँझ हमर चुल्हा जरत, मगर बेटी तँ हर पग-पग पर कलंक बोटरने घर आनत। ओकर उजर चुनरीमे कारिख लगैत देर नै हएत। आब कहू काकी ओइ शर्मसँ मरी आकि अहिना मरी।
लवकी काकी- तोेहर बात सही छऽ कनियाँ पर अही सोचकेँ तँ बदलै कऽ छै। जे लोग निअम बनेने छै आ कहै छै बेटा बैटी एक समान, वएह बेटीक इज्जतक दुश्मन बनि जाइ छै। घोर कलयुग छै। सभ मजबूर छै। पटाक्षेप।
दोसर-दृश्य
रामेश्वर- रमकाली माय, की करबै, डॉक्टर साहेब कहै छै जे फेर बेटी अइ। महग युगमे चारि टा बेटी पहिले सँ अछि। बेटाक खातिर छः बेर अहाँकेँ सफैया करा चुकलौं, आब तँ अहाँक शरीर देख डॉक्टर सफैया करैसँ सेहो मना करैत अछि। कहै छै जे अहाँक देहमे खूूून नै यऽ। चलू गाम चलू, ओतऽ निचेेेेनसँ विचारि कऽ कोनोे काज करब।
कमला- हयौ रमकाली बाबू, हम अहाँसँ सभ बेर निहौरा करै छी कि अहाँ हमरासँ एतेक बड़का पाप नै कराउ। अकर बध हम दूनू परानिये टा कऽ नै पुरे परिवारकेँ लागत। आइ बेटी बेटासँ कम छै जे अहाँ बेटा लऽ आनहर भेल छी आ हमर जानक दुश्मन बनि रहल छी।
रामेश्वर- अपन मुॅंह तूँ बंदे राख। नै तँ अतैसँ लतियाबैत गाम लऽ जेबौ। जेना अतेक साल तक मुँह सिने छँ तहिना आगुओ सिने रह। तूँ मर या जी, हमरा तकर परवाह नै अछि। जाबऽ तक तोरा देहमे जान छउ ताबऽ तक जेना जेना कहबौ करैत रह।
कमला- तँ लऽ लिअ ने हमर जान, मुक्ति मिल जैत हमरा। अहाँक मारि-गारि सँ आ अइ पाप करैसँ.............
रामेश्वर- की कहली पाप..... पाप नै करिऐ तँ की करिऐ। साले-साल बेटी जनमाबैत रहिऐ। जब हम घरसँ निकलैत छी तँ लरेग हमरा देख मुँह फेर लइए। भोरे-भोर कोइ हमरा देखै यऽ तँ कहै यऽ कि अही निपु़तराहाक दरसन करि हमर अजुका दिन खराब भऽ गेल। तूँ की बुजबिही कि अइ बदनामीकेँ लऽ कऽ हम केना तिल-तिल मरि रहल छी। चल घर चल, हम सफैया करैबला दवाइ लऽ कऽ अबै छी।
पटाक्षेप।
तेसर-दृश्य
(कमला गाड़ीसँ उतड़ि किछु दूर चलैत बेहोश भऽ गिर पड़ैत अछि।)
रामेश्वर- रमकाली माय..... रमकाली माय..... की भेल? कोइ कनी पानि दिअ।
(एक व्यक्ति एक गिलास पाइन रामेश्वरकेँ पकड़ाबैत छथि। रामेश्वर पाइन कमलाक मुँह पर छिटैत अछि। कमला भक सँ आँखि खोलैत अछि।)
कमला- कनी पियै लऽ पाइन दिअ।
(रामेश्वर पाइनक गिलास कमलाकेँ दै छथि।)
रामेश्वर- रमकाली माय, की भेल? ठीक छिऐ ने, टाइर गाड़ी मंगाबी घर पर सँ आकि रसे-रसे जएल भऽ जएत।
कमला- हम ठीक छी। उ गाड़ीमे छेलिऐ ने, तइ सँ मन घूर गेल। अहाँ चलू, हम धीरे-धीरे अबै छी।
(कमला मने-मन भगवानक स्मरण करैत कहैत छथि- हे भगवान, हमरा देहमे ई की भऽ रहल अछि जेना लगैए पुरा देह कोइ गोधना गोधै यऽ। कखनो कऽ तँ जेना पताए लगै छी। भगवान अगर हम मरि जाइऐ तँ हमर बाल-बच्चाक रक्षा करिहक।)
पटाक्षेप।
चौथा-दृश्य
रामेेश्वर- कतऽ गेलिऐ..... लिअ, ई गोली खा लिअ।
कमला- हमर बात मानू आ अइ बच्चाकेँ नै गिराउ। चारिम महिना चलि रहल छै। आबऽ दियौ जे आबैए, अपने भागे एतै। हमरा भागमे बेटा नै लिखल छै तैँ तँ नै होइ छै। हम ई दवाइ नै खएब।
रामेश्वर- (एक थप्पर कमलाक गालपर दैत कहैत अछि) से किए एहन करम छउ तोहर जे तोरा कोइखमे बेटा पनपबे नै करै छउ। कोन गै घरमे आगि लगेने छेलही से एहन वंशहीन कोइख दऽ कऽ भगवान पठेलकौ। कुलक्छिनी.... कलंकनी, कहाँ कऽ हमरे कपारमे सटल छेल। चुपचाप ई दवाइ खा ले नै तँ जबरदस्तीयो खुऐल होइ छै हमरा, बुझलिही कि नै।
कमला- ठीक छै, अहाँक मर्जीक खिलाफ आइ तक एको गो काज नै केलौं आ आइयो नै करब, अहाँ जे चाहै छी हम वएह करब। हम दवाइ खाइ छी, आगू राम राखए।
(कमला दवाइ खाइ यऽ आ रामेश्वर पएर झमाड़ैत ओतऽ सँ चलि जाइ यऽ।)
पटाक्षेप।
अंतिम-दृश्य
(गामक सरकारी अस्पतालमे अधमरा अवस्थामे कमला खुन सँ लतपत पड़ल अछि।)
नर्स- डॉक्टर साहेब, की करिऐ? कारनी कऽ हालत बहुत सिरियस भेल जाइ यऽ। खून बन्दे नै भऽ रहल अछि। देहक आधासँ बेसी खून निकलि गैलै, की करबै?
डॉक्टर- हम अहाँ की करि सकै छिऐ। हम तँ बस प्रयास करबै जे कि राइतेसँ कऽ रहल छिऐ। इंसान जे जेना करै छै, तहिना पबै छै।
(10 सालक रमकाली कनैत डॉक्टर लग अबै अछि। डॉक्टर साहेब देखियौ ने, माय कऽ की भेलैए। साँसो नै लै छै।)
(डॉक्टर साहेब दौड़ कऽ कमला लग जाइ छथि जतऽ रामेश्वर कमलाक माथा अपना कोरामे लऽ कऽ विलाप करै छथि।)
डॉक्टर- चुप रहू, अतऽ एना कननाइ बंद करू, सबहक जड़ि अहाँ छी। आब अइ लोरसँ हमदर्दी देखबै छी।
(डॉक्टर कमलाक नारी देखैए आ आलासँ सेहो जाँच करैए।)
रामेश्वर- की भेलै डॉक्टर साहेब, किए ई एना लारू-बातू भऽ गेलैए।
डॉक्टर- अकरा मुक्ति मिल गेलैए। अहाँक अत्याचारसँ। आब ई अइ पापक नगरीकेँ छोड़ि चलि देलखिन। लऽ जाउ अकरा आ पुछबै कि अहाँक बेटा देने बिना ई किए दुनियाँ छोड़ि देलक। अहाँक मर्जी बिना किए आँखि बंद कऽ लेलक। जाउ आ पुछियौ। अकरा देहसँ निकलल अइ खुनक रेतसँ। अहाँ हत्यारा छी। बेटाक लालचमे घरवालीकेँ मारि देलौं। अहाँकेँ तँ मौतो नसीब नै हएत।
रामेश्वर- हँ डॉक्टर, हम कातिल छी। अपन खुशीकेँ...अपन जीवन संगनीकेँ...अइ बच्चा सबहक ममताकेँ।
डॉक्टर- आखिर कहिया तक अहाँ सब अनहार घरमे बैठल रहब। अइ अनहार घरसँ निकलू, देखियौ बाहर कतेक प्रकाश छै। हमरो बेटा नै छै, दू टा बेटी छै जे हमरा लऽ बेटा समान छै। फेर अहाँ किए बेटा खातिर अतेक भुखौइल छी।
रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, ई समाजक लोग हमरा निपुत्र कहि-कहि कऽ हमर जिनैइ दुर्लभ करि देलक आ बेटा पाबै कऽ भूख अओर बढ़ा देलक। हम नै बुझलौं जे अकर अंत ई हएत।
डॉक्टर- बेटा आ बेटी कोनो स्त्रीक भाग पर नै बल्कि पुरूष पर निर्भर करै छै। अइमे स्त्रीकेँ कोनो दोष नै छै। आइ देखियौ, एहन कोनो क्षेत्र नै छै जतऽ बेटी बेटाक बराबरीमे खरा नै छै, फेर ई भेद भाव किए? बेटी होय या बेटा, आखिर दुनू तँ अहींक अंश अहींक संतान छी।
रामेश्वर- डॉक्टर साहेब, हमर तँ दुनियाँ उजड़ि गेल मुदा हम अन्हार सँ आब इजोतमे आबि गेलौं। हम अपन चारू बेटीकेँ खूब पढ़ैब-लिखैब आ बेटा सँ उच्च दर्जा देब। आब यएह हमर चौस कंधा छी।
पटाक्षेप।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
गजेन्द्र ठाकुर
नाटक- गंगा ब्रिज
कल्लोल एक
दृश्य १
स्टेजक एक कात किछु मजदूर सभ खट-खुट कऽ गिट्टी पजेबा तोड़ि रहल छथि लगैए जे गंगापुलक मरोम्मति भऽ रहल अछि, कारण किछु मजदूर जय माँ गंगे कहि मंचक नीचाँ प्रणाम सेहो कऽ रहल छथि। स्टेजक दोसर कात दूटा लोक नीचाँ राखल नगाड़ा-ढोलपर चोट दऽ रहल अछि। तखने एकटा ढोलहो देनहारक प्रवेश।
ढोलहो देनहार : गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि।
एकटा लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि मजदूर सभकेँ अकानैत ढोलहो देनहार लग अबैए , मुदा दोसर लोक आस्ते आस्ते डंका बजबिते रहैत अछि): देखै छिऐ जे काज तँ चलिये रहल छै, तखन फेर?
ढोलहो देनहार: एतबे मजदूरसँ काज नै चलतै। पूरा पुल हिल रहल छै। (ढोलहो दैत) सुनै जाउ, सुनै जाउ।… गंगा ब्रिज। पवित्र गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि।
दोसर लोक (डंका बजेनाइ छोड़ि कऽ ढोलहो देनहार लग अबैए): एतबे दिनमे कोना ई हाल भऽ गेलै। सुनै छिऐ जतेक पाया ऐ पुलमे छै ततेक कए करोड़ टाका एकरा बनबैमे खर्च भेल रहै।
ढोलहो देनहार:काज ढंगसँ नै भेल रहै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ।
एकटा लोक: देखै छिऐ, जहिया बनिये रहल छलै, बनि कऽ तैयारो नै भेल रहै, तहियेसँ ऐ पुलक मरोम्मति शुरू छै।
दोसर लोक: चिप्पीपर चिप्पी पड़ि रहल छै। उद्घाटनसँ पहिनहिये सँ चिप्पी पड़नाइ शुरू भऽ गेल रहै।
ढोलहो देनहार: सरकारी पुल छिऐ, चिप्पी नै पड़तै तँ इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा कोना एतै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...।
एकटा लोक: हौ ढोलहोबला, से तँ बुझलिऐ, मुदा से ने कहऽ जे दुनियाँ मे आनो ठाम पुल बनै छै, से ओतुक्का इन्जीनियर आ ठिकेदारक घरपर छज्जा पड़ै छै आकि नै हौ।
ढोलहो देनहार: किजा ने गेलिऐ, मुदा सुनै छिऐ अंग्रेजबला पुल मजगूत होइ छलै। सुनै जाउ, सुनै जाउ...।
दोसर लोक: हौ, अनेरक पाइ आबै छलै लूटिक तँ जे एकाध टा पुल अंग्रेज बनेलकै से मजगूते ने हेतै हौ।
एकटा लोक:ई इन्जीनियर आ ठिकेदार सभ लूटिमे अंग्रेजसँ कम नै छै, मुदा पुल मजगूत किए नै बनबै छै हौ। ओइ बनबैमे अंग्रेज सन किए नै छै हौ।
दोसर लोक: मजगूत बना देतै तँ फेर मरोम्मतिक ठेका कोना भेटतै हौ। की हौ ढोलहोबला..
ढोलहो देनहार: किजा ने गेलिऐ। सुनै जाउ, सुनै जाउ...। गंगापर बनल ऐ पुलक मरोम्मति लेल मजदूर चाही। स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभ कियो आवेदन दऽ सकै छथि। सुनै जाउ, सुनै जाउ।
(ढोलहो बला चलि जाइए। पाछाँसँ दू-दूटा तिरंगा झण्डा लेने बच्चा सभ अबैए। संगमे दूटा शिक्षक छै। एकटा शिक्षक (वा शिक्षिका) आगाँ-आगाँ आ एकटा शिक्षक (वा शिक्षिका) पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छथि। सभ मजदूरकेँ एक-एकटा झण्डा दऽ देल जाइ छै। “ओइ दुनू टा लोककेँ सेहो एक-एकटा झण्डा देल जाए”- ई गप शिक्षक इशारामे कहै छथि, मुदा झण्डा घटि गेलै, से ओ दुनू खाली हाथ रहि जाइ छथि आ सभक मुँह ताकऽ लगै छथि।
मजदूरक सोझाँ ओ दुनू लोक ठाढ़ भऽ जाइए आ फेर डंके लग आबि ठाढ़ भऽ जाइए आ आश्चर्यसँ देखऽ लगैए।
त्रिवार्णिक झण्डा लऽ कऽ बाकी सभ गोटे मंचपर छितरा जाइ छथि आ स्टेजपर ठाढ़ भऽ जाइ छथि। उल्लासक वातावरण सगरे पसरल अछि, दुनू लोककेँ छोड़ि सभक मुँहपर (मजदूर सभक सेहो) हँसी-प्रसन्नता आबि जाइ छै।
जखन सभ ठाढ़ भऽ जाइ छथि तखन दुनू शिक्षक (वा शिक्षिका) बच्चा सभक आगाँ आ दर्शक सभक सोझाँ ठाढ़ भऽ जाइ छथि।
“१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि।
शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बौआ-बुच्ची। आइ ई त्रिवार्णिक झण्डा हमरा सभक हाथमे फहरा रहल अछि। पहिने हम सभ दोसराक अधीन छलौं, पराधीन छलौं, ई झण्डा झुकल छल, फहरा नै सकै छलौं। झण्डा फहराइत रहए ओइ लेल हमरा सभकेँ जोर लगाबैत रहऽ पड़त। (चारू दिस हाथ पसारैत) ऐ इलाकामे आब खुशी पसरत। जमीन्दारक राज खतम भऽ गेल। सभ कियो पढ़ि सकै छथि। झगड़ा-झाँटी, युद्ध, आब सभ खतम भऽ गेल। हमरा सभक जीवनमे एकटा नवका भोर आएल अछि। नवका शिक्षा, नवका खेतीक चलनि हएत।
शिक्षक (वा शिक्षिका) २: बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत। बड़का-बड़का बान्ह ओइ धारकेँ बान्हि-छेक कऽ सञ्जत कऽ देत। खूब उपजत खेत, बर्खा बरखत इन्द्रक नै हमरा सभक प्रतापसँ। खेते-खेत बहत धार, हएत पटौनी। छोट-पैघक भेद मेटा जाएत।
शिक्षक (वा शिक्षिका) १: छोट-पैघक भेद मेटा जाएत? बड़का चिमनीक धुँआ आ बड़का-बड़का बान्ह छोट-पैघक भेद मेटाएत?
शिक्षक (वा शिक्षिका) २: हँ। पटौनी हएत खेते-खेत। बिलैंतसँ आबैबला सभ समान आब एतै चिमनीबला फैक्ट्रीमे तैयार हएत।
शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का बान्ह आ बड़का फैक्ट्रीसँ ढेर रास समस्या सेहो आबै छै। ओकर निदान जरूरी छै। विकास एकभग्गो भऽ जाएत।
शिक्षक (वा शिक्षिका) २: विकास एकभग्गू कोना हएत?
शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बड़का फैक्ट्री सभ ठाम नै लागि सकत, कतौ-कतौ लागत, ओतऽ बोनिहारक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह बनलासँ ओकर भीतरक गामसँ सेहो लोकक पड़ैन हएत। बड़का बान्ह जँ मजगूत नै हएत तँ ओ टूटत आ प्रलय आएत। बड़का फैक्ट्री आ बड़का बान्ह लोकक जिनगीकेँ छहोछित कऽ देत।
शिक्षक (वा शिक्षिका) २:एक पीढ़ीकेँ तँ बलिदान देबैए पड़त। बच्चा सभ, बाजै जाउ। अहाँ सभ देश लेल अपनाकेँ समर्पण करब आकि नै।
शिक्षक (वा शिक्षिका) १: बच्चा सभ, बाजै जाउ, अहाँ सभ की बनऽ चाहै छी। समाजकेँ की देबऽ चाहै छी।
बच्चा १: हम इन्जीनियर बनब आ सड़क, पुल, नहर बनाएब। जइसँ लोकक दुःख दूर हेतै।
बच्चा २: हमहूँ इन्जीनियर बनब। बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनीक धुँआ। धुँआ सुंघैमे हमरा बड्ड नीक लागैए। कतेक नीक दिन आएत, बड़का-बड़का बान्ह, बड़का-बड़का चिमनी देश भरिमे पसरि जाएत।
बच्चा १: मुदा धुँआसँ खोँखी होइ छै। हमर माए खोँखी करैत रहैए। हमरा धुँआसँ परहेज अछि।
बच्चा २:मुदा हमर माए तँ भनसाघर जाइतो नै अछि। मुदा हम जाइ छी, चोरा-नुका कऽ, आ धुँआक गंध, बड़का देवार, ई सभ हमरा बड्ड नीक लगैए।
शिक्षिका २: नीकगप। मुदा विकास केहन हुअए, ई सभ हमरा सभक हाथमे नै अछि। पटना आ दिल्लीमे ई निर्णय हएत जे हमरा सभ लेल केहन विकास हेबाक चाही।
शिक्षिका १: नीकगप, नीक गप जे हमरा सभक विकास लेल पटना आ दिल्लीमे सोचल जा रहल अछि। मुदा ओतऽ बैसि कऽ वा एकाध दिनक हलतलबीमे कएल दौड़ासँ ओ सभ उचित निर्णय लऽ सकता? जे से, मुदा हम सभ समाज लेल काज करी, से सतत ध्यान रहए। पूरा इमानदारीसँ, जान जी लगा कऽ ऐ देशक इतिहास हमरा सभकेँ बनेबाक अछि, से ध्यान रहए। आइ १५ अगस्त १९४७ केँ हम ई प्रण ली, वचन दी।
सभ बच्चा: हम सभ वचन दै छी, हम सभ पूरा इमानदारीसँ जान जी लगा कऽ ऐ देशक नव इतिहास लिखब।
(“१५ अगस्त” ई नारा दुनू शिक्षक बाजै छथि आ “स्वतंत्रता दिवस” ई सभ मिलि कऽ (दुनू लोक केँ छोड़ि कऽ) बाजै छथि। बच्चा आ शिक्षक सभ मजदूर सभसँ झण्डा आपस लऽ लै छथि। मजदूर सभ फेर बैसि कऽ ठक-ठुक करऽ लगैए। दुनू लोक ओतै हतप्रभ ठाढ़ रहैए। फेर पर्दाक पाछाँ कोनमे देखऽ लगैए जेना ककरो एबाक प्रतीक्षा कऽ रहल हुअए। तखने दुनू हरबड़ा कऽ जाइए आ एकटा कुर्सी आनि कऽ राखैए। एकटा ४०-४५ बर्खक अभियन्ता मंचपर अबैए। अभियन्ता कनेक हाँफि रहल अछि, कुर्सी देखिते ओ धबसँ ओइ कुर्सीपर बैसि जाइए। फेर साँस स्थिर कऽ ठाढ़ होइए। ठक-ठुक बन्द भऽ जाइ छै आ मजदूर सभ फ्रीज भऽ जाइए, ओ दुनू लोक कोन दिस दंका लग चलि जाइए आ फ्रीज भऽ जाइए। अभियन्ता बाजऽ लगैए।)
अभियन्ता: (कुर्सीकेँ झमाड़ैत) एना। एना हिलि रहल अछि ई, ई गंगा ब्रिज। सीमेन्ट, बालु, गिट्टीक कंक्रीटसँ बनल ई पुल कठपुलासँ बेशी हिलैए। जहिया आबै छी, मरोम्मतियेक काज चलैत रहै छै। वन-वे, एक दिस; एक्के दिसुका मात्र भऽ कऽ रहि गेल अछि ई। एक्के दिस पुल खुजल छै, दोसर दिस कोना चलत, अदहा पुलपर मरोम्मतिक काज भऽ रहल अछि। (तखने ओ आभासी रूपमे हिलऽ लगैए आ ओकर बाजब थरथरा उठै छै।) ई पुल तँ एत्ते हिलि रहल अछि जत्ते गामक कठपुलो नै हिलैए।
(तखने एकटा ठिकेदार अबैए।)
ठिकेदार (अभियन्तासँ): हइ इन्जीनियर। तोहूँ वएह कऽ वएह रहि गेलेँ। बालुकेँ एना कऽ चालनिसँ चालू, ओना कऽ चालू, जेना ओ चाउर दालि हुअए मुदा हम सेहो चाललौं। ठीक छै ठीक छै। तूँ कहै छलेँ जे रोटी बनेबा लेल जेना चालै छी तहिना पुल बनेबा लेल चालू, तखने नीक रोटी सन नीक पुल बनत। ठीक छै ठीक छै। फेर एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, एतेक.. हम कहने रही जे हम तोहर सभ गप मानब, मुदा तखन नेता, दोसर इन्जीनियर, गुण्डा, एकरा सभकेँ कमीशन कतऽ सँ देबै? तोरा कहलासँ बालु चालऽ लगलौं आ कमीशन बन्द कऽ देलिऐ। हमर तँ किछु नै भेल मुदा तोहर बदली भऽ गेलौ, तोहर दरमाहा बन्न भऽ गेलौ। बच्चा सभक नाम स्कूलसँ कटाबऽ पड़लौ, गाम पठाबऽ पड़लौ बच्चा सभकेँ। हम कहने रहियौ तोरा, जे बालु चालब, एतेक सीमेन्ट, एतेक बालु, सभ निअमसँ देबै। हमरा की? इलाकाक पुल, सड़क… जतेक मजगूत रहतै ततेक ने नीक। हमरो लेल नीके। मुदा हमरा बूझल छल जे तोहर बदली भऽ जेतौ। चीफ इन्जीनियर, नेताक दहिना हाथ.. पहिने हमरे कहने रहए तोरा रोलरक नीचाँमे पिचड़ा कऽ दैले.. बइमान चीफ इन्जीनियर। देख, पहिने हमरो होइ छल जे तोहूँ ओकरे सभ जेकाँ छेँ, अपन रेट बढ़ाबैले ई सभ कऽ रहल छेँ। मुदा बादमे हम देखलौं जे नै, तूँ अलग छेँ। मुदा हम की करू? हम अपन बच्चाक नाम स्कूलसँ नै कटबा सकै छी। मुदा जौँ तोरा सन चीफ इन्जीनियर आबि जाए.... कहियो से दिन आबए... तखन हम फेरसँ बालु चालब शुरू करब आ वएह चालल बालु, एत्ते बालु एत्ते सीमेन्टमे मिलाएब। एत्ते बालु, एत्ते सीमेन्ट, सभटा ओहिना जेना अहाँ तूँ कहै छलेँ। मुदा जखन तोरा सन कियो आबए तखने किने। ताधरि तँ...
(अभियन्ता आ ठिकेदारक प्रस्थान। लागल जेना फ्रीज लोककेँ अभियन्ता आ ठिकेदारक गपक विषयमे बुझल नै भेलै जेना ई सभ आभाषी छल। दुनूटा लोक फ्रीज स्थितिसँ घुरि असथिरसँ डंका बजबऽ लगैए आ तखन मजदूर सभ सेहो फ्रीज स्थितिसँ आपस आबि जाइए आ फेरसँ ठकठुक करऽ लगैए। दुनू लोक डंकाक अबाज आस्ते-आस्ते तेज करऽ लगैए आ फेर ठक-ठुकक अबाज मद्धिम पड़ि जाइए आ डंकाक अबाजक संग पर्दा खसैए।)
कल्लोल २
दृश्य १
(इन्जीनियरिंग कॉलेजक दीक्षान्त समारोह, विद्यार्थी सभ ठाढ़ अछि आ शिक्षक (बा शिक्षिका) भाषण दऽ रहल छथि। अभियन्ता सेहो विद्यार्थी सभ मध्य ठाढ़ अछि।)
शिक्षक/ शिक्षिका १: अहाँ सभक आइ ऐ इन्जीनियरिंग कॉलेजमे अंतिम दिन अछि। एतुक्का जीवन आ असल जीवनमे बड्ड अन्तर छै। आब अहाँ सभकेँ धूरा-गर्दामे जेबाक अछि। काज करबाक अछि। मोन लगा कऽ काज करबाक अछि। एतेक काज करबाक अछि जे ई खेत सोना उपजाबऽ लागए। लोकक जीवनमे समृद्धि आबि जाए। दिन-राति नै देखबाक अछि। यएह हमर गुरुदक्षिणा हएत। ऐ दीक्षान्त समारोहमे अहाँ सभसँ हम यएह आग्रह करै छी।
हमर देश, हमर लोक बड्ड मुश्किलसँ स्वतंत्र भेल अछि। मुदा ई स्वतंत्रता मानसिक रूपसँ आबि जाए तखन ने। आर्थिक रूपसँ हम दोसरासँ स्वतंत्र भऽ जाइ, ककरो आगाँ हाथ नै पसारऽ पड़ए, बजबाक स्वतंत्रता तखने आबि सकत। अभियन्ता माने बनेनहार, सर्जक। सड़क बनेनहार, नहर बनेनहार, पुला बनेनहार। अभियन्ता माने जोड़ैबला। ई पुल लोककेँ लोकसँ जोड़त। सड़क सभ बनत। लोकक जीवनमे गति आएत, दौगत जिनगी। नहरि, पोखरिसँ भरल इलाकामे सोना उपजत।
(विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि।)
शिक्षक/ शिक्षिका २:अहाँ सभकेँ बड़का-बड़का काज करबाक अछि। बड़का-बड़का बान्ह बनेबाक अछि। ओहीसँ विकास हेतै, ओहीसँ तेजीसँ विकास हेतै। सगरे विश्वमे अही तरहेँ विकास भेल छै। भारतकेँ स्वतंत्रता भेटल छै, आ ई स्वतंत्रता तखने काएम रहि सकत जखन तेजीसँ विकास हएत। आ तेजीसँ विकास हएत बड़का-बड़का फैक्ट्री आ बड़का-बड़का बान्हसँ।
शिक्षक/ शिक्षिका १: ओना तँ हमरा विकासक ओइ बड़का पथसँ मतभिन्नता अछि, कारण बड़का फैक्ट्रीमे हमर लोक मजदूरे बनि कऽ ने रहि जाए, बड़का मजगूत पक्का बान्ह बनबैमे जतेक पाइ चाही तत्ते ऐ देश लग छैहो नै, तखन बड़का कच्ची बान्ह कतेक गामकेँ अपन पेटमे लेतै, ओतेक मजगूत नै रहतै, टुटैत भंगैत रहतै, सदिखन ओकर मरोम्मतिये होइत रहतै।
शिक्षक/ शिक्षिका २: मुदा मुजफ्फरपुरक ऐ दीक्षान्त समारोहमे विकासक पथक दिशा नै तय कएल जा सकैए। ओ तँ दिल्ली आ पटनेमे तय हएत। आब…(जोरसँ बजैत) ऐ दीक्षान्त समारोहमे सभसँ बेशी नम्बर लऽ कऽ पास केनिहार छात्रकेँ हम बजबऽ चाहै छियन्हि।
(अभियन्ताकेँ हाथक इशारासँ बजबैए आ मेडल पहिराबैए)।
(विद्यार्थी सभक करतल ध्वनि। शिक्षक/ शिक्षिकाक प्रस्थान।)
अभियन्ताक मित्र: दोस। अभियंत्रणक पढ़ाइमे तँ तूँ बाजी मारि गेल छेँ। आब असल जिनगी शुरू हएत। देखी ओतऽ के बाजी मारैए।
अभियन्ता: कोनो अभियन्ताक जीत छै जे ओकर बनाएल पुल कतेक मजगूत छै, ओकर बनाएल नहरि आ बान्ह पानिक निकासीमे बाधा तँ नै दै छै। ओ लोकक जिनगी सुखी बना पाबैए आकि नै। काज समयसँ पूर्ण होइ छै आकि नै।
अभियन्ताक मित्र: बड़का काजमे कने-मने गलती तँ होइते रहै छै। जे कहीं भाइ, हमरा तँ बड़का छहर, बड़का फैक्ट्री, बड़का चिमनी बड्ड नीक लगैए। धुँआक सुगन्ध तँ हमरा बच्चेसँ नीक लगैए, तोरा तँ बुझले छौ।
अभियन्ता:आ हमर माएकेँ धुँआसँ खोँखी होइ छै, हमरा धुँआ नीक नै लगैए। तोरा तँ बुझले छौ।
अभियन्ताक मित्र:देख भाइ, हमरा आ तोरामे की अन्तर अछि। हम तँ ओइ पथपर आगाँ बढ़ि जाएब जे दिल्ली बा पटना हमरा लेल निर्धारित करत। मजगूत बड़का पक्का बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै, कमजोर बड़का कच्चा बान्ह बनाबैले कहत तँ से बनेबै। जे उपरका हाकिम कहत से करबै।
अभियन्ता: चाहे ओ नीक हुअए बा खराप।
अभियन्ताक मित्र: ऊपरमे बैसल छै तँ कोनो गुण छै तेँ नै बैसल छै। आ गुणी लोक अधला गप किए कहतै?
अभियन्ता:तखन एतऽ पढ़ि कऽ, ज्ञान अर्जित कऽ कऽ की फाएदा?
अभियन्ताक मित्र:छोड़ भाइ।आइ खुशीक मौका छै, आइ तूँ जीतल छेँ तेँ आइ तोरे गप सही, मुदा आइये धरि।
जारी...
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
पूनम मण्डल-१.दाग (उपन्यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण २."सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे ३.समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस
१
दाग (उपन्यास) : गौरीनाथ- लोकार्पण
बहुत दिन भेल, एक्कैस वर्ष, मातृभाषाक प्रति अनुरागक एक टा विशेष क्षण मे मैथिली मे लिखबाक लेल उन्मुख भेल रही—1991 मे— एहि एक्कैस वर्ष मे लगभग दू गोट कथा-संग्रह जोगर कथा आ दू गोट वैचारिक (आलोचनात्मक, संस्मरणात्मक आ विवरणात्मक) पुस्तक जोगर लेख यत्र-तत्र प्रकाशित आ छिडि़आयल रहितो ओकरा सभ केँ पुस्तकाकार संग्रहित करबाक साहस एखन धरि नइँ भेल। ई प्राय: अनके कारणेँ, जकर चर्चा बहुत आवश्यक नइँ। मुदा, ई उपन्यास एहि लेल पुस्तकाकार अपने सभक समक्ष प्रस्तुत क’ रहल छी जे एकरा पत्र-पत्रिका द्वारा प्रस्तुत करबाक सुविधा हमरा लेल नइँ छल। मुदा हमरा लग ई विश्वास छल जे मैथिलीक ओ पाठक वर्ग पढ़’ चाहताह जे प्राय: तेरह वर्ष सँ 'अंतिका’ पढ़ैत आयल छथि। मैथिली पत्रकारिताक दीर्घकालीन ओहि इतिहास—जे मैथिली पत्रिका पाठकविहीन आ घाटा मे बहराइत अछि—केँ फूसि साबित करैत जे पाठक वर्ग 'अंतिका’ केँ निरंतर 'घाटारहित’ बनौने रहलाह हुनक स्नेह पर हमरा आइयो विश्वास अछि। निश्चये ओ पाठक वर्ग हमर उपन्यास सेहो कीनिक’ पढ़ताह आ हमर पुरना विश्वास केँ आरो दृढ़ करताह।
—लेखक
Price : 150.00 INR
स्त्री आ शूद्र दुनू केँ हीन आ मर्दनीय मान’वला कुसंस्कृतिक अवसानक कथा जे अपन तथाकथित 'ब्रह्मïशक्ति’क छद्ïम अहंकार मे परिवर्तनक ईजोत देखिए ने पबै यए...जखन देख’ पड़ै छै तँ पाखंडक कील-कवच ओढि़ लै यए, अहुछिया कटै यए, घिनाइ यए आ अंतत: एक टा 'दाग’ मे बदलै यए जे कुसंस्कृतिक स्मृति शेषक संग परिवर्तनक संवाहक, स्त्री आ शूद्रक, संघर्ष-प्रतीक सेहो अछि।
उपन्यास पठनीय अछि, विचारोत्तेजक अछि आ मैथिली मे बेछप।
—कुणाल
गौरीनाथ मैथिलीक चर्चित आ मानल कथाकार छथि। पठनीयता आ रोचकता हिनकर गद्य मे बेस देखाइत अछि। माँजल हाथेँ ओ ई उपन्यास लिखलनि अछि। गौरीनाथ मैथिली साहित्यक आँगुर पर गनाइ वला लेखक मे छथि जे जाति-विमर्श केँ अपन विषय वस्तु बनौलनि। आन भारतीय भाषा मे साहित्यक जे लोकतांत्रिकीकरण भेल, तकर सरि भ’क’ हेबाक मैथिली एखनो प्रतीक्षे क’ रहल अछि। ई उपन्यास मैथिली साहित्यक लोकतांत्रिकीकरण लेल कयल एक टा सार्थक आ सशक्त प्रयास अछि।
'दाग’ अनेक अंतद्वंद्व सबहक बीच सँ टपैत अछि विश्वसनीयता, रोचकता आ लेखकीय ईमानदारीक तीन टा तानल तार पर एक टा समधानल नट जकाँ। एत’ सामंतवाद आ ब्राह्मणवादक मिझेबा सँ पहिनेक दीप सनहक तेज भ’ जायब देखाइत अछि। धुरखुर नोचैत नपुंसक तामस आ वायवीय जाति दंभ अछि। नवतुरियाक आर्थिक कारणेँ जाति कट्टरताक तेजब सेहो। दलित विमर्श अछि, ओकर पड़ताल सेहो। दलितक ब्राह्मणीकरण नहि भ’ जाय, तकरो चिंता अछि। दलित विमर्शक मनुष्यतावाद आ स्त्रीवादक नजरिञे पड़ताल सेहो।
आकार मे बेसी पैघ नहियो रहैत एहि मे क्लासिक सब सनहक विस्तार अछि अनेक रोचक पात्रक गाथाक बखान संग। आजुक मैथिल गाम जेना जीवंतता सँ एहि उपन्यासक पात्र बनि केँ सोझाँ अबैत अछि, से अनायासे फणीश्वरनाथ रेणु केँ मन पाडि़ दैत अछि। गामक नवजुबक सबहक दल यात्रीक नवतुरियाक योग्य वंशज अछि।
जँ आजुक मिथिला, ओकर दशा-दिशा आ संगहि ओत’ होइत सामाजिक परिवर्तन रूपी अमृत मंथनक खाँटी बखान चाही, तँ 'दाग’ केँ पढ़ू।
एहि रोचक आ अत्यंत पठनीय उपन्यासक व्यापक पाठक समाज द्वारा समुचित स्वागत हैत आ गाम-देहात सँ ल’क’ नगर परोपट्टा मे एहि पर चर्चा हैत, एहेन हमरा पूर्ण विश्वास अछि।
—विद्यानन्द झा
स्त्री आ दलित एहि दुनू विमर्श केँ एक संग समेट’वला उपन्यास हमरा जनतब मे मैथिली मे नहि लिखल गेल अछि। ई उपन्यास एहि रिक्ति केँ भरैत भविष्यक लेखन लेल प्रस्थान-विन्दु सेहो तैयार करैत अछि।
'दाग’ अपन कैनवास मे यात्रीक 'नवतुरिया’ आ ललितक 'पृथ्वीपुत्र’क संवेदना केँ सेहो विस्तार प्रदान करैत अछि। ताहि अर्थ मे ई मैथिली उपन्यास परंपराक एक टा महत्त्वपूर्ण कड़ी साबित हैत। 'नवतुरिया’क 'बम-पार्टी’क विकास-यात्रा केँ 'गतिशील युवा मंच’ मे देखल जा सकैत अछि। जाति, धर्म, लिंग आदि सीमाक अतिक्रमण करैत मनुष्य ओ मनुष्यताक पक्ष मे लेखकीय प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक सुभद्रा सनक पात्रक निर्माण जे अपन दृष्टि सँ जातीय-विमर्श सँ आगाँक बाट खोजैत अछि, 'पहिने मनुष्य बचतै तखन ने प्रेम!’
अभिनव कथ्य आ शिल्पक संग मिथिलाक नव बयार केँ थाह’वला उपन्यास थिक 'दाग’।
—श्रीधरम
उसार-पुसार
ई उपन्यास हम लगभग दस वर्ष पहिने लिखब शुरू कयने रही। 2003 मे। एक्कैसम शताब्दीक नव गाम मे तखन धरि जे किछु थोड़ेक सामाजिकता बचल छल, एहि बीच सेहो खत्म जकाँ भ’ गेल। खगल केँ के देखै यए, हारी-बीमारी धरि मे तकैवला नइँ! अहाँक नीक जरूर दोसर केँ अनसोहाँत लगै छै। लोभ-लिप्साक पहाड़ समस्त सम्बन्ध आ हार्दिकता केँ धंधा आ नफा-नुकसान सँ जोडि़ देलक अछि।...गाम सँ बाहर रह’वला भाइ-भातिज केँ बेदखल करबाक यत्न बढ़ल अछि। खेती-किसानीक जगह व्यापार आ बाहरी पाइ पर जोर। सुखितगर होइते लोक शहर जकाँ आत्मकेन्द्रित भ’ रहल अछि आकि नव तरहक दबंग बनि रहल अछि, नंगटै पर उतरि रहल अछि। संगहि की ई कम दुखद जे जाति-धर्म, पाँजि-प्रतिष्ठा सनक मामिला मे एखनो; थोड़े कम सही; उग्र कोटिक सामाजिक एकता, आडम्बर आ शुद्धता देखाइते अछि?...
सवर्ण समाज दलित-अछूतक कन्या पर अदौ सँ मोहित होइत रहल आ एम्हर आबि विवाह आदिक सेहो अनेक घटना सोझाँ आयल। मुदा दलित युवकक संग गामक सिरमौर पंडितजीक कन्याक भागि जायब, घर बसायब आ ओकर स्वावलंबी हैब पागधारी लोकनि केँ नइँ अरघैत छनि तँ एकरा की कहबै?
खेतिहर समाज लेल खेती-किसानी सँ बढि़ ताग आ पाग कहिया धरि रहत से नइँ कहि सकब!...
ओना मिथिला-मैथिल-मैथिलीक मामिला मे 'पूबा-डूबा’क हस्तक्षेप पश्चिमक श्रेष्ठता-ग्रंथि केँ कहियो स्वीकार्य नइँ रहल—खासक’ शुद्धतावादी लोकनि आ पोंगा पंडित लोकनि केँ!...
निश्चये ओहेन व्यक्ति केँ मैथिल समाजक ई पाठ बेजाय लगतनि जे मनुक्ख आ मनुक्ख मे भेद करै छथि, एक केँ श्रेष्ठ आ दोसर केँ हीन बुझैत छथि!...
सिमराही-प्रतापगंज-ललितग्राम-फारबिसगंज बीचक आ कात-करोटक 'पूबा-डूबा’ गाम-घरक किछु शब्द (ककनी, कुरकुटिया, ढौहरी, दोदब आदि), किछु ध्वनि, भिन्न-भिन्न तरहक उच्चारण आ वर्तनीक विविधता कोसी-पश्चिमक किछु पाठक केँ अपरिचित भनहि लगनि, आँकड़ जकाँ प्राय: नइँ लगबाक चाहियनि किएक तँ कोसी पर नव बनल पुल चालू भ’ गेल अछि...जाति मे भागनि आकि अजाति मे, बेटी-बहिन घर-घर सँ भागबे करतनि...ताग आ पाग धयले रहि जयतनि!...नव-नव बाट आ पुल आकर्षक होइत छै! से जनै अछि छान-पगहा तोड़बा लेल आकुल-व्याकुल नव तुरक मैथिल कन्या! हँ, पंडिजी बुझैतो तकरा स्वीकार’ नइँ चाहैत छथि।
उपन्यासक अन्तिम पाँति पूरा क’ हम विश्रामक मुद्रा मे रही...कि पंडीजी, माने पंडित भवनाथ मिश्र, आबि गेलाह। पुछलियनि—पंडित कका, अंकुरक प्रश्नक उत्तर के देत? कहू, ओकर कोन अपराध?... पंडित कका किछु ने बजलाह, बौक बनि गेलाह!...मुदा हुनका आँखि मे अनेक तरहक मिश्रित क्रोध छलनि! ओ पहिने जकाँ दुर्वासा नइँ भ’ पाबि रहल छलाह, मुदा भाव छलनि—खचड़ै करै छह! हमरा नाँगट क’क’ राखि देलह आ आबो पुछै छह...जाह, तोरा कहियो चैन सँ नइँ रहि हेतह!...
अंकुरक छाती पर जे दाग अछि, तेहन-तेहन अनेक दाग सँ एहि लेखकक गत्र-गत्र दागबाक आकांक्षी पंडित समाज आ विज्ञ आलोचक लोकनि लग निश्चये अंकुरक सवालक कोनो उत्तर नइँ हेतनि। सुभद्राक तामस आ ओकर नजरिक दापक दाग सेहो हुनका लोकनिक आत्मा पर साइत नहिए बुझाइत हेतनि!... मुदा सुधी पाठक, दलित समाज सँ आगाँ आबि रहल नवयुवक लोकनि आ स्त्रीगण लोकनिक नव पीढ़ी जरूर एकर उत्तर तकबाक प्रयास करत, से हमरा विश्वास अछि।
—गौरीनाथ 01 सितम्बर, 2012
२
"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे
-"सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ शनि दिन सन्ध्याकेँ केँ दरभंगामे
-आयोजक छथि श्री अरविन्द ठाकुर
--"सगर राति दीप जरय"क पहिल चरणमे बहुत रास घुसपैठिया घुसि गेल रहथि आ ई अपन मूल उद्देश्यसँ दूर भऽ गेल छल।
-लोक भरि राति सुतैत रहथि, जातिवादिताक स्वर सोझाँ आबि गेल छल, लॉबी बना कऽ होइत समीक्षा आ ब्राह्मणवादी-आमंत्रण धरि गप पहुँचि गेल छल। साहित्य अकादेमीक हस्तक्षेपसँ मामला आर गरबड़ा गेल। ७५म सगर राति दीप जरयमे पटनामे किछु गोटे द्वारा शराब पीलापर धनाकर ठाकुर विरोध सेहो प्रकट केलन्हि। तकर बाद ओहीमेसँ किछु गोटे ऐ गोष्ठीकेँ दिल्ली लऽ गेला, मुदा विभिन्न कारणसँ आ साहित्य अकादेमीक दवाबपर मैथिली पोथी प्रदर्शनी नै लगाओल जा सकल, कारण आयोजक तकर अनुमति नै देलन्हि, ऐ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीकेँ ७६म -"सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल (ओना किछु ब्राह्मणवादी कथाकार आ घुसपैठिया लोकनि एकरा ७६म सगर राति दीप जरय कहि रहल छथि!!) । ७६म -"सगर राति दीप जरय"क आयोजन विभा रानी द्वारा चेन्नैमे भेल जतए मात्र एकटा कथाकार पहुँचला। कियो माला नै उठेलनि आ सगर राति दीप जरयक पहिल चरणक दुखद अन्त भऽ गेल।
--"सगर राति दीप जरय"केँ फेरसँ जियेबाक प्रयत्नक स्वागत कएल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय ०१ दिसम्बर २०१२ केँ "किरण जयन्ती"क अवसरपर आयोजित भऽ रहल अछि। आशा अछि जे ई नव "सगर राति दीप जरय"क दोसर फेज (चरण)क पहिल सगर राति दीप जरय पुनः अपन ओइ पथपर आगाँ बढ़त, जे प्रभास कु. चौधरी ऐ लेल सोचने छला।
३
समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/ ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस
-भारतीय भाषा महोत्सव २ नवम्बरकेँ प्रारम्भ भेल- -ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक जीवनपर आधारित "उगना रे" पर कथक नृत्यांगना शोभना नारायणक नृत्य लोककेँ मंत्रमुग्ध केलक
-समन्वय २-४ नवम्बर २०१२ इण्डिया हैबीटेट सेन्टर भारतीय भाषा महोत्सव SAMANVAY 2-4 November 2012 IHC INDIAN LANGUAGES' FESTIVAL/
- ३ नवम्बरकेँ मैथिलीमे ब्राह्मणवाद, ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापति आ मैथिलीमे प्रेमक गीतपर भेल बहस
-बहसमे भाग लेलनि उदय नारायण सिंह नचिकेता, देवशंकर नवीन, विभा रानी आ गजेन्द्र ठाकुर; आ मोडेरेटर रहथि अरविन्द दास
-आकाशवाणी दरभंगा, हिन्दी अखबार सभक दरभंगा संस्करण, सी.आइ.आइ.एल. , साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट आ अंतिका- मिथिला दर्शन, जखन-तखन केर लेखकक प्रोफाइल, विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ विद्यापति पर्व केनिहार चेतना समितिक पत्रिका घर बाहर, झारखण्ड सनेस आ जातिवादी रंगमंचक नाटकक शब्दावली आदि, ऐ सभ द्वारा मैथिली साहित्यकेँ ब्राह्मणवादी बनेबाक प्रयासक विरुद्ध गएर-ब्राह्मणवादी समानान्तर धाराक चर्च गजेन्द्र ठाकुर द्वारा भेल
-ज्योतिरीश्वर पूर्व गएर ब्राह्मण विद्यापति आ ज्योतिरीश्वरक पश्चात बला कट्टर संस्कृत-अवहट्ठ बला विद्यापतिक बीच अन्तर गजेन्द्र ठाकुर रेखांकित केलन्हि
ऐ सँ पहिने हिन्दी आ मणिपुरीक कार्यक्रम सेहो भेल।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डा.रमानन्द झा ‘रमण’