मूर्दाः श्रृंगार संघर्ष आ द्वन्द्व
ई सर्वविदित अछि — काव्येषु नाटकं रम्यम् । अर्थात काव्यमे नाटक सभसँ आनन्दप्रद अछि । एहिसँ दू टा बात अभरिकऽ हमरा लोकनिक सोझामे अबैत अछि — पहिल तँ ई जे नाटक एक प्रकारक काव्य अछि आ दोसर, ओहि काव्यमे सभसँ बेसी आनन्दप्रद । एहि दुनूमेसँ दोसर बातपर कोनो आंगुर नइ उठल अछि । एकरा ध्वनि मतसँ सभ स्वीकार कएलक अछि , मुदा पहिल बातपर आंगुर उठव शुरू भऽ गेल । सभसँ पहिने पंडित जगन्नाथ एहिपर आपत्ति उठौलन्हि । ओ कहलन्हि जँ रसव्यंजककेँ काव्य मानल जाए तँ नाटकीय अंग अभिनय आदिकेँ रसव्यंजक भेलासँ निश्चिित रूपेण एकरा काव्य कहबामे आपत्ति होयत । एहिना अलंकार चिन्तामणिक पंचम परिच्छेदमे जिनसेनाचार्य द्वारा – काव्यादौ नाटकादौ कहिकऽ अलग– अलग सत्ता स्वीकारल गेल अछि । ओेहूना जँ देखल जाए तँ काव्य काविक कर्म छियै आ नाट्य नटक । संगहि नाट्य खेल अछि जकरा देखल आ सुनल जा सकैछ । एहिमे आँखि आ कान दुनू व्यस्त रहैछ, मुदा काव्यमे काने टा । आचार्य भरत नाटक सम्बन्धमे सेहो कहने छथि व्रक्रीडनीयकममिच्छामो दृश्यं श्रव्यं च यद्भवेत । अर्थात नाटक खेल अछि, देखबाक चीज अछि आ ओ श्रव्य सेहो अछि । एतदर्थ एकरा मंचक विभिन्न प्रक्रियासँ गुजरऽ पड़ैत छैक । एहना स्थितिमे कोनो कवि वा उपन्यासकार वा कथाकार जखन एहि साहित्यिक विधासँ टपिकऽ नाट्य साहित्यक क्षेत्रमे अबैत छथि आ एकर मूल्यांकन करऽ लगैत छथि तँ ओतेक सटीक नइ भऽ पबैत छथि । लेखन आ सम्पादनसँ ल’ क’ समीक्षा धरि कतेको एहन स्थल हमरा भेटल अछि जतऽ ओ चुकल बुझना जाइत छथि । एहिसभक जँ उदाहरण देबऽ लागब तँ एकटा पोथा तैयार भऽ जाएत तथापि हम एक–आध टा उदाहरण अवश्य देबऽ चाहब । यथा—जीवन झाक नाटक ‘सुन्दर संयोग’ मे चतुर्थ अंकक पर्दा खसैत अछि । मंचपर कोनो पात्र प्रवेश नहि करैत अछि, मुदा सात–सात टा गीत नेपथ्यसँ चलैत रहैत अछि । एकर बाद रथोद्धतामे दू पाँती गबैछ, मुदा कादम्बरीक प्रवेश नहि देखाओल गेल अछि । पुनः जे नवम गीत अछि ओ नेपथ्यसँ अछि कि मंचसँ तकर उल्लेख सेहो नहि अछि । एकर मतलब जे नाट्यकारकेँ रंगमंचक जानकारीक अभाव छन्हि । एहिना मिथिला मिहिर, १३–०५–१९६२ ई. मे प्रकाशित राधाकृष्ण चौधरीक नाटक ‘राज्याभिषेक’ मे राजधर कहैत अछि – चलू, आइ संध्याकाल कोनो गाछी दिस घूमि आबी । पुनः कोष्ठमे देल गेल अछि — साँझुक पहर, तीनू गोटए गाछीमे पहुँचलाह आ देखलनि ओतऽ हाँजक— हाँज छौड़ीसभ विद्यापतिक गीत गाबि रहल अछि । ई लोकनि कातमे बैसि मजा लैत रहलाह ।’ आब साँझुक पहर, गाछीमे पहुँचब आ हाँजक–हाँज छौड़ीसभके विद्यापति गीत गबैतक जानकारी प्रेक्षककेँ कोना भेटतैक ? ने दृश्य परिवर्तन, ने चलबाक माइम, ने कोनो संवाद आ ने दृश्य निर्माण । जखन कि नाट्यकार आ संपादक जानल–मानल विद्वान छलाह । आब जँ समीक्षाक बात करी तँ ओकरा हास्यास्पद छोड़िकऽ आओर नहि किछु कहल जा सकैए । एहि बातक पुष्टिक दू–तीन वर्षक भीतर प्रकाशित किछु समीक्षासँ कएल जा सकैछ । हमरा नइ लगैए जे नाट्यकर्मक एकोरत्ती छूति हुनका लोकनिमे छन्हि ।
उपर्युक्त बात सभकेँ देखैत आब हम नाट्यकार रमेश रञ्जनपर अबैत छी । ई एकटा सफल अभिनेता रहलाह अछि । तें रंगमंचक जे तकनिक छैक ओकरा हिनका पूर्ण ज्ञान छन्हि । अतः एकर उपयोग अपना नाटकमे सफल ढंगसँ कएलनि अछि । एकर प्रमाण एहि नाटकक संवाद अछि जे अपना लयमे चलैत अछि । संगहि प्रत्येक संवादकेँ बजबामे ओष्ठकेँ सुलभताक अनुभव होइत छैक । किएक तँ संवाद छोट–छोट अछि । एकर जड़िमे हिनक अभिनेताबला गुण काज कएलक अछि । आखिर मंचपर संवाद अभिनेते बजैत छैक । तें ओ एहन संवादकेँ किन्नहुँ समावेश नहि करत जाहिमे ओष्ठ सुलभता नहि होइक ।
एतबए नहि, एकटा सफल निर्देशक सेहो रहबाक कारणेँ पात्रसभ सेहो मंचपर सक्रिय रहैछ । मंच निर्देश सेहो उचित ढंगसँ कएल गेल अछि ।
एमहर आबिकऽ किछु गोटे ‘पुरुष एक– पुरुष दू’ अथवा ‘युवक एक एक–युवती’ एक कहिकऽ जे नाटकमे पात्र रखैत छथि ताहिपर आपत्ति उठौलनि अछि । मुदा हम कहब जे एहन आपत्तिमे कोनो जान नहि अछि । आओर ई आपत्ति परोक्ष रूपसँ पाठ्य नाटकक ओकालत करैत अछि, मंचीय नाटकक नहि । किएक तँ नाटक पाठक वस्तु नहि, ओ तँ प्रेक्षकक वस्तु छियैक । आओर प्रेक्षकक हेतु नाटकमे युवक, पुरुष, स्त्री तथा युवतीक हेतु नाम दऽ देल गेल रहैत छैक । संवादमे पुरुष, स्त्री, युवक, युवती आदि कहिकऽ नहि अबैत छैक । मंचक आगाँ बैसल प्रेक्षककेँ केओ नहि कहैत छैक जे ई पुरुष एक वा दू छियैक । एहना स्थितिमे पुरुष एक वा दू पर आपत्ति उठाएब बिल्कुल असंगत लगैत अछि ।
एहि नाटकपर दुरुहताक चार्ज लगाओल गेल अछि । मुदा एहि मादे अपन विचार व्यक्त करबासँ पहिने हम प्रेक्षकक सम्बन्धमे किछु विचारणीय तथ्य दिस जाए चाहब – प्रेक्षक विभिन्न प्रकारक होइत अछि । आओर ई विभिन्नता वयस, शिक्षा, पेशा आदि पर निर्भर करैत छैक । बच्चा सभक वास्ते ओहन नाटक चाही जाहिसँ ओकर बालसुलभ जिज्ञासाक पूर्ति होइक । मुखौटा लागल पात्र आ अवस्थाक अनुकूल संवाद ओ सभ बेसी पसिन करत । तहिना निरक्षर आ अखरकट्टू प्रेक्षक ग्रामीण कलाकारद्वारा प्रस्तुत लोकनाट्यकेँ बेसी पसिन करत । किएक तँ एकरा बुझबाक लेल ओकरा बेसी मानसिक श्रम नहि करऽ पड़ैत छैक । इएह कारण अछि जे कोनो लोकनाट्यक पाछाँ निरक्षर आ अखरकट्टू जनसमुदाय ढंगरि जाइत अछि । ओहीठाम पढ़ल—लीखल लोक एहिमे नगण्येक बराबर रहैत अछि । एकरा लोकनिक हेतु ओहिसँ इतर नाटक चाही । एकटा बात आओर—देश, काल आ परिस्थिति नाटकक मीटर होइत छैक जाहिपर नाटक अपने आप बाजऽ लगैत अछि । तें जँ हमरा रेडियो नेपाल सुनबाक अछि तँ मीटरकेँ ओहिपर घुसकाकऽ आनऽ पड़त । हमरा नीक जकाँ मोन अछि जे एकटा मित्रकेँ सैमुअल बैकेटक नाटक ‘इण्ड गेम’ पढ़ऽ लेल देने रहियनि । एक मासक बाद हुनका कहलियनि जे नाटक पढ़ल भऽ गेल तँ दऽ दिय । एहिपर ओ जवाब देलनि जे ‘पढ़ल तँ नइ भेल अछि , मुदा लेब तँ लऽ लिय । कारण, हम बुझबे नइ करै छियै ।’ बैकेटक ओ नीक नाटक अछि जे द्वितीय विश्व युद्धक बाद लिखल गेल छल । एकरा हिटलरक पराजय आ वर्लिन पतनसँ जोड़ल जाए तँ सभ मिलि जएतै ।
एहिना ई नाटक ‘मुर्दा’ अछि । ओहि कालखण्डमे नेपालक शासन राजाक अधीन छलैक । यमराज एहिठाम राजाक प्रतीक अछि । चित्रगुप्त प्रधान दरबारी अछि जे राजाक छत्रछायामे विभिन्न कुकृत्य करैत अछि । देखल ने जाए—चित्रगुप्तः हँ सरकार, असलमे मृत्युभुवनकेँ स्वच्छ रखबाक दायित्व तँ हमर अछि । अपने तँ निमित्त पात्र मात्र छी ।
एहि संवादसँ ई बात साफ भऽ जाइत अछि जे मृत्युभुवन अर्थात नेपालकेँ केहन साफ करैत होएतैक । संगहि ई सफाइ ककरा नामपर होइत छैक तकरा लेल तँ निमित्त पात्र अछिए ।
एहि नाटकक केन्द्र विन्दु मुर्दा अछि जे सत्ताद्वारा बनाओल जाइत अछि । किएक तँ ओ मुर्दा मात्र पर शासन कऽ सकैत अछि, जागरुक लोकपर नहि । तें सत्ता चाहैत रहैत अछि जे सभकेँ मुर्दा बना दी । एहिव्रmममे सत्ता दू टा हथियार अपनबैत अछि – पहिल तँ ई जे ओ सुख–सुविधाक जाल फेकैत अछि । आइ — काल्हुक पूजीपतिसभ पूर्वक पूजीपतिकेँ गारि पढ़ैत छैक जे जखन बुझलकै जे मार्क्स एतेक प्रखर बुद्धिक अछि तँ ओकरा सभ सुख–सुविधा जुटाकऽ बेकार किएक ने कऽ देलक । एहि बातक चरितार्थ ई नाटक करैत अछि । देखल ने जाए—
बूढ़ा ः ओ दूर होइत गेल हमरा सभसँ आ शासनक नजदिक होइत गेल । शासन ओकरा गुड़क ढेप बुझाइक । ओ बुझऽ लागल रहय जे एहिमे सटल रहलासँ हमरा स्वर्गी आनन्द भेटत । शासनक आनन्द अर्थात स्वर्गक आनन्द लेल जीवनकेँ छोड़ि देलक ।
आब तेसर मार्ग छैक दमन । एकर आगाँ लोक मुह नहि खोलि पबैत अछि । एहि बातक पुष्टि निम्नांकित संवाद करैत अछि —
बूढ़ा ः एहि सभक बलपर अपना भीतरमे अद्भुत क्षमताक विकास कएनाइ एखन दुलर्भ छै । हवाक गतिक विरुद्ध के ठाढ़ हैत ? उफनैैत नदीक विपरीत दिशामे आगू बढ़बाक के दुस्साहस करत ? शासनक विरुद्ध स्वर निकालबाक इच्छा–शक्ति के देखाओत ?
एहि तरहें नाट्यकार दमन आ पोषण सत्ताक दूू टा आँखि मानैत छथि जे अक्षरशः सत्य अछि । देखल जाए ई संवाद —
युवक २ ः शासनक आँखिसँ दू टा रोशनी निकलै छै । एकटा जरबऽबला आ एकटा बढ़बऽबला । जे जिन्दा रहल तकरा जरौलक आ जे मुर्दा भऽ गेल ओकरा बढ़ौलक ।
एहिठाम जिन्दाक तात्पर्य ओहि व्यक्तिसँ अछि जे सत्ताक विरुद्ध किछु बजबालए तैयार होइत अछि । एहन व्यक्तिकेँ जराओल जाइत छैक अर्थात नाना प्रकारक कष्ट देल जाइत छैक । एकर विपरीत जे मौन भऽ गेल अर्थात मुर्दा भऽ गेल ओ विभिन्न तरहक सुख भोगैत अछि ।
उपर्युक्त हथकण्डा अपनौलाक बादो विद्रोहक ज्वाला फुटबे करैत छैक । आओर ओहि ज्वालामे केहनो तानाशाह भस्म भऽ जाइत अछि । एहन उदाहरणसँ इतिहास भरल पड़ल अछि । तें नाट्यकार हतोत्साह नहि होइत छथि । ओ एकटा बूढ़ पात्र गढ़ैत छथि जे समयकेँ घीचिकऽ अपना संग लऽ अनैत अछि । एहने वयक्तिपर तँ लोक विश्वास करैत अछि । एही विश्वासक प्रतिफल छैक जे पुरुष एक, दू, तीन आ चारि बूढ़ाक इर्द–गिर्द जमा भऽ जाइत अछि । ओ सभ चित्रगुप्त आ ओकर सहयोगीकेँ अपना घेरामे लऽ लैत अछि । एहना स्थितिमे यमराज सत्तासँ कोना अलग–थलग भऽ जाइत अछि तकर अनुमान सहजहिं लगाओल जा सकैछ ।
नाटकक महत्वपूर्ण श्रृंगार संघर्ष तथा द्वन्द्व अछि । ई संघर्ष तथा द्वन्द्व स्वीकृत यथार्थ आ अस्वीकृत यथार्थक बीच उत्पन्न होइत अछि । एहि स्वीकृत तथा अस्वीकृत यथार्थक संवाहक क्रमशः खलनायक तथा नायक होइत छैक । एहि दुनूक बीच घात–प्रतिघात चलैत रहैत अछि । नायक चाहैत अछि जे स्वीवृmत यथार्थक स्थानपर अस्वीकृत यथार्थकेँ स्थापित करी । अतः नायक आ खलनायकक बीच संघर्ष होइत छैक । एहन संघर्ष एहि नाटकमे भरपूर देखल जाइछ । यमराज अ चित्रगुप्त सभकेँ मुर्दा बनबऽ चाहैत अछि जकर प्रतिकार बूढ़ा करैत अछि । आ, जतऽ प्रतिकार होएतैक ओतऽ संघर्ष नहि होएबाक कोनो प्रश्ने नहि उठैत छैक ।
तहिना प्रस्तुत नाटकमे द्वन्द्व सेहो प्रचुर देखल जाइछ । नाट्यकार देखबैत छथि जे सत्ता लोककेँ मुर्दा बनबैत छैक आ से गुड़क ढेप देखाकऽ अथवा डंटा देखाकऽ । मुदा किछु लोक सोचैत अछि जे एहि दुनूक विरुद्ध ठाढ़ भेल जाए । एहना स्थितिमे युवक आ पुरुष लोकनिमे भयंकर द्वन्द्व उत्पन्न होइत छैक जे नाट्यकारक सफलताक द्योतक अछि ।
कोनो रचनाक वास्ते शीर्षक एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । किएक तँ शीर्षक कोनो रचनाक विषयमे बहुत किछु कहैत छैक एहि दृष्टिएँ प्रस्तुत नाटकक शीर्षक ‘मुर्दा’ बहुत उपयुक्त अछि । किएक तँ मुर्दाक चर्चा प्रस्तुत नाटकमे बेर–बेर आएल अछि ।
अन्तमे हम इएह कहब जे प्रबुद्ध प्रेक्षकक बीच एहि नाटकक आदर हेतै से हमरा पूर्ण विश्वास अछि । नाट्य क्षेत्रमे नाट्यकारक भविष्य उजज्वल छन्हि से हम मानैत छी ।
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जगदानन्द झा मनु, ग्राम पोस्ट- हरिपुर डीहटोल, मधुबनी
लघुकथा-
कमलू
पूष मास, जाड़ अपन चरम सीमापर । लगातार पन्द्रह दिनसँ शितलहरी । गामक एकटा टूटल- फूटल खोपड़ीक असोरा । जाड़सँ बचैक हेतु असोराकेँ बाँकी दुनूकात बोड़ाक ओहाड़ । एकटा पुरान टूटल-फूटल चौकीपर पुआरक ओछैन, ओहिपर करीब सत्तैर बरखक बेमार असहाय कमलु । माए-बाबू बड्ड सिनेहसँ ओकर नाम कमल रखने रहथि, मुदा अभाब आ गरीबीसँ संघर्ष करैत -करैत कमलसँ कमलुमे बदैल गेल ।
गरीबी आ बुढ़ापा ओहिपर बीमारीसँ सताएल जीर्ण-शीर्ण शरीर, अभाबक कारण अप्पन बएससँ दस बरखक बेसीएक लगैत । उपरसँ जाड़क एहन हाल । जाड़सँ कपैत लगातार खोंखी करैत । खाँसैत-खाँसैत कखनो बिचमे राहत भेटै छै तँ मुहसँ, कहु तँ करेजासँ दर्दक थकान संगे दुख मिलल आह ओकर मुहसँ निकलैत । ओहि आहसँ किन्चीत एक बेर पाथरो पिघैल जाए, मुदा कमलुक आह सुनै बला ओकर दर्दकेँ बुझै बला ओहिठाम कियोक नहि । नै कियो देखभाल करै बला आ नै कियो पुछै बला । मुदा कमलुक आह आ खोंखीकेँ शाइद एहि बातक ज्ञान नहि, तैँ तँ ओ रुकैक नाम नहि लए रहल छलै । खोंखी आओर बेसी असहनीय आ विभत्स्यए भेलजा रहल छलै ।।
खोंखीक वेककेँ सम्हालेमे असमर्थ, कमलु एकाएक अपन सम्पूर्ण बलकेँ एकठ्ठा करैत अपन दुनू हाथसँ छातीकेँ कैस कए दबाबैत बैस रहल, कि तहने ओकरा पानिक तलब महसुश भेलै । आ ओकर मुहसँ अनायास निकैल परलै -"पानि -पानि "
मुदा ! अभागा कमलु ! असहाय कमलु ! ओहिठाम ओकर बास्ते एक घूँट पानि दै बला कियोक नहि । इ बिचार कमलुकेँ मोनमे अबैत देरी ओकर मुहपर दर्द भरल व्यंगक एकटा मुस्की चमैक गेलै । जेना ओ अपन वाक्यपर पचता रहल हुए । अपन दर्दकेँ ठोरपर अनि दाँतसँ कटैत, लाठीक सहारा लैत चौकीक निच्चा राखाल पानिक लोटा लेबक लेल झुकल । बहुत संघर्सकेँ बाद लोटा उठाबैत जल्दी-जल्दी दू घोंट पानि अपन हलकमे उतारि लेलक । परञ्च पानि पीबैक बाद ओकरा लग एतेक बल नहि रहलै जे ओ लोटाकेँ फेरसँ नीँचा राखि सकै । लोटा ओकर हाथसँ छूति कए गुरैक गेलैक । लोटाक बचल पानि चारू कात नीच्चाँ बहि कए मानु कमलुक तकदीर आ एकाकीपर ठहाका लगाकए हँसैत होए ।
कमलु सेहो अपने खाली लोटा जकाँ चौकीपर पसैर जाइत अछि । परला बाद ओकर दहिना हाथ ओकर दुनू आँखिकेँ झैंप दै छैक । मानु अपन आँखिकेँ झाँपिक नोर नुकाबैक प्रयास कए रहल हुए । मुदा निर्लज्य नोर छैक की रुकैक केँ नामे नहि लए रहल छैक । आ ई नोर छैक, ओकर बुढ़ाड़ीकेँ ?
ओकर बीमारीकेँ ?
ओकर भूख-प्यासकेँ ?
नहि नहि नहि ।
तँ ई नोर किएक ?
केकरा लेल ?
ई नोर छैक ओकर मनोरथक हत्याकेँ । ई नोर छैक ओकर छिरयाइत सपनाकेँ, जेकरा की ओ अपन सोनीतसँ पटेने रहए । ओकर नोर छैक की रुकैक नाम नहि लए रहल छैक । मुदा मोन स्वप्नील दुनियाँक इन्द्रधनुषी अतीतमे हिलकोर मारै लगलै ।
जखन ओ उनैस बीस बरखक जबान सुन्नर युबक रहए । माए बड्ड मनोरथसँ ओकर ब्याह रचेने रहथिन । बाबू तँ कखन एहि दुनियाँसँ गेलखिन ओकरा मोनो नहि । बाबूक सभटा भार माए उठेलखिन । केखनो ओकरा बाबूक कमी नहि होबए देलखिन । ब्याह भेलै । घरमे एकता सुधड़ कनियाँ एलखिन । समय खुशी-खुशी बीतै लगलै । मुदा ब्याहक पाँच बर्ख बादो ओकर घर नेनाक जन्म नहि भेलै । कमलु दुनू व्यक्तिक तँ जे हाल, ओकर माएकेँ तँ नेनाक अभाबमे दिन काटब मुश्किल भए गेलनि । फेर शुरू भेल कोबला-पातिरक दौड़ । माँ भगवतीक मंदिरमे पातैर राखल गेल । भगवान सत्यनारायणक कथाक कोबला राखल गेल । भगवतीक इच्छासँ ओहो दिन आएल । कमलुक कनियाँ गर्भवती भेली आ नियत समयपर एकटा सुन्नर बालकक जन्म भेलै । सून घरमे बसन्तक आगमन भए गेलै । कमलु माएक तँ खुशीक मारे धरतीपर पएर नहि टिकैत छलनि । छ्ठीहार दिन समूचा गाम माछ भात खूएल गेल । सत्यनारायण भगवानक कथा कराएल गेल । माँ भगवती घरमे पातैर देल गेल । बच्चाक नाम राखल गेल, राज ! राज कमल । सम्पूर्ण वातावरण खुशीसँ गमकए लागल । जे आबए कमलुकेँ बधाइ दइत । आखिर दे किएक नहि ? सात बर्खक बाद जे बाप बनल रहए ।
माँ भगवतीक माया जखन नहि देबक रहनि नहि देलखिन । देबए लगलखिन तँ एककेँ बाद एकटा, कमलु चारिटा पुत्रक पिता बनल । घर गृहस्थी खुशी-खुशी चलए लगलै । एहि बीच कमलुक नोकरी सेहो लागि गेलै । आर्थिक चिन्ताक समाधान सेहो भए गेलै । चारू बेटाकेँ यथासामर्थ नीकसँ शिक्षा दिएलक । समयकेँ काल चक्रमे, कमलुक माए अपन जीवनक सम्पूर्ण सुख भोगि स्वर्ग चलि गेली ।
देखतए-देखतए कमलुक चारू पुत्र युवा भेल । ओकरो सभहक घर बसबक समय आबि गेल । नीक लोक-बेद देख कए चारू बेटाक ब्याह केलक । कमलुक घर पोता-पोतीसँ भरि गेल । भरल-पुरल घर देखब शाइद नीयतिकेँ मंजूर नहि । अथबा कमलुक भागमे एहिसँ आगाँक सुख भोगब नहि लिखल रहै । आथिक युग आ परिबारक बोझसँ लदल, कमलुक चारू बेटा एक एक कए रोजी रोजगारक खोजमे ओकरा लगसँ दूर होति गेलै । चारू बेटा अपन-अपन परिबारक संगे शहरमे बसि गेल । रहि गेल कमलु आ ओकर संग देबैक लेल ओकर अर्धांगिनी, पत्नी ओकर चारू पुत्रक माए । जेना-तेना दुनू प्राणीक जीवन चलैत रहए । परञ्च केखन तक ? जेना भोरक बाद साँझ होइत छैक, प्रतेक शुरुआतक अन्त होइत छैक, ओनाहिते प्रतेक जीवनक मृत्यु । कमलुक कनियाँ सेहो जीवनसँ लडैत लडैत कमलुक संग नै दए पेली आ एक दिन कमलुकेँ छोरि स्वर्ग लोक चलि गेली । आब कमलु निदान्त असगर रहि गेल ।
आधा तँ कमलु ओहि दिन मरि गेल । बाँकी जीवन जे शेष रहै ओहिसँ निकैल कए अपन अतीतमे हरा गेल छल । मुदा नै जनि कखन ओ अपन अतीतक दुनियाँसँ नीकैल गेल रहए । अथबा कखन निकालि देल गेल रहए, बिधाताक हाथसँ । नोर सुखा कए ओकर गालपर पपड़ी जैम गेल रहै । दुनू आँखि खुजल । ओहे खुजल आँखिसँ अपन अतीतकेँ निहाईर रहल छल, कमलु । आओर ओहे खुजल आँखि आब शाइद केकरो बाट देख रहल छैक । शाइद अपन बेटा सभक ।
अगिला भोरे, गामक किछु लोक एकटा अर्थीकेँ उठेने जा रहल छलै ।
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
"राम नाम सत्य छै, सभक इहे गत छै ।"
रस्तामे एककात ठार एकटा शहरी युबक, जेकी अर्थी देख कए रुकि गेल रहए । लग एला बाद ओहिमे सँ केकरोसँ पूछैत छै - "के छथि भाई "
ओकर उत्तरमे गामक एकटा लोक बजैत छथि, जे की ओहि शहरी युबककेँ नहि चिन्हैत छथि - "छथि कतए, कहियौंह छलथि । छलथि हमरे गामक एकता अभागल, चारि-चारिटा बेटाक बाप रहितो, असगर । बेचारा ! अभाब एवं बेमारीसँ असगरे लडैत-लडैत मरि गेला । आब मुखाग्नीयो देबैक हेतु अप्पन कियोक नहि, सभ अपने-अपनेमे व्यस्त । कमलु नाम छलनि हिनकर ।"
"कमलु"
कमलु नाम सुनैत देरी ओ शहरी युबक जोर-जोरसँ दहाड़ि मारि-मारि कए कनए लागल । ओकर कनैक कोनो पार नहि । ओकर करून रुदनमे एतेक दर्द रहै कि ओकरासँ सभकेँ सहानुभूति भए गेलै ।
"किए भाई अपने किएक एतेक कानै लगलौं ।"
"अरे ! हम अभागल नहि कानब तँ आओर के कानत ।" ई कहैत ओ अपन जेबीसँ एकटा टेलीग्राम निकाइल कए देखेलकै जे कोनो ग्रामीण द्वारा कमलुक बेटा राजकमलकेँ कमलुक बीमारीक खबर लेल लिखल गेल रहै ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नवेंदु कुमार झा-