विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

आचार्य भामहक चिंतन आ दण्डी आ काव्यलक्षण

रवि भूषण पाठक · 2012-01-01 · अंक 97

आचार्य भामहक चिंतन
भामह क चिंतन
भामह अलंकारवादी रहथि आ संस्‍कृत आलोचना क ऐ विवाद सॅं परिचित छलाह जे काव्‍यसौंदर्यक मूलाधार शब्‍दालंकार मे होइछ वा अर्थालंकार मे ।पहिल मानैत छलाह जे काव्‍य मे चमत्‍कार क सृष्टि शब्‍द सौंदर्ये सँ संभव अछि ।दोसर समुदाय मानैत छल जे उपमा ,रूपक आदि अर्थालंकारे सँ काव्‍य शोभा होइछ ।भामह अपना हिसाबें दूनू मे समन्‍वय करबा के प्रयास केलखिन्‍ह ।
' शब्‍दार्थौ सहितौ काव्‍यम्' क द्वारा भामह शब्‍द आ अर्थ दूनू क महत्‍व पर बल दैत छथिन्‍ह ,अर्थात शब्‍द आ अर्थक सहभाव मे काव्‍यक सृष्टि होइत छैक ।य‍द्यपि भामहक चिंतन सँ ई विवाद आर गहिरायल कि काव्‍य कत' होइत छैक 1 शब्‍द मे2 अर्थ मे 3 या सहभाव मे ।ई विवाद एते प्रबल रहल कि शाहजहॉ कालीन विद्वान जगन्‍नाथ कहलखिन्‍ह 'रमणीय अर्थक प्रतिपादक शब्‍दे काव्‍य थिक ।आ वर्तमान मैथिली कविता के देखल जाइ तखन लागैत अछि जे फेर सॅ शब्‍द अपन जाल फैला रहल अछि ।
ओना आधुनिक मैथिली मे फतवा क कमी नइ छैक आ जइ कविता के प्राचीन सॅ प्राचीन आचार्य तक नवोन्‍मेष के कारणें स्‍वीकार क' सकैत छलखिन ओ कविता मैथिली मे एक झटका मे श्रीविहीन साबित क' देल जाइत अछि ,आ तहिना श्रीविहीन कविता के गौरवान्वित करए के सेहो ऐ ठाम सुदीर्घ परंपरा अछि ।

दण्‍डी आ काव्‍यलक्षण
दण्‍डी नीरस शास्‍त्रकार नइ छथिन्‍ह ,प्रतापी कवि सेहो छथिन्‍ह । ''अलंकृतमसंक्षिप्‍तं रसभाव निरंतरम '' ।हुनकर स्‍पष्‍ट विचार अछि कि कविता ओइ पदसमूह क नाम छैक ,जे वांछित सरसता सँ युक्‍त हो ।ऐ ठाम कविप्रतिभा सुंदर पदावली सँ संयुक्‍त हेबाक चाही ।
''शरीरंतावदिष्‍ठार्थ व्‍यवच्छिन्‍ना पदावली ''(काव्‍यादर्श) । इष्‍टार्थयुक्‍त पदावलीक एकटा अर्थ ई जे पद मे 'योग्‍यता' ,'आकांक्षा' आदि होयबाक चाही ।दंडी महाराजक मंतव्‍य ऐ ठाम ई अछि कि इष्‍ठार्थत्‍व क सौजन्‍ये सँ काव्‍यत्‍व क जन्‍म होइत छैक ।यद्यपि हुनक रसचेतना भावात्‍मक कम आ अलंकार केंद्रित बेशी अछि आ हुनका लेल समस्‍त अलंकारक उद्देश्‍य रससृष्टि मात्र छैक ।
हिनकर चिंतन मे 'इष्‍टार्थ'क स्‍पष्‍ट व्‍याख्‍या नइ छैक ,तैयो ई मानल जाइत अछि जे ऐ पदक संदर्भ भामहकालीन काव्‍यचिंतन सँ छैक ।भामहक लेल शब्‍दालंकार आ अर्थालंकार दूनू इष्‍ट छलइ ,मुदा दण्‍डी क लेल शब्‍द,अर्थ,रस सौंदर्य सँ युक्‍ते पदावली काव्‍य थिक ।दण्‍डी क सीमा ई अछि जे ओ ' 'इष्‍टार्थ'क चर्चा मात्र अर्थालंकारक लेल करैत छथिन्‍ह ।
दण्‍डी क सीमा स्‍पष्‍ट अछि ओ शब्‍दार्थ के काव्‍यक शरीर मानैत छथिन्‍ह आ अलंकार के आत्‍मा ।हुनकर विचार मे अलंकारविहीन पदावली साहित्‍य नइ भ' सकैत अछि ।

टिल्‍लू जी (शिव कुमार झा)
जन्‍मदिनक मधुर मंगलकामना टिल्‍लू जी ।बहुत दिन सँ अहॉं से बात नइ भ' रहल अछि आ हम प्रयासो केलहुं त' अहॉ व्‍यस्‍त रही ,कखनो टाटा ,कखनो भुवनेश्‍वर ।आइ अहॉक जन्‍मदिन अछि आ अहॉक सभ स्‍वप्‍न सभ प्रतिज्ञा सामने होयत ।भगवान सँ हमर सभक प्रार्थना कि अहॉंक सब कामना फलीभूत हो ।मैथिली भाषा क एकटा पाठक होयबाक नाते हमर ई कामना कि अहॉ सब तरहें मैथिली साहित्‍य के समृद्ध करी ।एकटा कविक पुत्र होयबा क नाते जे दायित्‍व अहॉ क छल से अहॉ लगभग पूरा क देलहुं ,मुदा एकटा लेखक होयबा क नाते अहॉके बहुत किछु करबा क अछि ,ने केवल मात्रा मे बल्कि गुणात्‍मकता मे सेहो ।
अहॉक कविता मे बूच भैया क कविता क छाया देखाइत अछि ,ई जत्‍ते स्‍वाभाविक छैक ,ओतबे अहॉ लेल अपरिहार्य अछि कि अहॉ अपन रस्‍ता बनाबी ।जे ओइ पीढ़ीक दुख छैक ,ई ओकरे छैक आ ओ पीढ़ी जे शिल्‍पक चयन केलकइ ,सेहो ओकरे रहतइ ,नवका पीढ़ी के बेशी नवोन्‍मेषी बनए पड़तए ,तखने ई ज्‍योतिरीश्‍वर आ विद्यापतिक भाषा अपन प्रासंगिकता बनेने रहतइ ।यद्यपि सभ भाषाक अपन अपन संस्‍कार होइत छैक आ ओकर रचनात्‍मकता सेहो इतिहासक कोखि सँ निकलि रहल छैक ,तैयो लोकल किछु नइ रहलइ ।

अहॉक आलोचना भाषा तथ्‍यात्‍मक आ निर्णयात्‍मक रहैत अछि ।तथ्‍यात्‍मकता यद्यपि प्रामाणिकताक अंग बनिके आबैत अछि ,तथापि कखनो कखनो ओ पाठ के बोझिल सेहो बनबैत अछि आ तथ्‍य क बोझ तखन आर बेशी भ' जाइत अछि ,जखन ओ केवल जानकारी क प्रदर्शनक लेल आबैत अछि ।जेना 'गामक जिनगी' पर लिखैत काल अहॉ खूब रास कहानीकारक नाम लिखैत छी । बात केवल अहींके नइ अछि ,प्राय: मैथिली मे नामक गोला चलैत छैक ,आ लेखकक भाषाक स्‍वभाव ,ओकर बनावट पर कम विचार होइत अछि ।तहिना तुलनात्‍मक आलोचनाक मतलब लेखक लोकनि दूटा किताब ,लेखक या उद्धरणांश सँ बूझैत छथिन्‍ह ,तुलनात्‍मक आलोचना के सही बाट देखयबाक जिम्‍मेवारी अहीं सन लेखक के अछि ।ऐतिहासिक आलोचना एखनो महत्‍वपूर्ण अछि ,किएक त' मैथिली साहित्‍यक इतिहास आ विभिन्‍न युग ,लेखक ,क्षेत्र आ प्रवृत्तिक कार्यभागक सही सही मानचित्र अखनो हमरा सभक समक्ष नइ अछि ।समाजशास्‍त्रीय आ उत्‍तर आधुनिक आलोचना क बाते छोड़ू ,एकर त' नामोनिशान अखन मैथिली मे नइ अछि ,मुदा अहॉ सन उद्योगी व्‍यक्ति हमरा समक्ष छथि ,तें आशान्वित छी ,आइ ने काल्हि सब चीज अनुकूल स्‍थान पर मानक रूप मे रहत ।
आइ बस एतबे ,जन्‍मदिनक फेर सॅ मंगलकामना ।अहॉ चिरायु हो ।

Suggested citation: रवि भूषण पाठक. “आचार्य भामहक चिंतन आ दण्डी आ काव्यलक्षण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 97, 2012-01-01. https://www.videha.co.in/research/2012/97/आचार्य-भामहक-चिंतन-आ-दण्डी-आ-काव्यलक्षण.htm

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