विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

हम, देह आ विदेह

अनिल मल्लिक · 2012-01-01 · अंक 97

देह आ विदेह....!
मोन बड़ा उद्विग्न छल, भोरे चाइरे बजे आँखि खुइल गेल ! बौआऽक माय कहलथि “जाड़ मास, ठाड़ पकड़ि लेत, गब्दिया कऽ सुइत ने रहू !”
मुदा आँखि मे निंद रहय, तँ ने सुती? निंद तँ पड़ायल छल, चिन्ताक जेना बाढ़िमे भसिऐ लगलौं हम! काइल्हे बौआ'क बियाह लगभग निश्चित केलौं ! भजियबैत भजियबैत, गप्प मिलबैत मिलबैत… सौ टा फुइस साँच बजैत… दू सालमे चारि ठमन कन्या देखलाक बाद… आब जा कऽ एतऽ हमर दाइल गलल! कन्या सेहो सुशील, मोन गदगद, कि हमर सभ मनोरथ ऐ कुटमैतीसँ पूरा भऽ रहल अछि, सभसँ पैघ बात तँ ई, कि कन्याक पिता झटसँ राजी भऽ गेलथि कि लेनदेनक बात केकरो पता नै चलतै, कतौ नै खोलता, सभ ठमन बजता… कि आदर्श विवाह भेल! हमर गिन्ती समाजक अगुआमे होइत अछि, हमहीं सभ तँ छी, जे एहन कुरीतीक विरोध करै छीI जौं हमरा बारेमे लोककेँ पता चलि जाइ, की हम पाइ लऽ कऽ कुटमैती केलौं, तँ ई समाजमे हमर प्रतिष्ठाक चेथरा उड़ा देतI हम मोनेमोन धन्यवाद दैत एलौं मझिला साढ़ूकेँ, जे सभ बात भीतरे भीतर मिलेलथिI हुनके गतातीक कथा अछि ई, तै दुआरे निफिक्कीर छी !
बड़ खुशी मोनसँ कन्यागत ओतऽ सँ लौटैत बेर भुतही हटियापर सँ ताजा बलसाही किनने एलौं I घर अबिते बौआक मायकेँ सभ बात बतेलौं I सुनि कऽ बहुत प्रसन्न मोनसँ बाजि उठलथि, की चलू “साँपो मरल आ लाठीओ नै टुटल”! खा पी कऽ जल्दिए सुइत रहलौं दुनु प्राणी !
हौ बा ! ई की भेल ? आब एकर निदान तँ श्रीधर बाबु मात्र बतेता तँ हुनके लंग जाइ छी I मोनेमोन निश्चय कऽ चललौं हुनकेसँ भेंट करs ! कहुना कहुना कऽ पाँच बजल, कुहेश बड़ जोर, दशो हाथ दूर तक देखनाइ मुश्किल, पहुँचलौं श्रीधर बाबूक घर, तीन चाइर गोटेक साथे घुर तपैत भेटला, दतमैन करैत ! अकचका कऽ पुछलथि, की यौ ? की बात ? एतेक सबेरे ? हम कहलियन्हि जे बड़का आफतमे छी, की कहू ? कनेक असगरेमे विचार करैक छल अहाँसँ ! सुनि कऽ श्रीधर बाबु हमरा दलान परक कोठरीमे बैसबाक लेल कहलथि आ कुर्रा आचमन केलाक बाद दू गिलास चाह लऽ कऽ एलथि कोठरीमे, बैसते कहलथि “हँ ! तँ, आब कहs कोन आफतक बात करै छलह तों?” ! बिना चोरा नुका कऽ सभटा बात कथा कुटमैतीक बारेमे कहलियन्हि हम श्रीधर बाबूकेँ ! हमर गप्प निर्विकार भावसँ सुनैत रहला !
हम कने दम धेलौं, आ फेर कहऽ लगलौं श्रीधर बाबू ! जेना अहाँ कहैत छी जे सपना कहियो भविष्यमे घटैबला घटनाक सूचक सेहो होइ छै आ हमहूँ ई बात मानै छी, आइ राइत बड खुशी खुशी सुतलौं मुदा राइत हम सपना बड बिचित्र क देखलौं !
देखलौं की… हम दू गोटे छी, एकदम हमरे जकाँ… हु बहू… देखबामे एको मिसिया फरक नै जेना डबल रोल होइ? डिट्टो ओहिना, एकटा उपर आ एकटा निच्चा! उप्पर बला अपनाकेँ आत्मा कहैत छल, आ निच्चा बलाकेँ देह ! आत्मा बड खिसिया कऽ धमकबैत छल देहकेँ “ हम नै सहबौ आब तोहर बदमाशी, बाल्यकालक… जबानीक मनमानी क्षमा करैत गेलियौ I अंग-अंग केँ, सभ इन्द्रियकेँ डेमोक्रेशी देलियौ, बदलामे की भेटल हमरा? निराशा, अपमान, आत्मग्लानि… आई तँ अति केलैं तों, हाथ पकड़लक देह क आ जेना घिसीयबैत चलल कहिते की आ तोरा देखबै छियौ तों की की केलैं अखैन धरि, आ दण्ड किए नै दियौ तोरा? मायक गर्भसँ लऽ कऽ अखैन तक क यात्रा हमर देहकेँ क्षण भरिमे करा देलक जेना सिनेमा होइ तहिना, जेना ऐनामे स्पष्ट देखाइ छै तहिना एकदम किलियर साफ साफ!
अपन कुकृत्य देख देह हाँइफ गेल तँ आत्मा ओकर हाथ छोड़लक, देह धप्पसँ खसल जमीनपर, डरा कऽ देखऽ लागल आत्मा दिस जेना चोर देखै छै दरोगा दिस तहिना, चुपचापI
कनिक्को शांत नै भेल अखैन धरि आत्मा, बाजैत रहल, बेटाक बिवाह करै छेँ, नीक बात, मुदा ऐ प्रयासमे तों की की प्रपंच रचलेँ से यादि छौ? सभसँ पहिले तोँ नीक बेपारी जकाँ ग्राहककेँ अपन जालमे फसेलेँ I ग्राहक कन्यागत, प्रोडक्ट तोहर लालच, बेचारा नवयुवक तोहर अपन बेटा जे ई कुरीति, भ्रष्टाचारक विरुद्ध लम्बा युद्ध लड़ैक क्षमता रखै छल, तीन चारि बेर कम्पीटिशन की लूज केलक तों ओकरा हिम्मत देबाक बदला, हौसला देबाक बदला लगले ओकर ब्रेन वास करऽ आर ई शर्टकट रस्तापर चलैक लेल राजी कऽ लेलहीं ! मार्केटिङ टुल बनबाक लेल तैयार कऽ लेलहीं, नीक पैकेज, बोनस, इन्सेन्टिभक मकड़जालमे फाँइस लेलहीं, जखैन ओ तैयार भऽ गेलौ तँ निकलि पड़लै ओकरा लऽ कऽ मार्केटिङमे ! आब आ, तोरा देखबै छियौ तोहर जघन्य अपराध ! हमरा आगाँ आबि गेल दृश्य जइमे हम बौआ लेल पहिल कन्या देखऽ गेल रही ! ओ बाजैत रहल, ऐ कन्याकेँ, तों पिड़श्याम छेँ, दोसरकेँ लम्बाइमे, तेसरकेँ शाकाहारी कहि कऽ छँटलिहीं लेकिन बात दोसरे छलै, तोहर अदॄश्य अभीष्ट जौं पूरा होइतै तँ तों कोनो नै छँटितहीं, जखैन दालि नै गलैबला भेलौ तँ तों बहाना बनेलहीँ ई सभ! यथा सामर्थ कन्यागत तैयार छलखुन तोरा दै कऽ लेल मुदा तों कन्सिडर आ कम्प्रोमाइज करै कऽ लेल तैयार नै भेलें आ छ छ महिना प्रतिक्षा करेलाक बाद, दौड़ैलाक बाद जबाब पठेलहीं की एतऽ नै हएत, आन ठमन देखूI हरेक जगह तों कन्या परिक्षण करैक बेर चला कऽ, बजा कऽ, लिखा कऽ कन्या देखलेँ जेना पुतौह नै मार्केटसँ एल. सी. डी. टेलिभीजन पसन्द कऽ रहल छें कनेक्को अनुमान छौ?
कोन मनोदशासँ ऐ सभ निरपराधकेँ गुजरय पड़ल हेतै ? गरजि उठल आत्मा देहपर, कतेक मेहनतसँ ऐ बचिया सभमे विकसित भेल हेतै आत्मविश्वास आ स्वाभिमान, जकर नेओं हिला देलकै तोहर मिथ्या लांछन? निरपराध बचियाकेँ हीन भावनाक शिकार बनबैक, अपराधबोधक शिकार बनबैक दुश्प्रयाश केलें तों, ई अक्षम्य अपराध छौ, एकर दण्ड भेटतौ तोरा !
हम आत्मा छी पर-आत्माक दुख बुझै छी। परम-आत्माक कंठहार बनैक अछि हमरा ! तोहर कुकृत्य हमरा नर्कक द्वार लऽ जायत ! आब मनमौजी नै चलतौ, कड़ा अनुशासन रहतौ आब ! तों तँ देह छेँ, एक दिन सुन्दर काया क्षीण भऽ जेतौ। पे बैक पीरियडक बाद तों बेपारी जेना बैंकक पूँजी आपस करै छिही तहिना हमरो आपस करय पड़तौ ! तोहर नियति छौ… कि तँ तों जड़बे कि तँ तों गड़बे, राख बनबें या माइट ! तोहर खिस्सा तँ खतम भऽ जेतौ, लेकिन हमरा तँ जबाब देबऽ पड़त हमर श्रृजनहारकेँ, देखाबऽ पड़त तोहर बैलेन्सशीट ! हुनको अपन युनिटक परफोरमेन्सक रिपोर्टिङ करय पड़ैत छन्हि, हायर मैनेजमेन्टक! तोहर बैलेन्सशीटक सम्पैत पक्ष छौ सत्कर्म, पुण्य आ दायित्व पक्ष छौ दुष्कर्म, पाप ! तोहर अखन धरिक कारगुजारी सँ निश्चित छौ की तोहर दायित्व पक्ष भारी रहतौ ! हम की औचित्य बतेबै ? हमरा तँ नियुक्त कएल गेल तोहर बैलेन्स शीटक सम्पैत पक्षकेँ भारी करैक लेल, तोरापर विश्वास केलियौ, स्वतंत्रता देलियौ डेमोक्रेटिक एक्सरसाइज करेलियौ, तकर परिणाम तों धोखा देबऽपर, घाटा देबऽपर लागल छें ! कुकर्म तों करबे आ कुकर्मक बिशेषन हमरा? सजाय हमरा? दुरात्मा, पापात्मा, निचात्मा… हम किए ? तोहर कएल अपराधक सजाय हम नै भोगबौ ! बेर बेर पृथ्बीपर आउ, एतेक झमेलामे हम आब नै पड़बौ ! आत्माक क्रोध देखि कऽ डरसँ देह काँपि गेल ! दुनु हाथसँ माथ पकड़ने चुक्कीमाली बैसल रहल देह! निशब्द, निस्तब्ध, निसहाय ! जेना करेज फाइट जेतै तहिना दर्द उठलै छातीमे, आँखिक आगाँ एकदम घुप्प अन्हार...जेना अचानक बिजली चलि जाइ तँ केहन अन्हार होइ छै? तहिना ! मोनमे सोच एतबे जे आब कोन दण्ड भेटत ?
कनेक देर चुप रहलाक बाद फेर हुँकार भरलक आत्मा, तोहर सजाय ई छौ की हम आइ, अखने तोरासँ निकलि जाइ, हमरा की ? हमरा एतबे ने की फेर आबऽ पड़त धरतीपर? हमरा तँ फेर कोनो देह भेटत रहैक लेल, तों आब अप्पन सोच… कहिते घुमल आत्मा, देह धड़फड़ा कऽ उठल आ आत्माक पएर पकड़ि लेलक ! देह घिघिऐ लागल, हमरा नै छोरु, सुबकऽ लागल, हाथ जोड़ि कऽ कहऽ लागल, जे अपराध केलौं हम तकर आब प्रायश्चित हम करब, हमरा रस्ता देखाउ ! जे रस्ता अहाँ देखेबै तहीपर हम चलब, अहाँ हमरा एकटा औसर मात्र दिअ, कहिकऽ देह बिलखऽ लागल !
देहक कननाइ देखि कऽ आ पश्चाताप करैत देखि कऽ देहकेँ धेने जे ओकर खास संगी साथी छलै लोभ, काम, ईर्ष्या, द्वेश, मोह पाँचो क पाँचो अपन अभीष्ट आब पूरा नै हएत बुझि कऽ छिटकि गेल ओकरा लगसँ, डगर नापि लेलक, फेर कहीं आत्माक कोपभाजन नै बनि जाइ, ई सोचि कऽ सभक सभ लंक लाइग कऽ भागल! देह केँ असगर छोड़ि कऽ!
देहकेँ डर, दिनता आ पश्चाताप करैत देखि कऽ आत्माकेँ दया आबि गेलै! किछु देर चुप रहलाक बाद आत्मा बाजल, किछु कोमल श्वरमे, अखन जे हम तोरा छोड़ि दियौ तँ कतेक दिन धरि सन्जोगि कऽ रखतौ तोरा तोहर परिवार? हम जे अखन निकलि जेबौ तोरामे सँ तँ ऐ सुखक तों भोग कऽ सकबेँ? देह मूड़ी हिलेलक नै क इशारामे ! आत्मा आब समझाबऽ लागल…. देख अखनो किछु नै बिगड़ल छौ, हमर बात मनबे तँ पूर्ण काल तक तोरे संग रहबौ ! डेमोक्रेशीक बड बेजाय फएदा उठओले तों, आब एकटा निश्चित परिधिमे रहैक छौ तोरा! डेमोक्रेसी नै छिनबौ, मुदा तोहर क्रियाकलापपर कड़ा निगरानी रखबौ आत्म लोकपाल बनि कऽ! तोहर दैहिक आवश्यकता, अधिकारक सम्मान करबौ, अपमान तोरा सँ ककरो होए आब, से नै होबय देबौ ! धर्म नै करबे नै कर, मुदा अधर्म तोरासँ, आब नै होबय देबौ ! ककरो सुख नै दऽ सकबे, कोनो बात नै, मुदा ककरो तोरा सँ दुख पहुँचय, से नै होबय देबौ ! नै आनय सकबे ककरो चेहरापर मुश्कान, कोनो बात नै, मुदा तोहर कारण ककरो आँखिसँ नोर खसय, से नै होबय देबौ ! तोरा मे "विदेह" बनैक सामर्थ नै छौ, हम जनै छी, जौं हमर कहबपर चलबे तों, तँ नीक "देह" तोरा जरुर बनेबौ हम ! पक्का...गारण्टी छौ हमर, कह छौ मन्जूर? देह बुझि गेल छल अखैन धरि की आब एकर बात मनबाक अलावा कोनो विकल्प नै अछि तँ कहलक, हँ हम सभ बात मानब ! मोनेमोन मुश्कायल आत्मा, सोचि कय की चलु ई तँ आयल आब लाइनपर, आब अपन आत्मा बिरादरीक मीटिङ्ग बैसेनाइ बड जरुरी बुझा पडल आत्माकेँ, कतौ आरो कोनो देह तँ एहन बदमाशी ने कऽ रहल होय, आब इग्नोर केनाइ उचित नै ! अधिकसँ अधिक आत्माकेँ सचेत केनाइ आवश्यक महशूस केलक आत्मा, फेर कहलक, तों अप्पन बोझा केना हल्लुक करबे, की स्ट्राटजी बनेबहीं जे तोहर नफा नोक्सान खाता केना नफा देखेतौ, से योजना तोरा अपने बनाबय के छौ ! हमर कोनो हस्तक्षेप नै रहतौ, यदि तोरा सलाहक जरुरी पड़तौ, तँ आँखि बन्द करिहेँ, हमरा यादि करिहेँ, हम तुरन्त आबि जेबौ ! हम चलै छियौ, कहि कय अन्तरध्यान भेल आत्मा !
आब उठल देह लम्बा साँस लय कऽ तँ अचानक अनुभव भेलै जे ओ बहुत हल्लुक भऽ गेल छल, हवामे जेना उड़ियाइत होइ तहिना, देखलक अपनाकेँ तँ आश्चर्य भेलै अपनाकेँ देखि कय ! एक दम नया, साफ, चिक्कन चुनमुन, पहिले तँ जेना हटिया परक चाह बलाकेँ वएह ठमन चाह बनबैबला गंदा ससपेन जेहन देह छलै अखन तँ जेना प्रिल सँ साफ कऽ देने होइ ससपेनकेँ तहिना चमकैत छल देह ओकर ! खुशीसँ हवामे नाचय लागल देह जेना मुन वाक करैत होए तहिना, की ठोकर लगलै आ आँखि खुलि गेल हमर!
श्रीधर बाबु ! ई सपना हमरा परेशान कऽ देने अछि ! ऐ सपनाक अर्थ की भऽ सकैत अछि? कि जेना अन्गिनैत सपना हम जीबनमे देखैत छी, जकर कोनो अर्थ नै होइ छै, तहिना ईहो एकटा छै? कहीं ई कोनो संकटक पूर्वानुमान तँ नै? प्रश्नक जेना हम झरी लगा देलिऐ श्रीधर बाबूक आगाँ !
सभटा बात सुनलाक बाद कनेक मुश्केलथि श्रीधर बाबू आ कहय लगला, सुन भाय, ई तोहर भाग्य छौ जे तोहर आत्मा तोरा अतीतसँ वर्तमान तकक मात्र यात्रा देखेलखुन्ह अहिमे तों यतेक त्रस्त भऽ गेलैं, जौं भबिष्यक यात्रामे कहियो लगेलखुन्ह तँ तोहर की हाल हेतौ? हम कहलिऐ, नै बुझलहुँ हम, तँ बजला श्रीधर बाबू, देख तोहर होबयबला समधि अखैन तँ कहलखुन्ह जे ओ कतौ नै बजता मुदा ओ बजता जरुर ! तोहर पुतहुकेँ पता चलतौ, किछु साल बाद बेटो तोरे दोषी कहतौ, अखैन पैरुख छौ कोनो बात नै मुदा धिरे-धिरे अबस्था ढलैत जेतौ, तोरा लोकक जरुरी, सम्मानक जरुरी, प्रेमक जरुरी पड़तौ तखैन तों पयबे कि सभ सुख जेकर तोरा आवश्यकता हेतौ तों मुठ्ठीमे बन्द करय चाहबेँ, लेकिन सुखल बालु जकाँ तोरे आँखिक आगाँ तोहर हाथ सँ निकलि जेतौ सभ सुख! तों किछु नै कऽ सकबे, कसकबे तँ मात्र अफशोस ! कोइ नै रहतौ तोरा संग ! ने पुत्र, ने पुतहु, ने पत्नी ने पौत्र कोइ नै ! ने ककरो प्रेम ने ककरो बिश्वास! असगर रहि जेबैं तों भोगैक लेल अपन कृत्यक परिणाम ! तखैन तों बेर बेर भगबानसँ पुछबे कि तोरे संग किए एना? तखैन तोरा यादि अयतौ तोहर सभ कृत्य, लेकिन करबेँ की? समय तँ निकलि गेल रहतौ ! भोकासी पाड़ि कय कनबे तों, मुदा तोहर नोर पोछयबला कोइ नै रहतौ ! हम सुनैत रहलौं श्रीधर बाबूक सभ बात ध्यानसँ, आँखिक आगाँ जेना चलदृश्य होइ तहिना बुझाइत छल तखैन हमरा ! कहैत रहला श्रीधर बाबू, एकटा बात बुझल छौ, ई दोसर जन्म की होइ छै? दोसर जन्म होइ छै बुढापा ! कहै छै ने बच्चा बूढ एक समान, तँ बच्चाक जन्म भेलै एक जनम आ बुढापा भेलै दोसर जनम ! कहै छै ने पुण्यसँ अगिला जनम सुधरै छै? तँ ई अगिला जनम मृत्युक बाद नै अबै छै! ई छै बुढापा, जकरा नीक कर्म कय कऽ सुधारै छै लोक !
आब तों निश्चय कर कि तोरा की करय के छौ ! बयस अखनो बहुत बाँकी छौ, तों तँ एकटा सफल बेपारी छेँ, तोरा तँ पता छौ कि एकटा खाता जतेक रकमसँ डेबिट होइ छै ओतबेसँ दोसर खाता क्रेडिट सेहो होइ छै ! तँ जीबन बेपारकेँ सेहो डेबिट क्रेडिट एतय होइ छै !
आब कोन पथ चलबें, कि आत्मा सँ कएल वचन पूरा कय सकबें, तोरा निर्णय करैक छौ ! भाय ! हम तँ एतबा कहबौ, जे फर्मुला तों बेपारमे लगा कऽ सफल भेलें तहिना निक फर्मुला निकाल आ जुटि जो जोरसोर सँ जिबन बेपार मे नफा कमाइ क लेल ! एतबा कहि कय श्रीधर बाबू हमर पीठ थपथपेलथि तँ जेना भक्कसँ हमर आँखि खुलि गेल, जेना कोनो पर्दा छल अखैन तक, से अचानक हटि गेल ! चारु दिस जेना प्रकाश, उत्साह, रंग…व्यक्त नै कयल जा सकयबला खुशी…! जेना हमरा नया दिशा भेट गेल, हम गोर लगलौं श्रीधर बाबु केँ आ चलि पड़लहुँ बाँकी रहल जीबन सुधारै क लेल… नव पथपर, पूरा आत्मबिश्वासक साथ… धिरे धिरे ! दूर असमानमे बादलमे दूटा आँखिक आकृति उभरल… जेना लगे रहो मुन्ना भाई मे गान्धी जी क आकृति देखाइ छै ने तहिना, मानू कि आत्मा हमरापर नजैर राखि रहल होय !
हम हँसि पड़लौं आ निर्भीक मलङ्ग जकाँ बढैत रहलौं, बढ़ि रहल छी आ बढैत रहब...हिम्मत दैत रहत "टैगोर" रचित गीत...जोदि तोर डाक सुने कोइ ना आसे तोबे एकला चोलो रे.....!!
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला २— बृषेशचन्द्र लाल- बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ

जगदीश प्रसाद मण्‍डल- कामरूप आ मिथिला
मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति द्वारा गुवाहाटीमे आयोजित "विद्यापति स्मृति पर्व समारोह" स्थान: प्राग्ज्योतिष आइ.टी.ए. सेन्टर, माछखोवा, गुवाहाटी आइ २३ दिसम्बर २०११ केँ ५ बजे अपराह्णसँ शुरू भेल/
ऐ अवसरपर विशेष अतिथि रहथि डॉ. श्रीमती प्रेमलता मिश्र "प्रेम" आ सम्माननीय अतिथि रहथि श्री जगदीश प्रसाद मण्डल।
जगदीश प्रसाद मण्डलजी क उद्बोधन भाषण भेल जे नीचाँ देल जा रहल अछि।-सम्पादक
वि‍द्यापति‍ स्‍मृति‍ पर्व समारोह-
कामरूप आ मिथिला
सभसँ पहि‍ने ऐ पर्व समारोहक सहयोगी आ मि‍थि‍ला सांस्‍कृति‍क समन्‍वय समि‍ति‍केँ धन्‍यवाद दैत छि‍यनि‍ जे मि‍थि‍ला आ कामरूपक बीच युग-युगसँ प्रवाहि‍त होइत जीवन धाराकेँ जीवि‍त रखने छथि‍। संगहि‍ आगूओ एहि‍ना लहड़ाइत धाराकेँ जीवि‍त रखताह, से आशा करैत छी।
कामरूप आ मि‍थि‍लाक बीच संबंध कहि‍यासँ शुरू भेल, एकर नि‍श्चि‍त ति‍थि‍ तँ नै बुझल अछि‍, मुदा सहस्रो सालसँ जीवन धारा बनि‍ प्रवाहि‍त होइत आबि‍ रहल अछि‍, ई कहैमे कनि‍योँ मनमे संकोच नै अछि‍। जे कामरूप कहि‍यो प्राग्‍ज्‍योति‍ष कहल जाइत छल भरि‍सक तहि‍येसँ। ओना इति‍हासक वि‍द्यार्थी नै रहने इति‍हास पढ़लो नै अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे जहि‍ना मि‍थि‍लाक संपूर्ण इति‍हास लि‍खि‍नि‍हारक अभाव रहल अछि‍ तहि‍ना भाषोक हुअए। मुदा दुनूक बीच प्रगाढ़ संबंध बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, ऐमे कतौ दू-राइ नै अछि‍। जखन बच्‍चे रही तहि‍यो बूढ़-बूढ़ानुसक मुँहे सुनैत रही जे फल्‍लां कामरूपक सि‍ख छथि‍। ततबे नै मि‍थि‍लावासीक लेल कामरूप कामाख्‍या, अदौसँ तीर्थ-स्‍थल बनल चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍, आगूओ चलैत रहत। जहि‍ना बंगालक गंगासागर, दक्षि‍णेश्वर, उड़ीसाक कोणार्क आ जगरनाथ मद्रासक श्वेतबान रामेश्वर, कन्‍याकुमारी, गुजरातक द्वारि‍का, राजस्‍थानक पुष्‍कर पंजावक स्‍वर्ण मंदि‍र, कश्मीरक वैश्‍णोदेवी-अमरनाथ, उत्तरांचलक बद्रीनाथ, हरि‍द्वार उत्तर प्रदेशक काशी, वि‍न्‍घ्‍यांचल मथुरा-वृन्‍दावन इत्‍यादि‍ रहल अछि‍, तहि‍ना। जइ समए गाड़ी-सवारीक अभाव छल तहू समए छल।
शंकरदेवक पारिजातहरण आ रामविजय , दैत्यारि ठाकुरक श्यामन्तहरण यात्रा आ लक्ष्मीदेवक कुमारहरण नाट (शतस्कन्ध रावण वध), ई सभ अंकियानाट मैथिलीक आरम्भिक नाटक अछि आ असमक ऐ ऋणसँ हम सभ कहियो उऋण नै भऽ सकै छी।
गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानक बीच बसल मि‍थि‍लो आ कामरूपोक रहने उपजा-बाड़ीसँ लऽ कऽ जि‍नगीक आनो-आनो संबंध सहज अछि‍। जहि‍ना कामरूप तलहटी मैदानसँ लऽ कऽ पहाड़-पठार, वनक संग प्रवाहि‍त होइत जलधारासँ सम्‍पन्न अछि‍ तहि‍ना बि‍‍हारो अछि‍। बंगालक खाड़ीसँ उठैत माैनसुनसँ जहि‍ना कामरूपक भूमि‍ सि‍ंचि‍त होइत तहि‍ना मि‍थि‍लांचलोक। ओना मुँहपर पड़ने कामरूपमे अधि‍क आ जेना-जेना पछि‍म मुँहेँ ससरैत तेना-तेना कम होइत जाइत, मुदा दुनूक बीच नजदीकी रहने बहुत बेसी अंतर नै पड़ैत। गंगा-ब्रह्मपुत्रक एक तलहटी रहने माटि‍यो आ माइटि‍क सुगंधोकेँ एकरंगाह बनौने अछि‍। उत्तरी पहाड़सँ नि‍कलैत (नदी धारा) जल धारो एक-रंगाहे रहल अछि‍। जइठाम जेहन माटि‍-पानि‍ तइठाम तेहन उपजा-बाड़ी। जइठाम जेहन उपजा-बाड़ी तइठाम तेहने खानो-पान आ आचारो-वि‍चार। जइठाम जेहन खान-पान, आचार-वि‍चार तइठाम तहि‍ना कला-सांस्‍कृति‍क संबंध। जे दुनूक बीच अदौसँ रहल अछि‍। ओना, खेती-बाड़ीमे एक-रूपतो अछि‍ आ भि‍न्नतो। अधि‍क मध्‍यम बर्षा भेने, पनि‍सहू फसि‍लो आ फलो-फलहरीमे अन्‍तर होइत, से अछि‍यो। जइ कामरूपमे नारि‍यल, सुपारी, चाहक बहुतायत अछि‍ ओ मि‍थि‍लांचलमे कम अछि‍। ओना मि‍थि‍लांचलमे ि‍सर्फ आम हजारो कि‍स्‍मक अछि‍। मुदा पटुआ आ धान जहि‍ना कामरूपक मुख्‍य फसि‍ल अछि‍ तहि‍ना मि‍थि‍लोक। मुदा जहि‍ना नीलक नव अवि‍ष्‍कार भेने नीलक खेती मारल गेल तहि‍ना पोलीथि‍नक आगमनसँ पटुआक खेती प्रभावि‍त भेल अछि‍।
मि‍थि‍लाक उर्वर भूमि। जहि‍ना माटि‍-पानि‍ तहि‍ना स्‍वच्‍छ हवो। जइसँ सभ कथूक वृद्धि‍। चाहे ओ खेती हुअए आकि‍ जीवन पद्धति‍ हुअए आकि‍ कला-संस्‍कृति‍। मि‍थि‍लांचलक चि‍न्‍तन धारामे ि‍सर्फ उच्‍चकोटि‍क मनुष्‍ये नै उच्‍च कोटि‍क समाज आ सामाजि‍क-पद्धति‍क सेहो दि‍शा-दर्शन रहल अछि‍। जन-गणक नगर जनकपुर। आ जनकपुरक राजा जनक। जनि‍क कन्‍या जगत जननी जानकी। एक-सँ-एक चि‍न्‍तक, तत्ववेत्ता, दार्शनि‍क मि‍थि‍ला भूमि‍ पैदा केने अछि‍‍। जेकर वानगी इति‍हास-पुराण जीवि‍त अछि‍।
जहि‍ना सौंसे देश गुलामीक शि‍कंजामे हजारो बर्खसँ रहल तहि‍ना देशक उत्तर-मध्‍य बसल मि‍थि‍लो अछि‍। ओना मि‍थि‍ला दू देशमे बटल अछि‍। साठि‍-पेइसठि‍ बर्ख पहि‍ने भारत स्‍वतंत्रताक साँस लेलक जहन कि‍ नेपालक मि‍थि‍ला हालमे साँस लेलक। जहि‍ना अभावी परि‍वारमे अभावक चलैत जीवनक सभ कि‍छु प्रभावि‍त होइत, तहि‍ना भेल। जीवन-पद्धति‍मे खोंट अबैत-अबैत खोंटाह होइत गेल अछि‍। जेकर असरि‍ अधलाह पड़ैत गेल। मुदा तैयो मि‍थि‍लाक वएह भूमि‍ छी जे अदौसँ रहल।
मि‍थि‍लांचलक उर्वर भूमि‍ रहने मनुष्‍योक बाढ़ि‍ सभ दि‍नसँ रहल, अखनो अछि‍ आगूओ रहत। कतबो मि‍थि‍लावासी पड़ाइन (पलायन) केलनि‍, दुनि‍याँक कोन-कोनमे बसलाह अछि‍, तैयो मि‍थि‍लाक जनसंख्‍या पर्याप्‍त अछि‍ये। जइसँ गरीबी रहल अछि‍। एक दृष्‍टि‍ये देखलासँ जहि‍ना पर्याप्‍त जनसंख्‍या अछि‍ तहि‍ना प्रचुर सम्‍पत्ति‍यो अछि‍। मुदा दुनूक संयोगमे भि‍न्नता अछि‍। जइसँ दुनूक बीच भारी खाधि‍ बनि‍ गेल अछि‍। जि‍नकर गाम ति‍नकर सम्‍पत्ति‍ नै आ जि‍नकर सम्‍पत्ति‍ ति‍नकर गाम नै। जइसँ मुट्ठी भरि‍ पूर्ण सम्‍पत्ति‍ हथि‍यौने छथि‍। जेकर ज्‍वलंत उदाहरण पड़ाइन (पलायन) अछि‍।
गरीबीक चलैत मि‍थि‍लावासी आइये नै पूर्वहि‍सँ नेपाल, बंगाल, अासाम धरि‍ रोजी-रोटीक लेल जाइत रहल छथि‍। पटुआ काटब, धान रोपब, धान काटब हुनका सबहक मुख्‍य कार्य छलनि‍। सालक छह मास ओ सभ कमाइ छलाह। मुदा ओइसँ पैघ-पैघ उपलब्‍धि‍ सेहो भेटल। अपना संग अपन भाषो, कलो-संस्‍कृत लेनौं अबैत छलाह आ लैयो जाइत छलाह जइसँ दुनूक बीचक संबंधमे प्रगाढ़ता अबैत रहल। एकठाम रहने दुनूक बीच सभ तरहक संबंध बनैत रहल आ अखनो प्रवाहमान धारा सदृश्‍य बहि‍ रहल अछि‍। तँए ऐ पावन अवसरपर समन्‍वय समि‍ति‍ संग वि‍द्योपति‍केँ कोटि‍श: नमस्‍कार!
पूर्वाचल आ मि‍थि‍ला, दुनूक बीच व्‍यापारि‍क संबंध सेहो अदौसँ रहल अछि‍। गाए-महि‍ंसिक व्‍यापार चलैत रहल अछि‍। संग-संग कलाकारक संग कलाक आदान-प्रदान सेहो चलैत रहल अछि‍। अखनो मि‍थि‍लाक श्रमि‍कक बीच जते पूर्वाचलक भाषा पसरल अछि‍ ओते मध्‍य आ उच्‍च परि‍वारक बीच नै अछि‍।
वि‍द्यापति‍ पर्व समारोहक ऐ पावन असवरपर वि‍द्यापति‍केँ ि‍सर्फ मि‍थि‍ले-मैथि‍ल कहब हुनका संग अन्‍याय करब हएत। हुनका आत्‍माकेँ ठेस पहुँचतनि‍। ओ युग-पुरूष छलाह। भाषा-साहि‍त्‍यक अपन धारा अछि‍। जइ धाराक मध्‍य ओ अखनो ठाढ़ छथि‍। वैदि‍क भाषा जखन जन-गणक बीच अपन साहि‍त्‍यि‍क धारा पकड़लक, तहि‍येसँ समाजमे एक नव समाज उठि‍ कऽ ठाढ़ भेल। ओ बढ़ैत-बढ़ैत कालि‍दास धरि‍ अबैत-अबैत सोझा-सोझी ठाढ़ भऽ गेल। मुदा जि‍नगीक लेल भाषा-अनि‍वार्य, तँए जन-गणक बीच पालि‍ भाषा उगल। तहि‍ना आगू बढ़ैत- प्राकृत, अपभ्रंश होइत अवहट्ठमे पहुँच गेल।
अवहट्ठक सीमानपर वि‍द्यापति‍ अपन कीर्तिलता लऽ कऽ ठाढ़ छथि‍। जइमे जन-गणक आत्‍मा झलकि‍ रहल छन्‍हि‍। ओना ओ संस्‍कृतक प्रगाढ़ पंडि‍त छलाह, जे हुनक रचनामे झलकि‍ रहल अछि‍, ओ उगना सन संगीक संग रहैत छलाह। जे उगना गंगाजल पहुँचबैत छलनि‍। एक भांग पीसैमे मस्‍त तँ दोसर पीब-पीब मस्‍त! एहनठाम हटलासँ, वि‍द्यापति‍ पत्नि‍योसँ झगड़ा कऽ उगना लेल नि‍ष्‍काम प्रेम धारा नै बहाबथि‍, से केहन होएत।
अंतमे, जहि‍ना अदौसँ एक-दोसर सटल रहलौं तहि‍ना आगूओ सटि‍ चलैत रही, यएह शुभ-कामना। एहेन-एहेन पर्व आरो नम्‍हर भऽ भऽ मनाओल जाइत रहए, यएह शुभेच्‍छा!
जय-मैथि‍ली! जय मि‍थि‍ला!!, जय कामरूप! जय भारत!! जय मानव!!!

— बृषेशचन्द्र लाल
बिद्यापति–स्मृति पर्व मादेँ —

बड़ सुख सार पाओल स्मरणे ...

एखन सम्पूर्ण मिथिला विद्यापतिमय अछि । नेपाल आ भारतक दुनू पारक मैथिलीभाषी अपन महान् साहित्यकार, जनउद्वेलक लोककवि तथा समाजक मार्गनिर्देशक कविकोकिल विद्यापतिक स्मरण श्रद्धापूर्वक कऽरहल अछि । विद्यापति अपन कालमे अपन विशिष्ट, अद्भूत आ हृदयस्पर्शी लोकलयसँ युक्त पदावलीसभक बलेँ सम्पूर्ण मिथिलाकेँ जोड़बेटा नहि कएलनि वरन् दूर–दूर तक एकर माथ गर्वसँ ऊँच कऽ देलनि । हिनक भक्ति पदावलीसभ वैष्णव सम्प्रदायक सभसँ लोकप्रिय तथा सन्तसभकलेल अध्यात्मिक अनुभूतिदायक बनि गेल । कविकोकिल एखनो सम्पूर्ण मिथिलाक एकताक डोर छथि । प्रत्येक वर्ष विद्यापति स्मृतिपर्वक अवसरपर सम्पूर्ण मैथिलीभाषी एक भऽ जाइत छथि । अन्तर्राष्ट्रिय सीमा बिला जाइत अछि आ हिनक किर्तिपताकाका दुनियाँभरिमे मैथिलभाषीसभपर गौरवक सौरभ छिटैत बहैत चलि जाइत अछि ।

विद्यापति स्मृतिदिवस मिथिलाञ्चलमे कविकोकिलक स्मरणटामे सिमित नहि अछि, आब ई मैथिलीभाषी क्षेत्रक भाषिक आन्दोलनप्रतिक एकवद्धता प्रदर्शनक दिवसक रुप लऽ नेने अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान आ एकरा राष्ट्रियभाषाक रुपमे पुनः सम्मानित आ प्रतिष्ठित कराबएहेतु सक्रिय मिथिलाक सपूतसभकलेल ई उर्जा प्राप्तिक पर्व बनि गेल अछि ।
भारतेमे नहि नेपालमे सेहो मैथिली–आन्दोलनक प्रारम्भ विद्यापति स्मृति दिवसक आयोजनसँ शुरु भेल छल । काठमाण्डूमे पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीक सक्रियतासँ नेपालमे एक भाषा—एक भेषक घोरऔपनिवेशिक मानसिकतासँ चालित राजाशाही क्रूर शासन आ एकदलीय तानाशाहीक सांस्कृतिक बिरोधक शुरुआत सेहो विद्यापति स्मृति पर्वक आयोजनसँ आगाँ आएल छल जकर अनुशरण बादमे अन्यान्य भाषाभाषीसभ सेहो कएलनि । नेवाररत्न शंखधरक स्मृतिमे पद्मरत्न तुलाधर आ हुनक संगीसभसँ न्हुदयाँ भिन्तुना दिवसक भव्य राजनीतिक आयोजन होमए लागल जे समूह एखन नेवार समुदायमे भाषिक आन्दोलनक नेतृत्व कऽ रहल अछि । पण्डित सुन्दर झा तहिआ पर्यटन मन्त्रालयमे कार्यरत छलाह । काठमाण्डूसँ फूलपातक प्रकाशन कऽ मैथिलीक प्रति मैथिलीभाषीसभमे अनुराग वृद्धि आ अपन मातृभाषामे साहित्य रचना करएलेल लोककेँ प्रेरित करक पुनित कार्यमे सत्रिmय छलाह । आईसँ २१ वर्ष पूर्व, काठमाण्डूक मारवाडी सेवा समितिमे आयोजित विद्यापति स्मृति समारोहमे हुनकाद्वारा प्रस्तुत सयगोट व्यङ्ग दोहासभक संग्रह सुन्दर शतसई धूम मचा देने छल । ओहि दोहासभमे तत्कालिन तानाशाही राजशाहीतन्त्रक विभिन्न विषय मादेँ अद्भूत कटाक्ष कएल गेल छल । सुन्दर शतसई अत्यन्त लोकप्रिय भेल आ दोहा लोकक ठोरपर बैसि गेलैक । एहि कारणेँ पण्डित सुन्दर झा शास्त्रीकेँ सरकारक प्रताडनक भागी बनए पडलनि । वृतिविकासपर नकारात्मक असर पडलनि । तथापि पण्डितजीक मैथिली प्रतिक अनुराग आ प्रतिवद्धता बढ़िते गेल आ अवकाशक बाद ओ पूर्णतः अही यज्ञमे लागि गेलाह जे जीवन पर्यन्त करिते रहलाह । जनकपुरमे पर्वक आयोजन, पत्रिका प्रकाशन, मैथिलीक वकालत — मैथिलीकेँ प्रतिष्ठित करएहेतु ओ अपन अन्तिम समयधरि समर्पित भऽ सक्रिय रहलाह । ओ जनकपुरक मुरलीचौकपर विद्यापतिक मूर्ति स्थापित करकहेतु सभकेँ आन्दोलित करैत रहलाह आ अन्तमे लोकतन्त्रक स्थापनाक बाद जखन हम नगरपालिकाक प्रमुख निर्वाचित भेलहुँ, हुनक ई सपना पूरा भेलनि । हुनकर अध्यक्षतामे निर्माण समिति गठित भेल । जनकपुरनगरपालिकाक अनुदानसँ विद्यापति टावरक निर्माण सम्पन्न भेल । एहि पुनित कार्यमे तत्कालिन धनुषा जिलाक सभापति रामसरोज यादवक सेहो महत्वपूर्ण योगदान छलनि । निर्माण कार्यमे शास्त्रीजी अत्यन्त स्वच्छ आ पारदर्शी रहए चाहैत छलाह जाहिसँ हुनकर अपने समितिक लोक हुनकर बिरोध करए लगलखिन । एहिसँ दुखित शास्त्रीजी निर्माण कार्यक अन्तमे निर्माण समितिक अध्यक्षता छोडि देलनि आ दोसरकेँ जिम्मा लगा देलनि । मुदा दुख असिमित रहनि । निर्माण समिति षडयन्त्रपूर्वक हुनका आ नगरप्रमुख रहितो हमरा सेहो उद्वघाटन कार्यक्रममे आमन्त्रित नहि कएलक । हमरासभ कहुना कार्य सम्पन्न होउक विमर्श कए चुप रहलहुँ । उद्वघाटन दिन शास्त्रीजी पश्चिम नेपालमे रहथि आ ओ एहि दुखकेँ वरण करैत स्वर्ग प्रस्थान कऽ देलनि । जनकपुर मैथिली अनुरागीसभक इतिहास ई एकगोट कलंक थिक ।

पंचायतकालमे एहन आयोजनसभ क्षेत्रीय भाषासभक अस्मिता एवं सम्मानक संघर्ष तथा एहिलेल लोकतन्त्रक अनिवार्यताक बोध कराबएदिस सेहो लक्ष्यित रहैत छल । समारोहमे पुलिस हस्तक्षेप होइत छलैक आ सहभागीसभकेँ हनुमानढ़ोकाक गुमसल ठाड़ थुनुवाघरमे अबेर रातितक थुनिकऽ राखल जाइत छलनि । रिहाईक समय होइत छल दूपहर राति — हड्डी गला देबएबला जाड़, पाला, उपरसँ तुसारो आ बहैत शीतलहरीमे सहभागीसभकेँ अपन डेरा जाए पड़ैत छलनि । शनैः पर्वक आयोजन पूर्वी नेपालक शहरसभमे होमए लागल । मिथिलाञ्चलक सांस्कृतिक आ भाषिक आन्दोलनक ई जड़ि बनि गेल ।

नेपालमे लोकतन्त्रक पुर्नस्थापनाक बाद पर्वक आयोजन मैथिलीप्रति मैथिलीभाषीक अनुरागक द्दोतक आ राज्यद्वारा भऽरहल भाषिक भेदभाव विरुद्ध संघर्ष दिस केन्द्रित भऽ गेल अछि । मैथिली साहित्यक पुनरुत्थान, प्रगति आ प्रतिष्ठापनहेतु एहिसँ वत्र्तमान पीढ़ीमे उल्लेखनीय चेतना आ सजगताक अभिवृद्धि भेल अछि । मिथिलाक हरेक सामुदायिक आ शिक्षण संस्थासभमे आब एकहि दिन वा परिस्थिति अनुसार एकाधदिन आगाँपाछाँ पर्वक आयोजन सभ जाति आ वर्गक मैथिलीभाषीमे एकवद्धताक सूत्रक रुपमे विद्यापतिक नामक महत्वक ठोस प्रमाण अछि ।

जन्म, काल आ प्रतिभाक विरासत

विद्यापति वास्तवमे सरस्वती–पुत्र आ विद्याक अधिपति छलाह । भाषा आ साहित्यमे योगदानक सन्दर्भमे हुनक स्थान इटलीक दा“ते आ बेलायतक चौसर जका“ छन्हि । साहित्यिक रचनाकारक संगहिं विद्यापति सफल कूटनीतिज्ञक भूमिका करैत मिथिलाक भूमिक संरक्षणलेल अपन दायिŒवक निर्वाह सेहो कएलनि । मैथिलीक अद्वितीय सेवक विद्यापतिक काल एखनतक सुनिश्चित नहि कएल जा सकल अछि, मुदा अन्वेषकसभक मत छन्हि जे ओ इस्वी सन् १३५० सँ १४४० धरि रहथि । हुनक जन्म गढा बिस्फी गाममे कश्यप गोत्रीय मैथिल ब्राह्मण परिवारमे भेल रहनि । १४०२ ई.मे हुनका अपन जन्मस्थान बिस्फी ग्राम प्रदान कएल गेल रहनि जे सम्प्रति मिथिलाञ्चलक भारतक बिहार राज्यक मधुबनी जिलामे अवस्थित अछि । १४४८मे ओ श्रीमद्भागवत्क प्रतिलिपि तैयार कएने रहथिन्ह आ राजा शिवसिंहक मृत्यु (ई.१४०२)क ३२ बर्षबाद तक ओ जिवित रहलथि से प्रमाणित भए गेल अछि । ओ अपन भनिता आ कृतिसभमे मिथिलाक ओइनिवार वंशीय राजा शिवसिंहसँ भैरवसिंह तकक सम्पर्कमे रहलथि से उल्लेख कएने छथि । अपन मृत्युक तिथिक सम्बन्धमे ओ अपने कहने छथि æविद्यापतिक आयुअवसान कातिक धवल त्रियोदशी जान” । एकरे आधार मानि कातिक धवल त्रियोदशी तिथिमे हुनक स्मृति पर्व मनाओल जाइत अछि ।

विद्यापतिकेँ प्रतिभाक विरासत अपन उच्च पूर्वजसभसँ प्राप्त भेलनि । विष्ण्ु ठाकुर–श्र हरदित्य–श्र कर्मदित्य–श्र देवदित्य–श्र धिरेश्वर–श्र जयदत्त–श्र गणपति आ तखन हुनकर पुत्र विद्यापति । मायक नाम रहनि गंंगादेवी । देवदित्यक सभसँ जेठ बालक मिथिलाक कर्णाट राजा शत्रm सिंहक युद्ध आ शान्तिक मन्त्री रहथिन अर्थात् विदेश विभाग सम्बन्ध प्रमुख । ओ दशकर्मपद्धतिक रचना कएने रहथि । हुनक पुत्र चन्देश्वर धर्मशास्त्र, राजनीति आ ज्योतिषक प्रकाण्ड विद्वान रहथिन । तहिना देवदित्यक दोसर पुत्र गणेश्वर ठाकुर सुगतिसोपान् तथा गंगापट्टालकाक रचना कएने रहथि । हुनक जेठ बालक रामदत्त महादानपद्धति रचलनि । सभसँ छोट पुत्र विष्णुक भक्तिमे गोविन्दमानसोल्लास लिखने रहथिन । विद्यापतिक पूर्वजसभ राजासभक भण्डारिका, स्थानान्तारिका आदि पदसभपर सेहो काज कएने रहथि । मातृपक्ष सेहो राजासभक दरबारक प्रमुख पदाधिकारी रहलखिन ।

कविकोकिल – हिनक रचना आ प्रभाव

मैथिलीक प्रसिद्ध कवि विद्यापतिके“ कविकोकिल कहल जाइत छन्हि । विद्यापतिक प्रति सम्मान स्वरुप सभतरि यएह विशेषणक प्रयोग कएल जाइत अछि । विद्यापतिके“ कविकोकिल किएक कहल गेलन्हि ? कहियास“ कहल गेलन्हि ? प्रायः एहि प्रश्नक ठीकठीक उत्तर किनको लग नहि छन्हि । विद्यापति नीक गायक छलाह । हुनक कण्ठ मधुर छलन्हि । हुनक प्रस्तुतिक कला, हुनक राग–लय–छन्द–अलंकारक अद्भूत संयोजनस“ लोक मुग्ध आ सम्मोहित भद्र जाइत छल । प्रायः तै“ हुनका लोक कविकोकिल कहने हएतनि । मुदा एहि सन्दर्भमे एक गोट ज्ञातव्य जे अपन लेखनीस“ सभस“ पहिने हिन्दीक प्रसिद्ध समालोचक डा.रामवृक्ष बेनीपुरी विद्यापतिके“ कविकोकिल कहलखिन्ह । विद्यापति पदावलीक भूमिकामे ओ लिखने छथि — मैथिली राका रजनी के राकेश कविकोकिल विद्यापति .... । डा. बेनीपुरीक एहि टिप्पणीक बाद कविवर विद्यापतिक सम्बन्धमे कोनो मनतव्य, आलेख आदिक सभस“ पहिल आस्पद रहैत अछि — कविकोकिल विद्यापति !

विद्यापतिक लेखन, विषय र भाषाक्षेत्र व्यापक आ विशाल छल । हुनकर रचना संस्कृत, प्राकृत, मैथिली आ अबहठ्ठमे प्राप्त भेल अछि । मैथिलीमे शक्ति–आराधना, नचारी, कृष्ण–लीला, प्रणय सहितक विषयपर हजारसँ फजिल गीत परिचित अछि । अबहठ्ठमे दूगोट खण्डकाव्य कित्र्तिलता आ कित्र्तिपताका तथा संस्कृत–प्राकृत–मैथिलीमेगोरक्षविजय आ संस्कृत–प्राकृतमे मणिमञ्जरी नाटकसभ उपलब्ध अछि । संस्कृतमे हुनक लिखल ग्रन्थसभकेँ शास्त्रीय आ व्यवहारोपयोगी मानल जाइत अछि । शिक्षाप्रद रोचक कथासभक संकलन पुरुषपरीक्षा तथा अभिलेखाङ्कन नमूनाक शासनोपयोगी पत्राचारसभक लिखनावली विश्वविख्यात अछि । विद्यापतिका यात्रा साहित्य भूपरिक्रमण, धर्मशास्त्र र कर्मकाण्डका पारम्परिक ग्रन्थसभ विभागसार, शैवसर्वस्वसार, दुर्गाभक्ति तरङ्गिनि, दानवाक्यावली, गङ्गावाक्यावली, गयापत्तलक, बर्षकृत्य, ब्याडी भक्तितरङ्गिनि आदि अमर कृति अछि । एहिसभ कृतिमे तखुनका समयक ऐतिहासिक सूचना एवं समकालिन सामाजिक चित्रण देखल जाइछ । कित्र्तिलता विद्यापतिक पहिल कृति मानल जाइत अछि । ओहि कालमे विद्वानसभ अपन रचना संस्कृतमे करैत रहथि । मुदा, विद्यापति अपन पहिल कृति मैथिलीमे लिखलनि आ मैथिलीमे लिखक कारण आ महत्व सेहो स्पष्ट कएलनि — देसिल बअना सब जनमिठ्ठा, ते“ तैसन जम्पओ अवहट्ठा । कित्र्तिपताकामे मैथिलीमे प्रेम सम्बन्धी कमनीय कवितासभ अछि । शैवसर्वस्वसारमे भवसिंहसँ विश्वासदेवीतकक कीर्तिकथा विरुदावली शैलीमे वर्णित अछि । गंगावाक्यावली आ दुर्गाभत्तिmतरंगिणी गंगा एवं शत्तिmक उपासनामे रचित रचनासभक संग्रह अछि ।

बंगाली साहित्यमे विद्यापतिक जर्बदस्त प्रभाव छन्हि । चण्डीदासक समयमे हुनका बंगाली कविमे रुपमे जानल जाइत रहन्हि । कतेक विद्वान तँ विद्यापतिकेँ जेसोरक ब्राह्मण भावानन्द रायक पुत्र बसन्त राय सिद्ध करक कोशिश करैैत छथि । प्रमाणस्वरुप ओसभ पद–कल्पतरुक १३१७ पदक उल्लेख करैत छथि जाहिमे एहि नामक प्रयोग भेल छैक । चण्डीदास वैष्णव सम्प्रदायक रहथि । विद्वान रोमेश चन्द्र दत्तक कहब छन्हि जे विद्यापतिक रचनाकेँ चण्डीदासक समयमे दोसरक रचनामे मिझरादेल जाइक आ बेसी काल दोसर रचनाकार अपन रचना विद्यापतिक नामेँ करथि । दत्तक अनुसार चण्डीदास बहुत बादमे अएलाह । मुदा ई तथ्य निश्चित अछि जे विद्यापतिक प्रभाव कृष्णकित्र्तनपर जर्बदस्त रहनि । ग्रीयरसन एहि मादेँ Maithili Chrestomathy क पृष्ठ ३४मे लिखैत छथि — And now a curious circumstance arose, unparalleled I believe in the history of literature..(His songs) were twisted and contorted, lengthened and curtailed, in the procrustean bed of the Bengali language and metre into a kind of bastard language neither Bengali nor Maithili. But this was not all. A host of imitators sprang up notably one Basant Roy of Jessore, who wrote, under the name of Vidyapati in this bastard language, songs which in their form bore a considerable resemblance to the matter of our poet, but which almost entirely wanted the polish and felicity of expression of the old master-singer … (These imitation songs known as “Brajbuli” songs) became gradually more popular amongst the Bengali people than the real songs of Vidyapati.”डा. सुकुमार सेन अपन History of Brajbuli मे ब्रजबोलीक सभ कविसभक विवरण देने छथिन । ध्यान देबए योग्य छैक जे ओहि समयक प्रभाव रविन्द्रनाथ ठाकुरपर सेहो पड़लनि । ओ भानुसिंह ठाकुरेर पदावली मे भानुसिंहक नामसँ एहन बहुतो पद लिखने छथि ।

तहिना आसमिया साहित्यपर सेहो कविकोकिल विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट रुपसँ पड़ल अछि । ब्रजबोली अर्थात् मैथिलीककेँ असाममे शंकरदेव लऽ गेलाह । ओ वैष्णव सम्प्रदायक प्रचारमे विद्यापतिक भजनसभक उपयोग कएलनि । असमिया भाषाक इतिहासमे ब्रजबोलीक महŒवपूर्ण स्थान छैक । असमिया भाषाक विकासक आधार ठाढ़ करएमे एकर योगदानक चर्च The Department of Historical Antiquities, Government of Assam, Gauhati द्वारा प्रकाशित सामग्रीमे भेटैत अछि ।

डा. सुकुमार सेन श्री चैतन्यदेव आ रामानन्दक वर्णन कएने छथि । रामानन्द ब्रजबोलीमे विद्यापति प्रभावित पदसभक रचना कऽ मधुर संगीतक संगेँ गबैत छलाह । एहिसँ ओडिसामे विद्यापतिक प्रभाव स्पष्ट देखएमे अबैत अछि । सोरहम शताब्दीमे चम्पति राय, महाराव प्रताप, रुद्रदेव, माधवी दास, कान्हु दास, मुरारी आ सतरहम् शताब्दीमे दामोदर दास, चन्दा कवि, यदुपति दास आदिक रचनामे विद्यापतिक प्रभावसाफे देखएमे अबैत अछि । विद्वानसभक कहब छनि जे एहि सन्दर्भमे आओर अनुसन्धान किछु आओर महŒवपूर्ण तथ्यसभ बाहर आनत ।

नेपालीक कवि भानुभक्तक बधूशिक्षा विद्यापतिक पुरुषपरीक्षापर आधारित अछि । एहि सन्दर्भमे प्रसिद्ध विद्वान डा. राजेन्द्र पसाद विमलजीक कहब छनि जे नेपालीक आदिकवि भानुभत्तm गजाधर सोतीक ओहिठाम एक राति बितोलन्हि आ तकरबाद बधूशिक्षाक रचना कएलन्हि । बधूशिक्षाक शैली विद्यापतिक पुरुषपरीक्षा सनक अछि । डा. विमलक अनुमान छन्हि जे जखन विद्यापति बनौलीमे आएल हएताह तकरबाद हुनक आश्रयदाता सोत्रिय कुलक किछु सोइतसभ तत्कालिन राज्यसत्ताक भयक कारणे“ पश्चिम नेपालक तनहु“ तम्घास क्षेत्रमे जा कए बैसि गेलखिन्ह, जे बादमे सोती ब्राह्मणक रुपमे परिणत भए गेलाह । भानुभक्त हुनका ओतए साहित्यिक चर्चाक क्रममे पुरुषपरीक्षास“ परिचित भए बधूशिक्षाक रचनाक लेल प्रेरित भेल हएताह ।

नेपालमे विद्यापतिक प्रभावक चर्च करैत काल सोचए पड़त जे तहिया नेपाल आ भारतक बीच एखन जकाँ सीमा कहाँ रहैक ? काठमाण्डू उपत्यकामे मैथिलीक स्थान केहन रहैक तकर अन्दाज एतबेसँ कएल जा सकैत अछि जे मल्ल राजासभ मैथिलीमे रचैथ आ एना कऽ ओ अपन विद्वता देखाबथि । अपनाकेँ गौरवान्वित बुझथि । बनौलीमे विद्यापतिक प्रवास आ एतए रचित पदावलीसभक अपने कथा अछि । नेपालक एखुनका तथाकथित विद्वानसभ नेपालक बहुतो तथ्यकेँ नुकाबक दुष्प्रयत्न करैत आबिरहल छथि । ओसभ अपन अज्ञानतावश नेपालकेँ स्वतनत्र आ अलग राष्ट्रिताक प्रमाणित करएलेल ऐतिहासिक तथ्यसभकेँ नुकबक कोशिशमे छथि । मैथिली आ विद्यापतिसँ सम्बन्धित बहुतो वास्तविकता अही कारणेँ अन्हार गुफासँ बाहर निकलि नहि पाबिरहल अछि । एहिलेल स्वतन्त्र आ निष्पक्ष अनुसन्धानक जरुरत अछि ।
(प्रस्तुत लेख काठमाण्डूसँ प्रकाशित अप्पन मिथिलाक अगहन २०६८ (२०११) वर्ष १ अंक ६ विद्यापति विशेषांकमे विद्यापति मैथिल एकताक डोर शिर्षकसँ प्रकाशित भेल अछि ।-साभार)
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सत्यनारायण झा
कथा

Suggested citation: अनिल मल्लिक. “हम, देह आ विदेह.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 97, 2012-01-01. https://www.videha.co.in/research/2012/97/हम-देह-आ-विदेह.htm

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