विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

यशोधरा

कामिनी कामायनी · 2012-01-15 · अंक 98

३.२.१.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.रूबी झा
३.३.१.जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.धीरेन्द्र प्रेमर्षि ३.निक्की प्रियदर्शिनी- दूटा कविता ४.जगदानंद झा 'मनु' -गीत-गजल
३.४.१.विनीत उत्पल २. पंकज कुमार झा
३.५.गणेश कुमार झा "बावरा"
३.६.१.निशांत झा २.किशन कारीगर
३.७.१.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा"
३.८.नवीन ठाकुर
कामिनी कामायनी
2011 दिसंबर मास मे महात्मा बुद्व के महासंबोधि प्राप्ति के 2600 बरख भेलोपरांत ’हम हुनक अद्र्धांगिनी के मोन पाङैत ई काव्य कुसुम हुनक चरण कमलेषु मे समर्पित कय रहल छी । ..
यशोधरा
मुरूछा टूटै .. लोक कहै छल
धीरज धरू पटरानी
सून ऑखि सॅ भवन निहारैत
फेर खसैथ महारानी ।
टिकुली भाल सॅ खसल भिन्न भ’
लट सबटा छिङियायल ।
अस्त व्यस्त सब असन वसन छल
गाल प नोर सुखायल ।
पङल पलंग प’ चित्त बेसुद्व
संगी चेरी सब हिचुकैत ठाढ।
ऑखि खुजैन्ह त’ हेरैत चहुॅ दिस
आखीर कोना खुजलै केवाङ।
दिप .दिप . दिप. दिप दीप जरै छल
अहिना आधी रतिया ।
ज्वार उठाबैत मोन पङैत छल
रहि रहि बीतल बतिया ।
रंग महल के लाल सोनहरा
लिखल सब दरवाजा ।
मुदा नै कत्तौ बाजि रहल छल
दुंदुभि वा बाजा ।
सोइरी गृह मे पङल किशोरी
बनल हलाल के बकरी ।
बैरीन नींद ऑखि मे पैसल
लुटा गेल सब गठरी ।
नाथ निकसि क’ द्वार फोलल त’
जोत किएक नै मिझायल ।
कत्तो कोनो खट खूट होयतै
ऑखि हमर खूजि जैतै ।
हम कलंकिनी पङल रहि गेलहु
सुख सॅ सुतल ओछावन ।
भटकै लै ओ विदा भ’ गेला
दुर्गम जंगम वन कानन ।
कोना जीयब अहि सून भवन मे
हिय हम्मर कॉपैत अछि ।
मुईला प सब के डाहै छै
जीबतै हम डहि जाय छी ।
हॅसै छलथि उद्यान मे कहियो
कखनो एको पल ल्ोल ।
तृप्त होय छल मन मंदिर
हरियर भाव जगै छल ।
मुखारविन्द प’ छिटकल हुनकर
कारी कारी कुंतल ।
हुलसि हवा सॅ गप्प करै छल
झूमि झूमि क’ चंचल ।
ई दुधमूहॉ बालक लग मे
काल बनि जनु आयल ।
क्षण मात्र मे भवन त्यागि क’
सब वैभव के बिसरायल ।
नामकरण ओ अपने कयला
बिनु पंडित बिन ज्ञानी ।
पिता के प्रेम कतय सौं पाओत
ई निरदोष परानी ।
कोना क’ झूलत बॉहि जनक के
कोरा कॉख लै’ तरसत ।
चान सन अहि नेना के देखि
मुख मंडल केकर हरषत ।
फेर कहथि अहि नेना के दोष की
भस्म भेल ओ हमर कपार ।
देखि क’ धधरा विरहिणीके
थमि जायत छै बहैत बयार ।
रचलन्हि कोन विधाता हमरा
चिकनी माटि गढि गढि ।
जानै किएक कहै छल सब कियो
लछमी हमरा बढि बढि ।
तजि गेला एकांत भवन मे
त्रुटि हमरो किछु हेतै ।
निशारात्रि मे सिंहद्वार सॅ
अकारण किए कियो जेत्तै ।
अपना मे एतेक डूबल छथि
सोचि नै सकला हम्मर ।
कोना गिन गिन हम दिवस गमायब
मुॅह हेरब हम कक्कर ।
अजगूत रूप धरि देलन्हि विधाता
ओही मानुष के तन मे।
मन मे छल वैराग्य समाओल
रहितथि कोना भवन में ।
लहठी कंगन पाजेब बिछिया
हार नवलखा हीरा ।
कर्णफूल नकबेसर .. ड़ढकस
औंठी .. नथुनी .. सीथिया. .।
तजली सब सिंगार की
काजरि बास ने ऑखि लेलक।
अटोर पटोर सतरंगी चुनरिया
अगिन के संपत्ति बनि गेल ।
पीत वस्त्र एक धारण कयलन्हि
जोगिन रूप बनाओल ।
कठोर व्रत दिन बन्हल छल
राग मोह सब भागल ।
ओ संन्यासी महल के बाहरि
हम जोगिनिया भीतर ।
एकसंझा जे अन्न उसीनल
उदरपूर्ति के लायक ।
देखि फूलकुमरि के दुर्गति
जनक भाय सब आयल ।
नहि गेली मुदा छोङि डीह
कतबो कियो समझाओल ।
ओ सुन्नरि सर्वांग एखनि धरि
रूपक छलीह बखारी।
दूर लग के राजा कतेको
पठबए लागल पुछारी ।
रानी मुदा सज्ञानी एतेक
मन सॅ कखनो नहिं हारल ।
करि बहाना जतन जतन सॅ
सब के लग सॅ टारल ।
आब हमर जीवन वसंत सब
हुनके संग रमल अछि ।
जाहि मार्ग प’ नाथ चलै छथि
मन हमरो संग चलल अछि ।
वृद्व शूद्वोधन देखि दृश्य सब
नोचथि अप्पन माथा ।
आर कतेक दुख देखय लेल
रखने जीवित विधाता ।
तजला प्राण हवेली के’
बाहरि जाकए एकरा ।
ओ तजली सब वैभव अन्नधन
भ’ घर मे एकसरहा ।
रोज सुरूज के जल चढा’ क’
मीनती मने मन करलन्हि ।
वन वन में जे फिरि रहल छथि
हुनकर पीर सब हरबैन्ह ।
तेज घाम मे बूलैत टहलैत
हेता भुक्खल पियासल ।
गरा सॅ नीचा पानि नै उतरैन्ह
लागै सब किछु डाहल ।
सूुन भवन चमगादङि बाजै
दीप मिझल दीपदानी ।
दिवस कतेको पट नहि खोलथि
विरह मे रमल दीवानी ।
आब सखी ई कारी बादरि
ंमोन मे आगि पजारै ।
उमङि घुमङि चहुॅठाम सॅ बुलि क’
हमरे छत चित्कारै ।
बरसि बरसि सब दिस डूबा देल
दादूर झिंगुर बाजै ।
राति राति भर जागल चिल्का
सेहो पीर बढाबै ।
पानि बूनी मे भींज भींज क’
हेता कोना सौभाग्य हमर ।
कोमल काया पान फूल सन
छल न्ौ रौद बसात जोगर।
सुून भयौन जंगल मे हुनका
भानस के करि देतैन्ह।
जौं संग हमरा नेने रहितथि
ई दुख हम हरिलैतियैन्ह ।
कहै लोक सब छह बरख धरि
पता नहि कोनो ठेकाना।
कत्त कत्त नै दूत पठाबैथ
हारल सन महाराना ।
जतय कखनो चर्च हो हुनकर
सखी सब दोैग पङै फुरती सॅ ।
कान सुनै किछु हुनक खिस्सा
दृग बहै मस्त ी सॅ ।
अहि जनम की नाथ फेर सॅ
दर्शन पायत ई दासी ।
सोचि सोचि ओही परम पुरूष के
नीत दिन रहैन्ह उदासी ।
हाथ के रेखा रहि रहि देखैथ
बजबैथ पंडित ध्यानी ।
कि गुनल अछि करम मे हमरा
कहियौ पोथी बखानी ।
पतरा पोथा ल’ सब चुप छल
ई होनी त’ होनी छल ।
कोना क’ रोकि देता महाराज
कतबो करितथि छल वा’ बल ।
बाट घाट सॅ आनि पकङि
सेवक जन साधु लाबै ।
जंतर मंतर जादू टोना
सबहक नियम बताबै ।
ओझा गुनी दिन गुनै छल
दिसा दिस उच्चारै ।
कतेक दिवस धरि खेल चलल ई
किछु नै घाट उतारै ।
माईट आनै श्मशान सॅ
प्राण प्रिय सब चेरी ।
छिटै कियो बाट गंगा जल
शंख बजाबै ढेरी ।
ंमुदा लिखल के मेटा सकल कियो
ओ पकिया रंग सियाही ।
निष्क्रिय शासक बैस रहल छल
देखैत अपन तबाही ।
कपिलवस्तु के धुरि कनै छल
फफकि फफकि क’ हरदम ।
तीरथ बनै भलै भविष्य मे
एखनि त’ शोक सॅ सकदम ।
मूॅह सॅ वाक निकसबा खातिर
तरसैत रहि जाए गरै मे ।
हॅसी राज्य सॅ दूर पङा गेल
छोङि व्यथा नगरे में।
एला जखन प्रिय ज्ञानी भ’ क’
छह बरखक’ अन्तर प’।
महल अटरिया उमकए लगलै
नैन टिकल सुन्नर जोगी पर ।
शुक़ . पिक़ . . शुभ बोली बाजल
उङल चलल लग आयल ।
ंमाल जालसब दौगि दौगि क’
अप्पन नेह देखायल ।
सखी समेत विमाता आयल
छोङि क’ अपन धूनि ।
बांधव जन के घेर मे बैसल
मुस्कैत छल नव मुनि ।
मात्र क्षण मे बिजुरि चमैक गेल
बंद ऑखि के आगॉ।
महाभाग प्रिय कांत आयल छथि
मन बाजल भ’ बाजा ।
बलजोरि मन रोकि उठल छली
बेलगाम सब घोङा ।
एना किए उताहुल भेलौं
अपने औता ओ सोझॉ ।
सपन देखल भोर पहर
ओ देसदेस बूलै छथि ।
आगॉ पाछॉ टाढ जनि सब
उपदेश गुरू के सुनै छथि ।
ऑखि सॅ देखता संन्यासिन के
झूलसल झरकल काया ।
उठै किंस्यात मन मे कनिको
अहि अधम लेल माया ।
एला नाथ त’ ध्यान मे बैसल
मुस्कैत छली महाजोगिन ।
परम दृष्टि सॅ शाक्य हेरलखिन्ह
इहो रूप केहेन कय लन्हि ।
नजरि खूजल त’ चित्त शांत छल
नै कोनो अवसाद छूपल ।
नहि छल कोनो राग द्वेष
नहिं ऑखि मे कोनो भाव बेकल ।
कत्तेक ओज ओहि मुख मंडल पर
सहस्त्रों सूरज जेना एके ठाम ।
स्थिर ऑखि .. चुप .. .मौन बैसल
जीवन मात्र विराम विराम ।
क्षण मात्र मे प्रजा उठि क’
ओहि मार्ग प’ चलै लै बेकल।
भाय भतीजा . . मातु .. भार्या
सब नतमस्तक भ’ दीक्षा लेलक’।
भिक्खुनी बनल चलल यशोधरा
मुनि के पाछॉ पाछॉ ।
मन त’ पहिने त्यागि चुकल सब
तन के आब की बाधा ।
जीवन के चरम उद्देश्य बूझि
बंधन मे किए रहै प्राणी ।
छाया बनि क’ मनुक्ख रहै छै
आगॉ चलै पिहानी।
ठाम ठाममे बुलि बुलि क’
देखल दूखक जीवन ।
कोना नोर सॅ नोर बहै छै
सुनि मुख कष्टक वर्णन ।
बौद्व विहार शरण स्थली भेल
ध्यान .. चिंतन. . . उपवास मनन के ।
तजि पोथी वेद उपनिषद .. . .
मानव के सहज सरल जीवन के ।
कष्ट भरल अहि संसार सॅ
पार उबारय के बेङा ।
साधन सामथ्र्यहीन स्त्री के
नेत्री भेलीह यशोधरा ।
सबहक लहकैत दग्ध हृदय पर
शाश्वत सत्य के लेप लगा ।
शांत कयल जखन महाभिक्खुनि
ऑखि फाङि क’ लोक हेरल ।
अलख जगौने जखन चलै छल
महादेवी संग जन्नी जाति ।
दृश्य निहारि क’ भरि जायत छल
जङ चेतन के छाति ऑखि ।
माटि के कण कण सटि क’
महासुन्नरि के तरबा सॅ
कहै सखी हमरा नहि तजबै
हम गहने छी कहिया सॅ ।
हमरो ई अभिलाष छल की
बुद्व के रूपमति रानी।
चलै राह पर जनम सुफल करि
जन .जन के कल्याण करैथ।
आस पङोस के राज मे पहुॅचल
विद्युत तरंग सन यशुके गान
राजकुवॅरि किछु पछोङ धेलन्हि
राजागण लेल बुद्व के नाम ।
सही अर्थ मे ई सहचरि छल
बुद्व एहेन परतापी के
जौं ओ छल हेता ब्रह्य त’
ई साक्षात ब्रह्यानी छल
प्हिल बेर इतिहास मे नारि
राज तजि संन्यास चुनल ।
दीन दुखी शोषित प्रताङित
लेल अपन दृष्टि फोलल ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.रूबी झा

Suggested citation: कामिनी कामायनी. “यशोधरा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 98, 2012-01-15. https://www.videha.co.in/research/2012/98/यशोधरा.htm

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