विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गजलक लेल: समीक्षा

ओम प्रकाश · 2013-03-01 · अंक 125

गजलक लेल (समीक्षा)
श्री विजय नाथ झाजीक गीत-गजल संग्रहक पोथीक नाम अछि "अहींक लेल"। ऐ पोथीमे गीत आ गजलक फराक-फराक दूटा प्रभाग छै। हम ऐ पोथीक गजल प्रभागक संबंधमे ऐठाँ किछु चर्चा करऽ चाहब। ऐ पोथीमे गजलकार श्री विजय नाथ झाजीक अठहतरिटा गजल प्रकाशित भेल अछि। पोथीक गजल पढलासँ ई पता चलैत अछि जे किछु गजल केँ छोडिकऽ बेसी ठाँ काफिया आ रदीफक निअमक पालन कएल गेल अछि। पृष्ठ संख्या ४७, ५०, ५४, ५५, ५६, ६७, ७१, ७४, ७५, ८२, ९४, १०१, ११०, ११४ पर छपल गजलमे काफिया गडबडाएल अछि। ऐठाँ ई धेआनमे राखबाक चाही जे बिना दुरुस्त काफियाक रचना गजल नै भऽ सकैए। तखनो अधिकांश गजलक काफिया दुरुस्त अछि, जे गजलक विकास यात्राक हिसाबेँ एकटा नीक लक्षण अछि। काफिया, रदीफ आ गजलक व्याकरणक निअम पालन करबाक हिसाबेँ गजलकार ओहि गजलकार सभसँ फराक श्रेणीमे छथि जे गजलक व्याकरणकेँ नै मानबाक सप्पत खएने छथि।
ऐ गजल संग्रहक गजल सब कोन बहरमे लीखल गेल अछि, ऐ पर गजलकार मौन छथि। गजलक नीचाँमे बहरक नाम जरूर लीखल जएबाक चाही। बहरक ज्ञान नब पीढीक गजलकार सभमे बढेबामे ई महत्वपूर्ण डेग हएत। ओना तँ गजलकार कोनो गजलक नीचाँमे बहरक नाम नै लीखने छथि, मुदा गजल सभकेँ पढलासँ ई पता चलैत छै जे ऐ संग्रहक ढेरी गजल एहन अछि जाहिमे अरबी बहरक निअमक पालन करबाक नीक प्रयास कएल गेल अछि। ई स्वागत योग्य गप अछि। ऐसँ इहो पता चलैत अछि जे गजलकार अरबी बहरसँ नीक जकाँ परिचित छथि आ जँ ई बात अछि तँ हुनका बहरक नाम गजलक नीचाँमे फरिछाकेँ लीखबाक चाही। ऐ संदर्भमे हम पोथीक सबसँ पहिलुक गजलक (पृष्ठ संख्या ४५) मतलाकेँ उद्धृत करऽ चाहै छी-
हमर पूजा, हमर परिचय, हमर शृंगार छी अपने
सकल सौभाग्य, मन, काया, रुधिर-संचार छी अपने
आब एकर मात्रा संरचना पर धेआन दिऔ, तँ पता चलै छै जे ऐमे मूल ध्वनि मफाईलुन माने "ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ" सब पाँतिमे चारि बेर प्रयोग कएल गेल अछि। माने ई शेर बहरे-हजजमे कहल गेल छै। ऐ गजलक आनो शेरमे मोटामोटी किछु गलतीकेँ छोडि बहरे-हजजक प्रयोग अछि आ किछुठाँ वर्ण दुरुस्त कऽ देला पर ई गजल अरबी बहर बहरे-हजजमे अछि। ई एकटा उदाहरण अछि, एहन आरो गजल ऐ संग्रहमे छै जे वर्ण आ मात्रामे किछु परिवर्तन भेला पर अरबी बहरमे कहल मानल जाएत। हमरा ई आस अछि जे गजलकार अपन अगिला गजल संग्रहमे ऐ बातक धेआन राखताह आ अरबी बहर युक्त गजल कहिकऽ मैथिली गजलकेँ समृद्ध करताह। शेरक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम वा कोनो विराम चिन्ह नै लगेबाक निअम अछि, मुदा पोथीक गजलक शेर सभक पाँतिक अंतमे पूर्ण विराम लगाओल गेल अछि, जे निअमानुकूल नै अछि आ एकर धेआन राखल जएबाक चाही छल।
संवेदनाक स्तरपर ई गजल संग्रह बड्ड नीक अछि आ गजलकारक विद्वताकेँ प्रकट करैत अछि। मुदा कएकठाँ भारी भरकम तत्सम आ संस्कृतक शब्दक प्रयोग गजलकेँ बूझबामे भारी बनबैत छै, जाहिसँ बचल जा सकैत छल। गजलमे क्लासिकल भाषाक प्रयोग नहिए हेबाक चाही, अपितु आम प्रयोगक भाषाक प्रयोग गजलक लेल बेसी नीक होइत छै। शेरमे एहन शब्दक प्रयोग जे आम बेबहारमे नै छै, गजलकारक शब्द सामर्थ्यकेँ तँ जरूर देखाबैत छै, मुदा शेरकेँ आम जनसँ दूर सेहो करैत छै। तैं शेर कहबाक काल हमरा हिसाबेँ बेसी क्लिष्ट भाषाक प्रयोगसँ बचबाक चाही।
अंतमे ई कहल जा सकैए जे "अहींक लेल" पोथीक गजल प्रभाग मैथिली गजलक विकसित होइत रूपकेँ अस्पष्टे रूपेँ, मुदा देखबैत जरूर अछि। ई पोथी गजलक व्याकरणक हिसाबेँ किछु गलतीकेँ छोडिकऽ नीक प्रयास अछि। ऐ संग्रहक कएकटा शेरमे अरबी बहरक पालनक प्रयास महत्वपूर्ण आ नोटिस करबाक जोग अछि। कएकठाँ क्लिष्ट आ संस्कृतनिष्ठ शब्दक प्रयोगकेँ जँ कात कए कऽ देखल जाइ तँ संवेदनात्मक स्तरपर सेहो ई संग्रह नीक अछि। मैथिली गजलक विकास यात्रामे ई पोथी गजलक भविष्यक लेल नीक डेग अछि।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा- जनक हाथे खेती २.बिन्देश्वर ठाकुर- बिपतियाक विदेश [विहनि कथा ]

जगदीश प्रसाद मण्‍डलक वि‍हनि‍ कथा
जनक हाथे खेती
दतमनि‍ काटए भैयाकाका हँसुआ नेने धड़फड़ाएल बॅसबि‍टी दि‍स जाइत छलाह आकि‍ रस्‍तेमे नुनुआँ पुछलकनि‍- “भैयाकाका, सरोसती पूजा कहि‍या छि‍ऐ?”
काजमे वि‍लम होइ दुआरे भैयाकाकाक मनमे उठलनि‍, जखन पुछलक आ नै कहबै ई उचि‍त नै। जखन काका बुझैए तखन अपनो तँ दायि‍त्‍व बनैए। मुदा लगले मनमे उठलनि‍, आठ दि‍नसँ पतरो नै उनटेलौं तखन ओहि‍ना केना कहि‍ देबै। आब कि‍ ओ समए रहल जे श्राद्ध कर्म करबै काल एक गोटे करबै छलाह आ दोसर गोटे वि‍धि-वि‍धान देखैत छलाह। मुदा जतए जे होउ से होउ। अपना मनक मौजी बहुकेँ कहलौं भौजी जे कहतै से कहौ मुदा हूसल बात नै बाजब। नुनुआँकेँ कहलखि‍न- “बौआ, आठ िदन पतरा देखना भऽ गेल, देखि‍ कऽ कहबौ। अखन दतमनि‍ काटए जाइ छी, नइ बरदेबौ।”
जहि‍ना गामक सभ भैयाकाकाक बात मानै छन्‍हि‍, तहि‍ना नुनुआँ सेहो मानि‍ गेल। मुदा दोहरा देलकनि‍-
“काल्हि‍ दुपहरमे आबि‍ कऽ बूझब।”
भैयाकाका बजला कि‍छु नै, कि‍एक तँ वि‍राम दइक जगह बूझि‍ पड़लनि‍। मुदा मनमे उठलनि‍ बड़ खच्‍चर छौड़ा अछि‍। कहू जे बारह बर्खसँ ऊपरेक उमेर हेतै, सौंसे गाममे टोले-टोल घरे-घर पूजा होइते छै, से नै देखै सुनैए जे पुछलक। मुदा मन ठमकि‍ गेलनि‍। मन पड़ि‍ गेलनि‍ पत्नीक बात जे कहने छेलखि‍न- “तीन कट्ठामे जते गहुमक लगता लागल छल दामक भाउवे ततबे भेल।”
करि‍आइत मन कड़ेलनि‍। मुदा कहबे केकरा करि‍तथि‍न। बॅसबि‍‍टीमे हँसुआ नेने आँखि‍ नवका कड़ची तकैत रहनि‍ मुदा मन जनक हाथे खेती करबामे बौआए लगलनि‍। सोझेमे कड़ची रहै मुदा नजरि‍पर चढ़बे ने करनि‍।
नमहर-नमहर बाँसक बॅसबि‍टीमे ठाढ़ छी मुदा दतमनि‍ नै भेट रहल अछि‍। वि‍ह्वल होइत मुँह पटपटेलनि‍-
“जनक हाथे खेती।”
वएह जनक ने जे बारह बर्खक रौदीमे हर जोति‍ मि‍थि‍लांचलक धरतीकेँ असथि‍र केलनि‍। एक हाथ पत्नीक करेजपर तँ दोसर हवनमे आहूत दैत छलाह। वएह मि‍थि‍ला राज छी ने जइठाम पढ़ब, अध्‍ययन करब पूजा नै! असल सरस्‍वतीक पूजा तँ देखि‍ते छी!!

बिन्देश्वर ठाकुर, धनुषा, नेपाल। हाल-कतार।
बिपतियाक विदेश [विहनि कथा ]

कतेको दिनसँ मुह घोकचौने बिपतियाक ओठपर आइ भरल मुस्कान अछि। कारण तीन महिनाक बाद पश्चिम दिससँ चान्द उगल। माने कम्पनी आइ तलब देबाक लेल राजी भेल। तीन महिना धरि विभिन्न बहाना बनाकऽ टारैत छल। अगला महिना, अगला महिना, अगला महिना..... । मुदा तीन महिना बाद कामदार सभ जब उखड़ल तँ कम्पनी सेहो विवश भऽ गेल सेलरी देबाक लेल। मुदा ओतेक सोझिया नै रहैक कम्पनीक मनेजर। लेबर सभकेँ ठकि फुसला कऽ एक महिनाक तलब देलक आ २ महिनाक राखिए लेलक। अन्तत: जे हुअए, सभ कामदार खुश भेल। बिपतिया सेहो खुश भेल।
सेलरी लऽ पैसा गनैत अछि तँ मात्र पाँच गोट नमरी। पहिनेसँ आएल मुस्कान बिपतियाक मुहसँ बिला गेलैक। ओ चिन्तित भऽ गेल। कारण खानाक पैसा बङ्गालीकेँ उधारिए छलै। चुल्हा चौका चलाएब हेतु घरमे पठाबै पड़तनि। ओतबे कहाँ, महन्थास लेल ढौवा नै बुझैताह तँ ५०००० क सुइद-सुइद जोड़ि कऽ २ लाख बनाइए देतै। आब की करत, बिपतिया गम्भीर सोचमे पड़ि गेल। "घर परिवार छोड़ि कऽ सात समुन्द्र पार अएली पत्थर फोड़ऽ मुदा तैयो घर नै चलल आ पेटो नै चलल, धिकार अछि हमर मेहनेत आ हमर कामकेँ "बरबड़ाइत आ लथरैत जेक्रीत ZEKREET क ट्रस्ट एक्सचेन्ज trust exchange मे जा प्रभु मनी ट्रान्सफर द्वारा पत्नीक नामसँ खाना पैसा बाहेक सभ पठा देलक। आरो नै किछु तँ ओइ महन्था धनिककेँ कर्जा तँ सधतै।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: ओम प्रकाश. “गजलक लेल: समीक्षा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 125, 2013-03-01. https://www.videha.co.in/research/2013/125/गजलक-लेल-समीक्षा.htm

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