राजनन्दनक आत्मालाप
एहि आत्मालाप मे प्रथम पुरुष अपन दीर्घकालक यात्राक अनुभव कें अपना मुहें व्यक्त कए रहल अछि जे स्वानूभूत तथ्यक विश्वसनीयता कें गंभीरता सँ प्रभावोत्पादक बनबैछ ।
एकरा लिखबाक पाछाँ हमर उद्देश्य कोनो व्यक्ति विशेषक प्रसंशा नहिं, मुख्यत: नवका पीढी(नव लोक) कें एहि वास्तविकताक प्रति सजग आ सचेष्ट करब अछि जे कोनो महान उपलब्धिक हेतु ककरो कोन तरहें दीर्घकालिक तपस्या करए पड़ैत छैक ।जेना अदनासन देखाइत छुद्र चूटी(पिपिलिका) सेहो डेगा-डेगी चलि पहाड़ कें टपि जाइछ । ताहि क्रमंे हमरा बुझाइछ जे कर्णगोष्ठीक संग कर्णामृतोक यात्रा सभ तरहें साधन-सम्पन्न नहिं रहितहुं ई विगत बत्तीस वर्ष सँ चलि आबि रहल निरन्तर तपस्याक प्रतिफलन थिक जे "मिथिला-मैथिलीक विकास में कर्णगोष्ठी एवं कर्णपामृतक योगदान(१९७४-२०११)" सकलनक रूप मे हमरालोकनिक सोझाँ प्रस्तुत अछि ।
एहि प्रसंग मे कर्णगोष्ठी मुम्बई आर्थिक सहयोगक अवदान कए यज्ञक पुरोधाक भाँति पूण्यक भागी छथि ।एखनुक जे समसामयिक लोकक(खास क नवका पीढीक) मानसिकता कनिएं क क बहुत हसोथि लेबाक अछि(जेना उगल चान कि लपकू पूआ),ताहि प्रवृतिक संदर्भ मे कर्णामृतक साधना एवं उपलब्धि द्रष्टव्य अछि ।राज नन्दन बाबूक निष्ठा जे एहि व्याजें सुव्यक्त होइछ ,वोहि मे कोनो तरहक आत्मश्लाघा नहिं भ क मात्र वस्तुनिष्ठ निरपेक्ष प्रदर्शन अछि जे आत्मालापक रचयिता द्वारा कएल गेल अछि ।वो एहि रीतिएंँ मिथिला मैथिलक कृतज्ञता विज्ञापित कए रहलाह अछि,संगहिं नवका पीढी कें ओकर कर्तव्यक दायित्वबोध करेबाक उपादान सेहो उपस्थित कएलनि अछि ।
एहि आत्मालाप मे एक व्यक्ति नहिं संस्था बाजि रहल अछि जाहि सँ मिथिलालोकक आशा, अभिलाषा आ आकांक्षा संलग्न अछि ,से बात बुझबाक चाही ।साहित्य मे सत्यक अभिव्यंजना एहुना होइछ,पाठक कें अपन मानस क्षितिज उदार बनाक रखबाक चाही, सैह हमर अभ्यर्थना ।
आत्मालाप - राज नन्दनक
हमरा नहिं किछु चाह, मैथिलीक परिप्लावन लए हमजीबइ छी ।
सुधी पाठकक लेल पत्रिका कर्णामृत कें नित डेबइ छी ।
तीन दशक कए पार वयक्रम वृद्ध अपन होइतहु सेबइ छी ।
यदपि छोट डोंगी कें जलधि मे रहि जलपोत जकाँ खेबइ छी ।
नित्तहु प्राच्य क्षितिज सँ दिनकरक अभिवादन अरुणिमा पबइ छी ।
दिग-देशान्तर पार सँ अनिलक आनल सुखद समाद जे लई छी ।
बहुधा मेघाच्छन्न दिगन्तक रहनहुँ नभ निर्मेघ पबइ छी ।
पबइत पाणि-स्पर्श पयोदक संकेतल ,अभिराम रहइ छी ।
लाभ ई नाम "राजनन्दन "भएने अछि एतवा जे हम ने थकइ छी ।
आधि-व्याधि बाधा कें पार नहिं जिजीविषा पर पाबै दइ छी ।
ओतबै नहिं हम व्यवधानहु सँ अभिनन्दित भए राज करइ छी ।
"मैथिलीक"आशीष अपरिमित मैथिलीक सेवा सँ पबइ छी ।
"कर्णामृतक" अमिय संपोषित सेवा सँ जे अमृत पबइ छी ।
बुन्न मात्र सँ परिप्लावित भए हम अजस्र सुखसिन्धु लहइ छी ।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते" केर मिहिर- बलें घन तिमिर कटइ छी ।
की आश्चर्य यदि भरि उड़ान हम सात समुद्रो पारक लइ छी ।
मैथिली-साहित्यक मंजूषा मे स्वर्णिम संस्कृतिक धरोहर,
राखल रहए तेना जे भविष्यो पाबए संगति युगतक सुखकर ।
दिग-दिगन्त कें करति प्रहर्षित सुर-सरगम संगीतक फरहर,
शिवक नचारि-महेशवाणी सँ गूंजित जनकसुता केर नैहर ।
गौरव सँ उच्छ्वसित बसातो सौरभ सुमनक सुखद पसारए ,
मार्तण्डक-ज्वाला प्रचण्ड सँ मैथिलीक हरियरी न हारए ।
आस्था तुंग हिमाद्रि-शृंग सन व्योम मध्य कीर्ति-ध्वज धारए,
जकर स्तवन मे आह्लादित मुग्ध भुवन आरती उतारए ।
"कर्णामृत" सार्थक पीयूष जे अंजलि भरि-भरि जन तक आनए ,
गरिमा संग माधूर्य तिरहुतक बन्दनवार क्षितिज तक तानए ।
संभव तैं पुरि संग निसर्गो सुखद संयोग मुहूर्तक ठानए ,
बत्तिस ग्रं्थक भेल प्रकाशन हेतु प्राप्त अनुदान प्रमाणय ।
लेसल गेल "श्रीधरक" कर सौं "कर्णामृतक" जे टिम-टिम वाती ,
रहलहुँ से उसकावति टेमी खरिका सँ, सेवति दिन-राती ।
निरवधि-काल विपुल पृथ्वी केर छुबइतक्षितिज रहत ई पाँती,
की न एहन सुधि-संरक्षण सँ होएत तृप्त मातु केर छाती ?
की न मैथिलीक संतानहुँ कें पथ प्रशस्त होएत लेखा सँ ?
काल-भाल पर कर्णामृत सँ टपकल स्मित बुन्न-रेखा सँ,
दूर अतीतक आँजुर सँ उठि अबइत सरगम अनदेखा सँ,
सहज सरल सम्बुद्धि सुपोषित प्रज्ञा केर उत्सुक पेखा सँ ।
होइत रहल गुंजरित "सदुक्तिक" मंजुल स्वन अनवरत कान मे,
मधुर सारगर्भित प्रस्पन्दन उष्मा भरइत स्वत: प्राण मे ।
नौ सदीक विस्तार पार करि चलि अबइत उर्जा अम्लान मे,
कर्णामृतक सैह सुर-सरगम उर्मिल अछि एखनहुं उड़ान मे ।
अमलिन स्मित-हरित सुधि-सुरभित भूमि ई यावतकाल रहए,
संस्कृतिक सुकुमार अरुणिमा-दीप्त मैथिलीक भाल रहए ।
तावत कर्णामृतो पसारति अविरत प्रीतिक ज्वाल रहए,
कर्णामृतक हिंडोल में झुलइत वृद्ध, वनिता आवाल रहए ।
चाह हमर मैथिली-मानसक कर्णामृत ई मराल रहए ,
ताल दैत संतरण मे जकरा दत्त चित दिक् ओ काल रहए,
अमित उड़ान भरैत कल्पना जाहि छविक प्रतिपा़ल रहए,
होइत नित मैथिली-मनीषा जइ सँ सदति नेहाल रहए ।
उत्पत्स्यति कोअपि समानधर्मा" भवभूतिक धार पकड़ने,
हम ने रहब त हमर तपस्या धैर्यक पारावार पकड़ने,
दिवा-रात्रि केर चोरा-नुकी बिच प्रत्यूषक झंकार पकड़ने ,
बढ़त घार मे कालनिर्झरक ककरो शुभ अवतार पकड़ने ।
नदी सदानीरा वसुन्धरा सरिताजल पटबैछ साल भरि ,
धन्य होइछ आदित्य रश्मि-अभिषेकित भोरे जकर भाल करि,
जतए उतरि नीरव-निरभ्र नभमे शरदक हो मुग्ध विभावरि,
रजनीगंधा केर वितान मे थकए न मलयानिलो ताल भरि ।
नहिं विदेह नहिं सीरध्वज हम तदपि उर्वरा शक्ति उभारल,
नहिं नृप तइयो मिथिलामाटिक प्रतिभा कें दए हाक उतारल ,
कृति कें भोला लाल दास केर दीपदान दए सुधि झंकारल,
मातृ-पितृ रृण भूमिक प्रति हम निज कृति सँ एहि भाँति उतारल ।
प्रतिभापूंज मैथिली पुत्रक स्मृति मे जे अंक निकालल,
अर्घदान आलोकसुछन्दित अमरत्वक झंडा सन गाड़ल,
सारस्वत स्तंभ मेदिनीक व्योमक राखत छवि अजवारल,
रहत जाहि सँ लोक चेतना स्पर्शित भए सदति पखारल ।
दीपशिखा केर रिजु कंपन सँ अट्टहास करि हँसत अमरता,
सतत सरस्वतिपुत्रक कर सँ उद्घाटित प्रातिभ उर्वरता,
अंगीभूत करत दर्शावोत मुड़ि इतिहास अपन तत्परता,
हरति चलत जे दीर्घकाल तक सकल समाजक बौद्धिक जड़ता ।
पालन, पोषणआ विकास मे जतवा किछु पावोल समाज सँ,
तकर करति प्रतिपूर्ति किंचितो द क जाइ सुख अपन काज सँ,
सैह यत्न होइत आएल अछि सेवा में रहि "नन्दन राज" सँ,
कर्णामृत कें लेल जुटाबति संगीतक हित साज-वाज सँ ।
आसक, अभिलाषक,उल्लासक बनि पतंग नभ मे कर्णामृत,
दैत रहल आश्रय उमेद कें कते भविष्णु लेखकक,उड़ि नित,
प्रोत्साहन सँ नव प्रतिभा केर सुुष्ठु विकासो कएल सुनिश्चित,
कर्मनिष्ठ अविरत सेवा सँ अछि गौरवास्पद यशक सुअर्हित ।
नहिं टिटही टेकल पर्बत सन,हमर भूमिका मैथिलीक प्रति,
हम होइत अभिसार तकै छी गगनक पार गगन तक उन्नति,
मैथिली संस्कृति-साहित्यक सम्मान करए उठि विश्वक सम्मति,
सफल अपन साधना तखन हम बूझि सकब जे पओलक सद् गति ।
नगर-नगर हम छानति फिरलहुँ लेने कर मे लोटा-डोरी,
डगर-डगर पानिक तलाश मे कनहा लटकल बोझने झोरी,
जते भए सकए लोकक मन सँ भावक संवेदना निचोड़ी,
किय न चेतना जगबइ खातिर भावक जल मे मधुरस घोरी?
चलति बाट एकसरो हमेशा हमर इएह पाथेय रहल अछि,
मातृ-मंदिरक आराधन मे सेवा एहि विधि धेय रहल अछि,
राग जे कंठ सम्हारि सकए नहिं गीत हमर से गेय रहल अछि,
वाणी चिरकल्याणी बनि विचरए जन-जन मे श्रेय रहल अछि ।
यदि नहिं मान बूझत मैथिल चलि जाए न जेना गेलीह वैदेही,
भेलीह भूमिगत लोकक रहितहु सुधि संवेदनशील,सुगेही,
ओ छलि मैथिली,इहो मैथिली शंका मन मे उठइछ मेहीं,
किए कि नवका लोक लगैत अछिमातृ-साहित्यक प्रति नहिं स्नेही ।
लजविज्जी सुकुमार सदृश अनुराग होइत अछि साहित्यक प्रति,
से न प्रवाहित हो यदि सहजहिं होइछ संस्कृति कें बड़का क्षति,
जेना-जेना नव शहरी सभ्यता नवका लोकक मारि रहल मति,
भौतिक होइत विकासक सोझाँ संस्कृतिक झलकैत अछि अवनति ।
अन्देसा मांत्सर्य सँ उपगत होइछ क्षितिज पर हमर चेतनक,
जखन तकै छी गगन भविष्यक एहि संध्या मे अपन जीवनक,
भेल जा रहल सिमटि संकुचित आपकतामय शील जन-जनक,
शहरक आकर्षण मे लुब्धल विसरि पुरातन मान साधनक ।
शारदानन्द दास परिमल
४ अगस्त २०१२,नई दिल्ली
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