विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

गजल समीक्षा (पेटारसँ)

मुन्नाजी · 2013-11-15 · अंक 142

२.८.१.धीरेन्द्र प्रेमर्षि गजल समीक्षा (पेटारसँ) २.आशीष अनचिन्हार- गजल समीक्षा (पेटारसँ)
१.ज्योति- एक युग : टच वुड भाग ६ २.जगदानन्द झा ‘मनु’- विहनि कथा- सेल्समेन

ज्योति
एक युग : टच वुड भाग – ६
मधुश्रावणी समाप्त भेल तखन हमर मॉं के हाथक बनल भोजनक सिलसिला शुरू भेल।पति देव कहला जे अहॉं तऽ कहनेहे नहिं रहि जे अहॉंके मॉं अतेक नीक खाना बनाबैत छथि।हुनका सबसऽ नीक हमर मॉं के हाथक बनाओल माछ लगलैन । हम सब बचपन के बात करैत रही । हमरा द कहल गेल जे हमर मॉं हमर माथा पर ठीक बीचो बीच एकटा चोटी कऽ दैत छलैथ तऽ हमर मुँह खरबूजा के ऊपर खजूरक गाछ सनक लागैत छल आ हमर बहिन के दू चोटी बकरी के बच्चा सनक। हमरा अखन तक मोन अछि जे जखन हम अपन चोटी सामान्य पैघ लोक जकॉं पाछॉंमे केलहुँ तऽ हमरा कतेक खुशी भेल रहै। हमर पति के बहुत हँसी लगलैन ई बुझिकऽ जे हम बच्चा मे एकटा गति बहुत गाबै छलर्हुँ ”भला है बुरा है जैसा भी है मेरा पति मेरा देवता है ।” घरमे एकटा जन्मदिवसके पार्टी छल से मनाक फेर हमसब मुम्बई लौटि रहल छलहुँ। पतिदेव आबै कालमे हमर पिताश्री सऽ पुछलखिन जे अहॉं ठीके चाहै छियैन जे ई नौकरी करैथ। तऽ हमर पिताजी कहलखिन जे प््रोफेशनल कोर्स कियैक कऽ रहल छथि नौकरिये करैलेल ने। फेर ट्रेनमे हम दुनु विदा भेलहुँ मुम्बई दिस। रस्ता भरि बात करैत रहलहुँ जेना लागल बहुत दिनक बाद बात भेल छल। फेर बियाहक बात मोन पारैत रही जे हमर पति पुछने रहैथ जे हमर सपना की अछि तऽ हम कहलियैन जे भारत आ पाकिस्तान ह्यआधुनिक बंगलादेश सहितहृ एक भऽ जाय।ओ हँसय लगला जे हम इतिहास. भूगोल अथवा राजनीतिशास्त्र नहि पढ़ा रहल छी।आहि लंदन में सबके संगे रहैत देखैत छियै तऽ लागैत अछि जे सपना पूरा भऽ गेल।
हमर पति देव हमर हाथ देखि रहल छलैथ ट्रेनमे। हमर मेंहदी के रंग उतरि गेल छल।ओ कहला अहॉंके अति शीघ्र एकटा पुत्री के प््रााप्ति होयत।हमर मुंह बनि गेल त ओ कहला अहॉं ठीके खरबूजा सनक लागैत हेबै बच्चा मे।फेर कहला नौकरी के योग अछि।हम तुरन्त आह्लादित भऽ गेलहुँ। हमरा ट्रेनमे भूख बहुत लागैत अछि से हम रस्ता भरि किर्छु किछु खाइत पिबैत गेलहुँ मुदा हमर पति के त मानू निर्जला व्रत छलैन। 22 घण्टा के ट्रेनक सफर फेर 2 घण्टा लागल टैक्सी स घर पहुँचय मे तखन पति कहला आब खाना पकाऊ। हम बुझबे नहिं केलियै जे हम हँसु की कानू। नइहरमे मॉं भौजी आ बहिन के प््राशंसा सुर्निसुनि परेशान छलहुँ। आब हमरा महत्व भेटो रहल छलय त हम बहुत थाकल रही।तैयो पतिदेव के आज्ञा सऽ भोजन बनेलहुँ आ करीब 3 बाजि गेल सुतय जायमे। अगिला दू दिन सुटकेश खाली करई मे गेल।
फेर जल्दिये अपन बायोडाटा बनाक नौकरी के ताक मे लागि गेलहुँ। इंटरव्यू देबैलेल पतिके संर्गेसंगे दू चारि ठाम भटकलहुँ तखन नौकरी लागल। आनदिन हम पतिदेवके बेडटी दई छलियैन जाहिलेल सास बड खिसिया गेल छली एकदिन जे खाली पेटे चाय नहिं दियौन तखन हम पानि संगे देबऽ लगलियैन।मुदा हमर नौकरी के पहिल दिन पतिदेव हमरा सऽ पहिने उठिगेला आ कहला जे उठु आई सऽ अहॉंके मुम्बई के जिनगी शुरू भऽ गेल। हम कूदि कऽ भगलहुँ ओछाउन सऽ चाय बनाबैलेल। फेर तैयार भऽ विदा भेलहुँ आफिस दिस।मुम्बई मे सफर करैके स्वर्णिम दिन छल ओ हमर जखन हमसब भार्गिभागि कऽ तैयार होयत छलहुँ। बहुत सहायक छल जे ओतबे टा घरमे बाथरूम आ टॉयलेट अलर्गअलग छल। कारण हमर पतिदेव के कम सऽ कम आधा घण्टा लागैत छलैन टॉयलेटमे। हुन्का नास्ता कराबैमे बहुत पॉंछा लागल रह पड़ै छल। आ कहियो अन्ठा दियौ तऽ घर सऽ फोन आबि जायत छल। अहिमे के नइहर के सासुर कहनाइ मुश्किल ।बड्ड दुखी करै वला व्यवहार छल ई। हम अपन लेल टिफिन सेहो पैक क ल जायत छलहुँ ।सॉंझमे लौटैकाल के नास्ता सेहो पैक रहैत छल।आ पतिदेव सऽ पुछै छलियैन तऽ कहैत छलैथ आहि ऑफिस मे पिज्जा पार्टी अछि तऽ आहि किछु आर। हुन्कर अहि बात सबहक असर छल जे हमरा बाहर के खेनाई के जिद्द लागि गेल छल ।सप्ताहान्त मे हुन्का संगे कुनो भोजनालय मे जरूर जाय छलहुँ आ बेसीतर हमर पसन्दीदा होयत छल पाव भाजी। कोजगरा मे पतिदेव असगर गेला घर आ हम नौकरी मे व्यस्त।अपन पहिल दरमाहा सऽ हम पतिके दिवाली के कपड़ा कीन कऽ देलियैन । अहिना किछु किछु लागल रहल।कोनो सप्ताहान्त में पर्दा बदलल गेल कोनो मे टीवी के कवर। फेर बुझबो नहिं केलियै जे कोना समय बीत गेल आ हमर सबहक पहिल वर्षगांठ आबि गेल।

जगदानन्द झा ‘मनु’
ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी
विहनि कथा
सेल्समेन
गामक दलानपर नून तेलक दुकान चलेनाहर, साहजी अपन मुस्काइत मुँह आ शांत स्वभावकेँ कारण गाम भरिमे सभक सिनेहगर बनल मुदा किछु गोटे हुनकर एहि स्वभाबकेँ कारणे हुनका हँसीक पात्र बनोने। आइ साहजी अपने किछु काजसँ बाध दिस गेल। दुकानपर हुनकर १४ बर्खक बेटा समान दैत-लैत। एकटा बिस्कुट चकलेटक सेल्समेन साइकिल ठार करैत साहजीक बेटासँ, “की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।”
साहजीक बेटा सेल्समेनक मुँह दिस कनी काल देखला बाद, “किएक, की बात ?”
“बात की समान देबैकेँ अछि, पुरनका पाइ लेबैक अछि।”
“किछु नहि लेबैकेँ अछि (भीतरसँ समान सभ उठा कए दैत) ई अपन पहिलका समान सभ नेने जाऊ।”
“किएक ! पहिलका तँ रखने रहु।”
“नहि अहाँसँ किछु नहि चाही आ हाँ आगूसँ कहियो हमर दुकानपर नहि आएब।”
सेल्समेन मुँह बोनेए बकर-बकर ओइ नेना दिस देखैत अपन पुरनका समान सभ समटैमे लागल। ताबतमे साहजी सेहो आबि गेलाह।
सहजी सेल्समेनसँ, “कि यौ मालिक एना सभटा समान किएक समटने जाइ छी।”
“हम कहाँ समटने जाइ छी अहाँक नेनकीरबा सभटा समान उठा कए दैत कहलथि एहिठाम कहियो नहि आएब।”
“किएक अहाँ की कहि देलिऐ ?”
“हम तँ किछु नहि कहलिएन्हि।”
“नहि किछु तँ कहने हेबे।”
“हाँ अबैत माँतर पूछने रहिएन्हि, की रौ बौआ तोहर पगला बाबू कतए गेलखुन्ह।”
साहजी हँसैत, “हा हा हा, हमरा संगे जे हँसी ठठ्ठा करै छी से ठीक मुदा केकरो सामने ओकर बापकेँ पागल कहबै तँ ओ कोना सहत, जेकरा की ओ अपन भगवान बुझै छै। एखन भोरे भोर दिमाग शांत रहै तेँ चूपेचाप समानेटा आपस कए कऽ रहि गेल नहि तँ एहन तरहक गप्पपर बेटखारा उठा कए मारि दैतेए।”

Suggested citation: मुन्नाजी. “गजल समीक्षा (पेटारसँ).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 142, 2013-11-15. https://www.videha.co.in/research/2013/142/गजल-समीक्षा-पेटारसँ.htm

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