विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

जहिया ओ इतिहास सुनौलक

कामिनी कामायनी · 2014-03-15 · अंक 150

३.४.ज्योति- गजल
३.५.मो. गुल हसन- गीत- छोटका कि‍सान
३.६.ओम प्रकाश झा- दू टा गजल
३.७.शारदानन्द दास परिमल- दू टा गीत
३.८.योगानंद हीरा- ४ टा गजल
आशीष अनचिन्हार- दू टा गजल

गजल
सीताक बनबास छी हम
बौआ रहल आस छी हम
दाहीक संगे तँ रौदी
उपटल सनक चास छी हम
हमरा बुझाएल एना
जेना हुनक खास छी हम
भुखले तँ मरि गेल जै ठाँ
तै ठाँक मधुमास छी हम
सुर ताल छी राग सेहो
नोरसँ सजल भास छी हम
2212+2122 मात्राक्रम सभ पाँतिमे

गजल
किछु नै बाँचल तोरा लेल
नोरे साँठल तोरा लेल
गम-गम गमकै तोहर देह
छै सभ मातल तोरा लेल
हम पेटो काटल रहि रहि क'
जीहो जाँतल तोरा लेल
पंडित मुल्ला पासी संग
ताड़ी चाखल तोरा लेल
सरदी गरमी अन्हड़ बाढ़ि
ई अवधारल तोरा लेल
सभ पाँतिमे 222-222-21 मात्राक्रम।
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जगदानन्द झा ‘मनु’- ग्राम पोस्ट – हरिपुर डीहटोल, मधुबनी
२ टा गजल
गजल-१

देखलौं जखनसँ अहाँकेँ होस गेलौं बिसरि हम

आगि ख’र बिनु लेसने सौँसेसँ गेलौं पजरि हम

एकटा मुस्की अहाँकेँ प्राण लेलक लय हमर

खा क’ मोने मोन मुँगबा चट्ट गेलौं पसरि हम

अछि निसा चानक अहाँमे भ्रमित केने रातिमे

मुँह अहाँकेँ मोरिते बिनु पानि गेलौं पिछरि हम

स्वर्ग पेलौं बिनु अहाँ ओ स्वर्ग भेलै नर्क सन

छोरि छारि स्वर्गकेँ पाछूसँ गेलौं ससरि हम

खुजल आँखिक ‘मनु’क सपना प्रगट भेलौं जगतमे

देख निरमल नेह बिनु बरखाक गेलौं झहरि हम

(मात्रा क्रम- २१२२-२१२२-२१२२-२१२)

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गजल-२

किए तीर नजरिसँ अहाँकेँ चलैए
हँसी ई तँ घाएल हमरा करैए
मधुर बाजि खन-खन पएरक पजनियाँ
हमर मोन रहि रहि कए डोलबैए
छ्मकए हबामे अहाँकेँ खुजल लट
कतेको तँ दाँतेसँ आङुर कटैए

ससरि जे जए जखन आँचर अहाँकेँ

जिला भरि करेजाक धड़कन रुकैए

अहीँकेँ तँ मुँह देखि जीबैत 'मनु' अछि

बिना संग नै साँस मिसियो चलैए

(बहरे - मुतकारिब, मात्राक्रम -१२२-१२२-१२२-१२२)
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कामिनी कामायनी
जहिया ओ इतिहास सुनौलक
जहिया ओ इतिहास सुनौलक
रोम रोम बरछी बनि मारल /
केहेन आगि मे जरि रहल छी /
कोन मूह स कथा कहु आब?
तपत बौल मे तड़ैप रहल छी
अपन परती खेत पड़ल छल
मुदा बाध अनकर लहरायल
अपन सपना बेच रहल ओ /
हम्मर किम्हरो मूह नुकायल/
भांति भांतिक भइज लगाकऽ /
सब तर छल दाना छिड़ियौने /
मुसुकि मुसुकि कऽ नमरि नमरि कऽ
चान देखा कऽ जिह ललचौने /
बान्हि देल गरदनि पर टाइ /
गरा मिलल छल बनिक भाइ /
पड़ा रहल छल तैयो मुड़ि कऽ /
भाखा केँ मोटका जौरसँ बान्हल /
चिचिया कऽ /घिसिया कऽ कहलक /
अहि सँ केना आब तोँ बचमे /
अहि जौर केँ काटि ने सकबेँ /
परचम हमर सदा लहरायत
अपन आब बचल कतय किछु /
सबटा पच्छिम हड़पि रहल अछि
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ज्योति
बिन रदीफक एकटा गजल
लोकक बातक डरे जे हम नुकेलौं
अपन अलग दुनियाँमे डूमि गेलौं
से ओ दुनियाँ मुदा बड नीक छल यै
से जतऽ सँ बहराय नै हम चाहलौं

से जे लोककेँ बातक बहन्ना देलनि
तिनका तँ धैनवादो नहिये कहलौं
मोनक तरंग तँ पहुँचले हएत
से डोरी जकॉंं हम से हाथेमे बन्हलौं

एक साहिल जकाँ इच्छा छल हमर से
हलचल तँ अखनो बॉंकी बिसरलौं
तकर बाद डूमत स्वप्न संग ज्योति
जिनगी बितै डूमि चाहत से रखलौं
(सरल वार्णिक छन्द वर्ण १४)

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मो. गुल हसन
गीत-
छोटका कि‍सान
कन्‍हापर हर लऽ चलल जाइ कि‍सान
चलल जाइ कि‍सान...।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान
कि‍साने छै हम्‍मर भाय देशक शान।
भोरे उठै छै खेतपर जाइ छै
सरदी-गरमीकेँ कि‍छु ने बुझै छै
नसीबो ने होइ छै समैपर चाहो-पान।।
कि‍साने छै देशक अभि‍मान...।
कखनि‍ दि‍न होइ छै कखनि‍ होइ छै राति‍
ओगरैत रहै छै भैया अपन जजाति‍
खेतेमे होइ छै भाय खएक-जलपान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान...।
नि‍पौनी-पटौनीमे लगल रहै छै
कान्‍हपर कोदारि‍ ओकरा हरि‍दम रहै छै
पार्टी-पोलटीससँ कोनो नै मतलब
हरि‍दम रहै छै फसीलेपर धि‍यान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान।
गुल हसन कहैए सरकार अहाँ सुनि‍यौ
कि‍सानक समस्‍याकेँ पहि‍ले बुझि‍यो
खाद-बि‍आकेँ करि‍यो नि‍दान।
कि‍साने छै हम्‍मर देशक अभि‍मान
कि‍साने छै हम्‍मर देशक शान।
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ओम प्रकाश झा
दू टा गजल

राम जपैत छी रहम करू
कृष्ण सुमरि अहाँ करम करू
कष्ट अनकर बूझिकऽ सदिखन
धन्य कनी अपन जनम करू
कानि रहल बहिन-माय अपन
अंतरमे कनी शरम करू
पजरत आगि ठंढा हियमे
अपन विचारकेँ गरम करू
"ओम"क बात राजा सिनि लिअ
राजक आब किछु धरम करू
दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ(मुतफाइलुन), दीर्घ, ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ
२-११२१२-२-११२ (प्रत्येक पाँतिमे एक बेर)

हेतै खतम गुटबाज बेबस्था
बनतै सभक आवाज बेबस्था
भेलै बहुत चीरहरणक खेला
राखत निर्बलक लाज बेबस्था
देसक आँखिमे नोर नै रहतै
सजतै माथ बनि ताज बेबस्था
मिलतै सभक सुर ताल यौ ऐठाँ
एहन बनत ई साज बेबस्था
"ओम"क मोन कहि रहल छै सबकेँ
करतै आब किछु काज बेबस्था
दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-लघु, दीर्घ-दीर्घ-लघु-दीर्घ, दीर्घ-दीर्घ प्रत्येक पाँतिमे एक बेर।
२२२१-२२१२-२२
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शारदानन्द दास परिमल
दू टा गीत

पूर्णेन्दु नभांगनमे

उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना मंगल-घट छिलकौने ।
उत्त्तुंग द्रुमदलक परसि माथ आशीष मुकुट अछि पहिरौने ।
पबितहिं स्पर्श सिहकल बसात शेफालिकाक दृग बन्न फुजल,
उछ्वासक नेने हर्ष विपुल सुर-सौरभ पसरल छन्द भरल ।
अणु-अणु,कण-कण मे सम्बोधन ममता सँ भरल सुधि सरसौने ।
धुरियाएल तन सँ शिशुक जेना रज पोंछि लैछ माइक आँचर ,
तहिना हरि तिमिरक छाँह, नभक आनन कें कएल ज्योत्सना भास्वर ।
सौन्दर्य निसर्गक धरती पर आनल इंगिति सँ परिछौने ।।
शीतल स्पर्श सँ ज्योत्सनाक सहजहिं स्फूर्तित भेल धरा ,
अम्बर सँ अवनी तक पसरल आनन्दक छन्द अमित अपरा ।
तृण-तरु-वन-उपवन शैल उदधि सभ मस्त अपन हक़ अछि पौने ।
अछि मानव लेकिन निरानन्द अनुबन्धित कृत्रिम जीवन सँ,
संसृतिक बघारल ऐश्वर्यक अप्रतिम गौरवक प्लावन सँ,--
रहि दूर चलि रहल अपन लाश अपनहिं कनहा पर घिसियौने ।।
घुरि आओत कहिया पूत जे कि भसिया क गेल चलि बहुत दूर,
ममता माईक पथ मे पसरल करि पबइछ नहिं अभिलाष पूर ।
पथ-पाँतर नजरि बहारि रहल आशा सँ मनोरथ भरियौने ।।
उतरल पूर्णेन्दु नभांगन मे ज्योत्सना मंगल-घट छिलकौने ।।


फागुनक गीत
फगुनहटिक लए रहल लहरि छी।
मस्त उमंगक उमरल धार सँ लैत अंश हमहूं उपकरिछी। फगुनहटिक--

मधुमासक उल्लास रास मे,
परिरंभित रहि प्रणय-पाश मे,
मांगपूरक हितउचित अवसरक उडंति अवनि सँ अम्बर धरि छी। फगुनहटिक--

सुरक मधुर उर्मिल वितान मे ,
वरवस उधियाइत उडंान मे
भै विभोर सहजहि हिलोर सँ हेरा जाइत हम सम्हरि - सम्हरिछी।फगुनहटिक लए

स्फू्रतित गमकैछ दश दिशा,
अधिक बढाबति अछि जिजीविषा
नैसर्गिक ऐश्वर्यक मह-मह बा ढि बीच स्फुरित लहरि छी।।फगुनहटिक---

एहन मधुरितुक गुण सुर-रंजन,
बहति समीरण अछि दुखभंजन
जीवन मे सौन्दर्य यौवनक लैत अपन सुख अंजलि भरि छी।।.

कण-कण मे आकर्षण
पवनक हठपूऱवक मधुवरषन
मधुमासक एहि रास-भास केर थाह लैत हम ठहरि - ठहरि छी। फगुनहटिक लए रहल--

रहलआब नहिं जाड़क ठिठुड़न
ढीठ तुषारक निरलस अड़चन,
अकड़न वातावरणक दुर्बह दूर हटल हमगेल पसरि छी।। फगुनहटिक---

इहलौकिक सीमा क पार बहि,
रितुक प्रसादित स््वनक संग रहि,
उतरि अनन्त नभक प्रांगण मे आनन्दक सुर गहि सुरसरि छी।।फगुनहटिक,़़़़़़
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योगानंद हीरा
४ टा गजल

मोनमे अछि सवाल बाजू की
छल कपट केर हाल बाजू की
दुख सुखक गप्प आब सूनत के
सभ बजा रहल गाल बाजू की
छोट सन चीज कीनि ने पाबी
बाल बोधक सवाल बाजू की
माँग सभहँक तँ ओहिना बड़का
आँखि सभहँक बिड़ाल बाजू की
भाग लिखलक ललाट ई मँहगी
हाथ लेलक भुजाल बाजू की
सभ पाँतिमे 2122.12.1222 मात्राक्रम अछि

हमरहुँ घरमे आयल पाहुन
घर आँगनमे छायल पाहुन
जिनकर खातिर आँखिक पुतरी
छल पथरायल आयल पाहुन
अँगना गमकल कंगना खनकल
घर आयल चोटायल पाहुन
मेना बाजल सुगना नाचल
दीदीकेँ भरमायल पाहुन
कनखी मारै पोसा पिल्ला
देशी मुरगी खायल पाहुन
हीरा जे छल दुबकल घरमे
तरहथपर चमकायल पाहुन
सभ पाँतिमे आठटा दीर्घक प्रयोग अछि।

रहू कमल सन सदा सुवासित
बनू मनोहर हवा सुवासित
उड़ै भमर चहुँ दिशा सुनाबै
हमर हुनक ई कथा सुवासित
दुखक झमारल हँसी लुटाबै
अलख जगाबै धरा सुवासित
किनक कने घोघ उठि रहल अछि
हवा करै अंगना सुवासित
चढ़ल गुलाबी निसा कमल सन
भरम हमर कंगना सुवासित
चलू बढ़ू सबजना निमंत्रण
बनी कुसुम हम मुदा सुवासित
सभ पाँतिमे 12+122+12+122मात्राक्रम अछि

देखू बौआ
आयल कौआ
छतपर बैसल
माँगय खोआ
कुचरय आनय
पाहुन कौआ
विरही पीड़ा
जानय कौआ
कानय बौआ
पकड़य कौआ
एके आँखिन
देखय कौआ
सभ पाँतिमे 2222 मात्राक्रम।
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Suggested citation: कामिनी कामायनी. “जहिया ओ इतिहास सुनौलक.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 150, 2014-03-15. https://www.videha.co.in/research/2014/150/जहिया-ओ-इतिहास-सुनौलक.htm

मूल विदेह अंक / Original issue