विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

बड़का साहेब: परम्परागत संस्कार केर पराभवक वृत्तचित्र

शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ · 2014-03-15 · अंक 150

बड़का साहेव : परम्‍परागत संस्‍कार केर पराभवक वृति‍ चि‍त्र
मैथि‍ली नाट्य साहि‍त्‍यमे लल्‍लन प्रसाद ठाकुरक प्रवेश आधुनि‍क मैथि‍ली नाटकक लेल क्रांति‍काल मानल जा सकैत अछि‍। लौंगि‍या मि‍रचाइ आ मि‍. नीलो काका सन चर्चित नाटकक कृति‍कार लल्‍लन जीक नाटक “बड़का साहेव” सन् 1985 ई.मे प्रकाशि‍त भेल। प्रकाशनसँ पूर्वे 20 नवम्‍वर सन् 1983 ई.मे एकर पहि‍ल मंचन रवीन्‍द्र भवन जमशेदपुरमे लोकप्रि‍यताक नूतन आयाम स्‍थापि‍त केलक।
लल्‍लनजी टाटा स्‍टीलमे अधि‍कारी संवर्गमे नि‍युक्‍त छला। बेस्‍त दैनन्‍दि‍नीमे रहि‍तो अपन अभि‍नय आ साहि‍त्‍य प्रेममे लि‍पि‍त ऐ मैथि‍ली भक्‍तकेँ साहि‍त्‍यि‍क मानस पटलपर ओ नाओं आ ठाओं नै भेटल जेकर ई अधि‍कारी छल। मैथि‍ली नाटककेँ “मंच ि‍नर्देश” आ परम्‍परावादी संस्‍कारकेँ आधुनि‍कतासँ तारतम्‍य स्‍थापि‍त कऽ अपन मौलि‍कताकेँ बचा कऽ राखब हि‍नक रचनाक वास्‍तवि‍क उदेस मानल जाए। ऐ क्रममे महान कलाकार कथाकथि‍त भलमानुष समाजक स्‍वीकृति‍क परवाहि‍ नै कऽ कऽ मात्र अपन उदेसक दि‍स धि‍यान दैत एकटा सरल आ सौम्‍य भाषामे 45 पृष्‍ठक नाटकक लि‍खि‍ मैथि‍ली समाजक आगाँ 30 वर्ष पूर्वे एहेन प्रश्नचि‍न्‍ह ठाढ़ कऽ देलक जेकर नि‍दान अखन धरि‍ नै भेटल। कलाकारक अभि‍यानक मौलि‍क उदेस होइत अछि‍ जनप्रि‍यताकेँ धि‍यानमे राखि‍ मंचन करबाक चेष्‍टा। नाटककार स्‍वयं ि‍नर्देशक छला। ऐ उदेससँ बाहर नि‍कसि‍ कऽ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क रूप देब हि‍नको लेल असंभव छल। मुदा एकरा साहि‍त्‍यि‍क भाषामे सरल वि‍षयकर “मौलि‍क संस्‍कार पराभव” चयन आ ओकरा बहुत हद धरि‍ सफल प्रति‍बि‍म्‍बमे समाहि‍त करब नि‍श्चि‍त समालोचककेँ स्‍तब्‍ध कऽ देलक। इहए कारण थि‍क जे सुधांशु शेखर सन चर्चित साहि‍त्‍यकार सेहो ऐ पाेथीक आमुख लि‍खबाक क्रममे कहुना कऽ पि‍ण्‍ड छोड़ा लेलनि‍।
वि‍षय बि‍म्‍बमे ऐ नाटकक कोनो वि‍शेष योगदान नै, मुदा आकर्षक अछि‍ तँ उदेसक दूरदर्शिता पूर्ण वि‍वेचन। तेकर परि‍णाम भेल जे “बड़का साहेव”अर्न्‍तराष्‍ट्रीय मैथि‍ली नाटक प्रति‍योगि‍तामे पहि‍ल स्‍थान प्राप्‍त केलक। “मि‍थि‍लाक्षर” नाट्य संस्‍था जमशेदपुरक प्रणेता लल्‍लनजी मैथि‍ली नाट्य मंचनक पहि‍लुक सम्‍पूर्ण हस्‍ताक्षर छथि‍ जे प्रकासमे ओ लोकप्रियता प्राप्‍त केलनि‍। जे देसि‍ल परि‍धि‍मे रहनि‍हार नाटकार लोकनि‍केँ ताधरि‍ तँ प्रात्रत नि‍श्चि‍त नै भेल छल। महि‍ला पात्रक अभि‍नय महि‍लेसँ करौल गेल।
ऐ नाटकक पहि‍लुक पात्र छथि‍ छेदी झा जे वृद्ध ग्रामीण मैथि‍लक भूमि‍कामे छथि‍। छेदी झाक भागनि‍ चूड़ामणि‍ झा गामसँ शि‍क्षा ग्रहण कऽ कऽ नौकरी लेल प्रवेश परीक्षा देबाक उदेससँ अपन माम संग जमशेदपुर अबै छथि‍। ग्रामीण जीवनमे सहज अर्थ पीड़ाक दंशसँ मर्माहि‍त प्रति‍भाक उद्वेलन एकर पहि‍ल दृश्‍यक मूल उद्बोधन मानल जाए। माम आ भागि‍न दुनू साधन वि‍हि‍न तँए जमशेदपुरमे आबि‍ क्षणि‍क प्रवासक छाँह तकैत बी.सी. झा सन अभि‍यन्‍ताक ओइठाम आबि‍ गेल छथि‍। बी.सी. झा कहि‍यो छेदी कक्काक “बालो” छला। समए आ कालक प्रभावसँ आब ऑफि‍सर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्‍कारकेँ बि‍सरि‍ जेबाक नाटक कऽ रहल छथि‍। ऐ नाटकक मूल कारण थि‍क अपन गरीब समाजसँ स्‍वयंकेँ दूर रखि‍ पाश्चात्‍य शैलीक जीवन जीबाक चेष्‍टा द्वारा अपनाकेँ भलमानुष देखेबाक प्रयास। गामक लोक बंगलापर आबि‍ खूब खएत आ गाममे जा कऽ बेर्थ गोलौसी करत। वालचन्‍द झाक स्‍त्री आब “एडभान्‍स” पलायनवादी नटकि‍याक अर्द्धांगि‍नी तँ छथि‍ मुदा अपन मौलि‍कताकेँ छोड़ए नै चाहै छथि‍। ऐमे हि‍नको स्‍वार्थे छन्‍हि‍। जौं अपन घर आएल गमैया मैथि‍लकेँ अपमानि‍त कएल जाएत तँ लोक गाममे खि‍स्‍सा करतनि‍ जे बी.सी. झा जि‍नका -अंग्रेजी नै जनबाक कारणें छेदी कक्का बेसी झा बूझि‍ गेलखनि‍।-क स्‍त्री नीक वि‍चारक नै छथि‍न। ऐ स्‍वाथि‍क संग-संग बेवहारि‍कता नाटकक दोसर कारण छन्‍हि‍। मीना जीक अपन तनया मि‍क्कीक लेल चूड़ामणि‍मे संभावना देखब। छेदी कक्काक अनुसारे चूड़ामणि‍क पि‍ता बी.सी.झामे कहि‍यो “समाधि‍” बनबाक वि‍चार पनकल छल। चूड़ामणि‍क पि‍ता आब नै छथि‍। चूड़ा स्‍वयं मसुआ गेल छथि‍। बी.सी.झा आ हुनक पुत्री मीनाक दृष्‍टि‍मे हि‍नक स्‍थान “टीकधारी” पुरोहि‍तसँ बेसी नै जमशेदपुर सन छोट-छीन बम्‍बईमे टाटा स्‍टीलक माटि‍-पानि‍सँ पोरगर भेलि‍ मीना तँ कन्‍वेन्‍टक छात्रा छथि‍। चूड़ामणि‍क सन“टीकमोहन” केना ऐ शहरी रम्‍भाकेँ रमतनि‍? ओ तँ अपन मैथि‍लीकेँ बि‍सरि‍ जेबाक टाटकमे लागल छथि‍। बापक रचनात्‍मक सहयोग मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दोहन मात्र मानल जाए।
नाटककार उद्वि‍ग्‍न छथि‍। सम्‍पूर्ण सहरसासँ मधुबनीकेँ प्रवासमे बसेबाक हि‍नक स्‍वपन्न ढहि‍ रहल अछि‍। एतेक पूर्वे सम्‍भ्रान्‍त मैथि‍लमे अपन संस्‍कृति‍क साँचल शि‍ल्‍पकेँ ध्‍वस्‍त करबाक संकेतन वर्त्तमान समैले एकटा रक्त स्‍तम्‍भ ठाढ़ कऽ देलक। स्‍वयंकेँ कुलीन मानैबला लोक सभसँ बेसी अपन मातृकेँ मर्दन कऽ देने अछि‍। वालचन्‍दक प्रकोपसँ ति‍लमि‍लायल छेदी आ चूड़ा हि‍नका डेरासँ पड़ा जाइ छथि‍। मीनाजी एकटा नीक काज करैत छथि‍न जे अपन मि‍त्र रानीक माध्‍यमसँ चूड़ाक नौकरी लेल पैरवी कऽ कऽ चूड़ाक दृष्‍टि‍मे अपन प्रति‍ श्रद्धा उत्पन्न कऽ लेलीह। रानीक पति‍ वर्माजी द्वारा ई गप्‍प जे पहि‍ने पोल छल आ फूजि‍ गेल। वालचन्‍द झाक उपहारसँ द्रवि‍त भऽ चूड़ामणि‍क पुरुषार्थ जागि‍ गेल। ओ योगदान पत्र फाड़ि‍ देलनि‍।
कालक चक्र उनटि‍ गेल। चूड़ामणि‍ आब आइ.ए.एस. भऽ गेल छथि‍। वालचन्‍द झा अा हुनक पुत्री मीनाक दृष्‍टि‍मे आब चूड़ामणि‍ टीक मोहन झासँ“चूड़ामणि‍जी” बनि‍ गेल छथि‍। कुलीनक स्‍वार्थक आगू कुकुरो असफल भऽ गेल। कालान्‍तरमे हाथ-पएर जोड़ि‍ मीनाक सि‍नेहकेँ हथि‍यार बना कऽ बी.सी. झा चूड़ामणि‍केँ अपन जमाए बना लेलनि‍। ऐ नाटकमे हास्‍य समागम लेल “भोला” सन पात्रकेँ सम्‍मि‍लि‍त कएल गेल अछि‍। ऐठाम नाटकमे वास्‍तवि‍कता सेहो देखैमे आएल। भोला, बाबूजी आ माए सन सासुरक उपहार पाबि‍ वालचन्‍द झा गदगद छथि‍। एहेन सासुर भक्‍ति‍मे शक्‍ति‍सँ बेसी अपन गि‍रगि‍टि‍या रूपान्‍तरणक नाटक बेसी अछि‍। कालान्‍तरमे बी.सी.झाक जमाए चूड़ामणि‍ जी आब बी.सी.झा (आइ.ए.एस.) भऽ गेल छथि‍। परि‍वर्त्तन तँ प्रकृति‍क नि‍अम छी। मैथि‍ल ऐसँ केना बाँचथि‍...? हमरा सबहक-शि‍क्षि‍त समाजक, सभसँ पैघ वि‍डम्‍बना (जे भलमानुषक मौलि‍क गुण छन्‍हि‍) छी “नकल करबाक पीपासा।” बी.सी.झासँ दस डेग आगू बढ़ि‍ अपन मौलि‍कताकेँ ति‍यागि‍ चूड़ामणि‍जी वि‍देशी शराब पि‍बएबला पलायनवादी बनि‍ गेल छथि‍। कोनो अर्थमे हि‍नका आब मैथि‍ल नै मानल जान्‍हि‍ आ ने ओइले हि‍नका कोनो जि‍ज्ञासा वा तृष्‍णा छन्‍हि‍।
मंचनक हेतु उपयुक्‍त बनेबाक क्रममे नाटककार ऐ गंभीर चि‍न्‍तनयुक्‍त वि‍षएकेँ कनीक झुझुआन बना देलनि‍ आ नाटक छोट भऽ गेल। जौं लल्‍लन बाबू कनीक आरो चि‍न्‍तन करि‍तथि‍ वा अपन प्रकृति‍केँ गंभरी बनेबाक प्रयास करि‍तथि‍ तँ नाटक बहुत उपयुक्‍त साहि‍त्‍यि‍क कृति‍ मानल जाइतए। ओना लोक अपन प्रकृति‍ आ प्रवृति‍सँ बि‍मुख नै भऽ सकैत छल। समग्र मूल्‍यांकन केलासँ ई तँ नि‍श्चि‍त प्रमाणि‍त हएत जे लल्‍लनजी एकटा अद्भुत व्‍यक्‍ति‍त्‍वक नाटककार छथि‍।
ऐ नाटकक सभसँ उत्‍कृष्‍ठ सबल पक्ष अछि‍ मौलि‍क संस्‍कारक अद्योगति‍क वास्‍तवि‍क कारण केर तात्वि‍क वि‍वेचन। ऐ क्रममे संवादक रूपेँ जे शि‍ल्‍प सोझहा आएल ओ बड़ पोखगर मानल जाए। समाजक आगूक आसनपर बैसल लोक संस्‍कृति‍क उत्‍थानक लेल स्‍वयंकेँ उत्तरदायी मानैत छथि‍। ई सर्वथा सत्‍य जे मि‍थि‍ला मौथि‍लीक वि‍कासक प्रारंभि‍क दायि‍त्‍व ऐ वर्गपर छेलनि‍। स्‍वाभावि‍क अछि‍ तंत्र जेकरा हाथमे रहै छै सारथी वएह बनि‍ सकैए। लल्‍लनजी ऐ वर्गसँ संबद्ध रहि‍तो रचनामे सभठाम ईमानदारीक अनुपालन केलनि‍।
मि‍थि‍ला मैथि‍लीक अधोगति‍ लेल सबल समाज जि‍म्‍मेवार छथि‍। शि‍क्षा-दीक्षा गामे ग्रहण कऽ कऽ चमकैत दुनि‍याँमे प्रवेश करैत काल अपन संस्‍कारकेँ गामेमे छोड़ि‍ देलनि‍। पलायन तँ कोनो वर्गमे भऽ सकै छै। अर्थनीति‍ भौति‍कतावादी सोचक आगू मलीन भऽ गेल अछि‍। ऐ पलायनसँ सम्‍पूर्ण भारतवर्ष प्रभावि‍त अछि‍। मुदा आन वर्ग अपन संस्‍कृति‍केँ कोंचामे बान्‍हि‍ पलायन केलनि‍। वि‍डम्‍बना अछि‍ तँ मि‍थि‍लाक भलमानुष वर्गक लेल भस्‍मासुर बनि‍ अपन मौलि‍क संस्‍कारक श्राद्ध मि‍थि‍लाक गहबरक सोझहा करैत पलायनकेँ आत्‍मि‍क स्‍वीकृति‍ दऽ देलनि‍। यएह ने नाटकक दूरदर्शी दृष्‍टि‍कोण मानल जाए।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
अमर कान्त अमर

Suggested citation: शिवकुमार झा ‘टिल्लू’. “बड़का साहेब: परम्परागत संस्कार केर पराभवक वृत्तचित्र.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 150, 2014-03-15. https://www.videha.co.in/research/2014/150/बड़का-साहेब-परम्परागत-संस्कार-केर-पराभवक-वृत्तचित्र.htm

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