मैथिली : सरकार आ हम सभ
मिथिलांचल विकास परिषद्क अध्यक्ष, डॉ. विद्यानाथ झा, कार्यकारी अध्यक्ष, डाॅ. गोपाल प्रसाद सिंहजी।
साक्षर दरभंगाक अध्यक्ष, श्री राम नरेश साहु ‘निर्मोही’ एवं महासचिव, श्री अशोक कुमार चौधरीजी।
मिथिला संघर्ष समितिक कार्यकारी अध्यक्ष, श्री शिवली नोमानी एवं महासचिव, श्री शंकार यादवजी।
संयोजक- आदरणीय श्री कमलेश झाजी।
मंचासीन विद्वतजन। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् प्रांगणमे उपस्थित चिन्तक श्रोता, मिथिला-मैथिली विकास प्रेमी। माए-बहिन। भाय-बन्धु तथा मिडियाकर्मी।
आइ ऐ शुभ पहरमे “मैथिली : सरकार आ हमसभ” सन विषयपर अपने लोकनिक बीच दू शब्द विचार करबाक अवसरि पाबि हम अपनाकेँ सौभाग्यशाली बुझै छी।
मैथिली- मैथिली एक ओहन भाषाक नाओं छी जइ भाषाक अपन जमीन कोनो आन भारतीय भाषा साहित्यक जमीनसँ कम नै। ईहो बात अछिए जे बहुतो भाषासँ मैथिलीकेँ तुलनो योग्य बूझब, उचित नै बुझना जाइत अछि। तहिना ईहो बात अछिए जे दुनियाँक साहित्यक चिन्तनक बीच मिथिलाक आध्यात्मिक चिन्तन अग्रिम पाँतिमे अछि जे दुनियाँक नजरिमे आइओ अछि। ई बात अलग जे डिबियाक पेनमे अपना सभ सभ दिनसँ रहलौं। ईजोतमे जे कियो रहबो केला आकि छथिओ आे कखनो इजोतक मतलब इजोत आ कखनो इजोतक मतलब ज्ञान कहि भकमोड़मे फँसबैत अपनो फँसल छथि।
सरकार- अपनासँ उगारे नै...बला स्थितिमे अपन सद्य: परिचए आइए नै सभ दिनसँ दैत रहल। खएर जे किछु...।
हमसभ- संघर्ष छोड़ि हाथ-पएर मोड़ि थुसकुनियाँ मारि बैसल रही सेहो बात नै। अपन मैथिली साहित्य माने मिथिलाक सामुहिक विकास लेल हमसभ सतत् संघर्षशील रही तइ आग्रहक संग हम स्वयंकेँ वचनवद्ध करै छी।
तखनि तँ बात ओतए आबि जाइत अछि अपना-अपनी, देहा-देही। तइले हम सभ पहिने अपनाकेँ वचनवद्ध करी जे आपसीसँ लऽ कऽ सामुहिक स्थल धरिक भाषाक माध्यम मैथिलीमे करी। तैकाल हम सभ अपनाकेँ थोड़े कात करैत विभिन्न तरहक परिचए दैत पबै छी। सरकारो अपने खेल खेलाइत रहल अछि। हमहूँ सभ कम खेलाड़ नै जे अष्टम अनुसूचिमे मैथिलीक स्थान लेल संघर्षरत् लोक सबहक जे कइएक बेर जहलक हाबा खेलक तेकरा बिसरि सुविधा अनुसार गपक मिलानी करैत रहै छी। जरूरति अछि, संघर्ष सतति बनल रहए तइले तेकर वैज्ञानिक अध्ययन करब आवश्यक अछि। ओइपर अपनाकेँ चलाएब। जेतबो सुविधा भेटल अछि तेकर उपयोग करब। तैकालमे हम सभ भातेपर भात करए लगै छी। भुखाएलकेँ भुखाएल नै बूझि दान-पून करए लगै छी। जइ कारण, आध्यात्मिक चिन्तन खाली गप्पे बनि कऽ रहि जाइए। एक तँ ओहुना मनुख-मनुखकेँ बाँटि सरकार अपन रोटी सकै पाछू बेहाल अछि। तैपर हमहूँ सभ रंग-बिरंगक तराजू बना एक्के चीजकेँ एक आदमी अदहा सेर तँ एक आदमी सबा सेर कहैत एकटा अलगे बखेरा ठाढ़ केने छी। जे सरकारो देखैए। सरकार मानै कथी? एक-एक आदमी। आम आदमी। आम आदमी माने अपना नै? अपने सभ! जरूरति अछि हमरा लोकनिकेँ पहिने अपनामे सम्बन्ध मजगूत बनए आ तेकर वास्तविक रूप केहेन अछि आ से केहेन तन्नुक अछि आकि सक्कत से अनुभव भाइए रहल अछि। एक तँ अहुना एक आदमीक आठ घंटाक मेहनति दोसर आदमीक बैसारीसँ कम पड़ि रहल अछि। तैठाम केतेक सहचेतीक खगता अछि ओ स्वयं सोचल जा सकैए। औहुना हम सभ अपनो गामक पुल-पुलिया बनबैमे दू-नम्बर सिमेंट तकै पाछू लगल रही छी। तहिना भाषा-साहित्य, पत्र-पत्रिकाक स्थिति अछि। जिनके हाथ जएह पड़ैए तहीमे अपन-अपन परिचए दऽ दऽ ठाढ़ छी। अगिला यात्रा लेल सुन्दर-सुन्दर बात कहि नम्हर प्लान लऽ लऽ चिचिया रहल छी। जरूरति अछि आपसी बिसवास केना बनत तैपर सोचैक। अपना पहिने चिनी खेनाइ छोड़ि जखनि दोसरकेँ मनाही करब तखने कारगर हएत...। ऐ बातपर धियान हमरा सभकेँ दिअ पड़त। सुनिहार आ कहनिहार दुनूक बीच जे एकटा तेसर यथार्थ काज करैत रहल अछि। तेकरा चिन्हब जरूरी अछि। आजुक ऐ मंचसँ जे सम्मान समारोह रहल ओ जरूर तइ दिशामे विचारणीय-विश्वनीय रहल। मुदा जरूरति अछि अहूसँ आगू बढ़बाक आ तइले सभसँ पहिने हम सभ ओहन उदेस बनाबी जे सर्वकल्याणकारी हुअए। सर्व कल्याणक माने ई जे सबहक आवश्यकताकेँ धियानमे रखि काज करब। तखने सभकेँ बिसवासमे लेल जा सकैत अछि। जाधरि हम सभ एकठीम नै हएब, ताधरि शक्ति केना औत?एकठीम भेनाइमे सेहो केतेक रंगक समस्या अछि। जेतबे भारी अछि ओतबे हल्लूक सेहो अछि। हल्लूक ई अछि जे एक विचार करब। बजैले तँ सभ बजिते छी जे मिथिला-मैथिलीक विकास चाहै छी। तँए हल्लूको अछिए। मुदा मूसो तँ हराएले अछि! कोइ काहू मगन तँ कोइ काहू मगन। मुदा अपनो अपनो तँ भार अछिए। से अपन-अपन भारक इमनदारीसँ संपादन करी, तेकर जरूरति अछि। सेवा तँ सेवे होइए। मुदा की पछुआएलक सेवा आ अगुआएलक सेवाकेँ एक्के कहल जाए? की आवश्यक्ता आ आवश्यक आवश्यक्ताकेँ एक्के कहल जाए। फर्क एतए आबि कऽ भऽ जाइए।
एक-दोसरमे एतेक खाधि किएक बनल अछि। एक-दोसराक बीच सम्बन्ध किएक एतेक कमजोर अछि। किएक एक-दोसरपर भरोष कमि रहल अछि। बिसवास नै किएक भऽ रहलै हेन। तेकरो कारण अछि। कारण ई अछि जे सभ सभकेँ ठकै पाछू लगल रहै छी। नै तँ अपनापनक भावमे कमी किएक?निश्चित रूपे सार्वजनिक संस्था सभ सार्वजनिक रहितो सार्वजनिक नै बुझना जाइए। माने ओहन-ओहन काज करैत रहल अछि जे तइसँ अलग परिचए बना हमरा सबहक बीच अछि।
कखनोकाल लोक स्वयं गलती करै छथि आ बेसीकाल ओहन गलती भऽ जाइए जे बेवस्था करबैपर मजबूर सेहो करै छै। तेकरा सभकेँ चिन्हित करब जरूरी अछि। तखने हम सभ हमसभ दिस बढ़ि पएब।
हमसभ आ बिहार सरकार। सरकार तँ पटनामे अछि। समस्या दरभंगो आ आनो-आनो जगहमे अछि। बहुत एहेन समस्या अछि जेकरा हम सभ उठबै बैसबै छी। दोसर बात, दरभंगा अकासवाणी आकि पत्र-पत्रिकाक जे बेवहार अछि ओकरा हमरे सभकेँ देखए पड़त। आइएक ऐ कार्यक्रमक समाचार अकासवाणी दरभंगा द्वारा दू दिन पहिने प्रसारित कएल गेल जइमे इत्यादि कविक रूपमे झारूदार जीकेँ कहल गेलनि। झारूदारजी उपस्थित छथि। कहियो ई स्वयं अपन रचना लऽ सम्बन्धि जगहपर पहुँचल छला। हलाँकी झारूदारजी रचना कार्यक्रम नै लेल गेलनि। हिनका टाड़ि देलकनि। तइ पाछू आनो-आनो कारण भेल होएत जे यथोचित सेहो भऽ सकैए। मुदा ईहो तँ भेबे कएल जे आेइमे ई अपनाकेँ अपन नहियोँ बूझि सकल हेता। झारूदारजी स्वयं बाजल छला-
“मन तँ भेल रहए जे चारि-पाँचटा झारू लिखि दरभंगा अकासवाणीक देबालपर साटि दिऐ!”
साइत गोविन्दे झा कहने छथिन जे भोजपुरीकेँ विद्यापति आ मैथिलीकेँ भिखारी ठाकुर जनु नै भेट पेतै।
भोजपुरीकेँ विद्यापति भेटौ आकि नै मुदा मैथिलीकेँ भिखारी ठाकुर भेट गेल अछि, श्री रामदेव प्रसाद मण्डल “झारूदार”।
दरभंगा अकासवाणीसँ तँ हमरा सभकेँ कोनो आश नहियेँ अछि। तइले भुरुकबा एफ-एम अछि। मुदा तैयो जौं “हमसभ” काज करैले डेग उठा रहल छी तँ से सचमुच प्रशंस्णीय अछि।
जहिना कोनो बच्चाकेँ एकटा पेन मंगला पछाति जौं ओकरा खाली संतोख बन्हैले कहल जाए से, आ परिस्थितिवश करचीओक बनौल लेखनीक प्रवन्ध कऽ देलापर परहक संतोखक चाह करने नीक खाली संतोषसँ नीक करचीक पेन नीक भऽ जाइए, तहिना हमसभ गपक बाट छोड़ि काजक रस्ता पकड़ि चली तँ से कल्याणकारी बुझाइए।
साहित्य अकादेमी द्वारा प्रसारित कार्यक्रम मात्र मैथिलीए साहित्य लेल नै अछि, आनो-आन जनू 24 भाषा-साहित्यक विकासक लेल अछि। कनी कम आकि कनी बेसी खर्च तँ होइते अछि। मुदा से मैथिली विकासक लेल साहित्य अकादेमीक केते सदुपयोग होइत आबि रहल अछि? हमसभ तैपर केतेक विचार करह छी जे हमरे सभ द्वारा संचालित भऽ रहल अछि। अपना हाथक काज अछि। तैकाल हम-हम आ तूँ-तूँ भऽ जाइए। जाधरि “हमलोग-तुमलोग”बला मानसिता हमरा सभमे रहत ताधरि सभ कल्पना लोक रहबे करत। मुदा जीवनमे ईहो समए तँ एबे करैए जखनि लोकक मुँहसँ स्वत: निकलए लगै छै-
“थाकल पाव पलान भेल भारी आब की लादबो हौ वेपारी।”
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
पूनम मण्डल
"