विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा: स्वरूप आ तत्व निर्धारण

आशीष अनचिन्हार · 2014-07-01 · अंक 157

मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण
(आलोचना)
भारतीय भाषा मध्य छंदक अवधारणा संस्कृतसँ आएल अछि। वैदिक संस्कृतमे सरल वार्णिक छंद छल, मने एहन छंद जे की पादमे कतेक वर्ण छैसे गानि बनै छलै जेना गायत्री, अनुष्टुप, जगती आदि।
लौकिक संस्कृतक शुरूआतमे वर्णवृतक प्रधानता भेल। मने काव्यक हरेक पाँतिक लघु-गुरू क्रम एक समान होमए लागल। लौकिक संस्कृतक अंतमे मात्रिक छंदक विधान चलल जैमे सभ पाँतिक मात्राक जोड़ एक समान होइत छलै। मुदा ई सभ शास्त्रक परिधिमे छल जे की मात्र शिक्षित लोक बुझैत छला। मुदा एकर ई मतलब नै जे अशिक्षित लोक सभ अपन लिखनाइ छोड़ि देने छला। अशिक्षित समाजक लोक ( चाहे ओ दलित होथि की सवर्ण) अपन रचना लेल उपरक तीनू छंदसँ अलग तालवृत छंदक उपयोग केला।
आब ई तालवृत छंद की भेल से कने आगू जा क' हम सभ देखब। ऐ छंदसँ पहिने संगीतक प्रारंभिक जानकारी ली। संगीतमे दू टा तत्व प्रमुख छै पहिल स्वर आ दोसर ताल। स्वर संगीत मुख्यतः आरोह-अवरोहपर अधारित रहै छै। संस्कृतक शिक्षित वर्ग स्वरकेँ प्रमुखता देलक तँ जन समान्य तालकेँ । स्वर निर्धारण लेल नाना प्रकारक छंद बनल जैमे सरल वार्णिक आ वार्णिक दूनू अबैए। तालवृत छंद लेल मात्र ताल बराबर भेनाइ अनिवार्य अछि। मने हरेक पाँतिमे चाहे अक्षर बराबर हो की नै हो, लघु-गुरू हरेक पाँतिक बराबर हो की नै मुदा हरेक पाँतिक ताल बराबर भेनाइ जरूरी अछि। तालवृत छंदमे कोनो शब्दक कोनो वर्णक उच्चारण नहियो भ' सकैए। तालवृत छंदमे विराम आ प्लुत केर महत्व अछि। ऐमे शब्दककेँ विशुद्ध उच्चारण अनिवार्य नै अछि। तालवृतमे दीर्घक उच्चारण लघु भ' सकैए आ लघु केर उच्चारण दीर्घ भ' सकैए। जेना तालवृतक हरेक पाँतिक तालगण समान रहनाइ जरूरी छै तेनाहिते वैदिक छंदक हरेक पाँतिमे समान अक्षर हेबाक चाही तेनहिते वार्णिक छंदक हरेक पाँतिमे मात्राक्रम समान भेनाइ जरूरी छै। मैथिलीक सभ प्राचीन लोकगीत तालवृत छंदपर अधारित अछि। तालवृत छंदमे हरेक पाँतिक लय मिलबाके टा चाही तँए तालवृतमे तुक कहियौ, तुकान्त कहियौ, अन्यानुप्रास कहियौ की काफिया कहियौ एकर भेनाइ अनिवार्य अछि। एही तुकान्त निर्वाहक कारणे तालवृत बहुत बेसी लोकप्रिय भेल आ ई परवर्ती संस्कृत धरिकेँ बदलि देलक। बादमे आदि शंकराचार्य अपन सभ स्त्रोत सभमे तुकान्तक प्रयोग केला। आ जेना-जेना समय बितैत गेल संस्कृत काव्य तुकान्त होइत गेल। व्याकरणमे अंत्यानुप्रास सन अलंकारक जन्म भेल आ जयदेव रचित गीत गोविन्दम् सन काव्यकेँ जे मात्र सुमधुर ललित शैली आ अंत्यानुप्रासक कारणे संस्कृतमे विश्वविख्यात भेल। तालवृत छंदक ईहो एकटा बड़का विशेषता अछि जे ई गायकपर निर्भर अछि मने जँ एकटा गायक कोनो दू टा पाँतिकेँ अष्टमात्रिक तालमे बान्हि गेला तँ दोसर गायक ओकरा सप्तमात्रिक तालमे सेहो बान्हि सकै छथि। तँए लौकिक संस्कृतक अन्तमे आ प्राकृतक जन्मसँ तुकान्त केर काव्यमे बहुत महत्व अछि आ जेना-जेना समय आगू बढ़ल तुकान्त बिनु काव्यक परिकल्पना असंभव भ' गेल। पाठक ओ जनता तुकान्तयुक्त काव्यकेँ बेसी मान देलक कारण तुकान्तयुक्त काव्य कर्णप्रिय होइत अछि। प्राकृतक ई गुण अनायास रूपें अप्रभंशमे आएल आ चूँकि अप्रभंश सँ मैथिली सहित आन आधुनिक भारतीय भाषा बनल अछि तँ एहू सभमे तुकान्त अनिवार्य भेल।गएबा कालमे तालवृत छंद हरेक छंद ( वैदिक, वार्णिक आ मात्रिक छंदपर ) लागू भ'सकैए। ओना वैदिक छंद ओ वर्णवृत लेल स्वर-संगीत अनिवार्य अछि। तथापि कोनो गायक ओकरा तालवृतमे सेहो गाबि सकै छथि। तालवृतकेँ मैथिलीमे भास कहल जाइत छै हमरा ज्ञानक हिसाबसँ। बूढ़-पुरान गितगाइन सभ एखनो कहै छथि जे ऐ गीतक भासे नै चढ़ि रहल अछि, एकर मतलबे भेलै जे उक्त गीतक तालवृत बराबर नै बैसि रहल छै। तालवृत छंदक किछु उदाहरण देखू---
भादब हे सखी रैनि भेयाओन
दोसरे अन्हरिया के राति यौ
राति दुख सुख संगहि खेपब
लेसब दीप अकास यौ
ऐ बरहमासाक चारि पाँतिक अध्य्यन केलासँ ई पता चलत जे पहिल पाँतिमे 19 मात्रा ( जँ न्ह बला नियम नै मानी तँ 18)टा मात्रा अछि। दोसर पँतिमे 18 मात्रा, तेसर पाँतिमे 15 आ चारिम पाँतिमे 13टा मात्रा अछि। चूँकि गायनमे न्हसँ पहिने बला स्वतः दीर्घ होमए लगैत अछि तँए हम पहिल पाँतिमे 19 मात्रा मानि रहल छी।
आब आउ देखू एकर तालवृत---
भादब हे सखी रैनि भेयाओन
दोसरे अन्हरियाx के राति यौ
राति दुxxख सुxxख संगहि खेपब
लेसब दीxxxप अxxxकास यौ
दोसर उदाहरण देखू--
काली के देखलहुँ सपनमा
से ठाड़े अँगनमा
केओ नीपे अगुआर माँ के
केओ नीपे पछुआर माँ के
केओ नीपे काली के भवनमा....
पहिल पाँतिमे 16, दोसरमे 11, तेसर आ चारिममे 17-17 एवं पाँचम ओ अंतिम पाँतिमे 19 मात्रा अछि। आब आउ देखू एकर तालवृत---
काली के देखलहुँ सपनमा
सेxx ठाड़ेx अँगनमाxx
केओ नीपे अगुआर माँ के
केओ नीपे पछुआर माँ के
केओ नीपे काली के भवनमा...
तेसर पाँतिक अगुआर शब्दक आपर विराम अछि तेनाहिते चारिम पाँतिक पछुआर शब्दक आपर विराम अछि। अंतिम पाँतिक केओ शब्दक ओ, नीपे शब्दक पे, एवं काली शब्दक लीपर विराम अछि। फलस्वरूप हरेक पाँति 16 तालमात्रिक रचना बनि गेल अछि। प्रस्तुत ऐ गीत सभहँक गायन सुनबा लेल विदह आडियो केर ऐ लिंकपर जाउ-- https://sites.google.com/a/videha.com/videha-audio/
संगीतमे x चिन्ह ताल लेल प्रयोग कएल जाइत छै। तँ ऐ उदाहरण देखि रहल छी जे चारू पाँतिमे ने तँ मात्रिक छंद छै ने वार्णिक आ ने वैदिक मुदा पाँतिक बीच-बीचमे रेघा क' वा ताल द' क' वा विराम ल' क' सभ पाँतिके पूरा कएल गेल छै। इएह तालवृत कहबै छै। गीत मुख्यतः तालवृतक अनुगामिनी अछि ताहूमे मैथिलीक सभ प्राचीन गीत आ लोकगाथा सभ तालवृत छंदक सुदंर उदाहरण अछि। जँ कोनो-कोनो गीतमे आन छंदक लक्षण अबैए तँ ओकरा मात्र संयोग बुझू। ओना हम पहिने कहि चुकल छी जे सभ छंदोबद्ध रचना गेय होइत अछि। तालवृत छंद आ वैदिक छंदमे मात्र एकैटा अन्तर छै बादबाँकी दूनू एकै अछि आ एही एक अंतरक कारणे एकटा स्वर संचालित भेल तँ दोसर ताल संचालित। आब हम पाठक सभसँ अनुरोध करब जे ओ सभ हिसाबसँ तालवृतक आन-आन उदाहरण ताकथि।
तालवृतक प्रसंगमे किछु महत्वपूर्ण जानकरी मोन राखू---
१) तालवृत तालगणपर पड़ैत नियमित बलाघातक आवृति अछि। स्वर संगीतक आरोह-अवरोह ऐमे नै अछि।
२) तालवृत वैदिक संस्कृतोसँ प्रचीन अछि। आदिवासी समजाक संगीत अध्ययनसँ एकरा देखि सकै छी।
३) तालवृतमे एक पाँतिमे अनेको तालगण भ' सकैए आ एकटा तालगणमे कतेको वर्ण वा मात्रा भ' सकैए।
४) तालावृतमे मात्रा मने कालमात्रा होइत छै।
५) तालवृतमे कालमात्राक संख्या निश्चित होइत छै।
६) तालगणमे सभ वर्णक वा सभ मात्राक उच्चारण हो से जरूरी नै छै।
७) तालवृतमे शब्दक रूढ़ स्वरूपकेँ बदलल जा सकैए।
८) तालवृत मुख्यतः गायनसँ जुड़ल अछि तँए सरल वार्णिक वा वर्णवृत वा मात्रिक छंदक कोनो रचनाकेँ तालवृतम,े प्रस्तुत क' सकै छी। उदाहरण लेल तुलसीदास जी रचित ई दोहा देखू-०
राम नाम मणि दीप धरु, जीह देहरी द्वार
तुलसी भीतर बाहिरहु, जो चाहसि उजियार
ई थिक दोहा जे की मात्रिक छंदसँ संचालित अछि। आब एकर तालवृत विश्लेष्ण देखू--
राम नाम मणि दीप धरुxxx
, जीह देहरी द्वा xxxxx र
तुलसी भीतर बाहिरहुxxx
जो चाहसि उजिया xxxxx र
आब अहाँ सभ देखि सकै छिऐ जे १४-१४ मात्राक दू पाँति बला छंद कोना ८-८ तालवृत छंदक ४ पाँतिमे बदलि गेलै। इएह छै तालवृत।
खाली प्राचीने कालमे ई तालवृत छल से गप्प नै आधुनिक कालक मैथिलीक पहिल जनकवि श्री रामदेव प्रसाद मंडल झारूदार एकटा नव छंदक जन्म द' ओकरा विकसित केलाह जकर नाम थिक " झारू छंद "। ई झारू छंद हमरा जनैत तालवृतपर अधारित अछि। ओना ऐठाम ई जानब उचित जे राजनीतिक पार्टी "आआप" केर चुनाव चिन्हसँ बहुत पहिने ई झारू छंद मैथिलीमे आबि चुकल छल।
किछु उदाहरण देखू--
भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति
कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँ लाति
पहिल पाँतिमे 32 मात्रा आ दोसर पाँतिमे 31 मात्रा अछि एकरा तालवृतमे एना देखल जा सकैए--
भागि गेला अंग्रेज अकेला, छोरि कऽ पाछू ढेरो जाति
कर रंगदारी वसुल रहल अछि , मारि मारि कऽ सभकेँx लाति
जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान
ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानि गेल अछि ई विज्ञान
ऐ झारूक पहिल पाँतिमे ३१ मात्रा अछि ( जँ अलग-अलग संयुक्ताक्षर बला नियम छोड़ल जाए तँ) आ दोसर पाँतिमे ३० मात्रा अछि। तालवृतमे एकर उदाहरण देखू--
जीवन-मरण पालन केर रचना, प्रकृति केर गजब विधान
ऐ रचनाकेँ भेदि-भेदि कऽ, जानिx गेल अछि ई विज्ञान
आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 31-31 तालमात्रा भ' गेल।
आर एकटा उदाहरण लिअ--
हे भूमि क' भाग्य विधाता, जगक अदाता भगवान।
कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान।
पहिल पाँतिमे 27 आ दोसर पाँतिमे 38 मात्रा। आब एकर तालवृत देखू---
हे भूxxxमि क' भाग्य विधाताxxx, जगक अदाxxता भगवाxxxन।
कहाँ पता तोरा सिबा छै केकरो, छूपल कतए छै खेतमे धान।
आब तालवृतसँ संचालित भ' दूनू पाँतिमे 38-38 तालमात्रा भ' गेल।
हुनक प्रकाशित पोथी "हमरा बिनु जगत सुन्ना छै " अनेको झारू छंद अछि जकरा पाठक सभ ऐ लिंपर देखि सकै छथि------ https://dbb13891-a-96a2f0ab-s-sites.googlegroups.com/a/videha.com/videha-pothi/Home/RamdeoPrasadMandalJharudar.pdf?attachauth=ANoY7cpwFD3AyNPFZn-bFA8rz2L55cs_LB8frjO_GGszrOG4x9MhScXFXBtCNC2Pid0KCYbBPXm_9UQlKdzNBy3QFA4ldAIrbUHkweRLr0Msi6F0oe2mytUfuZVlcNfK0KsOLD6XEmtfdZ5-zyx8KPfmmG-bIzZdNBmW2flPN5ilfYPfWYID4HvXJ_Bi_3sl0BhQa7tibwQzbRkejjTKerlsO6AWQhd0uupSAr83Ktk2RYBmzMo40yo%3D&attredirects=1 । झारूदार जी मात्र एकटा लेखक नै छथि बल्कि हमरा सभकेँ सिद्ध सरहपासँ ल' क' आधुनिक कालक जे धार बनल अछि तकर दूनू घाटकेँ मिलेबाक लेल पूल सेहो छथि।
झारू छंद स्वरूप निर्धारण---
तालवृतक अधिकांश रचना दूँ पाँति, चारि पाँतिक वा छह पाँतिक समूहसँ बनैत अछि। श्री झारूदार जी अपन पोथीमे दू पाँतिक स्वरूप बला रचना उपयोगमे केला अछि। एकर बाहरी संरचना दोहा सनक होइत छै।
आब हमरा विश्वास अछि जे सुधी पाठक ओ आलोचक सभ ऐ लेखकेँ देखैत श्री झारूदारजीकेँ नव रूपसँ परिभाषित करबाक प्रयास करता।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
सत्य नारायण झा

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा: स्वरूप आ तत्व निर्धारण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 157, 2014-07-01. https://www.videha.co.in/research/2014/157/मैथिली-काव्यशास्त्रमे-झारू-छंदक-अवधारणा-स्वरूप-आ-तत्व-निर्धारण.htm

मूल विदेह अंक / Original issue