सखारी-पेटारी केर तानी-भरनी
आधुनिक मैथिली कथा साहित्यमे नब-नब कथाकार नब-नब कथाक रचनामे संलग्न छथि। हुनक प्रयास निश्चित रूपे मैथिली कथाक संख्यात्म विस्तार हेतु सराहनीय छन्हि। मुदा मात्र संख्यात्मक विस्तारसँ साहित्यक सागरक गहराइकेँ विस्तार नै भऽ सकैत अछि। जहिना बाढ़िक पानिसँ धारक दुनू कात दूर-दूर तक धारक विस्तार बुझना जाइत रहै छै, मुदा बाढ़ि सटकिते धारक सत्यप्रकट भऽ जाइ छै तहिना साहित्योमे होइ छै।
कथा एहेन हेबा चाही जाहिमे भाषा-भावक ताल-मेलक संगे-संग कथामे जीवंतता आ दीर्घजीवी होइक तथ्य समाहित होइ। मात्र आधुनिकताक चोला पहिरा देला मात्रसँ कोनो कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। शब्दाडम्बर कथा नै होइ छै। नीक आ दीर्घजीवन हेतु कथामे विविध तत्वक समावेशकसंगे-संग मानव जीवनक जीजिविषाक प्रखरबिम्ब आ प्रतीक आवश्यक होइ छै।
कथामे जौं जीव-जगतक गहनतम गहराइ नै रहै छै तँ ओ कथा बहुत समए धरि जीवित नै रहि सकैए।
मैथिलीमे आइ कथाक अनेक नाआें देल जा रहल अछि- दीर्घ कथा, लघु कथा, विहनि कथा इत्यादि। मात्र नाआें रखि देलासँ कथा जीवित नै रहि सकैत अछि। अदौसँ आइ धरि वएह कथा जीवित अछि जइमे धार छै। जइमे गति छै। जइमे जिनगीक उहापोह छै। जइमे यथार्थ छै आ कल्पनाक एहेन गठन छै जेकरा पाठक छोड़ितो छोड़ि नै पबैत अछि।
ऐ दृष्टिए हम नन्द विलास रायक “सखारी-पेटारी”क तानी-भरनीपर विचार करबाक प्रयास करब।
‘सखारी-पेटारी’ िहनक पहिल कथा कृति छियनि। पहिल-पहिल कोनो काज करैमे कोनो ने कोनो त्रुटि हएब आश्चर्य नै। तैयो साहित्य सृजनक सरोकारकेँ देखैत हमर प्रयास रहत जे ऐ संग्रहक नीक-नीक कथाक समीक्षा नीक होइ आ सामान्य भावक कथाक फराक कऽ आगूसँ लेखक अपन कथामे आवश्यकतानुसार सुधारक प्रयास करबा हेतु धियान रखथि।
आब हम श्री नन्द विलास राय जीक कथा ‘सखारी-पेटारी’केँ सोझामे रखि खोलबाक कोशिश करब।
‘सखारी-पेटारी’केँ खोलैक काज तँ जनीजातिक छेलनि। साँठब सेहो हुनके सबहक काज छेलनि। आइओ साँठ-उसार करब हुनके अधीन छन्हि। मुदा पुरुख आब बुझू तँ अदहा जनानीए भऽ गेला। साँठ-उसारमे आब हुनक भूमिका अहम भऽ गेलनि अछि। की कहू! सभटा समैक खेल छिऐ।
आब देखू ने, श्री नन्द विलास राय पुरुख छथि मुदा ‘सखारी-पेटारी’ साँठि कऽ हमरा पकड़ा देला। हमहूँ पुरुखे। केते दिन धरि सोचैत रहलौं जे ऐ पेटारीकेँ कोनो जनानीएसँ खोलबएब मुदा ओहेन जनाना ताकब केतए। सखारी-पेटारीमे साँठल बौसक सनोमानो तँ कोनो बूढ़े-पुरान ने बुझै छै। थाकि-हारि कऽ पुरुखक साँठल सखारी-पेटारीकेँ अपनेसँ खोलैले तैयार भऽ गेलौं।
आब एकटा दिक्कत भऽ गेल। सखारी आ पेटारी जौं अलग-अलग रहितए तब ने बेरा-बेरी खोिलतिऐ। दुनू एक्केमे अछि। चलू सखारी-पेटारीक जगह तँ आब ट्रंक लऽ लेलक। आब ओइमे सँ हम एक सभ समान अलग-अलग करबाक कोशिश करै छी। अपने मने गिरथानि बनैक कोशिशमे आब जे हएत से देखल जेतै।
सखारी खुलल। देखू केतेक नीक बौस छै अइमे। समस्त मिथिलावासी एवं मैथिली भाषा-भाषीकेँ समरपित। ठीक बात। यौ, सखारीमे जे समान अबै छै, ओ मात्र घरवारीए सभ समान नै ने रखि लइ छथिन। चाउर, दालि, तरकारी, अदौड़ी, दनौड़ी, करुतेल इत्यादिसँ कनियाँक अबैक खुशीमे भोज-भात होइ छै। सौंसे गौआँ मिलि कऽ बर-कनियाँकेँ आशीष दैत खाइ छै। मुदा ओइ महक काजर, तेल, डोरि, फित्ता आ ककही इत्यादिक बड़ काज। कनियाँ देखए बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ नेना-भुटका तक जे अबैए, सभकेँ कनियाँ अपने हाथे केशमे तेल दऽ ओकरा झाड़ि कऽ ककहै छथिन। ककहि कऽ डोरि वा फित्तासँ बान्हि काजर-सिनुर लगबै छथिन। अगर पेटारीवाली कनियाँ से नै करथिन तँ हुनका भरदुलाहि कहतनि।
राय जीक सखारी-पेटारीक समर्पण हमरा मोहि लेलक। हमरा लगैत अछि जे सभ मैथिलकेँ ई पाँति जरूर मोहत।
चलू, आब चलै छी जे सखारी-पेटारीमे कोन-कोन तरहक वस्तु-जात अछि। यौ, ‘अप्पन-बात’मे तँ सखारी-पेटारीक वस्तु-जातक कोनो चर्चे ने छै। खाली आत्मेकथा आ समर्पण भरल अछि। यौ रायजी, आब बिआहे संग दुरागमन होइ छै। अहाँ तैयो पछुआ गेलौं। लगैए अहाँक बिआह-दुरागमन दू बेर भेल अछि। चलू- दरब-जात संग हम सर-समान तँ खोलए लेब। मुदा सखारीक दोसर झँपना खोलए पड़त।
खुलि गेल। एकसत्तरि। वाह...। आब तँ एके संग दरबजात-वस्तुजात आ सिनुर-टिकुली सभटा चमकए लगल। चलू, देरीसँ एलौं मुदा दुरूश एलौं।
सोइरी छछारब, निपुतराहा, जाति-पाति, वाड़ीक पटुआ आ बाबाधाम- ऐ संग्रहक उत्तम श्रेणीक कथा अछि।
आब हम सोइरी छछारैत बाबा धामक यात्रापर चलै छी। बीचमे निपुतराहा, जाति-पाति आ वाड़ीक पटुआ सन कथापर अँटकैत ऐ यात्राकेँ विश्राम देब। ई पाँचो कथा सखारी-पेटारीक विशेष लक्षणसँ युक्त अछि। लक्षणा आ व्यंजना शब्द शक्तिसँ युक्त पाँचो कथा पाठककेँ कल्पना लोकसँ उतारि कऽ यथार्थक धरतीपर उतारैमे सक्षम अछि।
मैथिल समाजक पारिवारिक-परिवेश आ तइमे धनक पाछू दौड़ैवाली नारी समाजक सोचपर सोइरी छछारब कथा करारा प्रहार करैत अछि।
मालती आ ललिताक जन्मासौचक पश्चात सोइरी छछारैले जे परिस्थिति बनल अछि ओ मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारक यर्थाथ अछि। ऐ कथामे रीनाकेँ उपस्थित कऽ कथाकार बहुत होशियारीसँ कथाकेँ अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचा देला अछि। जइ घरमे रीनानै रहै छै तैठाम विवश भऽ कऽ ललिता सन बेटीक सोइरी माइएकेँ छछारैले बाध्य हुअए पड़ै छै। मैथिल परिवारमे ललिता ऐ परिस्थितिकेँ भोगैत अखनौं जीबए लेल मजबूर अछि। ऐ कथाक व्यंग्य निश्चित रूपसँ पाठकक संग-संग भौजाइ लोकनिकेँ झमारबामे सक्षम अछि।
सोइरी छछारबसँ निकलि हम जाति-पाति कथाक यथार्थपर अबै छी। मैथिल समाजक पतनक एकटा सभसँ महतपूर्ण कारण जाति-पातिक भेद-भाव सेहो अछि। तथाकथित बुधिजीवी समाजसँ लऽ कऽ श्रवजीवी समाज धरि जाति-पातिक रोग ऐ प्रकार पसरल अछि जे एकर निदान कैंसर आ एड्स विमारीक इलाजसँ अधिक कठिन अछि।
कथाकार नुनुबाबूक चरित्रक मादे स्पष्ट कऽ देलनि जे जे समाजमे कोनो जातिक बेकती नुनुबाबूक उपकारसँ बाँचल नै अछि। ग्राम-पंचायतक प्रमुखक जे काज होइ छै तहूसँ अधिक नुनुबाबू समाज लेल कऽ रहल छथि। मुदा गामक जातिवादक समक्ष नुनुबाबू सन बेकती ताबत धरि नै चुनल जेता ताबे तक मैथिल समाजक माथमे जे जातिक कुण्ठाक भुस भरल रहल। आ जाधरि ओकरा बुधिकेँ आड़ीसँ चीरि कऽ विवेकक चुट्टासँ निकालि कऽ फेकल नै जाएत।
‘वाड़ीक-पटुआ’ ठीके बड़ तीत होइ छै। डाक्टर प्रमोद सन पटुआ तीत नै हेतै तँ फेर ई कहाबत किए बनतै। मंगनूबाबू असगरे एहेन बेकती नै छथि। जे सहज सुलभ होइत छै ओ निश्चित रूपे लोककेँ तीत लगै छै बरू ओ मिश्रीओसँ मीठ किएक ने होउ। लेखक निश्चित रूपे ऐ कथाक माध्यमसँ मंगनूबाबू सन लोकक मुँहक संग मनकेँ तीत करबामे सक्षम अछि।
अटकैत-फटकैत बाबाधाम लग आबिए गेलौं। माए-बापक सेवा केने की हेतै। माल पोसने दूटा टका आ मनुख पोसने दूटा कथा ओहिना नै कहल गेल अछि। आन समाजक संगे-संग मैिथल समाजक स्थिति दारूण भेल जाइत अछि। ‘जिन मातु पिता की सेवा की’ (जे माए-बापक सेवा केला) केर भावना आइ मरल जा रहल अछि। आइ मैथिल समाजमे बाबाधाम जेबाक होड़ लागल रहैत अछि। बानरक देखा-देखीबला भावसँ भरल हेंजक-हेंज स्त्री-पुखख नब-नब वस्त्र आ तेहने आँखिक भावसँ भरल जखनि गामसँ विदा होइत अछि तँ हमरा सन मुरूख देखिते रहि जाइत छी।
माए-बाप आ सासु-ससुरसँ भीन भऽ वृद्ध जनकेँ उपेक्षा करैत आजुक पीढ़ी नीचताक रस्तापर ऐ तरहेँ बढ़ि रहल अछि जे सुकनाक बाबू आ माए सन हजारो माता-पिता आइ पछताइत बाजि रहल अछि-
जतने जतेक हम पाप बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाय
मरनक बेर हरि क्यो नहि पूछलि एक करम संग जाय।
उपर्युक्त पाँचो कथा अपन स्वरूप विस्तारक संगे-संग संवाद, पात्र योजना, परिवेश, भाषा शैली एवं उदेसक कसौटीपर कसल बुझना जाइत अछि। पाँचो कथाक शीर्षक सेहो आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुरूप अछि। मैथिल समाजक विविध विडम्बनाक उपर्युक्त पाँचो कथा साक्षी अछि। आधुनिक व्यंग्य विधाक कथामे उपर्युक्त कथा जगह पबैक अधिकारी अछि।
‘सखारी-पेटारी’क छह गोट कथा आधुनिक समाजक पतनोन्मुख भाव-धाराकेँ रेखांकित करबाक प्रयास बुझना जाइत अछि। ‘डाक्टर बेटा’, ‘प्रोफेसर बेटा’,‘डिब्बाबला दूध, ‘सोच, ‘भोँट, आ ‘ऐना’ कथामे एक कात माता-पिताक प्रति उपेक्षा अछि तँ दोसर कात सन्तानक प्रति उपेक्षा। ‘सोच’, ‘भोँट’ आ ‘ऐना’मे एक कात विकास हेतु छटपटाहटि, तँ दोसर दिस समाजमे व्याप्त संकुचित मानसिकता।
मध्यवर्गीय समाजमे डाक्टर आ प्रोफेसर बनल बेक्तीकेँ परिवारक प्रति उपेक्षा पारिवारिक सिनेह आ समरसताकेँ क्षिण्ण-भिन्न करैबला मानसिकतसँ मानवता मरत। आधुनिक नारी शारीरिक सौन्दर्य बँचबैले सन्तानकेँ स्तनपान करैसँ कटब मातृत्वक प्रति उपेक्षाकेँ प्रदर्शित करैत अछि।
‘सोच’ कथामे प्राद्योगिकी शिक्षाक प्रति युवाकेँ बढ़ेबाक प्रयास छै। ‘भोँट’ आ ‘ऐना’ मनुखक आँखि खोलैक प्रयास अछि।
ऐ छबो कहानीमे छोट अकारमे अनेक विषयकेँ उठौल गेल अछि। मुदा ऐ कथा सभमे ऊपरका कहानी सन भाषामे धार नै बुझना जाइत अछि। कथाक शीर्षक आकर्षक एवं विषय-वस्तुक अनुकूल हेबाक चाही। ‘ऐना’आ ‘सोच’ शीर्षक तँ आकर्षक एवं विषयानुकूल अछि। शेष चारि गोट कथाक शीर्षक हमरा बुझने कमजोर अछि।
नन्द विलास रायक सखारी-पेटारीमे दू गोट कथा जनता आ सरकारी तंत्रक आँखि मुनौबलिपर आधारित अछि। लेखक दुनू कथाक माध्यमसँ सरकारी क्रिया-कलाप आ गाम-गाममे सरकारी सहायताकेँ बन्दर-बाँटक आद्यान्त वर्णन करबाक प्रयास केला अछि। प्रयासमे लगभग सफलो भेला अछि। पोषाहारक अनाजक विरोधमे जेना प्रमुख मामिलाकेँ खतम करेलक से ‘निवास प्रमाण पत्र’ मे लगभग विरोधा भास लगैत अछि। जखनि मुखिया आ प्रमुख लेल एकटा प्रमाण-पत्र बनबबैमे संग नै दइ छै ओ गहुमकेँ बन्दर-बाँट कऽ सत्यताकेँ सिद्ध कऽ शिक्षककेँ गहुम कीनि कऽ बाँटैले केना कहि सकै छै? एतबे नै, ओइ शिक्षिकाक पति गामक दबंग अछि। पोषाहारक गहुम बेचि तँ अखनि साधारण बात छी। तँए दुनू कथाक प्रमुखक चरित्रमे विश्वसनीयतासँ अलग काल्पनिकता आबि गेल अछि।
‘गोबरबिछनी’, ‘असल बेटा’, ‘ननदि-भौजाइ’, ‘विवेकक विवेक’, ‘सभसँ पैघ पूजी’, ‘चौरचनक दही’क संग ‘महाजन’ शीर्षकक कथाकेँ हम आदर्शवादी कथाक रूपमे देखि सकै छी। अही कोटिक कथामे भावक सुन्दर समन्वय देखना जाइत अछि। कथा रचना, ओकर विस्तारक मध्य आ अन्तक सुन्दर परिपाक अछि। रायजी कथा गढ़ैमे माहिर छथि। कथाक ताना-बानामे बान्हब पुन:ओकरा अन्तिम परिणति धरि लऽ जाएबमे रूकै नै छथि। ऐ कोटिक कथाक भाषा आ भाव-भंगिमा सरस आ प्रवाहगामी छन्हि।
“महान कथी? धनीक छी तँए महान? नै, जे हृदए महान हुअए। जेकर आत्मा महान हुअए। ...वएह महान आदमी हएत आ महाजन कहौत।” (महाजन)
भाषाक एकटा आरो बानगी-
“एक परनहिया तँ शोकेमे डुमल रहली। बेटी बुचनीक मुँह देखि फेरसँ काज-राज करए लगली।” (गोबर बिछनी)
राय जीक भाषा परिवेश जनित भावकेँ समाहित करबामे पूर्णरूपेण सक्षम छन्हि।
“जखनि नेना लाल पीसा साइकिलपर मीना बहिनकेँ बैसा मदना विदा भेला तँ ओ बौम फाड़ि कऽ कानए लगला।” (विवेकक विवेक)
एे ‘कानब’मे एक्के संग अनेक भावक विस्तार अछि।
समग्र कथा संग्रहकेँ पढ़ला पछाति केतौ-केतौ हिन्दी अथबा उर्दू शब्दक अनपच बेवहार भेल छै। ओ हमरा अनसोहाँत लागल। जेना-
जे ‘दिल’ महान होअए। हमरा सभ बात ‘मालूम’ भेल। ‘लाइन, कौलेज, प्रोफेसरक, इंजीनियर, बी.ए, डी.एम.सी.एच, चौठियाकेँ अपन गलती ‘महसूस’भेल अछि।
अन्तिम खानामे, विवेच्य कथाक शैली आ शीर्षक प्राय: अभिधामूलक छन्हि। लक्षणा आ व्यंजनाक माध्यमसँ ऐ कथा सभमे आरो आकर्षण बढ़ि सकैत छेलै। संगे-संग भावक अभिनय रूप सेहो।
अन्तत: हम कहि सकै छी जे ‘सखारी-पेटारी’ मैथिली कथा साहित्यक विकासक एकटा नीक कड़ी सिद्ध होएत। लेखकसँ आग्रह जे भाषा विचारक माध्यमे टा नै वाहको होइ छै। तँए भाषा-भावक संतुलित बेवहारसँ साहित्यमे रमणीयता अथवा भावक प्रवाह तीव्रगामी होइत छै। कथामे विषयक संग-संग नब-नब प्रतीक बिम्ब आ बात उठा कऽ पाठककेँ सहजे कथाकार बान्हि सकै छथि। तँए कथामे उतरोत्तर विकास परिलक्षित हएब आवश्यक छै।
तथास्तु।
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