सतसठि साला कौशिकी (मिथिला)क लेखा-जोखा
आइ जखन विश्व-मानव इक्कैसम सदीक दोआरि पर ठाढ़ अछि, भारतीय गणतंत्र अपन सतसठिम वर्ष गाँठ मना चुकल अछि, खासकए एहन हालतिमे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक, जे मिथिलाक एकटा भूभाग अछि, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थितिक अवलोकन, विश्लेषण आओर ओकर पुनर्निर्माणक आवश्यकता बहुतो दिनसँ अनुभव कएल जाए रहल अछि। एहि क्रममे साक्षात् होइछ किछु विषय, जेना- गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे आजादीक सतसठि वर्ष कोना बीतल? भारतीय गणतंत्रक एगारहम (11) पंचवर्षीय योजनाक एहि क्षेत्रमे की परिणाम निकलल? एहि क्षेत्रक वर्त्तमान स्थिति केहन अछि? एकर अध्ययन एक गोट आकर्षक विषय अछि; कारण जे आब हमरासबकेँ एकटा स्वतंत्र मिथिला राज्य चाही।
सर्वप्रथम गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक भौगोलिक परिवेश, पर्यावरण आ परिस्थितिसँ परिचित भेल जाए। ई अछि बिहारक उत्तर पूर्वांचल क्षेत्र- नदी संस्कृतिक परिशिष्ट भूमि, मैथिली भाषायी प्रदेश.... एहि क्षेत्रक शीर्ष पर अछि नेपालक सप्तरी आओर मोरंग राज धन-धान्यबला प्रांगण... गांजाक खेती तथा ओकर तस्करी.... एकर नीचाँक भाग अछि- दक्षिण गंगाक कछेर ...झरवेर, पटेर, झौआ, बांस तथा अनकठ-गाछक जंगल- कछेरसँ कछेर धरि कतोक कोसक बीहड़! जतए चोर-डकैतक आतंकसँ भयंकर राति लग-पासक लोकक नीन हराम करैत रहैत अछि।
कज्जलबन नामधारी एतुका खोपड़ीवला गाम, जे बासाक रुपमे बसैत आ उजड़ैते रहैत अछि, जकर कतहु कोनो स्थायी अस्तित्व नहि- आइ एतएतँ काल्हि ओतए। आखिर कछेर पर बसल लोकक अस्तित्वे की? कखनहुँ प्राकृतिक आपदासँ राति-दिनु सामना तँ कखनो भूखमरीक समस्या, ई तँ साधारण व्यक्तिक दैनन्दिनी, एहीमे किछु एहनो जे अपन लूटि-खसोटिसँ अर्जित सम्पत्तिक भंडाफोड़ भए जएबाक डरसँ प्रशासनकेँ रोकबाक लेल कृतसंकल्पित, मुदा स्थिति दुहूक एकहि अर्थात् सुतलोमे सदिखन जगले रहबाक हेतु विवश।
एकर दोसर भाग अछि कोशीक उपत्यका.... कास एवं मोथा वला घाससँ आच्छादित मैदान। एहि भू-भागक पूरबमे पश्चिम बंगाल एवं बंगला देशक सीमा तँ पश्चिममे अछि सारन तथा चम्पारनक भोजपुरी भाषी गाम! एही सीमा-रेखासँ बान्हल ई छोटसन द्वीप खण्ड जकर गाम, शहर तथा कसबाक अपन इतिहास छैक जे कखनहुँ कोशीक ताण्डवक बीच भसिआइत रहल, तँ कखनहुँ ओकर कछेरक लोककेँ बीतल संस्कृतिक बोध करबैत रहैत अछि।
एहि कोशीक भौगोलिक पृष्ठभूमि एकहि सङ्ग अत्यन्त मनोहारी ओ कुख्यात रहल अछि। एतुका पुरबा बयारमे भोर-साँझ एक दिस जतए कृषि कार्यक सुगन्धि व्याप्त रहैत अछि तँ दोसर दिस विभिन्न जीव जन्तुकेर अवसानक दुर्गन्ध, हँ बीच-बीचमे भिन्न-भिन्न माछक सुकठिक गन्ध-सुगन्धि सेहो....भने हम किछु गोटए ओकर गन्धसँ नाक सिकोड़ि ली, मुदा पड़ोसी बंगाली मोसाएसभक निन्नतँ एकरहि सुगन्धिसँ खुजैत छनि।
एकर पच्छिम कुशगामा गाम अछि- कुश आ काससँ आच्छादित भूखंड, उत्तर नेपालसँ सटल कुनौली आ दक्षिण बुढ़िया कोसीक कछेर, जतए नदी समय-समय पर कालबद्ध भए अपन बाट बदलैत रहल छथि.... कखनहुँ पाँच-सात कोसक लपेटमे बालु आ परती-पराँत भू-भाग तँ कखनहुँ धरतीक हरिअरीकेँ सज्जित-सुसज्जित करैत शस्य श्यामला।
बिहारसँ बहएवाली गंगाक उत्तरी कछेरक विस्तार- तिरहुत, दरभंगा, कोशी तथा पूर्णियाँ प्रमण्डल एवं नवगछिया अनुमंडलक लगभग 56,980 वर्ग किलो मीटर क्षेत्रमे अछि। हिमालयक गिरिपादमे बसल गंगाक ई उत्तरी मैदान कौशिकी अपन सर्वाधिक उर्वर-भूमि एवं उन्नत संस्कृतिक लेल आदिकालहिसँ मानव समुदायक आकर्षणक केन्द्र रहल अछि। किएक नहि हो भला? हिमालयसँ निकलि कए गंगा मिलन करएवाली- घाघरा, गंडक, बूढ़ी गंडक, कमला, बलान, बागमति, कोसी तथा महानंदा सदृश सालो भरि पानि भरल नदीसँ अभिसिंचित ई भूमि भला ककरा ने नीक लगतैक? नदी-चओर, बाड़ी-फुलबाडी, खेत-खरिहान, गाछ-बिरिछ, पशु-पक्षी, अन्न-फल, तीमन-तरकारी आर माछ-दूधसँ सम्पन्न ई चौरस मैदान अपन कोरामे मैथिल संस्कृतिकेँ पोषण दए रहल अछि।
एतबे नहि शस्य-श्यामल, हरित-पीत वसन पहिरने एहि कौशिकीक गौरव-गाथा गुनगुनएबाक इच्छा हो तँ मनन करू मैथिली, हिन्दी आर बंगलाक भाषा- साहित्य। सर्वविदित अछि जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जलवायु, मौसम एवं भौगोलिक स्थिति अत्यन्त मनमोहक, रुचि पूर्ण आ अनुकूल अछि। समतल मैदानमे प्रकृति अपन समस्त सम्यकताक संग उपस्थित भेल छथि। ई ओ क्षेत्र थिक जतए जीवन नहि तँ अतिशय गर्मीक कारण झुलसैछ आ नहि अत्यधिक जाड़सँ ठिठुरैछ। बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न समशीतोष्ण वातावरणक ई समतल भूमि अकूत प्राकृतिक एवं मानवीय संसाधन रहितो सोचबाक हेतु बाध्य करैछ जे हमसभ प्रतियोगिताक एहि विश्व-बाजारमे किएक पिछड़ैत रहल छी?
अदौसँ कृषि मानव-जीवनक अनिवार्य आ आधारभूत उद्योग अछि। एतए एक बेर फेर किंकर्त्तव्यविमूढ़क स्थितिमे अपनाकेँ पबैत छी जे मूलतः कृषि आ तद्जनित उद्योग पर आधारित जीवन-यापन करएवला गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक जन समुदाय इक्कैसम सदीक स्वागत कोन अक्षत-चंदन आ फर-फूलक भोग लगाकेँ करए?
कौशिकी भारतीय गणतंत्रक ओ हिस्सा थिक, जतए आजादीक सतसठि साल बादो 85.5% लोक कृषि पर आधारित जीवन-यापन करैत छथि, जाहिमे 70%सँ बेसी भूमिहीन मजदूर, 20%सँ बेसी छोट किसान आ 5%सँ कमे पैघ काश्तकार छथि। फलतः आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रमे भूमि-विवाद विकराल रूप धारण कए सामूहिक नर-संहारकेँ जन्म दैत रहल अछि। एहि भूमि-विवादकेँ नहि तँ बिनोबाक भूदान आन्दोलन शान्त कए सकल आ नहि तँ कम्युनिष्टक कोनो लड़ाइ वा सरकारेक कोनो नीति। आइयो एहि क्षेत्रसँ नहि तँ सामंतशाही टूटल अछि आर नहि तँ हदबन्दी-चकबन्दी योजना सफल भेल अछि। मुदा नारा फेर वैह लगाओल जाए रहल अछि--‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘हमरा हमर धरती दियऽ।’ आखिर फेरसँ ई नारा किएक?..... ककर धरती आ ककर देश? हमरा तँ हमर देश भेटि गेल, हमर धरती भेटि गेल। तँ फेर?....नहि-नहि, धरतीक मालिककेँ धरती नहि भेटल। .... धरती ओकरे होइछ, जे धड़सँ धार बहाबैत अछि; कन्हा पर जे हर-फार उठबैत अछि.... तखन एहि धरतीक असली मालिक अछि के?....??? नहि, नहि, नहि। नाना प्रकारक विसंगतीसँ जूझैत एहि देशक आ एहि प्रश्नक एकेटा उत्तर अछि- हजारक हजार, लाखक लाख लोक जे पुआरमे सिकुड़ि, फाटल-चीटल कपड़ामे जाड़क पैघ राति गुजारि लैत अछि।
भारतीय गणतंत्रक आरम्भिक कालमे पंचवर्षीय योजनाक अन्तर्गत हरित-क्रांतिक लप्पो-चप्पोक संग गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे सेहो विभिन्न नदी योजना (सन् 1955 मे कोसी नदी योजना आदि) एवं कृषि आधारित उद्योग धंधाक विकास कार्य आरम्भ भेल;मुदा शीघ्रहि एहि क्षेत्रक एक-एक कए चीनी, चाउर आ जूट मिल बन्न भए गेल अर्थात् नदी-योजना टाँइ-टाँइ फिस्स। नहि तँ पनबिजली (20 मेगावाट, कटैया) उत्पादन भेल आर नहि तँ नहर-योजनाक पटौनी व्यवस्था किछुओ चमत्कार देखा सकल। अनेक बाढ़-नियंत्रक योजना सभक लूट होइत रहल आ बाढ़ि अपन तबाही मचबैत रहल। पटौनीक पर्याप्त व्यवस्थाक नाम पर लूट चलैत रहल आर सुखाड़मे ई क्षेत्र जरैत रहल। आश्चर्यक विषय थिक कि नहि, जे आजादीक सतसठि वर्ष बितलाक आ एगारहम पंचवर्षीय योजनाक समाप्तिक बादो बिहार सरकार अखन धरि मात्र 14.83 लाख हेक्टेयर भूमिमे वास्तविक पटौनीक सुविधा उपलब्ध करा सकल अछि; जखन कि बिहारक अधिकतम 122.89 लाख हेक्टेयर जमीनक पटौनी सुविधाक आवश्यकता अछि। एहिमे तँ कोनो शक नहि जे बिहारक सिंचाई विभाग लूटक एकटा पैघ केन्द्र रहल अछि। तेँ तँ जाहि परियोजनाक पूर्ण होएबामे महज 8 करोड़ रूपैयाक खर्च अबिते, ओकरा बिहार सरकार 30 वर्षसँ लगभग 66 करोड़ रूपैया खर्च कएकेँ पूरा नहि कए सकल अछि। फलतः ओहि परियोजनाकेँ एगारहम पंचवर्षीय योजनामे सेहो सम्मिलित कए लेल गेल। ई कोनो उलटबासी नहि अछि-- सत्ता आ राजनीतिक खेलमे सब किछु जायज अछि? पटौनीक व्यवस्था गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक कृषि-संस्कृतिक लेल कतबा अहम्, अनिवार्य आ अपेक्षित अछि? किऐकतँ समुचित पटौनी-योजनाक विकास आ सफल क्रियान्वयनसँ एहि क्षेत्रकेँ नहि तँ केवल सुखाड़सँ बचाओल जाए सकैत अछि, अपितु जल-वितरणक समुचित व्यवस्था कए बाढ़िसँ सेहो एहि क्षेत्रक रक्षा कएल जाए सकैछ। बाढ़ि आ सुखाड़ सदृश प्राकृतिक आपदासँ बचाव होइते एहि क्षेत्रक आधि-व्याधि, दुःख-संताप सभ किछु दूर भए जाएत। मुदा ओएह गप्प, बिलाइकेर गरदनिमे घण्टी के बान्हत?
जखन दुनियाक सबसँ उपजाऊ जमीनमे सँ एक गंगाक उत्तरी मैदान पर बसए वला जन-समुदायक एहि औद्योगिक-पूंजीवादी वैज्ञानिक युगमे एतबा खास्ता हाल भए जाए तँ आश्चर्य होइत अछि अपन पूर्वजक सोच पर जे अपन संततिक रक्षार्थ एहि नदीक कछेर, समतल मैदानमे अपन सभ्यता आ संस्कृति विकसित नहि कए सकलाह। ध्यान देबाक छैक जे बीसम सदीक उत्तरार्द्धमे भारतक कोन रंग विकास-यात्राक अग्रिम सोपान मानल जाइत छल? लोक पहाड़ी आ पठारी भागक तुलनामे समतल मैदानमे बसब बेसी पसंद करैत छलाह;किएक तँ ई सामान्य धारणा छल जे पहाड़ी प्रदेशमे जीवन कने कठिन होइत अछि, जखन की समतल मैदानक जिनगी सरल। गंगाक उत्तरी किनार विशाल समतल मैदान अछि। जाहिमे बिहारक 60% आवादी निवास करैत छथि; जखन की ई क्षेत्र बिहारक कुल क्षेत्रफलक 40% अंश थिक। ई भारतक सर्वाधिक आबादी घनत्व (885 व्यक्ति प्रति हेक्टेयर) वला क्षेत्र अछि। विचारणीय अछि जे आजादीक सतसठि वर्षसँ भारतीय गणतंत्रमे ओ केहन शतरंजी राजनीति चलैत रहल जे आइ गंगाक उत्तरी मैदान कौशिकीक लोक सबसँ बेसी चिंतित छथि? चिंता स्वाभाविक छैक। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक एहि पछुआएल क्षेत्रमे नहि तँ उर्जा-स्रोत अछि, नहि तँ कोनो सफल उद्योग; नहि तँ वैज्ञानिक कृषि-तकनीकि अछि आ नहि तँ उन्नत यातायात। इक्कैसम सदीक भारतीय गणतंत्रक ई समतल इलाका आइयो लालटेन युगमे जीवन बसर कए रहल अछि।
बिहारक एहि क्षेत्रमे गामक परिकल्पना करैत लालटेन युगक बात के कहय, एतएतँ शहरोमे अन्हारे पसरल अछि। कारण स्पष्ट छैक- एहि क्षेत्रमे पनबिजली आ ताप विद्युत उत्पादनक विकासक दिशामे आइ धरि सरकारक डेगे नहि बढ़ल अछि। सन् 1971-72 मे गंगाक उत्तरी मैदानी भागक प्रति व्यक्तिक बिजली-खपत क्षमता मात्र 10.10 किलोवाट प्रतिघंटा छल जखन कि एही वर्ष गंगाक दक्षिणी मैदान आ छोटानागपुरमे उर्जाक खपतक क्षमता क्रमशः 41.5 किलोवाट एवं 201.9 किलोवाट प्रतिव्यक्ति प्रतिघंटा छल। मानल तँ इएह जाइछ जे उर्जा-खपतक क्षमता जीवन-स्तरक सूचक होइत अछि। उर्जा-स्रोत सदृश यातायातक विकास सेहो कोनो क्षेत्रक सर्वांगीण विकासक कारण आओर परिणाम होइत रहल अछि। किएकतँ यातायात ओहि ठामक जनजीवनकेँ मात्र आवागमनक सुविधे नहि प्रदान करैत अछि, अपितु उत्पादनक आयात-निर्यात एवं वितरण-उपभोग द्वारा ओहि ठामक जीवन-स्तरकेँ सेहो प्रभावित करैछ।
एहि वैज्ञानिक युगमे मनुक्ख जल, थल आओर नभ सदृश तीनू मार्ग पर विजय प्राप्त कए लेने अछि। मुदा दुर्भाग्य छैक जे गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीमे हवाई अड्डाक संख्या ईकाई अंककेँ पार नहि कए पओलक अछि। आइयो एहि क्षेत्रमे एहन मैथिल भेटि जएताह जे हवाई जहाज नहि देखने छथि; किएकतँ कहियो-काल कोनो सरकारी कार्यक्रमक अवसरे पर कोनो हवाई जहाज एहि क्षेत्रमे उतरैत अछि।
हवाई-मार्गक विकास नहि भेलासँ एहि क्षेत्रक लोककेँ कोनो मलाल नहि छनि; किएकतँ एहन खर्चावला यात्राक हेतु क्षमतो तँ होएबाक चाही? मुदा दुख अछि तँ एहि बातक जे कमे खर्चमे सुगम यात्रावला जल मार्ग, जकर विकासक अकूत सम्भावना एहि क्षेत्रमे बनैत छैक, किएकतँ एतुका सभ नदीमे सालो भरि पानि रहैत अछि, तकरो हाल तँ ओएह छैक। रहल-सहल एक मात्र थल मार्गक विकासमे सरकार सतसठि वर्षसँ प्रयासरत अछि, मुदा नतीजा ढाकक तीन पातक बराबरिओ नहि निकलैत अछि। एक दिस भारत सरकार मैट्रो रेलवेक विकासमे लागल अछि; आ दोसर दिस ई क्षेत्र बड़ी रेल लाइन मधेपुरा-कटिहार एवं सहरसा-फारबिसगंज शाखाक लेल संघर्षरत अछि। आइ जखन विश्व-बैंक सम्पूर्ण दुनियामे सड़कक जाल बिछैबाक लेल प्रयासरत अछि, तखनो एहि क्षेत्रक कतेको अनुमंडल जिला मुख्यालयक सड़क मार्गसँ जुड़बाक लेल लालायित अछि। एहनो नहि छैक जे सड़क योजना-मदमे कम खर्च भेल अछि। मुदा ओ तँ भारतीय नौकरशाहीक लूटक कमाल अछि जे बहुत रास देशी-विदेशी योजनाक बादो एतुका खाधि सबमे सड़क आ कि सड़कमे खाधि से ताकब मुश्किल अछि। योजना-कार्यालयसँ ठीकेदार धरिकेर पसरल लूट तंत्रक परिणाम भुगतैत सड़क आइ गिट्टी आ अलकतराक लेल तरसि रहल अछि। जा धरि सड़ककेँ‘भूमि क्षरण’आ पानिक बहावसँ बचाओल नहि जाओत-- ता धरि मजबूत सड़क सेहो टिकाऊ नहि भए सकैत छैक, मुदा लूटक शिकार बनल ई सड़क एहिना कहिआ धरि टिटिआइत रहत?
सर्वाधिक सघन आवादीकेँ पालन-पोषण देबाक एकमात्र साधन अछि-- पारम्परिक कृषि। एम्हर भारत सरकारक कृषि-नीतिक हाल ई अछि जे पंचवर्षीय योजनामे कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्रक विकासक लक्ष्य दिनानुदिन घटबैत जाए रहल अछि। पंचवर्षीय योजनाक माध्यमसँ भारत सरकार भनहि पंजाब एवं हरियाणामे हरित-क्रांति आनि लेने होअए-- मुदा गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी आइयो अपन बदहाली आ बदकिस्मतीक गीत गाबि रहल अछि। आइयो ई क्षेत्र भारत एवं बिहार सरकारक कृपा-दृष्टिक लेल लालायित अछि। आजादीक एहि सतसठि वर्षमे एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमतामे 100% क वृद्धि भेल ; जखन कि एतबहि दिनमे एहि क्षेत्रक जनसंख्यामे 125% क वृद्धि भेल अछि। आब एहि क्षेत्रमे आओरो कृषि-भूमिक विस्तार सम्भव नहि अछि। हँ, कृषि-विज्ञानमे वैज्ञानिक तकनीकी विकास कए एहि क्षेत्रक उत्पादन-क्षमताक विकास कएल जाए सकैत अछि; परंच प्राकृतिक संसाधनक वैज्ञानिक विकासक अभाव आ अनियंत्रित जनसंख्या विस्फोट एहि क्षेत्रक सामाजिक-आर्थिक हालतिकेँ बदतरि बना देलक अछि। फलस्वरूप एतए बेरोजगारीक एहन भयानक विस्फोट छैक जे जनसेवा, गरीबरथ, महानंदा, नार्थ-ईस्ट एवं दिल्ली तथा पंजाब जाइबला सभ ट्रेन एहि क्षेत्रसँ पलायन कएनिहार मजदूरकेँ ढोएबाक कीर्त्तिमान स्थापित कएल अछि। मजदूर सभक पलायनसँ दिल्ली सरकार चिंतित भए रहल अछि। की, ई भारतीय गणतंत्रक असमान विकास गतिक प्रमाण नहि थिक? की, भारत सरकारक श्रम एवं कल्याण मंत्रालयकेँ एकर चिंता नहि करबाक चाही? मजदूरक बहुसंख्य पलायन एहि क्षेत्रक अनियंत्रित आबादी आ श्रम-नियोजनक अभावक परिणाम एवं प्रमाण थिक।
आइ आजादीक सतसठि वर्ष बाद भारतक संसदीय राजनीतिमे क्षेत्रीय दलक बढ़ैत दबाव स्पष्ट देखा रहल अछि। मुदा आइ धरि गंगाक उत्तरी मैदानी भाग अर्थात मिथिलाक समस्याकेँ केन्द्रमे राखि राजनीति जन्म नहि लए सकल अछि। अतः आवश्यकता छैक गंगाक उत्तरी मैदान अर्थात मिथिलाक सांस्कृतिक समुदायक सामूहिक राजनीतिक हस्तक्षेपक, जे भारतीय गणतंत्रमे एहि क्षेत्रक समस्याकेँ केन्द्रमे राखिकए एकर अधिकारक लेल संघर्ष करए। कोनो क्षेत्रक पर्यावरण ओतुका जन जीवनक प्राण होइत अछि। गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकी समशीतोष्ण वातावरण, अपार जल, बन आ कृषि संसाधनसँ सम्पन्न अछि। कहल जाइत अछि जे अकबरक जमानामे जखन भूमि बंदोबस्त करए टोडरमल जी एहि क्षेत्रमे आएल छलाह तँ ई क्षेत्र एक गोट घनघोर जंगल छल। नतीजतन भूमिक बंदोबस्ती नहि भए सकल। मुदा अकूत प्राकृतिक संसाधन एवं अनुकूल पर्यावरणक कारण एहि क्षेत्रक जनसंख्या तीव्र गतिसँ बढ़ैत गेल। बढ़ैत आवादीकेँ पोषण देबाक हेतु जंगल काटिकए खेती योग्य जमीन बनाओल गेल। तखन पारिस्थितिक संतुलन बिगड़बाक डर किनका छलनि? परंच आइ एहि क्षेत्रक साठि वर्षीय सभ व्यक्ति बेबाकीसँ कहि सकैत अछि जे एहि क्षेत्रक सभ नदी कृशकाय भए गेल अछि।
सामान्यतः गंगाक उत्तरी मैदानी भाग कौशिकीक मूल भौगोलिक समस्या अछि-- बाढ़ि, सूखार, अनियंत्रित वन विनाश, मृदाक्षरण, नदीसँ पानिक सूखब शुभ संकेत नहि अछि। ई दुबर-पातर होइत नदी रहि-रहिकए बरसा मासमे अपन तामसकेँ जगजाहिर करैत सम्पूर्ण क्षेत्रकेँ बाढ़िक चपेटमे लए लैत अछि। एहि नदी सभक तामसकेँ बुझए पड़त। ई बान्हल नदी जाहि रफ्तारसँ एहि क्षेत्रकेँ बालूक ढेरमे बदलैत जाए रहल अछि, जाहि गतिसँ एहि जमीनसँ पैघ गाछसभ समाप्त भए रहल अछि-- ओ एहि क्षेत्रकेँ रेगिस्तानमे बदलि जएबाक संकेत दैछ। ओहुना हिमालयक ग्लेशियर फटबाक आतंक पूर्वेसँ एहि क्षेत्र पर मौजूद अछि। पर्यावरण केँ लएकए हाय-तौबा मचाबैवला लोकक नजरिसँ किऐक ओझल अछि ई क्षेत्र कौशिकी। पृथ्वीक ई सुन्दरतम अंश गंगाक उत्तरी समतल मैदान कौशिकी आइ पारिस्थितिक असंतुलनक भंवर जालमे फँसि गेल अछि। आजादीक आरम्भिक सालमे नहरक काते कात वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाओल गेल, मुदा रख-रखावक अभावमे ओ हरियर हरियर गाछो सुखिकए रक्षकक भक्षण भए रहल अछि। खासकए सुपौल, सहरसा, अररिया आ मधेपुरा जिलाक नहर-शाखाक काते कात लगाओल शीशोक गाछ पानिक बिना सुखिकए जारन भए गेल। बेचारा नहरे की करत? ओ तँ अपने पिआसल अछि, तखन खेत आ गाछकेँ कतएसँ पानि पिआओत? उत्तम नस्लक पशु एवं चरागाहक अभाव, कृषि-भूमि पर जनसंख्याक बेस दबाव, स्थिर आ असंतुलित औद्योगिक प्रगति, शक्ति स्रोतक अल्प विकास तथा जनसंख्या एवं संसाधनक बीच असंतुलनक वृद्धि, तेँ आवश्यक अछि-- भूमि-संरक्षण, वृक्षारोपण एवं जलाशयक सुरक्षा कए एहि क्षेत्रक पर्यावरणकेँ बचाएब। एहि क्षेत्रक नदी सभकेँ बान्हसँ बान्हब बान्हक काते-कात वृक्षारोपण द्वारा जंगल उगाएब, यातायातक लेल सड़क मार्ग विकसित करब, नहर योजना द्वारा सिंचाई आ उर्जाक व्यवस्था करबाक चिर आकांक्षित सपनाकेँ साँच करबाक आवश्यकता अछि जे आब मिथिला राज्य बननहि सम्भव अछि।
मिथिला राज्य आब हमरासभक हेतु प्राण-वायु सदृश् आवश्यकता बनि गेल अछि, जकर अभावमे एहि क्षेत्रक विकासकेर सपनो देखब असम्भव सन बुझबामे आबि रहल अछि। यद्यपि दोष अनका पर मढ़ब अति साधारण छैक, अपन दोष-अपन कर्मच्युतताकेँ जँ देखबाक सामर्थ्य हमसभ मिथिलावासी प्राप्त कए ली तँ ककर सामर्थ्य छैक जे हमरासभकेँ अपन अधिकारसँ वंचित करत। मुदा, की हमसभ अपन-अपन छाती पर हाथ राखि एहि विषयक गॉरन्टी दए सकैत छी जे हमसभ सबतरि अपन कर्मपथ पर सजग-सतर्क भए प्रयासरत छी? हमरा जनैत जँ केओ एकर गॉरन्टी देबाक असफल प्रयास करबो करताह तँ कमसँकम ओहि राति तँ हुनका निन्न निश्चये नहि होएतनि। कतेक सोचनीय विषय अछि जे मिथिला क्षेत्रक तथाकथित पब्लिक विद्यालयमे बंगलाक सङ्ग-सङ्ग आनो क्षेत्रीय भाषा पढ़ाओल जाए रहल अछि, मुदा मैथिली नहि। मैथिलीकेँ संवैधानिक मान्यता भेटबासँ पूर्व ओहि विद्यालयक संचालक महोदयलोकनिक कहब छलनि जे मैथिली पढ़ि की होएत? मुदा आब? आब तँ मैथिली पढ़ि भारतक सबसँ पैघ परीक्षा यूपीएससी पास कएल जाए सकैछ, तखन आब कोन समस्या? हँ समस्या अछि मानसिक हीनताक, जाहिसँ एखनहुँ धरि हमसभ निकलि नहि सकलहुँ अछि। ई तथाकथित विद्यालय चलौनिहार केओ कि मिथिलासँ बाहरक छथि, तखन फेर एना किएक?
तेँ आवश्यकता अछि जे हमसभ सबसँ पहिने निचुला स्तरसँ एहि दिसमे आगाँ बढ़ी तँ परिणाम सार्थक भए सकैछ। जँ मिथिलावासी निश्चय कए लेथि जे सम्पूर्ण मिथिलाक पढ़ाइ ओकर मातृभाषाक माध्यमे होएत, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ मिथिलावासी अपन आवेदन मात्र मैथिलीमे लिखब प्रारम्भ कए देथि, तँ के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? जँ हमसभ अपन पावनि-तिहारमे अपन संस्कृतिकेँ बढ़एबाक निश्चय कए ली तँ फेर के रोकि सकैछ मिथिलाकेँ बढ़बासँ? मुदा, ई तँ होएत नहि, कारण जे हमसभ तँ “तीन तिरहुतिआ तेरह पाक”मे विश्वास करैत आएल छी आ तकरे फल उठाए हमर-अहाँक संस्कृतिकेर दुश्मन लोकनि मैथिलीकेँ जाति-विशेषसँ बान्हि अपन मनोवांछित फल प्राप्त करबाक प्रयासमे लागल छथि। यद्यपि आशा नहि पूर्ण विश्वास जे ओ दुश्मनलोकनि कहिओ अपन एहन नीच कर्ममे सफलता प्राप्त नहि कए सकताह, मुदा हमर प्रयासकेँ शिथिलतँ कइए सकैत छथि।
तेँ आवश्यक अछि जे हमसभ एकजूट भए एहि दिशामे सोची आ अपन पीठ थपथपएबासँ पूर्व दोसराक पीठ थपथपएबाक कार्य करी। ई दृढ़ विश्वास रखबाक आवश्यकता छैक जे ककरहु नीक कार्यक फल आइ-ने-काल्हि भेटबे करतैक, ओकर कार्य जनसाधारण द्वारा चिन्हले जएतैक। तेँ शुद्ध मनसँ मिथिला-मैथिल-मैथिलीक विकास दिशामे सोचनिहारकेँ आगाँ आबि नेतृत्व सम्हारबाक आवश्यकता अछि जे अदौसँ आबि रहल मिथिलाक मांगकेँ पूरा करबाक सामर्थ्य प्राप्त करताह।
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जन्म स्थान- अर्राहा, पो.- अर्राहा, भाया- मठाही, थाना- घैलाढ़, जिला- मधेपुरा, बिहार, पिन-852121
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