विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता

योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’ · 2015-01-01 · अंक 169

योगेन्द्र पाठक “वियोगी”
एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता
घसल अठन्नी कविताक रचना कें प्रायः सात-आठ दशक बीत गेलैक। ओहि समय अठन्नीक मोल बहुत बेसी छलैक। आठ आना मे चारि पाँच सेर चाउर कीनल जा सकैत छल। घसल अठन्नी हमहू देखल अछि, ओ दू तरहें प्रचलित छल - एक तS वास्तविक अठन्नी जे बहुत पुरान भS गेला सॅं ओकर छपलाहा किछु अंश मेटा जाइत छलैक आ दोसर जे सही मे नकली छल से अठन्नीक आकारक कोनो अन्य धातुक टुकड़ा जाहि मे किछु छपले नहि रहैत छलैक। नेतघट्टू लोक एहेन सिक्का साधारणतः रातिक अन्हार मे चला लैत छल। पहिल प्रकारक सिक्का चलेबा मे ओतेक कष्ट नहि होइत छलैक कारण किछु छाप तS रहितहि छलैक मुदा दोसर तS सोर फोर ठकी छलैक। ओ सिक्का रहितहिं नहि छलैक।
कविता मे समाजक एकटा चित्रण अछि। ओहि समयक समाज मे भुटकुन बाबू छलाह जिनका लेल हत्या केनाइ मामूली बात छलन्हि कारण हुनका दरोगाक बरदहस्त प्राप्त छलन्हि -
“कै खून पचौलनि ई बंडा
रोइयों न भंग
युग युग दरोगाजी जीबथु”।
भुटकुन बाबू दरोगा कें खुआ पिया कए अपना पक्ष मे रखैत छलाह। कियो दरोगा आबथु, भुटकुन बाबूक ओतए सॅं डाली हुनका पहिनहिं पठा देल जाइत छलन्हि। मधुपजीक समयक भुटकुन बाबू जमीन जथा बला सामंत छथि। हुनकर अपन अहंकार छनि -
“बनिहारक दS कए उचित बोनि,
कुल मे लगाएब की हमहिं दाग?”
आइ एकैसम शताब्दीक दोसर दशक मे यदि समाज पर दृष्टिपात करी तS स्पष्ट भए जाएत जे कतहु किछु नहि बदललैक अछि। ढंग ओएह छैक, हॅं कने रंग बदलि गेलैक अछि। गामक भुटकुन बाबू कें आब मखना खबास नहि रहल होन्हि मुदा बाहुबली लोक अपना संग हॅंसेरी रखितहिं छथि, जे देखबा मे “कुलिशहुँ सॅं कर्कश भीमकाय” रहितहिं अछि आ जकर आतंक जनसाधारणक लेल मखनाक चाट सॅं बेसिये घातक होइत छैक। भुटकुन बाबूक चोला बदलि गेलन्हि अछि। जमीन जथा बला सामंत सॅं बदलि आब ओ नेता आ ठीकेदारक रूप धs लेलन्हि अछि। ओ नेता-ठीकेदार, जे बात बात पर दरोगा कें बदली करबा देबाक धमकी दैत अछि, तकरा दरोगा कोना नहि मददि करतै? ओकर अपन हित साधन सेहो ओही नेता-ठीकेदारक संग देला मे होइत छैक।
अठन्नीक मोल आब नहि रहलैक। परिवर्तित रूप मे पचास पैसाक सिक्का सेहो बन्ने भS गेल। मात्र सरकारी खाता पर चालू छैक। यदि क्रेय मूल्यक बराबरी करी तs साठि सत्तरि साल पहिलुक अठन्नी एखनुक दू सौ टाकाक समतुल्य भs जाएत। एखन समाज मे जन बोनिहारक न्यूनतम बोनि सेहो दू सौ सॅं कम नहिए छैक।
एहेन स्थिति मे पाँच सौ टाकाक नकली नोट मधुप जीक घसल अठन्नीक तुलना मे राखल जा सकैत अछि। आब कल्पना करियौ जे गाम घरक कियो बाहुबली (आ कि कियो आने नेतघट्टू लोक, नेताक चमचा आ कि ठीकेदार) साँझू पहर दूटा जन कें बोनिक रूप मे पाँच सौ टाकाक नोट देलखिन्ह ई कहि जे चौक पर भजा कए दूनू बाँटि लिहें। चौक पर ओ नोट नहि भजलैक कारण ओ नकली छलैक। एहन स्थिति मे यदि ओ नोट घुरेने हुनका लग आओत तs की ओ स्वीकार कs लेथिन्ह जे सम्भवतः हुनके देबा मे भूल भेल हेतन्हि आ नोट बदलि देथिन्ह ? के स्वीकार करत अपन ई गलती ? आ गलती भेलैक कोना जखन जानिये कए कएल गेलैक ?
मधुपजीक बुचनी अन्यायक प्रतीकार करैत अछि -
“मालिक, हम कर्ज न छी मॅंगैत,
अथवा नहि एलहुँ भीख हेतु,
उपजले बोनि टा देल जाए…”
मुदा फल की भेटैत छैक ? मखनाक लात घूसा आ बेहोस भs कए खसि पड़ला पर फेर भुटकुन बाबूक बेंतक प्रहार। बुचनी भागमन्त छल, कष्ट सॅं मुक्ति भेटि गेलैक। सोचियौक यदि ओहि दिन ओ मरैत नहि आ अपंग भs जाइत तखन ओकर जिनगी केहन बोझ भs जइतैक ? अथवा यदि अपने ओ मरि जाइत आ बच्चा टुअर भs कए जीबैत रहि जइतैक ? मधुपजी अपन नायिका कें ओहि कष्ट सॅं बचा लेलखिन्ह -
“बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन
शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि”
मुदा कतेको एहन “घसल जिनकर अदृष्टि” बुचनी सन भाग्यशाली नहियो भs सकैत अछि।
आजुक जन बोनिहार कतए जा कए नालिस करत ? एखनहु समाज ओहिना छैक जे दरोगा तs पैघ बात, सिपाहिए ओकरा थाना पर टपए नहि देतैक। उनटे झूठक कोनो अपराध बना कए दश लाठी मारबो करतै आ बेसी टेंटें करत तs ओकरा हाजतक भीतर बन्न सेहो कs देतैक। आ तकरा छोड़बै लेल फेर ओएह नेता जीक सहारा।
भुटकुन बाबूक घमंड आ बेइमानी पोषित छलन्हि भ्रष्ट प्रशासनक कारण। आ प्रशासनक भ्रष्टाचार बढ़बे केलै अछि, बहुत बेसी बढ़लैक अछि। नकली नोटक व्यवसाय जे फरि आ फुलाए रहलैक अछि से किएक ?
नवका भुटकुन बाबू अर्थात् ठीकेदार साहेब यदि पूरा बोनि दs देथिन्ह तs बूझू जमाना उनटिए गेलैक। सब जनैत छी मनरेगा मे कतेक पर औंठा छापल जाइत छैक आ कतेक हाथ पर देल जाइत छैक। बोनिहारक उचित बोनि एकटा साधारण किसान भले दs दैत होइक, ठीकेदार तs कतहु नहिए दैत छैक।
घसल अठन्नी कें एखनहु ठौर नहि भेटलैक अछि। ओ एखनहु ओहिना बौआ बौआ कए गाबि रहल अछि “हम कतए जाउ, अबलम्ब पाउ ?” आ बुचनीक बेटा बेटी नाती पोता खटि रहलैक अछि आ हाथ मे पाँच सौक नकली नोट लेने दोकाने दोकान बौआ रहलैक अछि। जेना समय ठाढ़ भs गेल होए।
मधुपजीक ई रचना काल निरपेक्ष भs गेल। काल बीतैत रहल मुदा रचना सदिखन अपन प्रासंगिकता बनौने रहल।
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Suggested citation: योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’. “एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 169, 2015-01-01. https://www.videha.co.in/research/2015/169/एकैसम-शताब्दी-मे-घसल-अठन्नीक-प्रासंगिकता.htm

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