विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल

ओम प्रकाश झा · 2015-01-01 · अंक 169

काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल
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काशीकान्‍त मिश्र ‘मधुप’ जीक नाओं मैथिली साहित्‍यमे एकटा उच्‍च स्‍थान रखैत अछि। मधुपजी मैथिलीमे अनेको रचना केने छथि। हिनकर अटुट मैथिली-प्रेम के नै जनैत अछि। एकसँ एक काव्‍य रचना हिनका मैथिली साहित्‍यमे ‘अमर’ बनौने अछि। की मधुपजी मैथिलीमे गजल सेहो कहने छथि, ई जनबाक उत्‍कण्‍ठा गजलक सिनेही हेबाक कारणेँ हमरा छल। “अनचिन्‍हार आखर” जलवृत्तसँ पता चलल जे मधुपजी मैथिलीमे एकटा गजल रचने छथि जे १९३२ ई.मे मैथिली साहित्‍य समिति द्वारा काशीसँ प्रकाशित पत्रिका- “मैथिली-संदेश”मे छपल छल। ई गजल हम नीचाँ उद्धृत कऽ रहल छी-
“मिथिलाक पर्व गौरव नहि ध्‍यान टा धरै छी
सुनि मैथिली सुभाषा बिनु आगियेँ जड़ै छी
सूगो जहाँक दर्शन-सुनबैत छल तही ठाँ
हा आइ ‘आइ गो’ टा पढ़ि उच्‍चता करै छी
हम कालिदास विद्या-पति- नाम छोड़ि मुँहमे
बाड़क तीत पटुआ सभ बंकिमे धरै छी
भाषा तथा विभूषा अछि ठीक अन्‍यदेशी
देशीक गोल ठेसी की पाँक पड़ै छी
औयत्र-तत्र देखू अछि पत्र सेकड़ो टा
अछि पत्र मैथिलीमे एको ने तैं डरै छी”
ऐठाँ ई देखबाक चीज अछि जे ई गजल पूरा-पूरी अरबी बहरपर आधारित अछि। ऐ गजलक प्रत्‍येक पाँतिमे मुस्‍तफइलुन (दीर्घ-दीर्घ-ह्स्‍व–दीर्घ) आ फऊलुन (ह्स्‍व-दीर्घ-दीर्घ)क प्रयोग २ बेर कएल गेल अछि। कहबाक मतलब जे ई गजल बहरमे कहल गेल अछि। ई अचरजक विषय अछि जे मधुपजी अरबी बहरमे गजल कहबाक योग्‍यता रखितो मात्र एकेटा मैथिली गजल किए कहलनि? आब एतेक दिनक पछाति ऐ विषयपर अनुमानेटा लगौल जा सकैत अछि। तथापि ई उत्‍कण्‍ठाक विषय छै, तँए विषयपर विमर्श आवश्‍यक बुझना जाइए।
ई गौरवक बात अछि जे मैथिलीमे पछिला सए बरख पहिनेसँ गजल कहल जा रहल अछि। मुदा ई चिंतनीय आ सोचनीय बात अछि जे घनेरो साहित्‍यकार सभ एकटा वा दूटा गजल कहला बाद फेरसँ आगू गजल एकदमे नै कहलथि। एकर की कारण भऽ सकैत अछि? ई बात सर्वविदित अछि जे मैथिली साहित्‍यकारक एकटा वर्ग हरदम ई मानैत रहल जे मैथिलीमे बहरयुक्‍त गजल नै कहल जा सकैए। अपितु किछु गोटे एतए तक मानैत रहला जे मैथिलीमे गजल लिखले नै जा सकैत अछि! ओना ऐ बातक प्रतिवाद स्‍वरूप बीच-बीचमे मैथिलीमे गजल कहल जाइत रहल, जेकर उदाहरण ‘मधुप’जीक ई एकमात्र गजल सेहो अछि। फेर ई सवाल जे जखनि मधुपजी बहरमे एकटा गजल कहने छथि तखनि फेर दोसर गजल किए ने कहने हेता? एकर जवाब तकैले जखनि आधुनीक मैथिली साहित्‍यक पूरा इतिहासकेँ देखै छी, तखनि बहुत किछु स्‍पष्‍ट भऽ जाइए। आधुनिक मैथिली साहित्‍यक इतिहास सामंतवाद आ दादागीरीक इतिहासक एकटा सर्वश्रेष्‍ठ उदाहरण रहल अछि। सदिखन एकटा खास ग्रुप वा वर्ग मैथिली साहित्‍यकेँ अपन जागीर बुझैत मैथिली साहित्‍यकेँ बन्‍हकी लगौने रहल अछि। ओना ई प्रक्रिया आइयो धरि रहल अछि, मुदा पहिनेसँ यएह परिवर्तन भेल अछि जे आब प्रतिवादक स्‍वर सेहो मुखर भेल जा रहल अछि। एकर सुगबुगाहटि आब बुझाए लगल अछि। अस्‍तु, हमर कहबाक तात्‍पर्य ई अछि जे मैथिली साहित्‍यक मठाधीश आ सामंत लोकनि ई घोषणा केलन्‍हि जे मैथिलीमे गजल नै भऽ सकैत अछि। प्रयोगधर्मी साहित्‍यकार जँ किछु नव करबाक दुस्‍साहस केलनि तँ हुनका नाना प्रकारसँ समझा-बुझा वा त्रास देखा मठाधीश सभ अपन बात मानबा लेल मजबूर करैत रहलखिन। ऐ क्रममे विषयसँ इतर ईहो चर्चा करए चाहै छी जे मैथिली साहित्‍यमे पुरस्‍कारक राजनीतिकेँ के नै जनै छथि। कोनो पोथीकेँ पढ़ैबला होइ वा नै, जँ मठाधीश प्रसन्न छथि तँ पुरस्‍कार निश्चित अछि पता नै किएक ई बात काल-क्रमे अनेको साहित्‍यकारक बलि ऐ रूपमे लैत रहल अछि जे ओ सभ अपन मेधा मैथिली साहित्‍यकेँ समृद्ध करबामे नै लगा मठाधीश सभकेँ प्रसन्‍न करैमे लगबए लगै छथि। केतेको बेर ईहो होइत अछि जे अपन पहिचान हेरेबाक डरसँ मेधावी साहित्‍यकार मठाधीश आ सामंत सबहक पैदा कएल अवधारणाक अनुरूपेँ चलए लगै छथि। अस्‍तु पहिचान हेरा जाइक डर होइ वा पुरस्‍कार नै भेटबाक डर वा साहित्‍य समाजमे अछूत हेबाक डर, कोनो ने कोनो कारणेँ केतेको साहित्‍यकार अपन मेधा स्‍वान्‍त: सुखाय लेखनसँ हटा मठाधीश सुखाय लेखन दिस बढ़ि जाइ छथि! ऐ दुष्‍चक्रक शिकार मैथिली होइत रहली अछि।
आब फेरसँ मूल विषयपर आबि ऐ बातक परताल जाए जे आखिर मधुपजी एक्के गोट गजल किए रचलनि? जखनि कि ओ अरबी बहरमे गजल कहैमे सक्षम आ समर्थ छला? ई बात अबस्‍स छै जे मधुपजी मैथिली साहित्‍यक एकटा मजगूत खाम्‍ह रहला आ पूरा मनोयोग पूर्वक मैथिलीक सेवा केलनि। हिनका द्वारा कहल गेल एकमात्र गजल विशेष क्षमताक परिचए सेहो करबैए। तइ दिनमे[1] मधुपजीक उमेर २५-२६ बर्खक छेलनि। ओइ समए मधुपजी एकटा युवा,उदीयमान आ ऊर्जावान रचनाकार छला आ प्रयोग धर्मितामे बिसवास रखै छला। ऐ बातक सम्‍भावना अछि जे युवा मधुपजी तत्‍कालीन मठाधीश सबहक प्रभावमे आबि आगू गजल नै कहने हेता। किएक तँ मठाधीश सबहक मान्‍यता रहल छन्‍हि जे मैथिलीमे गजल भाइए ने सकैए!! ...आ तँए मधुपजीक गजलकेँ मठाधीश सबहक समर्थन नहियेँटा भेटल हेतनि। एकर परिणाम स्‍वरूप मधुपजी आगू गजल लिखैक दुस्‍साहस नै केने हेता। दोसर सम्‍भावित कारण ईहो भऽ सकैए जे रचनाकारक मन अा रूचिक अनुरूप रचना-विधा सेहो होइ छै। खास कऽ आधुनिक मैथिली साहित्‍य लेखनमे रचनाकार स्‍वतंत्र रूपेँ अपन मन आ रूचिक अनुसार रचना करैत रहला अछि। तँए ईहो बातक सम्‍भावना भऽ सकैत अछि जे मधुपजीक रूचि आ मन गजल दिस नै भऽ कऽ आन विधा दिस बेसी रहल हेतनि। ओना अन्‍यान्‍य विधामे अनेको रचना केनौं छथि।
उपरोक्‍त कारण सभमे कारण चाहेजे रहल होइ, ई बात तँ अबस्‍से अछि जे मैथिली साहित्‍य आ मैथिली साहित्‍यक विद्यार्थी सभकेँ मधुपजी सँ बहरयुक्‍त गजलक जे उपहार भेटबाक चाही छल से नै भेटल।
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सम्‍पर्क-
भागलपुर (मिथिला)
[1] जइ समैमे गजल लिखलनि
2
मुन्नाजी

Suggested citation: ओम प्रकाश झा. “काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ आ मैथिली गजल.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 169, 2015-01-01. https://www.videha.co.in/research/2015/169/काशीकान्त-मिश्र-मधुप-आ-मैथिली-गजल.htm

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