विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

घसल अठन्नी: एकटा विमर्श

डॉ. शंभु कुमार सिंह · 2015-01-01 · अंक 169

घसल अठन्नी : एकटा विमर्श
डॉ. शंभु कुमार सिंह
राष्ट्रीय अनुवाद मिशन
भा.भा.सं., मैसूर
साहित्य अथवा काव्य समय-सापेक्ष होइत अछि; एहि कारणेँ समयक संग-संग काव्यक सेहो स्वरूप बदलैत रहैत अछि। काव्य कखनो काल ईश-महिमाक बखान करैत अछि तँ कखनो वीरगाथाक, कखनो कामिनीक देहयष्टिक सांगोपांग वर्णन करैत अछि तँ कखनो सामान्य मानव जीवनक पीड़ा, ईर्ष्या, द्वेष, राग आदिक। कहबाक तात्पर्य जे साहित्यक यात्रामे काल आ स्थितिक कारणेँ काव्यक उद्देश्य बेर-बेर बदलैत रहैत छैक। अतः मूल रूपमे जँ विचार कएल जाए तँ साहित्य अथवा काव्य रचनाक मुख्य उद्देश्य भेल प्रकृति (सजीव/निर्जीव)क प्रकृतिसँ तारतम्यता स्थापित कए मनुखमे मनुखताक अर्थ ताकब। एहि दृष्टिएँ कविताक सार्वभौमिकता आ सर्वकालिकता एहि शर्त पर निर्भर करैत अछि जे ओहिमे मनुखक संवेदनाक अभिव्यक्ति कतेक प्रभावी रूपेँ भेल छैक। ई संवेदना देश-कालकेँ समान रूपेँ प्रभावित करैत अछि।
कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ मैथिली काव्य काननक एकटा एहन नक्षत्र छथि जे अपन कविकर्मक हेतु युग-युगान्तर धरि मैथिली साहित्यमे पूजित रहताह। हम एतए “राधाविरह” सन उच्चकोटिक काव्य रचयिता मधुपक चर्चा नहि करए जा रहल छी। हम चर्चा करए जा रहल छी ‘घसल अठन्नी’क रचयिता मधुपजीक। एतए प्रश्न उठैत छैक जे कोन एहन परिस्थिति रहैत छैक जकरा कारणेँ ‘घसल अठन्नी’ सन काव्य रचना करबा लेल काव्यकार बाध्य होइत छथि अथवा प्रेरित होइत छथि। हमरा बुझने जखन लेखकक समक्ष ओहि कालखण्डक कोनो विस्मयकारी यथार्थ (जे कि घसल अठन्नीमे चित्रित कएल गेल अछि) उपस्थित भ’ जाइत छैक तँ ओहि यथार्थसँ कवि मन सेहो अपना आपकेँ मर्माहत महसूस करैत छथि आ तखने एहि पीड़ाकेँ जनमानसक सोझा आनबाक लेल ओ आतुर भ’ जाइत छथि। बुचनी सन शोषित, पीड़ितक पीड़ाकेँ एहन मार्मिक रूपेँ प्रस्तुत करबाक हिम्मत संभवतः मधुपेजीसँ संभव रहनि किएक तँ समकालीन व्यवस्था किन्नहुँ हुनका पक्षमे नहि छलनि।
घसल अठन्नी कविताक अध्ययन केलाक पश्चात् निम्न बिन्दु सभ पर विचार कएल जा सकैछ: शब्द-चित्रक माध्यमे प्रकृतिक चित्रण, भुटकुन बाबू (शोषक वर्ग)क अत्याचार, मखना सन भटकल प्रजावर्ग, बुचनी (शोषित)क रेखाचित्र, घसल व्यवस्थासँ घसाएल अठन्नीक आर्तनाद।
घसल अठन्नी कविताक सभसँ पैघ विशेषता थिक एकर व्यावहारिक भाषा, जकर पाठ कएलाक उपरान्त पाठकक मोनमे वैह भाव, वैह चित्र सोझा नाचए लागैत अछि। शब्द-चित्रक एहन जादूगरी कि गरमीक वर्णन पढैत काल पाठकक सोझा ओ दृश्य चलचित्र जकाँ चलए लागैत छैक आ पाठक ओहि स्थितिसँ अपन तादात्म्य स्थापित कए लैत अछि, जेना निम्न पाँति पढ़बा काल अंतिम पाँति पर अएलाक पश्चात् एहन अनुभूति होएत जे जँ आँखिकेँ झाँपि नहि लेब तँ ई तापत धूरा कतहुँ आँखिमे नहि पड़ि जाए; पछबा प्रचण्ड/बिरड़ो उदण्ड/सन सन सन सन/छन छन छन छन/आगिक कण सन/सन्तप्त धूलि अछि उड़ा रहल। अथवा इनहोर बनल पोखरिक पानि...। वा ई अग्निवृष्टि!/ संहार करत की प्रकृति सृष्टि! आदि कहैत-कहैत जखन ओ कहैत छथि- छाहरियो अभिलाष करए भेटए छाहरि...तँ बुझाइत अछि जे एहिसँ आगू कविक कल्पना जाइए नहि सकैए। कल्पनाक एहन सजीव चित्रण! एहन विलक्षण पराकाष्ठा! कवि मधुपेसँ संभव छनि।
वस्तुतः कविताक पहिल भागमे कवि प्रकृतिक वर्णन करबाक लाथे एकटा भूमिका तैयार केलनि अछि जाहिसँ प्रकृतिक एहि रौद्र रूपकेँ भुटकुन बाबूक सामन्ती प्रवृति पर आरोपित कएल जा सकए। मार्क्सवादी विचारधारामे सम्पूर्ण समाजकेँ दुइए वर्गमे विभाजित कएल गेल अछि-एकटा शोषक वर्ग आ दोसर शोषित वर्ग। एतए भुटकुन बाबू शोषक वर्गक प्रतिनिधित्व करैत छथि आ बुचनी शोषित वर्गक। गै छौक ने डर?/कै खून पचैलनि ई बण्डा/रोइयों न भंग/युग-युग दारोगाजी जीबथु/क’ देबौ खून। पहिने मखनाक अत्याचार- चट-चट-चट-चट/कुलिशहुँसँ कर्कश भीमकाय/मखनाक चाटसँ निस्सहाय/भू-लुण्ठित दुनू माइ-पूत/भ’ गेलि बेहोश। आ ताहूपर मोन नहि भरलनि तँ- दन-दन-दन-दन/मूर्छितो देह पर बेंत वृष्टि/बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन/शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!
एतए मखनाक चरित्र ओहि भटकल युवावर्गक सदृश अछि जे अपनहि हाथेँ अपन आ अपन समाजक सर्वनाश करबा लेल आतुर अछि। आखिर मखना सन नोकरकेँ भुटकुन बाबू सन मालिकसँ की सभ सुविधा भेटैत हेतैक? मालिकक पहिरलाहा पुरनका धोती-तौनी, खएबा लेल नीक-नुकुत भोजन आ कोनहुँ जग-जाजन पर खर्च करबाक लेल कर्ज, सैह ने? मुदा मखना सन नोकर एहि भ्रमकेँ नहि तोड़ि पबैत अछि जे यैह कर्ज ओकरा पुश्त-दर-पुश्त भुटकुन बाबूक चाकरी करबाक ले बाध्य करैत रहैत छैक आ करैत रहतैक। मालिकक सह पाबि ओ जाहि प्रकारेँ बुचनी पर प्रहार करैत अछि ताहिसँ सिद्ध भ’ जाइत अछि जे जाधरि मखना सन मूर्ख एहि समाजमे अछि ताधरि भुटकुन बाबू सन शोषकक अत्याचार निर्बाध रूपेँ चलिते रहत। रौ, की तकैत छें मूँह हमर/छोटका लोकक एते ठेसी? जहिया मखना सन लोक एहि ‘छोटका लोक’ आ ‘बड़का लोक’मे भेद जानि जाएत तहिए सँ समाजक कायाकल्प होएब प्रारंभ भ’ जाएत।
कहल जा चुकल अछि जे प्रस्तुत कवितामे कवि जे किछु कहने छथि, जाहि कोनो परिस्थितिक वर्णन केने छथि ओ प्रस्तुतिक पराकाष्ठा थिक। बुचनीक दुर्दैन्य दशाक वर्णन करैत काल कवि द्वारा बुचनीक खीचल गेल रेखाचित्र- कुट्टी-कुट्टी परिधान मलिन/हड्डी जागल/सौन्दर्य गरीबीसँ दागल...। आभूखक ज्वालासँ जरक डरें/तारुण्य जकर अबितहिं भागल/पाकल पानहुँसँ बढ़ल-चढ़ल/पीयर ओ दूबर-पातर तन/फाटल ओ फुफड़ी पड़ल ठोर/आमक फाड़ा सन नयन/खाधिमे धएल जकर दुर्दैव चोर। एहन देहक परिणति की भ’ सकैछ? शोणितोक आब नहि छैक शेष/पुनि दूधक होएब कोना सम्भव? एहनो स्थितिमे बुचनी अपन आ अपन बच्चाक जीवनक रक्षार्थ एहन भीषण समयमे खेतमे काज करैत अछि। घसल अठन्नी कोनहुँ दोकानमे नहि चललाक स्थितिमे ओ पुनः मालिकसँ गोहारि करैत अछि- ओ घसल अठन्नी चलि न सकल/हम सब दोकानसँ घूमि-फीरि/छी आबि रहलि/करु कृपा अठन्नी द’ दोसर/एसकरुआ हम/भ’ गेल राति/गिरहत, न आब देरी लगाउ/भूखें-प्यासें हम छी मरैत/लेबै बेसाह/कूटब-पीसब/बच्चा भोरेसँ कानि-कानि/छट-पट करैत अछि जान लैत। मुदा भुटकुन बाबू पर एहि गोहारिक कोनो असर नहि पड़ैत छैक। एतए बुचनीक भूख तँ नहि मेटा सकल, हँ ओकरा अपन शिशुक संगहि एहि इहलोकसँ मुक्ति अवश्य भेटि गेलैक-शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि!
एतए बुचनिक मुक्त सृष्टि! क संगहि कविताक अंत नहि भ’ जाइत अछि। हम कत’ जाउ/अवलम्ब पाउ/के शरण?/घसल जनिकर अदृष्टि! कहि कवि समाजक सोझा एकटा बड़का टा प्रश्नचिह्न छोड़ि देने छथि। एतए घसल अठन्नीकेँ समाजक शोषित वर्गक प्रतीकक रूपमे कवि प्रस्तुत केने छथि। अठन्नी अथवा पाइ माने की? अठन्नीक माने मौद्रिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, अर्थव्यवस्थाक रीढ़। आ गरीब-गुरबा वा मजदूर माने की?सामाजिक व्यवस्थाक एकटा छोट किन्तु महत्वपूर्ण घटक, समाजक निर्माण, कल्याणक सभसँ पैघ संसाधन। समाजक भौतिक सुख-साधन सँ ल’ कए सभ्यता, संस्कृतिक विकासक लेल दुनूक दोहन आवश्यक। मुदा दोहनक दृष्टिकोण की हेबाक चाही, यैह सभसँ महत्वपूर्ण प्रश्न अछि। भुटकुन बाबू सन सामंती प्रवृतिक लोक दोहनक माने बुझैत छथि ‘खून चोसब’ आ जखन बुचनी सन पीड़ित, शोषितक देहमे शोणितक अंश मात्र रहि जाइत अछि तखन ओकर अस्तित्व मेटा देबाक ई प्रवृति निश्चये दानवी प्रवृतिक द्योतक अछि। तहिना जखन हम घसल अठन्नीक अर्थविस्तारमे जाइत छी तँ ओहिमे समाजमे व्याप्त ओ सभटा कुरीति समा जाइत अछि जे जकरा कारणेँ मनुख जातिक मूल्यक तीव्र गतिएँ ह्रास भेल जा रहल छैक। घसल अठन्नीक एहि आर्तनादक रूपमे वस्तुतः कवि अपन आर्तनादसँ जनमानसक ध्यान आकृष्ट करबाक प्रयास केने छथि। आखिर ई व्यवस्था कहिया धरि चलैत रहत? एकरा सँ त्राण कोना हो? कि एहि व्यवस्थासँ त्राण दिआएब कोनो एक व्यक्ति/संस्था सँ संभव छैक? निश्चिते रूपसँ नहि। एकरा लेल हमरा सभकेँ सामूहिक प्रयास करए पड़त।
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विनीत उत्पल

Suggested citation: डॉ. शंभु कुमार सिंह. “घसल अठन्नी: एकटा विमर्श.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 169, 2015-01-01. https://www.videha.co.in/research/2015/169/घसल-अठन्नी-एकटा-विमर्श.htm

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