जन-चेतनाक स्वर वाहक मधुप
"हेड़ा गेलै, तकनो नै भेटत आब"। ई कोनो मूल्यवान वस्तु नै लोकक चेतना शून्य संस्कार दिस संकेत करैत मधुपजी मैथिली साहित्य परिषद्क सम्मेलन (बहेड़ा)मे देने रहथि। तात्कालीन वा समकालीन साहित्यकारक भीड़ मध्य ओ एकसर कवि, गीतकार छलाह जनिक स्वर लो चेतनाक स्वर बनि सोंझा अबैत छल। ओ अपन बौद्धिक वा मानसिक सोचसँ लोकक खसैत संस्कार, घटैत मानवीय संवेदनापर सतत चिंतित रहि लोककेँ उठेबाक आ झकझोरबाक काज करैत रहलाह।
हुनक कविताक केंद्र-बिंदुमे रहैत छल गाम समाजक वंचित-उपेक्षित वर्ग आ ओकर मानसिक पीड़ा। तहिया सामंती विचारसँ पनघैत अत्याचार आ मूँहसँ लाचार बोनिहारक दुख-दर्दकेँ अपन कविता माध्यमे चित्रित कऽ मधुपजी जगजियार भेला। सभ रस-अलंकारसँ सुशोभित रचना सब मार्मिक आ हृद्यस्पर्शी बनि कऽ सोंझा अबैत रहल।
एकटा रोटीक कतेको बखरा आ ओइपर छुच्छ नूनसँ गुजर करै बलाक मर्मान्तक पीड़ा। दोसर दिस नव-धनिकक छल-छद्म-घमंड। एक दिस भरि दिन बैसि कऽ ताश ओ तमाशा आ दोसर दिस भरि दिन खटियो कऽ घसल अठन्नी लेल मरैत जन बोनिहार। एक दिस भभा-भभा कऽ हँसैत चेहरा आ दोसर दिस जाबल मूँह। एक दिस डाक-निलामी बला जमिंदारक प्रशंसामे रचल साहित्य आ दोसर दिस......................................................खाली शून्य।
मुदा मधुपजी ऐ दोसर दिसकेँ बेसी दिन खाली नै रहऽ देला। ओहन भीषण सामंती व्यवस्था रहितों ओ शब्दकेँ अपन हथियार बना लेला। भने ओ शब्द कहियो प्रगतिवादी कविता बनि गेल तँ कहियो नचारी तँ कहियो किछु मुदा मधुपजी केंन्द्रमे सभ दिन वंचित वर्गेके रखलखिन।
जन-मनक पीड़ासँ पीड़ित कविक स्वर जँ केकरो रचनासँ बहराएल तँ ओ स्वर छल मधुपजीक जे खेत-खरिहान, जमीन-असमानके अपन आंतरिक विद्रोह वा समाजिक विसंगतिकेँ कागजपर आनि सभहँक सोंझा देखार कऽ कऽ रूकै छला।
मधुपजी कविते लेल नै बल्कि अत्यंत लोकप्रिय गीताकरक रूपमे सेहो स्थापित छथि। हुनक गीतक एक-एक पाँति अनमोल अछि। कविते जकाँ समाजिक उत्पीड़न। जीवनक आन विसंगतिकेँ गीतोमे अनलाह आ ई सिद्ध केला जे राग-लय-ताल प्रगतिशील ओ बौद्धिक हेबाकमे रुकावट नै छै।
मैथिलीक किछु आलोचकक मत जँ छोड़ि देल जाए तँ ई स्पष्ट रूपें ध्वनित होइए जे ओइ समयमे मधुपजी एकमात्र ओहन साहित्यकार छला जिनकर गह-गह लोक-चेतनासँ भरल छल। कहबा लेल तँ कविवर सीताराम झाजी सेहो छथि मुदा हमर मतानुसार ओ भाषामे लोक-चेतनाक पक्षधर छला। विचारमे सीताराम झा प्रगतिशील रहितों मधुपजीक आगू कमजोर सिद्ध होइत छथि। आ तँए हम मधुपजीकेँ तात्कालीन मैथिलीक पहिल जन-कवि मानै छी। ओना किछु आलोचक जनिका वैचारिक दरिद्रता छनि ओ वैद्यनाथ मिश्र "यात्री"केँ जन-कवि मानै छथि मुदा ऐ संबधमे 2 टा गप्प मोन राखब जरूरी—
1) यात्रीजी लेल जे जन-कवि प्रयोग होइत अछि से हिंदीसँ आयातति अछि। भऽ सकैए जे ओ हिंदीमे जन-कवि होथि मुदा मैथिली लेल अनफिट छथि। मैथिलीक अपन समस्या छै आ तकर समाधान मात्र मैथिलीए साहित्यकार कऽ सकैए। ई आयातित साहित्यकार ओ आयातित पदवीसँ मैथिलीक कल्याण नै हेतै। प्रायः मधुपजी कुल 23गोट प्रकाशित आ 12-13 टा अप्रकाशित पोथी छनि जैमे ओ कुल 1टा हिंदी रचना केला (भऽ सकैए कोनो आत्मीय संपादकक बलजोरी केलापर) तँए हमरा हिसाबें यात्रीजी नै मधुपजी जन-कवि छथि।
2) यात्री जीक जीवन चरित्र देखलासँ ई स्पष्ट अछि जे हुनका अपना-आपपर विश्वास नै छलनि। कहियो ओ हिंदू बनि जाइत छथि तँ कहियो बौद्ध। खन ओ अपनाकेँ प्रतिमा-भंजक कहै छला तँ खन पतिया करबाबै छला। कहियो अपनाकेँ निरपेक्ष कहै छला तँ कहियो वामपंथमे प्रतिबद्ध रहबाक लेल फाँड़ बन्हैत छला। कुल मिला कऽ यात्रीजीकेँ अपना उपर विश्वास नै छलनि आ जकरा अपना उपर विश्वास नै से अपन समाजक उपर विश्वास कोना करत। आ तँए हमरा हिसाबें मधुपजी जन-कवि छथि ।
गाम समाजमे चेतनाक निर्माण करऽ बला मधुपजी, अपन उर्जासँ समाजक कटु सत्यकेँ हटबऽ बला मधुपजी जे की जन-कविक सुच्चा हकदार छथि से किछु हिंदी बला सभहँक कारणें कतिया देल गेला। मुदा कतिएलासँ कियो कतिया नै जाइ छै। मधुपजी मोन पड़ैत रहता बेर-बेर, पुश्त-दर-पुश्त।
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मूल विदेह अंक / Original issue
Videha Digital Research Archives — preserved releases
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