विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद

आशीष अनचिन्हार · 2015-01-01 · अंक 169

आशीष अनचिन्हार
नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद
आधुनिक समयमे जतेक बेसी गंजन "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामधारी विचार सभहँक भेलै ततेक आन कोनो विचारक नै। आ ऐ गंजन लेल मात्र आ मात्र ओ तथाकथित "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ जिम्मेदार छथि जे छद्म रूपें एकरा मात्र कैरियर वा फैशन लेल अपनेलथि। जँ उपरलिखित विचार सभहँक अर्थ पूछल जाए तँ वस्तुतः सभहँ अर्थ एकै आएत आ तकरा सरल शब्दमे एना कहि सकैत छी--"जे मनुख धन संचयक प्रवृति छोड़थि आ आनो लोकेँ ऐ लेल प्रोत्साहित करथि संगे-संग ओइ धनक उपयोग सामूहिक हितमे हो से "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" कहेता। आब ऐ प्रवृति लेल नास्तिक भेनाइ जरूरी छै की नै से कहब मोश्किल कारण बंगालक करोड़पति "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ हरेक बर्ख धूमधामसँ दुर्गापूजा मनबै छथि। ओना प्राचीन कालमे वाममार्गी ओहन लोककेँ कहल जाइत छलै जे की संसारक प्रचलित परंपरासँ हटि कऽ काज करथि। मुदा ऐठाम हम ऐ सोचमे छी जे प्राचीन भारतक तंत्र-वाममार्गी आ आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गीमे की संबंध छै तँ हमर नजरि अनायासे "पंच-मकार" दिस चलि जाइत अछि आ अद्भुत साम्य भेटि जाइए। तँए हम "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभकेँ साम्यवादी सेहो बुझैत छी। ओना कतबो ताकै छी तँ धन-संचयक प्रवृतिकेँ छोड़बाक आदति "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभमे नै भेटैए। स्वतंत्रता समयमे जखन जमिंदारी प्रथा समाप्त भेलै आ जमिंदार सभ कांग्रेसक सदस्यता लऽ कऽ अप्रत्यक्ष रूपें अपन जमिंदारी बचेलक तेनाहिते किछु अति-महत्वाकंक्षी लोक सभ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक चोंगा पहीरि कऽ सामजाक सभ क्षेत्रमे प्रवेश केलक। आ, "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामक ऐ विचारक सभहँ छद्म रूपसँ साहित्यकेँ सभसँ बेसी नोकसान भेलै। ओना हमरा ई स्वीकार करबामे कोनो हर्जा नै जे किछु लाभ सेहो भेलै मुदा ओकरा एना बुझू जेना कोनो लोक दस रूपैयाक उगाही लेल पचास रूपैया खर्चा करथि।
2
जँ नास्तिकताकेँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए चार्वाक आ हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। प्रस्तुत अछि हुनक किछु विलक्षण विचार—
१) मानं त्वक्षजमेव हि' हिशब्दोऽत्र विशेषणार्थो वर्तते। विशेष: पुनश्चार्वाकैर्लोकयात्रानिर्वहणप्रवणं धूमाद्यनुमानमिष्यते क्वचन न पुन: स्वर्गादृष्टादिप्रसाधकमलौकिकमनुमानमिति।–षड्दर्शनसमुच्चय- पृ0 457
२) केचित्तु चार्वाकैकदेशीया आकाशं पंचमं भूतमभिमन्यमाना: पंचभूतात्मकं जगदिति निगदन्ति। षड्दर्शन समुच्चय- पृ0 450
३) लोकसिद्धो भवेद् राजा परेशो नाऽपर: स्मृत:। देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9
४) अंगनाऽऽलिंगनाजन्यसुखमेव पुमर्थता। कण्टकादिव्यथाजन्यं दु:खं निरय उच्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9
जँ प्राचीन मतकेँ खंडन करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए तखन तँ सभ उपनिषद्कार गीता संग हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। कारण उपनिषद् सभमे कर्मकांडक ओ वेदक यज्ञकेँ विरोध भेल अछि।
जँ समानताकेँ प्रतिपादित करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" थिक तखन याज्ञवल्क्यक विचार सर्वाधिक महान अछि। याज्ञवल्क्यस्मृतिक गृहस्थधर्मप्रकरणमे लिखल ई श्लोक देखू--
बालस्ववासिनीवृद्ध- गर्भिण्यातुरकन्यकाः ।
संभोज्यातिथिभृत्यांश् च दंपत्योः शेषभोजनम् ॥ यास्मृ१.१०५ ॥
मने बाल बच्चा बूढ़ ओ संगमे रहए बला लोक (नौकर-चाकर सहित), आतुर, गर्भिणी, कन्या अतिथिक आदि भोजन पहिने हेबाक चाही तकर बादे गृह मालिक अपने करथि। निश्चित रूपसँ नौकर चाकरकेँ ऐ सूचीमे आनि याज्ञवल्क्य अपन महानताक परिचय देने छथि। आ निश्चित रूपसँ आजुक "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील"सँ बेसी महान छथि।
जँ दया ओ करुणा "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक लक्षण थिक तखन बौद्ध आ जैन धर्मक पालन करऽ बला सभ सेहो महान बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" छलाह ओ छथि।
जँ अखिल विश्वक नारा देलासँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" बुझल जाए तखन वैदिक ऋषि सभहँक ओ ऋचा बेसी जोरगर अछि जैमे कहल गेलै जे-- वसुधैव कुटुम्बकम्।
जँ वस्तुतः देखल जाए तँ संसारमे "नियंत्रित पूँजी" वा "नियंत्रित पूँजीवाद" केर बहुत महत्व छै। मने एहन पूँजीवाद जैमे शोषणक दर कम होइ ( जी ठीक पढ़लिऐ अपने "जैमे शोषणक दर कम होइ )। आब बहुत लोक एकरा काल्पनिक कहता मुदा वर्तमान समयमे स्वंय सोवियत रूसक विघटन आ चीनक आर्थिक प्रसार देखि ई निश्चित होइत अछि जे पूँजीवाद बहुत जरूरी छै। आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। बहुत लोक एकरा एखनो काल्पनिक मानता। एकटा उदाहरण लिअ- "जँ सभहँक पेट भरि जाएत तँ ई संसार कतेक समय टिकतै। हमरा हिसाबें मात्र एक घंटा कारण सभहँक पेट भरले छै तखन एक दोसरक मोजर की? तँए हमरा हिसाबें जा धरि पेट खाली छै ता धरि लोक एक दोसरक गप्प मानऽ लेल मजबूर छै। हँ, कमसँ कम चारि घंटासँ बेसी पेट खाली नै हेबाक चाही आ ऐ लेल जै पूँजीवादक अवधारणा देलहुँ से भेल "नियंत्रित पूँजीवाद"।
3
साफ शब्दमे कही तँ मधुपजी भारतीय परंपराक मार्क्सवादी छथि। ई अलग गप्प जे ओ अपन साहित्यमे लाल झंडा कहियो नै उघला। मुदा की जेना सभ लोक जानै छथि जे साहित्यमे लाल झंडा उघनिहार छद्म मार्क्सवादी छला वा छथि। आब हम मधुपजीक किछु साहित्यक उदहारण दैत ई सिद्ध करब जे मधुपजी नियंत्रित पूँजीवादक समर्थक छला। मधुपजीक सर्वाधिक लोकप्रिय कविता थिक "घसल अठन्नी" एकर अंतिम भागमे पात्र बाजि उठैत अछि ---
हम कर्ज न छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए
हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत
कै बेरि एलउँ
टुटि गेल टाँग
अन्नक मारल अछि हमर आँग....
सप्ष्टतः मधुपजीक विचार अछि जे सुप्पत उपजल बोनि देल जाए। आ इएह तँ नियंत्रित पूँजीवाद छै। हम फेर कहब जे आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी।
तेनाहिते मधुपजी अपन आन दोसर प्रसिद्ध कविता "पीक" केर माध्यमें कहै छथि--
नहि पतन एक दिन ककर हैत ?
पृथ्वीक कोरमे के न जैत ?
तें सकल वस्तुमे एक भाव
निश्चित रूपसँ ई साधारण भारतीय जन-मानस केर अभिव्यक्ति अछि मुदा एकर मूल "नियंत्रित पूँजी"मे नुकाएल छै। जैठाँ नियंत्रित पूँजी छै ताही ठाम सुव्यवस्थित ढ़ंगसँ उत्थान-पतन संभव छै।
मधुपजीक बहुत रास कविता गीत हमर तथ्यक गवाही दैए मुदा ऐठाम सभकेँ राखब हमर अभीष्ट नै। कारण ऐ लेखकेँ हम मात्र प्रारंभिक मानै छी। की कारण छै आन आलोचक सभ मधुपजीकेँ प्रगतिशील तँ मानै छथि मुदा मार्क्सवादी नै जखन की मधुपजी आन कथित मार्क्सवादीसँ बेसी प्रमाणिक मार्क्सवादी छथि। हम ऐ लेखकेँ आर आगू बढ़ाएब आ ओत्तहि ई बुझना जाएत जे मैथिलीक आलोचक सभ कोना " कथित मार्क्सवादी" सभ मात्र पार्टी ज्वाइन करैत छल राजैनितिक ओ पुरस्कारक स्वार्थ लेल ऐ फेरमे मधुपजी सन सुच्चा मार्क्सवादी कोन कतिया गेला।
21 दिसम्बर 2014केँ गाम कोर्थुमे स्व. काशी कान्त मिश्र "मधुप"जीक प्रतिमा हुनक पत्नीक प्रतिमा संग स्थापित भेल। ऐ कार्यक्रमक विवरण एना अछि--
कविचूड़ामणि मधुपजी 27म बरखीपर हुनक गाम कोर्थुमे मधुप स्मृति मनाओल गेल अहि अवसर पर मधुप जीक स्मारकक स्थापना सेहो कएल गेल। राम जी ठाकुर दीप जरा कऽ कार्यक्रमक शुरुआत केलनि आ मंचक अध्यक्षता जीतेन्द्र नारायण झा " जीतू" आ संचालन डॉ जयप्रकाश चौधरी "जनक" जी केलनि। मुख्य अतिथि श्रीमती नीरजा रेनु, किशोर नाथ झा आ विशिष्ठ अतिथि चंद्रभानु सिंह आ बैजनाथ मिश्र "बैजू" छलाह। ऐ संगे आरो प्रबुद्ध लोक छला- शंभु नाथ मिश्र, सारदा सिंह, दिनेश चन्द्र झा, बैधनाथ झा, उमेश झा, कृष्ण कुमार झा, रामचंद्र झा शिवशंकर श्रीनिवास, चंद्रदेव झा, जटाशंकर मिश्र, रमन जी ठाकुर, प्रो. महेश झा, त्रिपुरारी ठाकुर, सुरेन्द्र झा, चंद्रकिशोर राय सरस जी, मदन झा, वरुण चौधरी, सरवन झा, सहयात्री जी, फूलचंद्र मिश्र"रमण", उदय चन्द्र झा "विनोद", मिथिलेश झा, सुमन सौरभ, उमानाथ झा ,कमल पाठक जी, चंद्रकिशोर झा, राघवेन्द्र चौधरी, आ राजीव मिश्र। प्रस्तुत अछि किछु फोटो (स्रोत- राजीव मिश्र, कोर्थु ग्रुप)—
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 169, 2015-01-01. https://www.videha.co.in/research/2015/169/नियंत्रित-पूँजी-आ-मधुपजीक-मार्क्सवाद.htm

मूल विदेह अंक / Original issue