केदार कानन
मधुपक रचना-व्यक्तित्व
( आलेख- मधुप अभिनंदन ग्रंथसँ साभार)
प्रकृतिक विराटता आ ओकर गह-गहमे भरल सौन्दर्यक रूपराशि, मानवीय करुणा आ ओकर पोर-पोरमे भरल हृद्यस्पर्शी तरलता, श्रृंगार आ ओकर अंग-अंगमे भरल चमक-दमकक कवि काशी कान्त मिश्र "मधुप" मैथिली काव्य-साहित्यिक अद्वितीय आ अपना ढ़ंगक एकसर कविक रूपमे स्थापित छथि।
जहिना मेथिली गद्य-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबामे प्रो. हरिमोहन झाक अन्यतम स्थान छनि, ठीक तहिना महाकवि विद्यापतिक बाद मधुपे जीक गीतकेँ ई महत्व प्राप्त छैक जे अपन लोकप्रियता आ अपन गेयधर्मिताक बलें संपूर्ण मिथिलांचलक लोककंठमे रचि-पचि आ बसि गेल।
ई मधुपजीक अद्वितीय प्रतिभाक परिचायक थिक जे ओ प्रायः एखन धरि पद्येमे सभ किछु लिखलनि, एतए धरि जे आन-आन साहित्यिक बंधु-बांधव लोकनिकेँ ओ पत्रो पद्यबद्धे लिखलनि। एकरा कम महत्वक बात नै बूझक चाही।
मधुपजीक कविताक विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली आ काव्यगत विशिष्टता शुरुहेसँ व्यापक आ अनेक धारामे प्रभावित रहलनि, इएह कारण थिक जे हुनक काव्य-संपदामे अनेक ढ़ंगक नव-नव प्रयोग आ विभिन्न धारा आ दिशाक कविता सभ भेटैत अछि।
मैथिलीक आलोचक लोकनि (?)केँ मैथिलीमे लिकल मधुपजीक फिल्मी पैरोडी अथवा ओहि प्रकारक हुनक अनेक गीतमे भने विशुद्ध साहित्यिक तत्व नै भेटैत होनि मुदा ओदा ओहि प्रकारक अनेक गीत सभक लोकप्रियता आ लोकानुरंजकताकेँ अनठाओल अथवा बिसराओल नै जा सकैत अछि। अपना ढ़ंगक ओ गीत सभ मैथिलीमे एकदमसँ फराक भऽ अपन स्थान सुरक्षित बनौने अछि।
मधुपजीक महत्व एहू लेल अछि जे ओ संपूर्ण मैथिली साहित्यमे प्रथम आ एकसर ओहन कवि छथि जे तमाम हेय, तिरस्कृत आ काव्यसंसारक अछोप-अजाति विषय-वस्तुकेँ अपन कविताक विषय सेहो बनौलनि आ हुनक ओ सभ कविता वस्तुतः मानवीय करूणा आ वेदनासँ ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे मुकन पतित पीक, छुतहर आ सारा परक तुलसी आदि कविताकेँ देखल जा सकैत अछि।
दोसराक दुखसँ उत्पन्न करूणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करुणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करूणाक बावना समाजिक क्षेत्रमे मानवतावादी विचारकेँ जन्म दैत अछि। व्यावहारिक जीवनमे सेहो जीवनक विषमता आ असारताक अनुभूतिसँ करूणाक भावना उत्पन्न होइत अछि। आ एहू पृष्ठभूमिमे हिनक अनेक रचनाक जन्म भेल अछि।
बहुआयामी प्रतिभाक अद्भुत रूपें धनी मधुपजी एक दिस अत्यन्त सहज आ सरस आ लोकग्राह्य गीत लिखने छथि तँ दोसर दिस जटिल आ दुहूह छंदमे तत्सम शब्दक प्रयोग कऽ सेहो अनेक गीतक रचना केने छथि। भने मधुपजीक एहन अनेक रचना लोकप्रियताकेँ नहि प्राप्त कयलक मुदा एहि प्रसंगे दू मत नहि जे एहन हुनक सभटा रचना विद्वन्मंडलीक बीच बेस चर्चित आ प्रशंसित रहल अछि।
प्रकृतिक विराटताक कवि मधुप अपन अनेक गीतमे प्रकृति-सौन्दर्यक चित्रकेँ चित्रित केने छथि। प्रकृति संबंधी हुनक गीतकेँ पढ़िकेँ कतहुँ ई नहि बुझाइत अछि जे आयातित भाव-बोधसँ हुनक गीत दबल अछि अपितु प्रकृतिक उन्मुक्तता आ व्यापकताक बोध हुनक गीत सभमे अनायासे दबल प्रकट होइत अछि। हिनक प्रकृतिसँ संबंध गीत सभ अपन स्वाभाविक रूपमे विकसित होइत अछि। प्रकृति मधुपजीक कविता संसारमे मात्र प्रकृति-ए नहि रहैत अछिअपितु प्रकृतिक अनेक-अनेक स्रोत, अनेक-अनेक अर्थ आ अनेक अनेक संदर्भ प्रकट होइत अछि।
मधुपक काव्य-संसारमे श्रृंगारिकता भरल पड़ल अछि किन्तु ओहिमे एकटा सहज स्वाभाविकता आ निश्छलता भेटैत अछि आ तें ओकर रसानुभूति पाठककेँ आह्लादित करैत अछि। ई श्रृंगारिकता पाठकक भीतर कोनो तरहक विकार आ पापकेँ जन्म नहि दैत अछि अपितु काव्यमय श्रृंगारिकता पाठककेँ मुग्ध आ मोहने रहैत अछि।
हिनक अनेक गीत रचना पारंपरिक ढ़ंगक अछि तँ अनेक प्रगतिशील रचना सेहो अछि। छोट-छोट। रमनगर। बहुत सहज। बहुत लोकप्रिय आ सरस। संस्कृतक पंडित रहितो हिनक पांडित्य हिनक प्रगतिशीलतामे कतहुँ अवरोध बनि ठाढ़ नहि भेल।
हिनक अनेक कथाकाव्यमे सभसँ बेसी चर्चित आ प्रशंसित भेल हिनक "घसल अठन्नी"। समाजिक जीवनक विद्रूपता आ कुरूपता, सामंत आ सर्वहाराक असमानता आ विशाल खाधि, गाम-घरमे जन-हरबाहक दुःस्थिति, ओकर सभहँक जीवनक नारकीयता, मजूरक पोर-पोरमे गस्सल दुख आ व्यथा आ करूणाक चित्रण घसल अठन्नीमे अपन स्वाभावितक संग व्यंजित भेल अछि।कविताक अंतिम पाँति पाठकक मोनकेँ भयंकर अवसाद आ गंभीर करुणासँ भरि दैत अछि, जखन मधुपजी ओहि घसल अठन्नीक निराश्रायता आ निर्थकताक चित्रण करैत कहै छथि—
सविषाद हासमे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:
हम कत’ जाउ
अवलम्ब पाउ
के शरण?
घसल जनिकर अदृष्टि!
एहि सभहँक अतिरिक्त मधुपजी महाकाव्य सेहो लिखलनि आ हुनक एहि महाकाव्य "राधा-विरह"केँ १९७० ई.क साहित्य अकादमीक पुरस्कारसँ पुरस्कृतो कएल गेल।
मधुपजी साहित्यकारक एकटा विशिष्ट वर्गकेँ अपन प्रेरणा, अपन सेजन्यता आ अपन व्यवहार-कुशलतासँ प्रेरित-उत्साहित केलनि आ तकर परिणाम थिक मैथिली साहित्यिक अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व यथा मणिपद्म, किसुन, बहरड़ आ अणु आदि।
अंतमे हम भीमनाथ झाक निम्नलिखित पाँति हमरा मधुपजीक काव्य-संसारक विषयमे बहुत सटीक आ संगत लगैत अछि--"मधुपक काव्य-समुद्र थिक-- मधुपक काव्य आ समुद्र- अत्यंत विशाल भंडार थिक, जाहिमे जएह ताकब सएह टालक टाल भेटत"।
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