कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा
मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि
मधुपजी मैथिली साहित्यक विभूति छलाह से के नहिं मानत. मधुपजी मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेहाल, प्रथम पीढ़ीक सिपाही छलाह सेहो निर्विवाद. ओ अपन रचना सं मैथिली साहित्यकें ततेक समृद्ध केने छथि जे हुनक प्रशंसा में बहुतो किछु कहल गेल अछि आ बहुतो कहब बांकी अछि. मधुपजीकें हम किरणजीक ओतय देखने अवश्य छियनि मुदा हुनका सं हमरा व्यक्तिगत परिचय तं नहिएँ छल. मधुप जीक कविता सं परिचित हेबा सं पूर्व हम मधुपजीक नाम सं परिचित भेलहुँ . कारण साठिक दशकमें ओ सुपरिचित कविक रूपमें प्रतिष्ठित भ चुकल छलाह, आ मैथिली कवि लोकनिक जं कतहु चर्चा होइक तं मधुपजी अग्रगण्य होथि . पछाति, हाइ स्कूलक मैथिली पाठ्य-पुस्तक में मधुपजी कविता 'घसल अठन्नी' पढ़लहुं. ओ कविता ततेक सुपरिचित छैक जे कतेको गोटे ओहि कविताक पक्ष -विपक्षमें अपन अभिमत देने होथि से संभव. मुदा, राजनैतिक विचारधाराक बखेड़ा सं दूर कविताक भाषा आ मर्मस्पर्शी चरित्र-चित्रणक गप्प हो तं 'घसल अठन्नी' कविता पढ़ि सहृदय मनुक्खक आंखिमें नोर अवश्य आबि जयतैक. मुदा, हम सोचै छी , मधुप जी हमरा किएक मन पड़ैत छथि ? सत्य पूछी तं मधुपजी हमरा 'घसल अठन्नी'क कारण नहिं मन पडैत छथि. मधुपजीक स्मरणक असली कारण अछि हुनकर लिखल मैथिली लोकगीत, जे स्वतः हरबाह- चरबाह सं ल कय विदेश्वर-कुशेश्वर स्थान जेबाबाली किशोरी धरिक कंठ सं अनायास प्रवाहित होमय लगैत छल . तें मैथिली गीतकें लोकप्रिय बनेबाले मधुपजी हिंदी सिनेमाक लोकप्रिय गीत सबहक तर्ज पर सेहो गीत सब बनौलनि. ओ संस्कृतक विद्वान छलाह, हुनका महाकाव्य लिखबाक कल्पना आ सामर्थ्य छलनि . तथापि मधुपजी मैथिली लोकगीत दिस किएक प्रवृत भेलाह . हमरा जनैत, मधुपजी विद्यापतिएक परम्पराक कवि छलाह. हुनका बूझल छलनि, जन-बोनिहार, आइ-माइ लोकनि ने विद्यापति पुरुष-परीक्षा पढ़इत छथि आ ने हुनका लोकनिकें कीर्तिलता वा कीर्तिपताका सं कोनो सरोकार छनि. मुदा, महिस पर बैसल महिसबार बिदेश्वरक बाट में 'कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ ' ओही तन्मयतासं गबैत अछि जेना कोनो चानन-तिलक धारी पण्डित गबैत छथि. तें लोकभाषाक प्रचारक हेतु मधुपजी लोकगीतक लोकप्रिय विधा कें सेहो संपोषित केलनि. आजुक मिथिलांचल में दुर्गापूजा-दसमीमें जखन ' मुंह खोल' मुंहबे में डाल दी' सन-सन वीभत्स गीतक अनवरत अष्टयाम चलैछ, नेपालक मैथिली टीवी चैनल सब पर पंजाबी गीतक तर्जपरक विकट गीत सब सुनैत छी आ मैथिली लोकगीतक दुर्दशा देखैत छी तं 'राधा-विरह' महाकाव्य क प्रणेता महाकवि क संग-संग, 'पंचमेर' आ 'टटका जिलेबी' सन गुटका गीतमाला लिखनिहार लोककवि मधुपजी सहजहिं मन पड़ैत छथि.
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1.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’-