विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना

डॉ. अरुण कुमार सिंह · 2015-01-01 · अंक 169

मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना
डॉ. अरुण कुमार सिंह
एल. डी. सी. आई. एल.,
सी. आई. आई. एल., मैसूर-6
परिचय
‘निरंकुशाः कवयः’ केँ सार्थक करैत संसारक कोनो बाधाकेँ बिनु अंगीकार कएने, अपन इच्छानुसार काव्यक सृष्टि-सर्जन करयवला युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा कवि चूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ स्वभावत: जन्मजात सारस्वत प्रतिभा-सम्पन्न संस्कारेसँ आशुकवि छलाह। जाहि वस्तु पर नजरि गेलनि, भाव उमड़लनि, बस्स, तकरा अपन लेखनीसँ भव्यता प्रदान कए देलनि। पं॰ सुरेन्द्र झा ‘सुमन’सँ प्रभावित भए मैथिलीमे लेखन कार्य प्रारंभ करयवला कलमक जादूगर मधुपजीक गीत विद्यापतिए जकाँ मिथिलाक सभ अंगनामे सभ अवसर पर सुनल जाइत छल। एहि ठाम छलसँ अभिप्राय अछि वर्त्तमान समयमे मैथिलीक वस्तुस्थिति।
प्रकाशित कृति
मधुपजीक प्रकाशित रचनाकेँ सुविधाक लेल निम्न भागमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि-
1. महाकाव्य- राधाविरह(1969); मुक्त मधुप(2006)।
2. गीतकाव्य- अपूर्व रसगुल्ला(1941); टटका जिलेबी(1945); पचमेर(1949); गीत मंजरी(1963); चौंकि-चुप्पे(1968); विदागीत(1973); बटसावित्री(1975); बोल-बम(1981)।
3. मुक्तक काव्य- झंकार(1942); शतदल(1944); ताण्डव(1959); गंगातरंगावली(1974);
मधुप-सप्तशती(1982); परिचय-शतक(1988)।
4. कथाकाव्य- त्रिवेणी(1945); त्रिकुशा(1958); द्वादशी(1979)।
5. संस्मरणात्मक आ आत्मकथात्मक काव्य- प्रेरणापुंज(1980)।
6. प्रशस्तिकाव्य- कोबर गीत(1945)।
7. अनुवादकाव्य- दुर्गासप्तशती, मैथिली-सुधा(1977)।
दलित चेतना : एक परिचय
धर्मसूत्र तथा दोसर ब्राह्मण पुस्तकमे ब्राह्मण, क्षत्रिय आओर वैश्यकेँ छोड़ि सभ श्रमजीवी जातिकेँ शूद्र घोषित कए देल गेल छल। महाभारतक अनुशासन पर्वमे कहल गेल अछि जे शूद्र मजदूर अछि। शूद्र नहि रहत तँ परिश्रमक काज के करत? नृसिंह पुराणमे कहल गेल अछि जे खेती-बारी शूद्रक काज थिक। ई निर्विवाद जे सबटा औद्योगिक उत्पादन करयवला लोककेँ भारतीय समाजमे हजारक हजार वर्षसँ शूद्र कहिकेँ दुर्दशाग्रस्त जीवन बितैबाक लेल बाध्य कएल गेल अछि। एहि स्थितिक विरोध अठारहवीं सदीसँ शुरु भेल जे अन्ततः बीसवीं सदीमे एकटा पैघ सामाजिक आन्दोलनमे परिवर्त्तित भए गेल। पंजाबसँ दक्षिण भारत धरि, पूर्वमे बंगालसँ महाराष्ट्र धरि जातीयता आओर वर्णव्यवस्थाक कारणेँ उत्पीड़ित समाजमे सामाजिक, राजनैतिक आओर सांस्कृतिक मुक्ति आन्दोलन होएब प्रारंभ भेल। एहि सामाजिक क्रांतिमे महाराष्ट्रमे ज्योतिबा फुले, केरलमे नारायण गुरु, तमिलनाडुमे रामास्वामी पेरियार, उत्तरप्रदेशमे झण्डुदास, बंगालमे चाँद गुरु ओ मध्यप्रदेशमे घासी दास आओर सम्पूर्ण राष्ट्रीय रुपमे बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकरक भूमिका एहि अर्थमे बहुत पैध छल जे ओ लोकनि समाजक उपेक्षित वर्गक मुक्ति आंदोलनकेँ तार्किक, वैचारिक आओर सैद्धांतिक आधार देलन्हि।
भारतीय इतिहासक ई एकटा दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठ अछि जे लगभग तीन हजार वर्षसँ बेसी अवधि धरि शूद्र घोषित जनसमुदायकेँ अन्तहीन दासता आओर दुर्दशा भोगए पड़ल। एहिमे संदेह नहि जे भारतक जे संस्कृति ब्राह्मणधर्मक प्रभावसँ मुक्त छल ओ एहि दुर्दशासँ बचल रहल, उदाहरणस्वरुप शिल्पी समाजकेँ देखल जाए सकैछ। बौद्ध, जैन आओर लोकायतक जीवन दर्शनमे शूद्र व्यवस्थाक सबसँ तीखगर तार्किक विरोध बुद्ध कएने छलाह। संभवतः इएह कारण अछि जे आइ भारतक सवर्णेत्तर समाजमे सबसँ बेसी आदर बौद्ध धर्मकेँ देल जाइछ। बौद्ध विचारक समाजकेँ अंधविश्वाससँ बाहर निकालि तार्किक बौद्धिक संस्कृतिक विकास कएने छलाह। समाजक निम्न वर्गक आन्दोलनक इएह बुनियादी ताकत रहल अछि।
अम्बेदकर प्रेरित दलित पैन्थर आन्दोलन मराठी कविता एवं कथासाहित्यमे सहसा एकटा चमत्कार आनि देने छल, जकर आबाज मैथिलीमे सेहो सुनल गेल। तकरे परिणाम थिक मधुप विरचित कथा काव्य ‘द्वादशी’क अन्तर्गत समाहित ‘घसल अठन्नी’, जकरा मध्य दलित चेतनाकेँ देखब हमर ध्येय अछि।
घसल अठन्नीमे दलित चेतना
घसल अठन्नी ‘मधुप’क सर्वाधिक प्रख्यात, सर्वाधिक प्रशंसित कथाकाव्य थिक। एहिमे दलित वर्गक एकटा विधवा स्त्री बुचनीक चित्रण कएल गेल अछि। ओ जेठक विकराल समयमे खेतमे बिनु जलखै-कलोक काज करबाक लेल विवश छल, अपन आ अपन बच्चाक जीवन रक्षार्थ। एहि काजक बदला ओकरा भेटतैक मात्र आठ आना। ओकर पति मरि गेल छैक। ओकरा एकटा छौ मासक नेना छैक। साँझमे ओकरा भुटकुन बाबू दिससँ बोनिमे भेटैत छैक अठन्नी, जे कोनो दोकानमे नहि चलैत छैक कियैकतँ ओ घसल छैक। बुचनी ओहि अठन्नी लएकेँ परेसान अछि आ ओ भुटकुन बाबू लग पहुँचि बदलि देबाक आग्रह करैत छैक। ताहि पर भुटकुन बाबू औरतक त्रियाचरित्रकेँ व्याख्यायित करैत उचित बोनि देलासँ अपन कुलमे दाग नहि लगोताह सन बात कहैत ओकरा पिटैत छथिन्ह आ एहि दुहू माय-बेटाक प्राणांत भए जाइत छैक। ई तँ भेल कविताक संक्षिप्तसार।
द्वादशीक आमुखकक अनुसारेँ- ‘‘प्रस्तुत द्वादशी संकलन एहने करुणाक निर्झरिणी थिक जाहिमे अवगाहन कयलासँ करुणाक एहि आवरणमे क्रांतिक ज्वालामुखी पाठककेँ दृष्टिगोचर होयतनि। एहि संकलनमे 1940सँ 50 ई.क मध्य रचित 12 गोट करुण रसात्मक कथाकाव्य संकलित अछि। ई संकलन सामाजिक वैषम्य, शोषण ओ अत्याचारक जीवन्त चित्र समक्षमे उपस्थित करैत अछि।’’- आमुख, पृ.- ख
उपरोक्त परिप्रेक्षमे आलेखक मूल उद्देश्य बुचनीक मुँहसँ निःसृत पाँति-
‘‘मालिक!
हम कर्ज नहि छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए’’ सँ अछि। जाहि मध्य दलित चेतनाक अवगाहन होइत अछि। बुचनीक वाणीमे दृढ़ता छैक जे भुटकुन बाबूक अहंकार अत्याचरक समक्ष टूटि भनहि गेल अछि, मुदा झुकल नहि।
बहुत रास आलोचकक कहब छन्हि जे मधुपजीक कविताक पात्र विद्रोहक स्वर मुखरित नहि कऽ परिस्थितिक आगू आत्मसमर्पण कए दैत छनि। मुदा एहि ठाम हम कहए चाहब जे एकाएक बिद्रोहक स्वर नहि उठैछ अर्थात् बिनु चेतनाक बिद्रोह कोना संभव भए सकैछ? स्वतंत्रतासँ पूर्व दलित वर्ग अपन हकक प्रति सावधान भए उचित मांग करब प्रारंभ कए देलनि सैह तँ भेल दलित चेतना। जेकि ‘घसल अठन्नी’क बुचनी अपन पारिश्रमिक मांगैत सिद्ध कए देलनि।
एक हिसाबेँ बात बड्ड छोट छैक, अदौसँ सामर्थ्यवान असहायकेँ कष्ट पहुँचबैत आएल छथि, जनिका लग शक्ति छनि, ओ ओकर उपयोग निरीह पर करैत अएलाह अछि, मुदा ‘घसल अठन्नी’ अपन प्रकाशनक संग सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करबाक हेतु वाध्य कएलक, जे एकर सबसँ पैघ उपलब्धि मानल जाए सकैछ। शक्तिशाली होथि वा शक्तिहीन, सभ केओ एहि दिशामे किछुओ काल अवश्य मनन कएलनि, जाहिसँ एहि साहित्यक उद्देश्य सोलहो आना सफलता प्राप्त कएलक, जे चिकड़ि-चिकड़ि ओहि साहित्यकारक गुणगान अदौसँ आइ धरि कए रहल अछि, एहिसँ बेसी एकटा साहित्यकारसँ एहि समाजकेँ अपेक्षा की?
निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे समाजक दलित-पीड़ित वर्गक वेदनाकेँ मुखर करब, ओकरा समाजक सहानुभूति अर्जित करैब हिनक कथाकाव्यक उद्देश्य रहल अछि। हिनक कथाकाव्यक नायक दलित वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि तथा खलनायक सामन्त वर्गक। शोषित वर्गक अमानुषिक अत्याचारक चक्कीमे दलित वर्गकेँ पिसाइत देखाएब एवं ओकरामे अपन हकक प्रति चेतनाकेँ जागृत करब हिनक ध्येय छन्हि।
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Suggested citation: डॉ. अरुण कुमार सिंह. “मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 169, 2015-01-01. https://www.videha.co.in/research/2015/169/मधुपजीक-घसल-अठन्नी-मे-दलित-चेतना.htm

मूल विदेह अंक / Original issue