मैथिलीक विद्रोही कवि: काशीकांत मिश्र मधुप
'मैथिलीक नवलेखन एक 'जनावर' जकाँ जीव बुझल जाइत छल, जाहिसँ परम्परावादी साहित्यकार लोकनि भयाक्रांत भs उठल छलाह. असलमे ने नवलेखन कोनो अजुगत वस्तु छल आ ने कोनो 'अजूबा' वस्तु छल. साहित्यक परिवर्तित रूपक एक 'तेबर' छल. नबतावादी लोकनि नवलेखनक आरम्भ राजकमल सं मानैत छथि, मुदा हमरा जनैक तकर उत्स यात्रीजीये में छनि. यात्रीजी अंततः सुमन व मधुप सं जे भिन्न छलाह से ने केवल मार्क्सवादीसं प्रभावित होयबाक कारण अपितु हुनक साहित्यिक अभिव्यक्ति, भंगिमा, ओहि दुनू गोट सं भिन्न छल आ तकरे गहिकs सं राजकमल आगां बढ़ल छलाह।'
ई बात सुधांशु शेखर चौधरी १९८३ में चेतना समिति द्वारा आयोजित विद्यापति पर्वक अवसर पर आयोजित विचार गोष्ठीक विषय 'आधुनिक साहित्य में परिवर्तनक स्वर' में कहने छल. अहि विचार गोष्ठी कs लs कs छपल 'आधुनिक साहित्य मे परिवर्तनक स्वर किताब मे रामनुग्रह झा लिखैत छैथ, 'आधुनिकतम काव्य प्रवृति पर विहंगम दृष्टि सं विचार करैत तीन वर्ग केल जा सकैत छथि. यथा,संस्कृत साहित्यपेक्षी (सुमनजी, जीवनाथ झा प्रभृति), उदार दृष्टिवादी (भुवनजी, मधुपजी, किरणजी, तंत्रनाथ झा, गोविन्द झा प्रवृति) तथा वाममार्गी (यात्रीजी, राजकमल, सोमदेवजी, किसुनजी, मायानन्द जी प्रवृति).
'आधुनिक गीत में परिवर्तनक स्वर' मे भीमनाथ झा लिखैत छैथ जे एके कवि गीतक स्वर आ शिल्प दुहू में व्यापक परिवर्तन अनबाक काज कयलनि, से थिकाह कवि चूड़ामणि श्री मधुप. आधुनिक काल मे गीत कें सभसँ लोकप्रिय बनयबाक श्रेय हिनके छनि. ई मैथिलीक अपन छंद में शताधिक गीतक रचना तं करबे कयलनि, संगहि हिंदी आ हिंदीतर भाषाक लोकगीत आ फिल्म संगीतक अनेक सुर पर अपन शब्द कें सजौलनि।
सुधांशु शेखर चौधरी, रामनुग्रह झा आ भीमनाथ झाक तथ्य केर सोचैत आ मधुपजीक कविता आ गीत पढ़ैत ई बात सुदृढ़ भेल जे मधुपजी एकटा विद्रोही कवि छैथ आ उपर लिखल तीनू गोटेक लिखल बात मे विरोधाभाष अछि. जखन राजकमल चौधरी स्वरगंधाक भूमिका मे लिखैत छैथ, 'कविता अनुभव, ज्ञान, आवेग आ अभिव्यक्तिक एकटा सशक्त प्रक्रिया होइत अछि. एहि प्रक्रिया मे शब्द,ध्वनि, छन्द आ लय, एकटा विशिष्ट सत्यक अनुभूति बनि जाइत अछि. तखन साहित्यिक अभिव्यक्ति आ भंगिमाक अंतर कोन धरातल पर केल जा सकैत अछि.
जहि काल जेहन सामाजिक, राजनीतिक आ आर्थिक वातावरण रहल, तहिने कवि आ लेखक अपन रचना केलखिन. कोनो भी रचनाकारक रचना हुनकर जीवनानुभव पर आधारित होयत अछि. ओना मानल जायत अछि जे विद्यापतिक बाद जतेक कवि आ गीतकार भेल, ओहि मे मधुपजीक गीत सर्वाधिक मुखर भेल छथि. मोहन भारद्वाज 'गीत, नवगीत,गजल' नामक एकटा लेख मे लिखहि छैथ जे देश-दशा आ मातृभाषा कें पृष्ठभूमि में राखिकेर गीत लिख- निहार मे हिनका नाम सबसे बेसी महत्वपूण अछि.
चारिम दशकक रचनाकार मधुपजी केर गीतक आठटा पोथी प्रकाशित भेल अछि. एखन धरि हुनकर रचनाक समीक्षा अहि बात पर भेल अछि जे हुनकर गीत आ कविता फिल्म संगीत पर आधारित छल. मुदा अध्ययन मे ई बात आगू आब रहल अछि जे मधुपजी जे विषय पर कविता आ गीत लिखने छथिन, ओ विषय अाजुक युग मे, आजुक कविता मे हासियो से बाहर अछि. आजुक कोनो मैथिलीक कवि अपन कविताक आधार रसगुल्ला, छुतहर, पतित पीक, टटका जिलेबी केर नहि बनाबैत अछि.
एखन हम सब ओहि काल खंड सँ गुजरि रहल छी जखन दुनियाक सबसँ पैघ लोकतंत्र भारतक राजधानी मे निर्भया कांड होयत अछि. अहि कालक दुनियाक सबसें तागतवर देश अमेरिकाक राष्ट्रपति क्लिंटनक सेक्स स्कैंडल वा रूस राष्ट्रपति पुतिनक प्रेम प्रसंग अखबार सुर्खी बनैत अछि. महिला सशक्तिकरण गप अहि कालखंड मे सबसें बेसी भेल, तखन आजु सँ सत्तर- अस्सी बरख पिहन नारी समाजक विद्रूपता आ सुतल अंतरात्माक आवाज गीतक माध्यम सँ बाहर आनैक काज केर विद्रोह ने कहल जाय ते की कहल जाय.
ओहि कालक कतेक रास रचना मिथिलाक स्त्री समाजक गप आगू आनलक, एकर गिनती केल जा सकैत अछि. कतेक रास समीक्षक हुनका श्रृंगारक कविता गीत लिखहि बलाक रूप मे प्रस्तुक करैत अछि,मुदा हुनकर कविता आ गीत विद्रोह कविक गीत अछि.
'पतित पीक' कविता मे मधुपजी कहैत अछि,
'स्वाथी संसारक केहन नियम,
उपक्रतो उपद्रव करै न कम.'
और ते और कहैत अछि,
'नहि पतन एक दिन ककर हैत,
पृथ्वीक कोर मे के न जाइत.'
मधुपजी ब्राह्मण वर्ण मे भेला के बादो 'छुतहर' गीत मे लिखैत अछि,
'हो सदिखन संसारक सुधार,
पतितौक बनथि क्यो कर्णधार.
उद्धार सुधारक सँ न हमर,
ई सभ्य समाजक छिक प्रताप.'
कविताक ई सभटा शब्द आ भाव केर श्रृंगार कहल जाय या एकटा विद्रोही कविक शब्द. ई कविता औहि काल मे लिखल गेल छल जहिया ने ते ओतेक संचारक साधन छल आ ने ओतेक सामाजिक विकास. हुनकर कविता "झंकार" आ "घसल अठन्नी" मे सेहो यहि भाव अछि.
एकटा गीत मे ओ लिखैत अछि,
"करू भेदभाव दूरे,
संसार केर सूरे,
करनीक किंतु काया,
इँगित करय न छू रे."
ओहि कालक कोनो कविता मे एहन धार नहि देखा पड़ैत अछि.
भीमनाथ झा एक ठाम लिखैत अछि जे 'हल्लुक' कविता मे ओ नायिका समाजक कुप्रथाक प्रतिकार करबाक साहस जुटबैत अछि,
'मन हवैद्य डाक देल जे तनिका केँ दी तलाक,
घुमबी नवीन सृष्टि हेतु एक नवचाक,
भै जाइ आर छोड़ि से समाजकेँ फराक.'
हुनकर ख्याति प्राप्त गीत
'हम जेबै कुशेश्वर भोर,
रंगि कै ठोर,
पहिरि कै काड़ा,
झनकाय झनाझन धारा' क माधयम सँ ओ स्त्री चेतनाक जे रूप राखने छथि, ओ दुलभ छथि.
भले ही कतेक रास कवि कं हुनकर समकक्ष राखल जायत अछि, मुदा मधुपजी पूर्णरूपेण विद्रोही कवि छल, जकर पहचान करब अा समीक्षा करब आवश्यक अछि.
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
1.योगेन्द्र पाठक “वियोगी”- एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता 2.केदार कानन- मधुपक रचना-व्यक्तित्व 3.कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा- मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि
1
योगेन्द्र पाठक “वियोगी”
एकैसम शताब्दी मे घसल अठन्नीक प्रासंगिकता
घसल अठन्नी कविताक रचना कें प्रायः सात-आठ दशक बीत गेलैक। ओहि समय अठन्नीक मोल बहुत बेसी छलैक। आठ आना मे चारि पाँच सेर चाउर कीनल जा सकैत छल। घसल अठन्नी हमहू देखल अछि, ओ दू तरहें प्रचलित छल - एक तS वास्तविक अठन्नी जे बहुत पुरान भS गेला सॅं ओकर छपलाहा किछु अंश मेटा जाइत छलैक आ दोसर जे सही मे नकली छल से अठन्नीक आकारक कोनो अन्य धातुक टुकड़ा जाहि मे किछु छपले नहि रहैत छलैक। नेतघट्टू लोक एहेन सिक्का साधारणतः रातिक अन्हार मे चला लैत छल। पहिल प्रकारक सिक्का चलेबा मे ओतेक कष्ट नहि होइत छलैक कारण किछु छाप तS रहितहि छलैक मुदा दोसर तS सोर फोर ठकी छलैक। ओ सिक्का रहितहिं नहि छलैक।
कविता मे समाजक एकटा चित्रण अछि। ओहि समयक समाज मे भुटकुन बाबू छलाह जिनका लेल हत्या केनाइ मामूली बात छलन्हि कारण हुनका दरोगाक बरदहस्त प्राप्त छलन्हि -
“कै खून पचौलनि ई बंडा
रोइयों न भंग
युग युग दरोगाजी जीबथु”।
भुटकुन बाबू दरोगा कें खुआ पिया कए अपना पक्ष मे रखैत छलाह। कियो दरोगा आबथु, भुटकुन बाबूक ओतए सॅं डाली हुनका पहिनहिं पठा देल जाइत छलन्हि। मधुपजीक समयक भुटकुन बाबू जमीन जथा बला सामंत छथि। हुनकर अपन अहंकार छनि -
“बनिहारक दS कए उचित बोनि,
कुल मे लगाएब की हमहिं दाग?”
आइ एकैसम शताब्दीक दोसर दशक मे यदि समाज पर दृष्टिपात करी तS स्पष्ट भए जाएत जे कतहु किछु नहि बदललैक अछि। ढंग ओएह छैक, हॅं कने रंग बदलि गेलैक अछि। गामक भुटकुन बाबू कें आब मखना खबास नहि रहल होन्हि मुदा बाहुबली लोक अपना संग हॅंसेरी रखितहिं छथि, जे देखबा मे “कुलिशहुँ सॅं कर्कश भीमकाय” रहितहिं अछि आ जकर आतंक जनसाधारणक लेल मखनाक चाट सॅं बेसिये घातक होइत छैक। भुटकुन बाबूक चोला बदलि गेलन्हि अछि। जमीन जथा बला सामंत सॅं बदलि आब ओ नेता आ ठीकेदारक रूप धs लेलन्हि अछि। ओ नेता-ठीकेदार, जे बात बात पर दरोगा कें बदली करबा देबाक धमकी दैत अछि, तकरा दरोगा कोना नहि मददि करतै? ओकर अपन हित साधन सेहो ओही नेता-ठीकेदारक संग देला मे होइत छैक।
अठन्नीक मोल आब नहि रहलैक। परिवर्तित रूप मे पचास पैसाक सिक्का सेहो बन्ने भS गेल। मात्र सरकारी खाता पर चालू छैक। यदि क्रेय मूल्यक बराबरी करी तs साठि सत्तरि साल पहिलुक अठन्नी एखनुक दू सौ टाकाक समतुल्य भs जाएत। एखन समाज मे जन बोनिहारक न्यूनतम बोनि सेहो दू सौ सॅं कम नहिए छैक।
एहेन स्थिति मे पाँच सौ टाकाक नकली नोट मधुप जीक घसल अठन्नीक तुलना मे राखल जा सकैत अछि। आब कल्पना करियौ जे गाम घरक कियो बाहुबली (आ कि कियो आने नेतघट्टू लोक, नेताक चमचा आ कि ठीकेदार) साँझू पहर दूटा जन कें बोनिक रूप मे पाँच सौ टाकाक नोट देलखिन्ह ई कहि जे चौक पर भजा कए दूनू बाँटि लिहें। चौक पर ओ नोट नहि भजलैक कारण ओ नकली छलैक। एहन स्थिति मे यदि ओ नोट घुरेने हुनका लग आओत तs की ओ स्वीकार कs लेथिन्ह जे सम्भवतः हुनके देबा मे भूल भेल हेतन्हि आ नोट बदलि देथिन्ह ? के स्वीकार करत अपन ई गलती ? आ गलती भेलैक कोना जखन जानिये कए कएल गेलैक ?
मधुपजीक बुचनी अन्यायक प्रतीकार करैत अछि -
“मालिक, हम कर्ज न छी मॅंगैत,
अथवा नहि एलहुँ भीख हेतु,
उपजले बोनि टा देल जाए…”
मुदा फल की भेटैत छैक ? मखनाक लात घूसा आ बेहोस भs कए खसि पड़ला पर फेर भुटकुन बाबूक बेंतक प्रहार। बुचनी भागमन्त छल, कष्ट सॅं मुक्ति भेटि गेलैक। सोचियौक यदि ओहि दिन ओ मरैत नहि आ अपंग भs जाइत तखन ओकर जिनगी केहन बोझ भs जइतैक ? अथवा यदि अपने ओ मरि जाइत आ बच्चा टुअर भs कए जीबैत रहि जइतैक ? मधुपजी अपन नायिका कें ओहि कष्ट सॅं बचा लेलखिन्ह -
“बस एक बेर अस्फुट क्रन्दन
शिशु संगहिं बुचनिक मुक्त सृष्टि”
मुदा कतेको एहन “घसल जिनकर अदृष्टि” बुचनी सन भाग्यशाली नहियो भs सकैत अछि।
आजुक जन बोनिहार कतए जा कए नालिस करत ? एखनहु समाज ओहिना छैक जे दरोगा तs पैघ बात, सिपाहिए ओकरा थाना पर टपए नहि देतैक। उनटे झूठक कोनो अपराध बना कए दश लाठी मारबो करतै आ बेसी टेंटें करत तs ओकरा हाजतक भीतर बन्न सेहो कs देतैक। आ तकरा छोड़बै लेल फेर ओएह नेता जीक सहारा।
भुटकुन बाबूक घमंड आ बेइमानी पोषित छलन्हि भ्रष्ट प्रशासनक कारण। आ प्रशासनक भ्रष्टाचार बढ़बे केलै अछि, बहुत बेसी बढ़लैक अछि। नकली नोटक व्यवसाय जे फरि आ फुलाए रहलैक अछि से किएक ?
नवका भुटकुन बाबू अर्थात् ठीकेदार साहेब यदि पूरा बोनि दs देथिन्ह तs बूझू जमाना उनटिए गेलैक। सब जनैत छी मनरेगा मे कतेक पर औंठा छापल जाइत छैक आ कतेक हाथ पर देल जाइत छैक। बोनिहारक उचित बोनि एकटा साधारण किसान भले दs दैत होइक, ठीकेदार तs कतहु नहिए दैत छैक।
घसल अठन्नी कें एखनहु ठौर नहि भेटलैक अछि। ओ एखनहु ओहिना बौआ बौआ कए गाबि रहल अछि “हम कतए जाउ, अबलम्ब पाउ ?” आ बुचनीक बेटा बेटी नाती पोता खटि रहलैक अछि आ हाथ मे पाँच सौक नकली नोट लेने दोकाने दोकान बौआ रहलैक अछि। जेना समय ठाढ़ भs गेल होए।
मधुपजीक ई रचना काल निरपेक्ष भs गेल। काल बीतैत रहल मुदा रचना सदिखन अपन प्रासंगिकता बनौने रहल।
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केदार कानन
मधुपक रचना-व्यक्तित्व
( आलेख- मधुप अभिनंदन ग्रंथसँ साभार)
प्रकृतिक विराटता आ ओकर गह-गहमे भरल सौन्दर्यक रूपराशि, मानवीय करुणा आ ओकर पोर-पोरमे भरल हृद्यस्पर्शी तरलता, श्रृंगार आ ओकर अंग-अंगमे भरल चमक-दमकक कवि काशी कान्त मिश्र "मधुप" मैथिली काव्य-साहित्यिक अद्वितीय आ अपना ढ़ंगक एकसर कविक रूपमे स्थापित छथि।
जहिना मेथिली गद्य-साहित्यकेँ लोकप्रिय बनयबामे प्रो. हरिमोहन झाक अन्यतम स्थान छनि, ठीक तहिना महाकवि विद्यापतिक बाद मधुपे जीक गीतकेँ ई महत्व प्राप्त छैक जे अपन लोकप्रियता आ अपन गेयधर्मिताक बलें संपूर्ण मिथिलांचलक लोककंठमे रचि-पचि आ बसि गेल।
ई मधुपजीक अद्वितीय प्रतिभाक परिचायक थिक जे ओ प्रायः एखन धरि पद्येमे सभ किछु लिखलनि, एतए धरि जे आन-आन साहित्यिक बंधु-बांधव लोकनिकेँ ओ पत्रो पद्यबद्धे लिखलनि। एकरा कम महत्वक बात नै बूझक चाही।
मधुपजीक कविताक विषय-वस्तु आ शिल्प-शैली आ काव्यगत विशिष्टता शुरुहेसँ व्यापक आ अनेक धारामे प्रभावित रहलनि, इएह कारण थिक जे हुनक काव्य-संपदामे अनेक ढ़ंगक नव-नव प्रयोग आ विभिन्न धारा आ दिशाक कविता सभ भेटैत अछि।
मैथिलीक आलोचक लोकनि (?)केँ मैथिलीमे लिकल मधुपजीक फिल्मी पैरोडी अथवा ओहि प्रकारक हुनक अनेक गीतमे भने विशुद्ध साहित्यिक तत्व नै भेटैत होनि मुदा ओदा ओहि प्रकारक अनेक गीत सभक लोकप्रियता आ लोकानुरंजकताकेँ अनठाओल अथवा बिसराओल नै जा सकैत अछि। अपना ढ़ंगक ओ गीत सभ मैथिलीमे एकदमसँ फराक भऽ अपन स्थान सुरक्षित बनौने अछि।
मधुपजीक महत्व एहू लेल अछि जे ओ संपूर्ण मैथिली साहित्यमे प्रथम आ एकसर ओहन कवि छथि जे तमाम हेय, तिरस्कृत आ काव्यसंसारक अछोप-अजाति विषय-वस्तुकेँ अपन कविताक विषय सेहो बनौलनि आ हुनक ओ सभ कविता वस्तुतः मानवीय करूणा आ वेदनासँ ओत-प्रोत अछि। एहि प्रसंगमे मुकन पतित पीक, छुतहर आ सारा परक तुलसी आदि कविताकेँ देखल जा सकैत अछि।
दोसराक दुखसँ उत्पन्न करूणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करुणाक भावनाक अभिव्यक्ति हिनक काव्यमे बहुत भेल अछि। इएह करूणाक बावना समाजिक क्षेत्रमे मानवतावादी विचारकेँ जन्म दैत अछि। व्यावहारिक जीवनमे सेहो जीवनक विषमता आ असारताक अनुभूतिसँ करूणाक भावना उत्पन्न होइत अछि। आ एहू पृष्ठभूमिमे हिनक अनेक रचनाक जन्म भेल अछि।
बहुआयामी प्रतिभाक अद्भुत रूपें धनी मधुपजी एक दिस अत्यन्त सहज आ सरस आ लोकग्राह्य गीत लिखने छथि तँ दोसर दिस जटिल आ दुहूह छंदमे तत्सम शब्दक प्रयोग कऽ सेहो अनेक गीतक रचना केने छथि। भने मधुपजीक एहन अनेक रचना लोकप्रियताकेँ नहि प्राप्त कयलक मुदा एहि प्रसंगे दू मत नहि जे एहन हुनक सभटा रचना विद्वन्मंडलीक बीच बेस चर्चित आ प्रशंसित रहल अछि।
प्रकृतिक विराटताक कवि मधुप अपन अनेक गीतमे प्रकृति-सौन्दर्यक चित्रकेँ चित्रित केने छथि। प्रकृति संबंधी हुनक गीतकेँ पढ़िकेँ कतहुँ ई नहि बुझाइत अछि जे आयातित भाव-बोधसँ हुनक गीत दबल अछि अपितु प्रकृतिक उन्मुक्तता आ व्यापकताक बोध हुनक गीत सभमे अनायासे दबल प्रकट होइत अछि। हिनक प्रकृतिसँ संबंध गीत सभ अपन स्वाभाविक रूपमे विकसित होइत अछि। प्रकृति मधुपजीक कविता संसारमे मात्र प्रकृति-ए नहि रहैत अछिअपितु प्रकृतिक अनेक-अनेक स्रोत, अनेक-अनेक अर्थ आ अनेक अनेक संदर्भ प्रकट होइत अछि।
मधुपक काव्य-संसारमे श्रृंगारिकता भरल पड़ल अछि किन्तु ओहिमे एकटा सहज स्वाभाविकता आ निश्छलता भेटैत अछि आ तें ओकर रसानुभूति पाठककेँ आह्लादित करैत अछि। ई श्रृंगारिकता पाठकक भीतर कोनो तरहक विकार आ पापकेँ जन्म नहि दैत अछि अपितु काव्यमय श्रृंगारिकता पाठककेँ मुग्ध आ मोहने रहैत अछि।
हिनक अनेक गीत रचना पारंपरिक ढ़ंगक अछि तँ अनेक प्रगतिशील रचना सेहो अछि। छोट-छोट। रमनगर। बहुत सहज। बहुत लोकप्रिय आ सरस। संस्कृतक पंडित रहितो हिनक पांडित्य हिनक प्रगतिशीलतामे कतहुँ अवरोध बनि ठाढ़ नहि भेल।
हिनक अनेक कथाकाव्यमे सभसँ बेसी चर्चित आ प्रशंसित भेल हिनक "घसल अठन्नी"। समाजिक जीवनक विद्रूपता आ कुरूपता, सामंत आ सर्वहाराक असमानता आ विशाल खाधि, गाम-घरमे जन-हरबाहक दुःस्थिति, ओकर सभहँक जीवनक नारकीयता, मजूरक पोर-पोरमे गस्सल दुख आ व्यथा आ करूणाक चित्रण घसल अठन्नीमे अपन स्वाभावितक संग व्यंजित भेल अछि।कविताक अंतिम पाँति पाठकक मोनकेँ भयंकर अवसाद आ गंभीर करुणासँ भरि दैत अछि, जखन मधुपजी ओहि घसल अठन्नीक निराश्रायता आ निर्थकताक चित्रण करैत कहै छथि—
सविषाद हासमे चन्द्रमाक
ओ घसल अठन्नी बाजि उठल:
हम कत’ जाउ
अवलम्ब पाउ
के शरण?
घसल जनिकर अदृष्टि!
एहि सभहँक अतिरिक्त मधुपजी महाकाव्य सेहो लिखलनि आ हुनक एहि महाकाव्य "राधा-विरह"केँ १९७० ई.क साहित्य अकादमीक पुरस्कारसँ पुरस्कृतो कएल गेल।
मधुपजी साहित्यकारक एकटा विशिष्ट वर्गकेँ अपन प्रेरणा, अपन सेजन्यता आ अपन व्यवहार-कुशलतासँ प्रेरित-उत्साहित केलनि आ तकर परिणाम थिक मैथिली साहित्यिक अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व यथा मणिपद्म, किसुन, बहरड़ आ अणु आदि।
अंतमे हम भीमनाथ झाक निम्नलिखित पाँति हमरा मधुपजीक काव्य-संसारक विषयमे बहुत सटीक आ संगत लगैत अछि--"मधुपक काव्य-समुद्र थिक-- मधुपक काव्य आ समुद्र- अत्यंत विशाल भंडार थिक, जाहिमे जएह ताकब सएह टालक टाल भेटत"।
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कर्नल (डाक्टर ) कीर्तिनाथ झा
मधुपजी हमरा किएक मन पडैत छथि
मधुपजी मैथिली साहित्यक विभूति छलाह से के नहिं मानत. मधुपजी मैथिलीक प्रचार-प्रसारक हेतु बेहाल, प्रथम पीढ़ीक सिपाही छलाह सेहो निर्विवाद. ओ अपन रचना सं मैथिली साहित्यकें ततेक समृद्ध केने छथि जे हुनक प्रशंसा में बहुतो किछु कहल गेल अछि आ बहुतो कहब बांकी अछि. मधुपजीकें हम किरणजीक ओतय देखने अवश्य छियनि मुदा हुनका सं हमरा व्यक्तिगत परिचय तं नहिएँ छल. मधुप जीक कविता सं परिचित हेबा सं पूर्व हम मधुपजीक नाम सं परिचित भेलहुँ . कारण साठिक दशकमें ओ सुपरिचित कविक रूपमें प्रतिष्ठित भ चुकल छलाह, आ मैथिली कवि लोकनिक जं कतहु चर्चा होइक तं मधुपजी अग्रगण्य होथि . पछाति, हाइ स्कूलक मैथिली पाठ्य-पुस्तक में मधुपजी कविता 'घसल अठन्नी' पढ़लहुं. ओ कविता ततेक सुपरिचित छैक जे कतेको गोटे ओहि कविताक पक्ष -विपक्षमें अपन अभिमत देने होथि से संभव. मुदा, राजनैतिक विचारधाराक बखेड़ा सं दूर कविताक भाषा आ मर्मस्पर्शी चरित्र-चित्रणक गप्प हो तं 'घसल अठन्नी' कविता पढ़ि सहृदय मनुक्खक आंखिमें नोर अवश्य आबि जयतैक. मुदा, हम सोचै छी , मधुप जी हमरा किएक मन पड़ैत छथि ? सत्य पूछी तं मधुपजी हमरा 'घसल अठन्नी'क कारण नहिं मन पडैत छथि. मधुपजीक स्मरणक असली कारण अछि हुनकर लिखल मैथिली लोकगीत, जे स्वतः हरबाह- चरबाह सं ल कय विदेश्वर-कुशेश्वर स्थान जेबाबाली किशोरी धरिक कंठ सं अनायास प्रवाहित होमय लगैत छल . तें मैथिली गीतकें लोकप्रिय बनेबाले मधुपजी हिंदी सिनेमाक लोकप्रिय गीत सबहक तर्ज पर सेहो गीत सब बनौलनि. ओ संस्कृतक विद्वान छलाह, हुनका महाकाव्य लिखबाक कल्पना आ सामर्थ्य छलनि . तथापि मधुपजी मैथिली लोकगीत दिस किएक प्रवृत भेलाह . हमरा जनैत, मधुपजी विद्यापतिएक परम्पराक कवि छलाह. हुनका बूझल छलनि, जन-बोनिहार, आइ-माइ लोकनि ने विद्यापति पुरुष-परीक्षा पढ़इत छथि आ ने हुनका लोकनिकें कीर्तिलता वा कीर्तिपताका सं कोनो सरोकार छनि. मुदा, महिस पर बैसल महिसबार बिदेश्वरक बाट में 'कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ ' ओही तन्मयतासं गबैत अछि जेना कोनो चानन-तिलक धारी पण्डित गबैत छथि. तें लोकभाषाक प्रचारक हेतु मधुपजी लोकगीतक लोकप्रिय विधा कें सेहो संपोषित केलनि. आजुक मिथिलांचल में दुर्गापूजा-दसमीमें जखन ' मुंह खोल' मुंहबे में डाल दी' सन-सन वीभत्स गीतक अनवरत अष्टयाम चलैछ, नेपालक मैथिली टीवी चैनल सब पर पंजाबी गीतक तर्जपरक विकट गीत सब सुनैत छी आ मैथिली लोकगीतक दुर्दशा देखैत छी तं 'राधा-विरह' महाकाव्य क प्रणेता महाकवि क संग-संग, 'पंचमेर' आ 'टटका जिलेबी' सन गुटका गीतमाला लिखनिहार लोककवि मधुपजी सहजहिं मन पड़ैत छथि.
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
1.जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’- मधुपक गीत अमर,मिथिलामे 2.आशीष अनचिन्हार- व्यंग निबंध “प्र.म”
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जगदीश चन्द्र ठाकुर ‘अनिल’
मधुपक गीत अमर,मिथिलामे
‘मधुप’जीक नाम सुनिते मोन पडि अबैत अछि हुनका द्वारा लिखल कतेक पांती सभ :
‘ओ घसल अठन्नी बाजि उठल हम कत’ जाउ....’
‘सुरुज डुबैत भैया केर ताकि बटिया
बहि गेल कमला बलान हे...’
‘हम जेबै कुसेसर भोर, रंगि क’ ठोर....’
‘कलबल कें भोरे-भोरे ई कोमलांगी औंघेले एली
चौंकि चुप्पे...’
मधुपजीक साहित्य-संसारक एक अवयव गीत मात्रपर एखन चर्च क’रहल छी ।
सिनेमाक गीतक भासपर मधुपजीक गीत सभ ‘टटका जिलेबी’ आ ‘अपूर्व रसगुल्ला’नामक पुस्तिका मे प्रकाशित होइत छल । बादमे ‘चौंकि चुप्पे’ नामकसंकलन-पोथीमे बहुत रास गीत सभ आएल। ई गीत सभ बहुत लोकप्रिय भेल । पढल-लिखल लोक आ अनपढो लोक सभ गायक लोकनिसं फरमाइस क’क’मधुपजीक गीत सुनैत छलाह आ आनन्दित होइत छलाह ।
मधुपजीक श्रृंगारोक गीत सभ स्तरीय रहैत छलनि ।
मैथिल युवा-युवतीवर्गमे सिनेमाक गीतक प्रभावक विरुद्ध मधुपजीक गीत सभ एकटा सशक्त हस्तक्षेप छल । सिनेमाक गीतक धुन केहनो हो ओकर भासपर मैथिलीमे गीत लीखि देब मधुपजी लेल सहज आ स्वाभाविक होइत छलनि। मधुपजी एहि तरहक गीतक रचना कए मैथिलीक लोकप्रियता बढौलनि। गीतमे बिम्ब मौलिक रहबाक कारण गीतक अपन आकर्षण होइत छलैक जे जन-सामान्यक कण्ठमे स्थापित भ’ जाइत छल। एकर अतिरिक्त सोहर,समदाउन, लगनी, उदासी आदिक भासपर सेहो नव गीत लीखि ओहि भास सभमे नवजीवन,नव उर्जा भरलनि ।
मधुपजी डेढ हजारसं बेसी विविध गीतक रचना केने छथि ।
ई गीत सभ निम्नलिखित छोट-पैघ आठ टा पुस्तकमे प्रकाशित भेल अछि :
1.अपूर्व रसगुल्ला
2.टटका जिलेबी
3.पचमेर
4.गीत मंजरी
5.चौंकि चुप्पे
6.बटसावित्री
7.बिदा गीत
8.बोल बम
गीतक अप्रकाशित पोथी सभ निम्नलिखित अछि :
1.विनयांजलि
2.दुलहा रे नंगटे नाचय
3.गंगा गीतामृत
एकर अतिरिक्त दुर्गा सप्तसतीक अनुवादक पोथी ‘दुर्गा सप्तसती मैथिली सुधा’मे तेरहो अघ्यायक आरम्भमे एक-एकटा घ्यान गीत छनि।
मधुपजी अपन आत्मगीतक शीर्षक रखलनि ‘मधुचक्र’जाहिमे करुणाक प्रवाह अनुपम अछि ।
गीत सबहक वर्गीकरण मुख्यतः 4 भागमे क’ सकैत छी :
1.श्रृंगार
2.करुणा
3.भक्ति
4.अन्य-सामाजिक सरोकारक गीत ।
मधुपजी सभ देवी-देवता पर गीतक रचना केने छथि जकर संख्या 500 सं कम नहि छनि । सभसं बेसी गीत शिव पर छनि ।
26 टा गीत राम पर छनि ।
सामाजिक विषमता पर लिखल गीतक संख्या सेहो बहुत छनि ।
मधुपजीक गीतक सम्बन्धमे किछु समीक्षक लोकनिक मत एहि प्रकारें व्यक्त कएल गेल अछि :
प्रो. रमानाथ झाक अनुसार :
‘मधुपजीकें गीत रचनामे प्रकृष्टता प्राप्त छैन्हि,किन्तु हिनक गीतक लोकप्रियता भाव-भाषाक सरलता ओ स्वाभाविकतापर आधारित नहि अछि, लोकप्रियताक कारण थिक ओकर संगीतात्मकता एवं िचत्रात्मक होएब। ई नव-नव लय, नव-नव तर्ज पर रचना करैत रहैत छथि जे हिनक रचनामे अन्तर्भूत कृत्रिम भाव-विन्यासक आवरणक कार्य करैत अछि,दोषकें झांपि दैत अछि।’
रमानाथ बाबू आगां लिखैत छथि : ‘लोकगीतक पहिल धर्म थिक सहजता ओ स्वाभाविकता। से रहनहि साधारण जनताक बीच ओकर प्रवेश भ’ सकैछ। आ ई तत्व मधुप प्रणीत लोकगीतमे प्रचुरतासं प्राप्त अछि।’
मधुपजीक शिव विषयक लोकगीतक प्रसंगमे शैव साहित्यक समर्थ समीक्षक डा.श्री रामदेव झा कहैत छथि :
‘मधुपजी नवीन-नवीन लय, छन्द ओ भावखण्डकें आधार बनाय शिवगीतक रचना करैत रहलाह अछि ।.....कीर्तनक हेतु उपयुक्त ढोल-झालिपर गेय धुनि सभक पद्धतिपर बहुतो शिवगीतक रचना कयलनि अछि। महिला कण्ठमे, गाम-गामक कीर्तन मण्डलीमे, गायक ओ नटुआ सभमे, ग्रामीण नाटकक रंगमंचपर, स्कूल कालेजक छात्रगण द्वारा आयोजित सांस्कृतिक समारोहमे मधुपजीक शिवगीत सुनल जा सकैत अछि ।’
मैथिली साहित्यक इतिहास लेखक डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क अनुसार :
‘शिल्पक क्षेत्रमे मधुपजी लोकगीत काव्यक सरल भाषा शैलीक अतिरिक्त चमत्कारपूर्ण आलंकारिक भाषा शैलीक सेहो प्रयोग कएल जाहिमे मुख्यतःचमत्कारपूर्ण अनुप्रास ओ यमकक पाण्डित्यपूर्ण शब्द विन्यासक छटा दिस कविक विशेष ध्यान अछि। किन्तु मधुपक सर्वश्रेष्ठ ओएह रचना थिक जे सरल सहज भाषामे लिखल गेल अछि ।’
डा. व्रज किशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ लिखैत छथि :
‘मधुपजीक अन्तर-वीणा मने कोनो नीक धुन सुनितहि झंकृत भ’ उठैत छनि्। ओइ झंकारकें ओ तखनहि मैथिलीक गीतपंक्तिमे बान्हि दैत छथिन ।.....ओना धुन जे अरबधि क’ मांगल-चांगल होइ, किन्तु गीतक बिम्ब रहैत छैक मौलिक। ई लोक जीवनक क्षणकें साकार क’ दैत छैक आ नटुआ-सुलभ छैक। एहेन गीत सभमे जेना मधुपजी पुरान धारक मैथिली-चिन्तनक तटपर साधना कयने होथि।’
डा.प्रेम शंकर सिंहक अनुसार :
‘कविचूडामणि मधुप नवगीतकारक आदि गुरु कहल जा सकैत छथि। आधुनिक तर्जपर लिखल मधुपजीक गीत विद्यापतिक उपरान्त सर्वाधिक लोकरंजन कयलक।’
श्री कुलानन्द मिश्रक मत छनि :
‘निश्चित रुपसं गीतकारक रुपमे मधुपजी सभसं अधिक सफल भेल छथि। मधुपजीक गीतकार हुनक कविक स्थापनामे सहायक भेलनि ।.....ई स्पष्ट थीक जे जं हुनक गीत रचना सभ लोकप्रिय नहि भेल रहितनि तं हुनक कवि व्यक्तित्वो एतेक आदरणीय किंवा व्यापक नहि भेल रहितनि।’
युवा वर्गक बीच मैथिलीक आकर्षणमे निरन्तर वृद्धि करैत रहबाक लेल मधुपजी फिल्मी गीतक धुनपर गीत लीखि क’ छोट-छोट संकलनमे कम पाइमे गायक,पाठक आ मैथिली प्रेमी लोकनिक बीच उपलब्ध करयबाक प्रयासमे लागल रहलाह। ओ एकर चिन्ता नहि केलनि जे एहि लेल विद्वान लोकनिक प्रतिक्रिया केहेन हेतनि ।
मधुपजी गीतक अतिरिक्त मुक्तक काव्य, कथा काव्य, प्रबन्ध काव्य, संस्मरणात्मक काव्य, प्रशस्ति काव्य, शोक काव्य,अनुवाद आदिसं मैथिली साहित्यक भण्डार भरलनि जाहि लेल विभिन्न संस्था द्वारा प्रशंसित आ पुरस्कृत सेहो कएल गेलाह । मुदा जं मात्र गीते लिखने रहितथि तइयो मिथिलाक जनमानसमे आ जन सामान्यक कण्ठमे अमर रहितथि ।
हमरा आदरणीय श्री ‘अमर’जीक निम्नलिखित कथन नीक लगैत अछि ‘
‘.....यद्यपि गोविन्द दास झा तथा चन्दा झाक गीत सेहो जनकण्ठमे प्रचुरतासं प्रचार पौलकनि, किन्तु विद्यापति जकां जनसामान्यक कण्ठहार नहि बनि सकलनि । ताहि दृष्टिएं मधुपजीक पदकें जे लोकप्रियता प्राप्त भेलनि से हिनका ‘अभिनव विद्यापति ’ कहयबाक उपयुक्त सिद्ध करैत छनि ।
मधुपजीक मुहें हुनक गीत ‘बातरससं छी तबाह, नहि बातक रस अछि...’ सुनबाक सुअवसर प्राप्त भेल अछि कोइलखमे विद्यापति स्मृति पर्वक अवसरपर ।
ओहि अवसरपर हुनक मैथिली-प्रेमक अनुभवक स्मृति एखनहु हुनका प्रति असीम श्रद्धासं भरि दैत अछि ।
हृदयसं निकलैत अछि :
‘ कत तोर करब बडाई..’
सन्दर्भ पोथी : श्री काशीकान्त मिश्र ‘मधुप ’ पर श्री चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ द्वारा लिखित आ साहित्य अकादमी द्वारा 1994 मे प्रकाशित पोथी ।
२
आशीष अनचिन्हार
व्यंग निबंध
“प्र.म”
जेना जीव-जंतुक अनेक योनि होइत छै। तेनाहिते मंत्री-संत्रीक सेहो अनेक योनि होइत छै। मनुख सेहो जन्म आ मरणक चक्रमे फँसैत अछि तँ मंत्री सभज्वाइन आ रिजाइन केर चक्रमे। जेना मनुखक बहुत रास नाम होइत छै तेनाहिते मंत्रीक सेहो बहुत्ते नाम होइत छै। किछु नाम काजक अधारपर होइत छै तँकिछु शारीरिक लक्षणपर तँ किछु नाम किछुपर। प्राचीन कालमे जेना-जेना संस्कृत पसरैत गेल तेनाहिते-तेनाहिते ओकरा सम्हारब कठिन भऽ गेल। ठीक तेहनेहालति मंत्री-संत्रीक नामावलीक भऽ गेल अछि।
प्राचीन कालमे पाणिनी सूत्र रूपमे संस्कृतकेँ बान्हि देला तेनहिते आधुनकि कालमे हम अपनाकेँ नव पाणिनी मानि आइ-काल्हि मंत्री-संत्रीक नामावली प्रस्तुतकेलहुँ। आब चूँकि एखनुक समयमे केकरो लग फुरसति नै छै जे ओ सूत्रक टीका-भाष्य करत। तँए ऐठाम हम अपने टीका ओ भाष्य प्रस्तुत कऽ रहल छी(ओना सूत्र भाष्यमे बहुत रास केटेगरी छूटि जाएत जेना प्रमेह मंत्री, प्रसिद्ध मंत्री, प्रबंध मंत्री आदि तँइ आब हम अति महत्वपूर्ण नामावली सभहँक दर्शनकराबी....) ---
1) दिनक गरीब आ रातुक धनिक जकर असीमित प्रवचनसँ तृप्त होइत छथि, अथवा खाली पेट जकर परम पवित्र शब्द, धातु, अलंकार आदिसँ भरि जाएअथवा, जकर मूँहक शब्देसँ सभ समस्याक समाधान भऽ जाए से प्रवचन मंत्री भेल।
2) जे लोक समाजक नामपर अपन ओ अपन गोंतिया आदिक विकास करए, अथवा जकर शासन कालमे समाजक विकास ओ प्रगति रुकि जाए अथवादुराचारी सभहँक प्रगति हुअए से प्रगति मंत्री छथि।
3) ओहन लोक जे अपन प्रतिमा मू्र्तिकेँ बाग-बगैचा, चौराहा, आदिपर लगाबथि। अथवा, ओहन लोक जे समाजक विकासकेँ नकारि प्रतिमा आदिक निर्माणपरव्यय करए से प्रतिमा मंत्री भेल।
4) प्रति शब्दसँ सजल आन शब्दक मालिक सेहो मंत्रीक काबिल होइत छथि जेना जे लोक छाँह जकाँ मुख्यमंत्री पदक मर्यादा तेयागि कोनो युवा लड़कीक छाँहजकाँ जासूसी कराबथि से प्रतिछाया मंत्री छथि। जे लोक सदिखन प्रतिवादे टा कऽ अपन वा अपन लोकक विकास करथि से प्रतिवाद मंत्री छथि, प्रतिरोधमंत्री सेहो कहि सकै छिऐ कहबाक लेल प्रतिक्रिया मंत्री सेहो कहि सकै छिऐ। जे लोक खाली प्रतिशोध लेल बैसल रहथि से प्रतिशोध मंत्री छथि, अथवापहिलुक सोधल पद ओ खजानाकेँ फेरसँ सोधि लेथि से प्रतिशोध मंत्री छथि। ऐ खंडमे बहुत रास संभावना छै जेना प्रतिदेह मंत्री, प्रतिदान मंत्री, प्रतिदिन मंत्री,प्रतिरास मंत्री आदि-आदि। ऐठाम सभहँक भाष्य संभव नै। ओना ऐ खंडक सभसँ शक्तिशाली "प्रतिफल मंत्री" छथि। भोटक रिज्लटक बाद जनताकेँ सेहो आसत्ता-विपक्षीकेँ सेहो सभकेँ अपन-अपन कर्मक प्रतिफल भेटि जाइत छै। कियो ऐ मंत्रीक प्रकोपसँ बचि नै पाबैए आ जे बचि जाइए तकरा लेल तँ भगवान 5बर्ख देने छथिन। ऐ खंडमे प्रतिबिंब नामक मंत्री पद सेहो महत्वपूर्ण अछि। जे लोक चुनावसँ पहिने आ चुनावक बाद बिंब निर्धारणमे निपुण छथि से ऐ मंत्रीपदक अधिकारी छथि।
6) जे लोक विदेश भ्रमण कऽ खाली प्रपोज करथि आ देशकेँ रिज्लट सुन्ना भेटै से प्रपोज मंत्री बनि सकै छथि। एकरा प्रस्ताव मंत्री कहि कऽ भारतीयकरणकऽ सकै छी।
7) लोक सभा ओ विधान सभामे जे उत्तर देबाक बदला जे जनतासँ प्रश्न पूछथि आ जनताक मूँह बंध कऽ देथि से प्रश्न मंत्री छथि।
8) जे लोक जनताक बीच योजना सभहँक लाभ प्रसाद रूपें बाँटि सकथि आ अंतमे अपने ओकर पूर्ण भोग करथि से प्रसाद मंत्री छथि।
9) जे खाली प्रथम-प्रथम मने इतिहासमे अपना-आपकेँ पहिल घोषित करऽ से प्रथम मंत्री बनि सकैए। ओना ऐ मंत्री पद लेल कम्पीटीशन बहुत कड़गर छै आऐ लेल बहुत रास कोंचिग सेन्टर सेहो खुलल छै। बहुत रास लोक ऐमे सफल होइए मुदा जे पहिनेसँ साहित्यकार अछि से ऐ मंत्री पदककेँ एकै बेरक परीक्षामेपाबि लैए।
तँइ सभ क्षेत्रक अलावे साहित्यमे ऐ मंत्री पदक बहुत डिमांड छै। एकटा खिस्सा लिअ-- एकटा गाम रहै जैमे सभ साहित्यकारे रहै। मर्दसँ जनानी धरि सभसाहित्यकार। बच्चासँ बुढ़बा धरि सभ कियो साहित्यकार। ओइ गाममे सभ कम्पीटीशन लेल मरै। ओइ गाममे कियो कोनो कहियो 3 बजे भोरसँ पहिने दिसामैदान नै गेल रहै... बस एकटा बुढ़बा चारि दिन उपास कऽ कऽ पाँचम दिन भुज्जा फाँकि लेलक। आ दू बजे लोटा लऽ कऽ विदा भऽ गेल। भोरे-भोर सौंसेहल्ला भऽ गेलै जे ऐ गामक इतिहासमे फल्लाँ महाकवि पहिल बेर दू बजे दिसा-मैदान गेला।
हाले-फिलहालमे एकटा संगोष्ठी भेल जकरा कहल गेल जे मैथिलीक इतिहासमे पहिल बेर "सेब संगोष्ठी" भेल अछि। हुनके मोताबिक ऐ संगोष्ठीमे भाग लेनिहारसभ प्रतिभागी कहियो सेब नै देखने रहथिन। सभकेँ सेब देखाओल गेलै। बताएल गेलै जे सेबपर छूरी कोना चलाओल जाइत छै। कोना फाँक काँटल जाइतछै। फेर हुनके मोताबिक प्रतिभागी लोकनि पहिल-पहिल बेर सेब खेलथि। एहन- एहन बहुत उदाहरण अछि। एकटा लोकक ई बेमारी तँ बहुत उपर चलि गेलछनि। हुनका इंटरनेटपर पहिल हेबाक बेमारी छनि। आँखिक सोंझा देल सभ सबूतकेँ ओ इग्नोर कऽ दै छथि। हुनका मोताबिक ओइ समयमे हम ई नै देखनेरहिऐ तँए ई पहिल नै हएत। आब हुनका के कहतनि जे सरकार ई अहाँक आँखि आ दिमागक कमजोरी अछि। अस्तु किछु गोटेक ईहो दाबी करै छथि जेराजकमल चौधरीकेँ पहिले-पहिल हमहीं दारू पिएलियै। कियो ईहो कहै छथि जे प्रो. हरिमोहन झाकेँ पहिले-पहिल हमहीं पेशाब करैत देखलिऐ आ तखने पहिलबेर कहिलिऐ जे ई बच्चा आगू बढ़त। ई पहिल हेबाक चक्करे तेहन छै जे एकटा बालक 2009मे बनाएल ब्लागकेँ डी-एक्टिभेट कऽ कऽ घोषणा केला जे हम2007मे ब्लाग बनेने रही। औ महराज जँ बनेने रही तँ कमसँ कम लोककेँ देखबाक लेल लिंक तँ छोड़ि दितिऐ ने। कतेक कहू ओना टटका-टटकी एखनेपता चलल अछि जे एकटा युवा साहित्यकार घोषणा केला अछि जे मैथिली साहित्यमे पहिले-पहिल हमहीं अंडा देलिऐ।
हेबाक लेल तँ आरो भऽ सकै छथि मुदा जे ऐ सभहँक जे प्रधान होथि से................. ईहो लिखनाइ जरूरी छै की?
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
1.डॉ. अरुण कुमार सिंह -मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना 2.आशीष अनचिन्हार- नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद
1
मधुपजीक ‘घसल अठन्नी’मे दलित चेतना
डॉ. अरुण कुमार सिंह
एल. डी. सी. आई. एल.,
सी. आई. आई. एल., मैसूर-6
परिचय
‘निरंकुशाः कवयः’ केँ सार्थक करैत संसारक कोनो बाधाकेँ बिनु अंगीकार कएने, अपन इच्छानुसार काव्यक सृष्टि-सर्जन करयवला युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा कवि चूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ स्वभावत: जन्मजात सारस्वत प्रतिभा-सम्पन्न संस्कारेसँ आशुकवि छलाह। जाहि वस्तु पर नजरि गेलनि, भाव उमड़लनि, बस्स, तकरा अपन लेखनीसँ भव्यता प्रदान कए देलनि। पं॰ सुरेन्द्र झा ‘सुमन’सँ प्रभावित भए मैथिलीमे लेखन कार्य प्रारंभ करयवला कलमक जादूगर मधुपजीक गीत विद्यापतिए जकाँ मिथिलाक सभ अंगनामे सभ अवसर पर सुनल जाइत छल। एहि ठाम छलसँ अभिप्राय अछि वर्त्तमान समयमे मैथिलीक वस्तुस्थिति।
प्रकाशित कृति
मधुपजीक प्रकाशित रचनाकेँ सुविधाक लेल निम्न भागमे विभाजित कएल जाए सकैत अछि-
1. महाकाव्य- राधाविरह(1969); मुक्त मधुप(2006)।
2. गीतकाव्य- अपूर्व रसगुल्ला(1941); टटका जिलेबी(1945); पचमेर(1949); गीत मंजरी(1963); चौंकि-चुप्पे(1968); विदागीत(1973); बटसावित्री(1975); बोल-बम(1981)।
3. मुक्तक काव्य- झंकार(1942); शतदल(1944); ताण्डव(1959); गंगातरंगावली(1974);
मधुप-सप्तशती(1982); परिचय-शतक(1988)।
4. कथाकाव्य- त्रिवेणी(1945); त्रिकुशा(1958); द्वादशी(1979)।
5. संस्मरणात्मक आ आत्मकथात्मक काव्य- प्रेरणापुंज(1980)।
6. प्रशस्तिकाव्य- कोबर गीत(1945)।
7. अनुवादकाव्य- दुर्गासप्तशती, मैथिली-सुधा(1977)।
दलित चेतना : एक परिचय
धर्मसूत्र तथा दोसर ब्राह्मण पुस्तकमे ब्राह्मण, क्षत्रिय आओर वैश्यकेँ छोड़ि सभ श्रमजीवी जातिकेँ शूद्र घोषित कए देल गेल छल। महाभारतक अनुशासन पर्वमे कहल गेल अछि जे शूद्र मजदूर अछि। शूद्र नहि रहत तँ परिश्रमक काज के करत? नृसिंह पुराणमे कहल गेल अछि जे खेती-बारी शूद्रक काज थिक। ई निर्विवाद जे सबटा औद्योगिक उत्पादन करयवला लोककेँ भारतीय समाजमे हजारक हजार वर्षसँ शूद्र कहिकेँ दुर्दशाग्रस्त जीवन बितैबाक लेल बाध्य कएल गेल अछि। एहि स्थितिक विरोध अठारहवीं सदीसँ शुरु भेल जे अन्ततः बीसवीं सदीमे एकटा पैघ सामाजिक आन्दोलनमे परिवर्त्तित भए गेल। पंजाबसँ दक्षिण भारत धरि, पूर्वमे बंगालसँ महाराष्ट्र धरि जातीयता आओर वर्णव्यवस्थाक कारणेँ उत्पीड़ित समाजमे सामाजिक, राजनैतिक आओर सांस्कृतिक मुक्ति आन्दोलन होएब प्रारंभ भेल। एहि सामाजिक क्रांतिमे महाराष्ट्रमे ज्योतिबा फुले, केरलमे नारायण गुरु, तमिलनाडुमे रामास्वामी पेरियार, उत्तरप्रदेशमे झण्डुदास, बंगालमे चाँद गुरु ओ मध्यप्रदेशमे घासी दास आओर सम्पूर्ण राष्ट्रीय रुपमे बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकरक भूमिका एहि अर्थमे बहुत पैध छल जे ओ लोकनि समाजक उपेक्षित वर्गक मुक्ति आंदोलनकेँ तार्किक, वैचारिक आओर सैद्धांतिक आधार देलन्हि।
भारतीय इतिहासक ई एकटा दुर्भाग्यपूर्ण पृष्ठ अछि जे लगभग तीन हजार वर्षसँ बेसी अवधि धरि शूद्र घोषित जनसमुदायकेँ अन्तहीन दासता आओर दुर्दशा भोगए पड़ल। एहिमे संदेह नहि जे भारतक जे संस्कृति ब्राह्मणधर्मक प्रभावसँ मुक्त छल ओ एहि दुर्दशासँ बचल रहल, उदाहरणस्वरुप शिल्पी समाजकेँ देखल जाए सकैछ। बौद्ध, जैन आओर लोकायतक जीवन दर्शनमे शूद्र व्यवस्थाक सबसँ तीखगर तार्किक विरोध बुद्ध कएने छलाह। संभवतः इएह कारण अछि जे आइ भारतक सवर्णेत्तर समाजमे सबसँ बेसी आदर बौद्ध धर्मकेँ देल जाइछ। बौद्ध विचारक समाजकेँ अंधविश्वाससँ बाहर निकालि तार्किक बौद्धिक संस्कृतिक विकास कएने छलाह। समाजक निम्न वर्गक आन्दोलनक इएह बुनियादी ताकत रहल अछि।
अम्बेदकर प्रेरित दलित पैन्थर आन्दोलन मराठी कविता एवं कथासाहित्यमे सहसा एकटा चमत्कार आनि देने छल, जकर आबाज मैथिलीमे सेहो सुनल गेल। तकरे परिणाम थिक मधुप विरचित कथा काव्य ‘द्वादशी’क अन्तर्गत समाहित ‘घसल अठन्नी’, जकरा मध्य दलित चेतनाकेँ देखब हमर ध्येय अछि।
घसल अठन्नीमे दलित चेतना
घसल अठन्नी ‘मधुप’क सर्वाधिक प्रख्यात, सर्वाधिक प्रशंसित कथाकाव्य थिक। एहिमे दलित वर्गक एकटा विधवा स्त्री बुचनीक चित्रण कएल गेल अछि। ओ जेठक विकराल समयमे खेतमे बिनु जलखै-कलोक काज करबाक लेल विवश छल, अपन आ अपन बच्चाक जीवन रक्षार्थ। एहि काजक बदला ओकरा भेटतैक मात्र आठ आना। ओकर पति मरि गेल छैक। ओकरा एकटा छौ मासक नेना छैक। साँझमे ओकरा भुटकुन बाबू दिससँ बोनिमे भेटैत छैक अठन्नी, जे कोनो दोकानमे नहि चलैत छैक कियैकतँ ओ घसल छैक। बुचनी ओहि अठन्नी लएकेँ परेसान अछि आ ओ भुटकुन बाबू लग पहुँचि बदलि देबाक आग्रह करैत छैक। ताहि पर भुटकुन बाबू औरतक त्रियाचरित्रकेँ व्याख्यायित करैत उचित बोनि देलासँ अपन कुलमे दाग नहि लगोताह सन बात कहैत ओकरा पिटैत छथिन्ह आ एहि दुहू माय-बेटाक प्राणांत भए जाइत छैक। ई तँ भेल कविताक संक्षिप्तसार।
द्वादशीक आमुखकक अनुसारेँ- ‘‘प्रस्तुत द्वादशी संकलन एहने करुणाक निर्झरिणी थिक जाहिमे अवगाहन कयलासँ करुणाक एहि आवरणमे क्रांतिक ज्वालामुखी पाठककेँ दृष्टिगोचर होयतनि। एहि संकलनमे 1940सँ 50 ई.क मध्य रचित 12 गोट करुण रसात्मक कथाकाव्य संकलित अछि। ई संकलन सामाजिक वैषम्य, शोषण ओ अत्याचारक जीवन्त चित्र समक्षमे उपस्थित करैत अछि।’’- आमुख, पृ.- ख
उपरोक्त परिप्रेक्षमे आलेखक मूल उद्देश्य बुचनीक मुँहसँ निःसृत पाँति-
‘‘मालिक!
हम कर्ज नहि छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए’’ सँ अछि। जाहि मध्य दलित चेतनाक अवगाहन होइत अछि। बुचनीक वाणीमे दृढ़ता छैक जे भुटकुन बाबूक अहंकार अत्याचरक समक्ष टूटि भनहि गेल अछि, मुदा झुकल नहि।
बहुत रास आलोचकक कहब छन्हि जे मधुपजीक कविताक पात्र विद्रोहक स्वर मुखरित नहि कऽ परिस्थितिक आगू आत्मसमर्पण कए दैत छनि। मुदा एहि ठाम हम कहए चाहब जे एकाएक बिद्रोहक स्वर नहि उठैछ अर्थात् बिनु चेतनाक बिद्रोह कोना संभव भए सकैछ? स्वतंत्रतासँ पूर्व दलित वर्ग अपन हकक प्रति सावधान भए उचित मांग करब प्रारंभ कए देलनि सैह तँ भेल दलित चेतना। जेकि ‘घसल अठन्नी’क बुचनी अपन पारिश्रमिक मांगैत सिद्ध कए देलनि।
एक हिसाबेँ बात बड्ड छोट छैक, अदौसँ सामर्थ्यवान असहायकेँ कष्ट पहुँचबैत आएल छथि, जनिका लग शक्ति छनि, ओ ओकर उपयोग निरीह पर करैत अएलाह अछि, मुदा ‘घसल अठन्नी’ अपन प्रकाशनक संग सभक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करबाक हेतु वाध्य कएलक, जे एकर सबसँ पैघ उपलब्धि मानल जाए सकैछ। शक्तिशाली होथि वा शक्तिहीन, सभ केओ एहि दिशामे किछुओ काल अवश्य मनन कएलनि, जाहिसँ एहि साहित्यक उद्देश्य सोलहो आना सफलता प्राप्त कएलक, जे चिकड़ि-चिकड़ि ओहि साहित्यकारक गुणगान अदौसँ आइ धरि कए रहल अछि, एहिसँ बेसी एकटा साहित्यकारसँ एहि समाजकेँ अपेक्षा की?
निष्कर्षतः कहल जा सकैत अछि जे समाजक दलित-पीड़ित वर्गक वेदनाकेँ मुखर करब, ओकरा समाजक सहानुभूति अर्जित करैब हिनक कथाकाव्यक उद्देश्य रहल अछि। हिनक कथाकाव्यक नायक दलित वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि तथा खलनायक सामन्त वर्गक। शोषित वर्गक अमानुषिक अत्याचारक चक्कीमे दलित वर्गकेँ पिसाइत देखाएब एवं ओकरामे अपन हकक प्रति चेतनाकेँ जागृत करब हिनक ध्येय छन्हि।
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आशीष अनचिन्हार
नियंत्रित पूँजी आ मधुपजीक मार्क्सवाद
आधुनिक समयमे जतेक बेसी गंजन "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामधारी विचार सभहँक भेलै ततेक आन कोनो विचारक नै। आ ऐ गंजन लेल मात्र आ मात्र ओ तथाकथित "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ जिम्मेदार छथि जे छद्म रूपें एकरा मात्र कैरियर वा फैशन लेल अपनेलथि। जँ उपरलिखित विचार सभहँक अर्थ पूछल जाए तँ वस्तुतः सभहँ अर्थ एकै आएत आ तकरा सरल शब्दमे एना कहि सकैत छी--"जे मनुख धन संचयक प्रवृति छोड़थि आ आनो लोकेँ ऐ लेल प्रोत्साहित करथि संगे-संग ओइ धनक उपयोग सामूहिक हितमे हो से "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" कहेता। आब ऐ प्रवृति लेल नास्तिक भेनाइ जरूरी छै की नै से कहब मोश्किल कारण बंगालक करोड़पति "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" सभ हरेक बर्ख धूमधामसँ दुर्गापूजा मनबै छथि। ओना प्राचीन कालमे वाममार्गी ओहन लोककेँ कहल जाइत छलै जे की संसारक प्रचलित परंपरासँ हटि कऽ काज करथि। मुदा ऐठाम हम ऐ सोचमे छी जे प्राचीन भारतक तंत्र-वाममार्गी आ आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गीमे की संबंध छै तँ हमर नजरि अनायासे "पंच-मकार" दिस चलि जाइत अछि आ अद्भुत साम्य भेटि जाइए। तँए हम "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभकेँ साम्यवादी सेहो बुझैत छी। ओना कतबो ताकै छी तँ धन-संचयक प्रवृतिकेँ छोड़बाक आदति "आधुनिक भारतक राजनैतिक वाममार्गी" सभमे नै भेटैए। स्वतंत्रता समयमे जखन जमिंदारी प्रथा समाप्त भेलै आ जमिंदार सभ कांग्रेसक सदस्यता लऽ कऽ अप्रत्यक्ष रूपें अपन जमिंदारी बचेलक तेनाहिते किछु अति-महत्वाकंक्षी लोक सभ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक चोंगा पहीरि कऽ सामजाक सभ क्षेत्रमे प्रवेश केलक। आ, "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" नामक ऐ विचारक सभहँ छद्म रूपसँ साहित्यकेँ सभसँ बेसी नोकसान भेलै। ओना हमरा ई स्वीकार करबामे कोनो हर्जा नै जे किछु लाभ सेहो भेलै मुदा ओकरा एना बुझू जेना कोनो लोक दस रूपैयाक उगाही लेल पचास रूपैया खर्चा करथि।
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जँ नास्तिकताकेँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए चार्वाक आ हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। प्रस्तुत अछि हुनक किछु विलक्षण विचार—
१) मानं त्वक्षजमेव हि' हिशब्दोऽत्र विशेषणार्थो वर्तते। विशेष: पुनश्चार्वाकैर्लोकयात्रानिर्वहणप्रवणं धूमाद्यनुमानमिष्यते क्वचन न पुन: स्वर्गादृष्टादिप्रसाधकमलौकिकमनुमानमिति।–षड्दर्शनसमुच्चय- पृ0 457
२) केचित्तु चार्वाकैकदेशीया आकाशं पंचमं भूतमभिमन्यमाना: पंचभूतात्मकं जगदिति निगदन्ति। षड्दर्शन समुच्चय- पृ0 450
३) लोकसिद्धो भवेद् राजा परेशो नाऽपर: स्मृत:। देहस्य नाशो मुक्तिस्तु न ज्ञानान्मुक्तिरिष्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9
४) अंगनाऽऽलिंगनाजन्यसुखमेव पुमर्थता। कण्टकादिव्यथाजन्यं दु:खं निरय उच्यते॥ सर्वदर्शन संग्रह- पृ0 9
जँ प्राचीन मतकेँ खंडन करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक तत्व बूझल जाए तखन तँ सभ उपनिषद्कार गीता संग हुनक अनुयायी बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" निकलत। कारण उपनिषद् सभमे कर्मकांडक ओ वेदक यज्ञकेँ विरोध भेल अछि।
जँ समानताकेँ प्रतिपादित करब "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" थिक तखन याज्ञवल्क्यक विचार सर्वाधिक महान अछि। याज्ञवल्क्यस्मृतिक गृहस्थधर्मप्रकरणमे लिखल ई श्लोक देखू--
बालस्ववासिनीवृद्ध- गर्भिण्यातुरकन्यकाः ।
संभोज्यातिथिभृत्यांश् च दंपत्योः शेषभोजनम् ॥ यास्मृ१.१०५ ॥
मने बाल बच्चा बूढ़ ओ संगमे रहए बला लोक (नौकर-चाकर सहित), आतुर, गर्भिणी, कन्या अतिथिक आदि भोजन पहिने हेबाक चाही तकर बादे गृह मालिक अपने करथि। निश्चित रूपसँ नौकर चाकरकेँ ऐ सूचीमे आनि याज्ञवल्क्य अपन महानताक परिचय देने छथि। आ निश्चित रूपसँ आजुक "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील"सँ बेसी महान छथि।
जँ दया ओ करुणा "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" आदिक लक्षण थिक तखन बौद्ध आ जैन धर्मक पालन करऽ बला सभ सेहो महान बड़का "मार्क्सवादी" वा "साम्यवादी" वा "समाजवादी" वा "वामपंथी" वा "प्रगतिशील" छलाह ओ छथि।
जँ अखिल विश्वक नारा देलासँ "मार्क्सवाद" वा "साम्यवाद" वा "समाजवाद" वा "वामपंथ" वा "प्रगतिशील" बुझल जाए तखन वैदिक ऋषि सभहँक ओ ऋचा बेसी जोरगर अछि जैमे कहल गेलै जे-- वसुधैव कुटुम्बकम्।
जँ वस्तुतः देखल जाए तँ संसारमे "नियंत्रित पूँजी" वा "नियंत्रित पूँजीवाद" केर बहुत महत्व छै। मने एहन पूँजीवाद जैमे शोषणक दर कम होइ ( जी ठीक पढ़लिऐ अपने "जैमे शोषणक दर कम होइ )। आब बहुत लोक एकरा काल्पनिक कहता मुदा वर्तमान समयमे स्वंय सोवियत रूसक विघटन आ चीनक आर्थिक प्रसार देखि ई निश्चित होइत अछि जे पूँजीवाद बहुत जरूरी छै। आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी। बहुत लोक एकरा एखनो काल्पनिक मानता। एकटा उदाहरण लिअ- "जँ सभहँक पेट भरि जाएत तँ ई संसार कतेक समय टिकतै। हमरा हिसाबें मात्र एक घंटा कारण सभहँक पेट भरले छै तखन एक दोसरक मोजर की? तँए हमरा हिसाबें जा धरि पेट खाली छै ता धरि लोक एक दोसरक गप्प मानऽ लेल मजबूर छै। हँ, कमसँ कम चारि घंटासँ बेसी पेट खाली नै हेबाक चाही आ ऐ लेल जै पूँजीवादक अवधारणा देलहुँ से भेल "नियंत्रित पूँजीवाद"।
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साफ शब्दमे कही तँ मधुपजी भारतीय परंपराक मार्क्सवादी छथि। ई अलग गप्प जे ओ अपन साहित्यमे लाल झंडा कहियो नै उघला। मुदा की जेना सभ लोक जानै छथि जे साहित्यमे लाल झंडा उघनिहार छद्म मार्क्सवादी छला वा छथि। आब हम मधुपजीक किछु साहित्यक उदहारण दैत ई सिद्ध करब जे मधुपजी नियंत्रित पूँजीवादक समर्थक छला। मधुपजीक सर्वाधिक लोकप्रिय कविता थिक "घसल अठन्नी" एकर अंतिम भागमे पात्र बाजि उठैत अछि ---
हम कर्ज न छी मँगैत
अथवा नहि अएलहुँ भीख हेतु
उपजले बोनि टा देल जाए
हम थिकहुँ अहीं केर प्रजा पूत
कै बेरि एलउँ
टुटि गेल टाँग
अन्नक मारल अछि हमर आँग....
सप्ष्टतः मधुपजीक विचार अछि जे सुप्पत उपजल बोनि देल जाए। आ इएह तँ नियंत्रित पूँजीवाद छै। हम फेर कहब जे आब ई हमरा अहाँक हाथमे अछि जे ओकरा नियंत्रित करी वा अनियंत्रित छोड़ि दी।
तेनाहिते मधुपजी अपन आन दोसर प्रसिद्ध कविता "पीक" केर माध्यमें कहै छथि--
नहि पतन एक दिन ककर हैत ?
पृथ्वीक कोरमे के न जैत ?
तें सकल वस्तुमे एक भाव
निश्चित रूपसँ ई साधारण भारतीय जन-मानस केर अभिव्यक्ति अछि मुदा एकर मूल "नियंत्रित पूँजी"मे नुकाएल छै। जैठाँ नियंत्रित पूँजी छै ताही ठाम सुव्यवस्थित ढ़ंगसँ उत्थान-पतन संभव छै।
मधुपजीक बहुत रास कविता गीत हमर तथ्यक गवाही दैए मुदा ऐठाम सभकेँ राखब हमर अभीष्ट नै। कारण ऐ लेखकेँ हम मात्र प्रारंभिक मानै छी। की कारण छै आन आलोचक सभ मधुपजीकेँ प्रगतिशील तँ मानै छथि मुदा मार्क्सवादी नै जखन की मधुपजी आन कथित मार्क्सवादीसँ बेसी प्रमाणिक मार्क्सवादी छथि। हम ऐ लेखकेँ आर आगू बढ़ाएब आ ओत्तहि ई बुझना जाएत जे मैथिलीक आलोचक सभ कोना " कथित मार्क्सवादी" सभ मात्र पार्टी ज्वाइन करैत छल राजैनितिक ओ पुरस्कारक स्वार्थ लेल ऐ फेरमे मधुपजी सन सुच्चा मार्क्सवादी कोन कतिया गेला।
21 दिसम्बर 2014केँ गाम कोर्थुमे स्व. काशी कान्त मिश्र "मधुप"जीक प्रतिमा हुनक पत्नीक प्रतिमा संग स्थापित भेल। ऐ कार्यक्रमक विवरण एना अछि--
कविचूड़ामणि मधुपजी 27म बरखीपर हुनक गाम कोर्थुमे मधुप स्मृति मनाओल गेल अहि अवसर पर मधुप जीक स्मारकक स्थापना सेहो कएल गेल। राम जी ठाकुर दीप जरा कऽ कार्यक्रमक शुरुआत केलनि आ मंचक अध्यक्षता जीतेन्द्र नारायण झा " जीतू" आ संचालन डॉ जयप्रकाश चौधरी "जनक" जी केलनि। मुख्य अतिथि श्रीमती नीरजा रेनु, किशोर नाथ झा आ विशिष्ठ अतिथि चंद्रभानु सिंह आ बैजनाथ मिश्र "बैजू" छलाह। ऐ संगे आरो प्रबुद्ध लोक छला- शंभु नाथ मिश्र, सारदा सिंह, दिनेश चन्द्र झा, बैधनाथ झा, उमेश झा, कृष्ण कुमार झा, रामचंद्र झा शिवशंकर श्रीनिवास, चंद्रदेव झा, जटाशंकर मिश्र, रमन जी ठाकुर, प्रो. महेश झा, त्रिपुरारी ठाकुर, सुरेन्द्र झा, चंद्रकिशोर राय सरस जी, मदन झा, वरुण चौधरी, सरवन झा, सहयात्री जी, फूलचंद्र मिश्र"रमण", उदय चन्द्र झा "विनोद", मिथिलेश झा, सुमन सौरभ, उमानाथ झा ,कमल पाठक जी, चंद्रकिशोर झा, राघवेन्द्र चौधरी, आ राजीव मिश्र। प्रस्तुत अछि किछु फोटो (स्रोत- राजीव मिश्र, कोर्थु ग्रुप)—
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