जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासमे समकालीन चेतना
राजेन्द्र कुमार प्रधान
शोध प्रज्ञ, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, दरभंगा
मैथिली साहित्यक पहिल तथा एकमात्र पुरस्कार “टैगौर साहित्य पुरस्कार”सँ पुरस्कृत एवं विदेह भाषा सम्मानसँ सम्मानित श्री जगदीश प्रसाद मण्डल अपना सबहक बीच एक ओहन साहित्यकार छथि, जिनकर किछुए दिनमे बहुत रास रचना मैथिली साहित्याकाशमे अपन स्थान बना लेलक अछि। प्राय: २००४ इस्वीक बाद लिखब शुरू केलनि आ प्रकाशित हुअ लगलनि २००७ इस्वीक पछातिसँ।
२००९ इस्वीमे आठ गोट पोथी प्रकाशित भेलनि। यथा- गामक जिनगी- कथा संग्रह, तरेगन- विहनि कथा संग्रह, मिथिलाक बेटी- नाटक तथा पाँच गोट उपन्यास यथा- मौलाइल गाछक फूल, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत, जीवन-मरण आ जीवन-संघर्ष। पछाति २०१२-सँ-२०१४ इस्वीक मध्य विभिन्न विधाक दू दर्जनसँ ऊपर पोथी प्रकाशमे एलनि। यथा- अर्द्धांगिनी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, शंभुदास आ बजन्ता-बुझन्ता, कथा संग्रह। सतमाए, कल्याणी, समझौता, तामक तमघैल, बीरांगना, कम्प्रोमाइज, झमेलिया बिआह, रत्नाकर डकैत तथा स्वयंवर- नाटक एवं एकांकी। इंद्रधनुषी अकास, राति-दिन, सतबेध, गीतांजलि, तीन जेठ एगारहम माघ, सरिता आ सुखाएल पोखरिक जाइठ गीत एवं कविता संग्रह। तहिना, सधबा-विधवा, भादवक आठ अन्हार, नै धाड़ैए तथा बड़की बहिन नामक उपन्यास सेहो लिखिलनि अछि। आ अनवरत लिखिओ रहल छथि।
हमरा एतए मण्डलजी केर “साहित्यमे समकालीन बोध” विषयक आलेख प्रस्तुत करब अछि। एहि प्रसंग हम ई छूट लेमए चाहै छी जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक तँ अनेक उपन्यास छन्हि, कथा छन्हि, नाटक छन्हि, कविता छन्हि, गीत छन्हि...। मुदा हम “बड़की बहिन” उपन्यासपर केन्द्रित एहि आलेखक इतिश्री करब। अर्थात् “जगदीश प्रसाद मण्डलक बड़की बहिन उपन्यासमे समकालीन चेतना”,पर ई आलेख अपने सबहक सोझा प्रस्तुत कए रहल छी।
समकालीन शब्दक बेस व्यापक अर्थ-परिधि अछि। एहि शब्दक प्रयोग प्राय: तात्कालिक वर्तमान लेल कएल जाइत अछि। एक तरहक निश्चित समए-खण्डक लेल सेहो कएल जाइत अछि। से बितलोहो आ चलितो परिपेक्ष्यमे। बितलाहासँ तात्पर्य ई जे विद्यापतिक समकालीन फल्लाँ...। आ एकटा भेल आइ माने औझुका वर्तमान। औझको-वर्तमानमे सभ चीज लेल एक्के नजरिसँ समकालीक निर्णए करब कठिनाहे जकाँ अछि। बहुत एहनो व्यवहार अछि जे ज्योतिरीश्वरकालीन मिथिलामे व्याप्त छल जे आइयो यथावते अछि, खाली परिपेक्ष्यमे फेर-बदल भेल अछि। खैर जे से...।
नारी-समस्यापर, नारी विमर्श करैत एक ओहन उपन्यासक नाओं बड़की बहिन छी जे हमरा सभकेँ एकर कथा वस्तु चौंका दइए, आत्म मण्थन हेतु विवश कऽ दइए, संगे ओहन चेतनामुलक अछि जे कोनो काज करैसँ पूर्व आकि कोनो काजक लेल डेग उठबैसँ पहिने ओइ काजक दिशापर सोचैले प्रेरित करैए। कारण एहि भाग-दौड़क आपा-धापीमे हम सभ बहुत ओहन परिपेक्ष्यकेँ बुझिओ ने पबै छी जे एकर काल्हि की हेतै...। हलाँकी तइ पाछू कएटा ओहन बिन्दु अछि जइ दिससँ हम सभ मुँह घुमा लेने छी। उपन्यासकार हमरा सभ लेल किछु एहने परिपेक्ष्यकेँ बड़की बहिन उपन्यासक मध्यमसँ सुलोचना बहिनक जिनगीक कथा परोसलनि अछि, जे समकालीक अछि, यथार्थ अछि आ समकालीन समस्यासँ एवं बोधसँ ओतप्रोत् अछि।
मिथिलाक एकटा ओहन गाम जे कोसी आ कमलाक बीचक अछि, जइ गामक सुलोचना बहिन छथि। माने ओ गाम सुलोचना बहिनक जन्मभूमि छियनि। चौदह बर्खक अवस्थामे सुलोचनाक बिआह भेलनि। जहिना पिताक साधारण किसान परिवार रहनि तेहने परिवारमे बिआहो भेलनि। समाजमे अखन धरि धन नहि कुले-मूलक महत अधिक रहल मुदा लेनो-देन तँ चलिते छल। नीक-मूलक कन्याक मांगो बेसी। ओना अपन-पिताक कुल-मूलसँ दब परिवारमे बिआह भेलनि, मुदा कोनो हिनके टा नै, समाजमे कतेको गोटेकेँ भेल छन्हि आ होइतो अछि। तँए कोनो प्रश्ने नहि उठल। सरस्वतीक आगमनसँ नैहरक परिवारक विचारमे किछु नवीनता तँ आबिए गेल छल। बिआहक तीन साल पछाति सुलोचनाक दुरागमन भेल, सासुर गेली। बरख-पाँचे-छबेक पछाति सासुरसँ सुलाचनाकेँ भगा देलकनि। भगबैक कारण रहै जे सन्तान नहि भेलनि। ओना ने कहियो डाक्टरी जाँच करौल गेलनि आ ने सन्तान नहि हेबाक दोष किनकामे छन्हि, से फड़िछौल गेल। सासुरसँ भगौल सुलोचनाकेँ परिवार सहर्ष अपना लेलनि। अपनबैक कारण भेल जे परिवारक सभ अपने गल्ती मानि लेलनि जे ओहन कुल-मूलमे डेगे नहि उठबैक चाही। ओहनसँ मुहोँ लगाएब नीक नहि हएत।
सरस्वतीक रूप परिवारमे बदलल। संस्कृत पद्धतिक जगह नव-नव पद्धति शुरू भेल। संस्कृतोक पद्धति रहबे कएल। मुदा शिक्षाकेँ बुनियादी पद्धतिसँ उछालि देलक। सुलोचनाक पीठ परहक जेठ भाय जुगेसर मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। गरीबी-बेकारीसँ त्रस्त परिवार। पछाति जुगेसर टीचर्स ट्रेनिंग केलनि। लोअर प्राइमरीक शिक्षक बनला। तहिना जुगेसरसँ छोट मुनेसर सेहो मैट्रिक पास तमुरिया स्कूलसँ केलनि। आगू पढ़ैक गर लगबए लगला, खगड़ियाक गर लगलनि। ओइ ठामक संस्कृत विद्यालयमे विद्यार्थीकेँ भोजन-डेराक व्यवस्था सेहो करैए। कोसी कौलेज सेहो छइहे। साइंसक विद्यार्थी मुनेसर, नीक जकाँ बीएस-सी केलनि तैबीच बिआहो अफसरक परिवारमे भऽ गेलनि। दुरागमनक किछुए-दिन पछाति मुनेसरक पत्नी साधना नैहर एली। अखन धरि पिता-श्यामानन्द बेटी-जमाएक घर-दुआर नहि देखने। बीएस-सी लड़का, शरीरसँ स्वस्थ सुनि बेटीक बिआह केलनि। नैहर आपसीक पछाति साधना जखन सासुरक सभ हाल माए-पिताकेँ कहलनि तखन पिताक मनमे जमाएक नोकरीक प्रश्न उठलनि। मुनेसरकेँ राँचीए बजा लेलनि। आ संगी-साथीक सहयोग लऽ मुनेसरकेँ स्कूलमे नौकरी धरा देलखिन। मुनेसरो नोकरी करए लगला। समए बितैत गेल।
जुगेसर आठ कट्ठा जमीन कीनैक विचार केलनि। ओना दुनू परानीक विचार जे मुनेसरकेँ एहि जमीनमे संग नहि करब। मुदा परिवारक तँ विधिवत् बँटबारा भेल नहि छेलनि। तखन जेठ भाय छिऐ, छोट भाएक हिस्सा तँ भइए जाएत। तँए कहि देब जरूरी अछि। जँ अदहा खर्च देत तँ ठीके छै नहि तँ अपन दोख तँ मेटा लेब। विचारक पाछू पेटमे रहनि जे मुनेसरक आमदनी ततबे छै जे कहुना कऽ परिवार चलै छै। तखन रूपैआ केतए सँ आनत? तैबीच मनमे ईहो होन्हि जे गुप-चुप दाम भेल अछि किने, बढ़ा देबै। कहुना (अधिया दाम भेने) चारि कट्ठा तेफैसला (तीन फसिला) खेतक भैलू कम नहि भेल। पोस्ट कार्डक माध्यमसँ जुगेसर मुनेसरकेँ जनतब देलखिन। स्कूलक दरमाहा तँ जुगेसरकेँ बूझल, मुदा ट्यूशनक आमदनी तँ नहि बूझल। तैसंग पत्नीओ (मुनेसरक) विचार देलखिन जे नैहरमे देल बरतन-बासन जे अछि ओ अनेरे घरमे ढनमनाइत रहैए, ओकरा बेचि कऽ जमीन कीनि लिअ। अखन धरि दुनू भाँइ -जुगेसर-मुनेसरक- बीच पहिलुके सम्बन्ध जीवित छल। मुनेसर अदहा खर्च दइले तैयार भऽ गेला।
अपन कमजोर पाशा देखि जुगेसर दुनू परानी विचार केलनि जे नीक हएत बेटा नाओंसँ जमीन लिखौल जाए। मुनेसरकेँ कोनो पता नहि। अनुकूल विचार बूझि जुगेसर अपना बेटाक नाओंसँ आठो कट्ठा जमीन लिखा लेलनि। जे पछाति दुनू भाँइक बीच विस्फोटक भऽ गेल।
गामक समस्या (भाइक व्यवहार) दुनू परानी मुनेसरक सम्बन्धमे खाधि बनैत गेल। दुनू भाँइक भिनौजी सुलोचनाकेँ सेहो बाँटि देलकनि।
मुदा झगड़ाक बीआ पहिने सुलोचना बहिन रोपि लेलनि। रोपि ई लेलनि जे खेत कीनला पछाति मुनेसर दिससँ बाजि देलखिन जे जखन दुनू भाँइ अदहा-अदहा खर्च दऽ खेत कीनलक तखन हिस्सा किए ने हेतै? अपना मुहेँ वेचारी एक भाँइसँ दूर आ दोसरसँ लग चलि एली!
दुनू भाँइ-जुगेसर-मुनेसरक विवाद समाजक मंचपर सेहो आएल। जुगेसरक जे बेटा मारिमे केस केलनि ओ घटना कर्ताक संग समाजोक लोककेँ भँसा देलनि। केसकेँ ओइ गतिए बढ़ौलनि जे घटनाक परात भने चारि थाना गाममे आबि गेल। हरबिर्ड़ो गाममे भऽ गेल। दौड़ा-दौड़ी खेहारा-खेहारी जमि कऽ भेल। दू गोटे जहलो गेल। लगले बाँकी मुद्दालहक जब्ती-कुर्की भऽ गेल। जकर प्रतिक्रिया समाजमे जमि कऽ भेल।
आगू चलि मुनेसर बेमार पड़ि गेला। छह मास आराम करैले डाक्टर सलाह देलकनि। जीवन-मुत्युक बीच पड़ल मुनेसरक मन छँहोछित भऽ गेलनि। एक दिस अपन अगिला जिनगी हरिअर बूझि पड़नि, अपन कमाइक संग दुनू बेटाक कमाइ देखि तँ दोसर दिस अपन स्थिति देखथि जे अपन सेवा केना हएत? पत्नीओ पत्नीए छथि। अकास उड़ैत चिड़ै जकाँ। कमा कऽ हाथमे दियनु, हुकुम पुरबियनु तँ बड़बढ़ियाँ नहि तँ अपनाकेँ कपरजरूआक पत्नी कहि डाकनि देती। अपन शेष नोकरी आ पेन्शनक आशा पत्नीकेँ देखथि, तँ बेटाकेँ कमासुत बूझि संतोष होन्हि, मुदा बड़की बहिनक की हएत? वेचारीकेँ अछैते भाइए ने भाए रहलनि, आ ने अछैते पतिए ने पति रहलनि! घरपर ओते सम्पति नै, तहूमे जँ बेचैओक अधिकार रहितनि तँ किछु बेसीओ दिनक आशा होइतनि, सेहो नहि। समए रौदियाहे अछि। अपने ओछाइन धेने छी, पाइक कोनो आमदनी नहि। बेटासँ मांगि केना सकै छी, ओकरो ई बात (बहिनक खर्च) बूझल नहि छै तैपर जँ मंगबै आ ओ माएकेँ कहत तँ जेहो किछु दिन जीवैक आशा अछि सेहो चलि जाएत। आइने-अवगरानिसँ लोक जहर-माहूर खाइए। अपन विचारकेँ अपने मनमे दाबि मुनेसर बहिनकेँ बिसरि देलनि।
महिना-दू महिना तँ सुलोचना आशा धेने रहली मुदा पेटक आगि तँ ओहन आगि होइ छै जेकरा मिझबैले लोक आचार-विचार कुल-खनदान सभ बिसरि जाइए। ततबे नै, सुलोचना ओहन परिवारमे जनम नेने छथि जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि केना सकै छथि। अपन ओहन वाड़ी-झाड़ी खेत नहि जे अपनो जोकर सागो उपजा सकै छी। बाधक खेत। बेवस सुलोचना गाममे टुटली मरैआमे बैस गाबए लगली- “हे भोलादानी कहिया हरब दुख मोर।”
चारू दिसक अपन बन्न रस्ता देखि सुलोचना बहिन चारूकात तकली तँ एकटा घर लगमे बूझि पड़लनि। ओ घर अपन दीदी-पीसाक। गामसँ सटले, करीब कोस भरिपर दीदीक घर। बेरू पहरमे सुलोचना बहिन दीदी गामक रस्ता पकड़लनि...।
सुलोचनाक पिसियौत भाए, हाइ स्कूलमे शिक्षक छथि। प्रतिष्ठित शिक्षक। जिनगीमे डेरापर कहियो कोनो विद्यार्थीकेँ ट्यूशन फीस नहि लनि। मास्सैबक परियाससँ सुलोचना बहिन सासुर गेली। दोहरा कऽ साठि बर्खक उमेरक पछाति जहिना जिनगी हारल-थाकल तहिना अपन जिनगी पाँच कौर अन्न आ पाँच हाथ वस्त्रपर अँटका लेलनि...।
उपरोक्त कथा-वस्तु सद्य: यर्थाथक परिचए अपनामे समेटने अछि। औझका पढ़ाइ-लिखाइक मात्र एक लक्ष्य नोकरी करब अछि। परिवारक अर्थ सिकुड़ि रहल अछि। समाजक बीच रंग-रंगक कलह केर भावना बढ़ि रहल अछि। भाए-भैयारीमे प्रेमक भावना कमि रहल अछि। पूजीवादी विचार मनुखमे एहि तरहेँ अपन जगह बना रहल अछि जे बैमानी भावना एते प्रवल भेल जा रहल अछि जे समाजक बात तँ दूर जे भैयारीओमे बैमानी शुरू भऽ गेल अछि। जइ परिवारक औरतकेँ भूमि छेदनसँ बर्जित कएल गेल छन्हि, ओ अपन श्रम बेचि कोना सकै छथि। अपना ऐठाम आइयो विधवा बिआहक सामाजिक मान्यता सभ समाजमे नहि देल गेल अछि। जकर जरूरत सजहे उपरोक्त कथा-वस्तुमे उपन्यासक माध्यमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल सुलोचना नामक पात्रक अवतारणा कऽ देखार केलनि अछि। जखन कि एहन मात्र सुलोचने बहिनटा नहि अपितु बहुत बहिन छथि...।
ऐ तरहेँ ऐ उपन्यासमे समकालीन चेतना वृहद पात्रक समस्त चरित्र-चित्रणसँ लऽ अन्त आएल अछि।
निर्मलीक गीत
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