विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलाक इतिहास

डॉ. श्रीमोहन झा · 2015-04-01 · अंक 175

मिथिलाक इतिहास
:: डॉ. श्रीमोहन झा
इतिहास साक्षी अछि जे वैदिक कालहिसँ जाहि मिथिलाक प्रतिष्‍ठा ब्रह्मज्ञानक विकास-केन्‍द्रक रूपमे भेल, जतय खेलहुमे ब्रह्मविद्या सिखाओल जाइत छल, जकर अनुशासन द्वारा स्‍मार्त कालहुमे देश-देशान्‍तरक आचार-विचारक क्षेत्रमे प्रेरणाक श्रोत रहल, जे जनपद अपन दर्शनक विचार-धारासँ सम्‍पूर्ण भारतकेँ आलोकित कयलक ओ जकर काव्‍य-कल्‍पना भारतीय साहित्‍यक रस-प्रवाहकेँ निरन्‍तर समृद्धि कयलक ओहि मिथिलाक पावन भूमि जनक, याज्ञवल्‍क्‍य, गौतम, कपिल, कणाद, गंगेश, चिन्‍तामणि, मण्‍डन, उदयन, वाचस्‍पति, पक्षधर, विद्यापति, गोकुलनाथ, अयाची, शंकर ओ ज्‍योतिरीश्वरक मिथिला न्‍याय, तत्‍वमीमांसा एवं सांख्‍यक जन्‍मभूमि मिथिला कृतिसँ भारते नहि अपितु समस्‍त विश्व आलोकित अछि।
मिथिलाक सीमा प्रसंग वृहद् विष्‍णु पुराणमे कहल गेल अछि जे मिथिलाक उत्तरमे नागाधिराज हिमालय एकर प्रहरीक रूपमे ठाढ़ छथि। दक्षिणमे पतित पावनी गंगा अपन कलकल-ध्‍वनिसँ एकर चरण स्‍पर्श करैत छथि। पूरबमे नृत्‍य करैत चिर-चंचला कौशिकी एकर सम्‍यता आ संस्‍कृतिक संवाहिका तथा विध्‍वंशिका दुनू मानल जाइत छथि तँ पश्चिममे धीरगमिनी गण्‍डकी स्‍वर्णक समान चकमक करैत एकर श्रृंगार करैत छथि।
कवीश्वर चन्‍दा झा सेहो अपन रामायणमे उपर्युक्‍त आधारकेँ स्‍वीकार करैत मिथिलाक सीमाक प्रसंग कहने छथि-
“गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि पूर्व कौशिकाधारा।
पश्चिम बहथि गण्‍डकी उत्तर हिमवत वल विस्‍तारा।।
कमला त्रियुगा अमृता धमुरा वागमती कृतसारा।
मध्‍य बहथि लक्ष्‍मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा...।”
वर्तमान समयमे मिथिलाक पूर्ण विस्‍तार भऽ गेलाक कारणें एकर सीमा दरभंगा, मधुबनी, चम्‍पारण, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, किशनगंज, भागलपुर एवं हिमालय केर तराइ धरि पसरि गेल अछि। एहि प्रकारेँ गंगा-प्रवाहसँ लऽ कऽ उत्तर हिमालय धरि सए मील तथा पूरबमे महानन्‍दासँ पश्चिम गण्‍डकी धरि २५० मीलमे मिथिला देश अछि।
अति प्राचीन कालसँ मिथिला तीरभुक्‍ति नामसँ प्रचलित छल। एहिठाम नदीक बाहुल्‍य अछि एवं ओहि सभक तीरमे लोक सभ बसैत गेलाह तेँ मिथिलाक पर्याय तीरभुक्‍ति नाम प्रचलित छल जे वर्तमान समयमे तिरहुत नामसँ प्रसिद्ध अछि।
मिथिला नामकरणक प्रसंग अनेक पौराणिक आधार अछि। भविष्‍य पुराणक अनुसार मिथिलाक नामकरण राजा ‘निमिक’क पुत्र मिथिक नामपर राखल गेल अछि। अयोध्‍याक राजा निमि एहि पूण्‍य भूमिपर अयलाह तेँ निमिक पुत्र मिथिक नामपर एहि प्रदेशक नाम मिथिला पड़ल। मुदा पाणिनिक कथन छनि जे जतय शत्रुक उन्‍मूलन कयल जाय ताहि भू-खण्‍डक नाम मिथिला अछि। महाभारतक युद्धमे मिथिलाक राजा पाण्‍डवक संग युद्ध कयने छलाह। एहिसँ स्‍पष्‍ट अछि जे मैथिल लोकनि योद्धा सेहो होइत छलाह। बाल्‍मीकि रामायणमे सेहो मिथिला नरेशक वीरताक वर्णन भेल अछि।
विश्व वाङ्गमयमे संस्‍कृतक साहित्‍य-सरिता अत्‍यन्‍तव्‍यापक, दीर्घकालिक ओ निरन्‍तर प्रवहमान रहल अछि। एहि अमृत सिन्‍धुसँ बिन्‍दु-बिन्‍दु ग्रहण कय भारतक समस्‍त लोक भाषा-साहित्‍य समृद्ध ओ संबलित भय युग-युगसँ समस्‍त विश्वकेँ प्रेरणा-पुंज आलोक प्रदान करैत आबि रहल अछि। संस्‍कृतक अक्ष्‍य-भण्‍डारसँ भाव राशि ग्रहण कय भाषा-साहित्‍यक परती-पाँतर पर्यन्‍त सुरभित ओ सुवासित होइत रहल अछि।
भारतीय इतिहासक ओ सांस्‍कृतिक मर्मज्ञ मनीषी लोकनि जनैत छथि जे भारत वर्षक राष्‍ट्रीय अखण्‍डतामे संस्‍कृत भाषाक अद्वितीय स्‍थान रहल अछि। प्राचीनकालसँ लय आसेतु हिमालय सांस्‍कृतिक, धार्मिक ओ दार्शनिक विचारक आदान-प्रदानक माध्‍यमे संस्‍कृते भाषा रहल अछि। काव्‍यक कोनो विधाक सर्जना एहिमे भेल अछि।
इतिहासकार लोकनि भारत वर्षक ओहि भू-भागकेँ मिथिला कहल अछि जे कतेको दृष्‍टिसँ अपन अप्रतिम विशिष्‍टताक महत्‍वकेँ अद्यावधि सुरक्षित रखने अछि। मिथिलाक ओ पावन-भूमि अपन सभ्‍यता-संस्‍कृति, जप-तप, ध्‍यान-धारणा-समाधि आदि उन्नत मानवताक साधक गुणक कारणेँ आइ संसार मध्‍य शीर्षस्‍थ स्‍थान रखने अछि। मिथिलाक माटि-पानिमे किछु एहन विलक्षण शक्‍ति सर्वदासँ सन्निहित रहलैक अछि जाहिसँ एहिठामक लोक शिष्‍ट, सज्‍जन, प्रतिभाशाली, विद्या-व्‍यवसायी एवं तत्‍व चिन्‍तनक होइत रहल अछि। यज्ञ-स्‍थलक केन्‍द्र मिथिला जे अपन यज्ञक धूआँसँ समस्‍त वातावरणकेँ पावनमय बनौने रहल अछि। वैदिक कालसँ लय अद्यावधि मिथिलामे उत्‍पन्न भय अपन दिव्‍य अवदानसँ समस्‍त-विश्वकेँ चकित-स्‍तम्‍भित कयनिहार ऋृषि-मुनि, योगी-साधक, दर्शनिक विद्वानक जँ सूची बनाओल जाय तँ ओहिसँ केओ आश्चर्यचकित भय जायत।
दर्शनक क्षेत्रमे मिथिलाक नाम अग्रगण्‍य रहल अछि।न्‍याय सूत्रक प्रणेता गौतम, वैशेषिक दर्शनक प्रणेता कणाद एवं नव्‍य-न्‍यायक जनक गंगेश उपाध्‍यायक कारणें मिथिला दर्शन क्षेत्रमे पूर्ण ख्‍याित प्राप्‍त कयने छल। हिनक अतिरिक्‍त उद्योतकर, मण्‍डन, वाचस्‍पति आदिक नाम उल्‍लेखनीय अछि। वेदान्‍त सूत्रक शंकरक व्‍याख्‍या वाचस्‍पति द्वारा भामती नामसँ लिखल गेल अछि। मण्‍डन एवं शंकराचार्यक शास्‍तार्थ तँ जगत प्रसिद्ध अछि। जैमिनिक मीमांसा तथा कपिल मुनिक सांख्‍य दर्शनक निर्माण सेहो एहि पवित्र भूमिपर भेल। मिथिलाक महान नगरी तथा बौद्ध एवं जैन धर्मक मुख्‍य प्रभाव क्षेत्र लिच्‍छवी वंशक राजधानी वैशाली प्राचीन इतिहासमे महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखने अछि।
मिथिलाक इतिहास एकर साक्षी अछि जे वैदिक युगहिसँ मिथिला संस्‍कृति, न्‍याय, तर्कशास्‍त्र, विज्ञान, गणित, कामशास्‍त्र, मीमांसा, व्‍याकरण, धर्मशास्‍त्र तथा दर्शनक अध्‍ययन-अध्‍यापनक केन्‍द्र दीर्घकाल धरि बनल रहल। सम्‍बद्ध युगहिमे विभिन्न प्रकारक विशाल साहित्‍य अस्‍तित्‍वमे आयल, जाहिमे वौद्धिक विकास तथा आध्‍यात्‍मिक प्रगतिक पराकाष्‍ठाक रूपमे स्‍थित विभिन्न उपनिषद सभ सम्‍मिलित अछि। विश्वास देवीक समयमे मिथिलामे चौदह सय मीमांसकक एक वैसक भेल छल। अत: उक्‍त युगहिमे गार्गी, मैत्रेयी तथा सुलभा सनक प्रतिभाशाली नारीक उदाहरण भेटैत अछि। एहि प्रकारेँ तद्युगीन राजा सबहक संरक्षणमे उच्‍च शिक्षाक अनेक नियमित संस्‍था छल। एहन संस्‍था सभ सामान्‍यत: ‘चरण’क नामसँ ज्ञात छल।
अत: एही वैदिक युगहिमे जनक ओ याज्ञवल्‍क्‍य सन श्रेष्‍ठओ अग्रणी दार्शनिक छलाह। ओहि समयमे अन्‍य प्रान्‍तहुसँ दार्शनिक लोकनि जनक ओ याज्ञवल्‍क्‍यसँ अध्‍यात्‍म सम्‍बन्‍धी शिक्षाक ज्ञानोपार्जन हेतु अबैत छलाह। याज्ञवल्‍क्‍यक जीवनवृत्त वस्‍तुत: हुनक मातृभूमिक तत्‍कालीन सांस्‍कृतिक इतिहास थिक। याज्ञवल्‍क्‍यक अतिरिक्‍त गौतम, कपिल, विमाण्‍डक, शतानन्‍द तथा श्रृंग-ऋृषि ततेक विख्‍यात छलाह जे राजा दशरथ सेहो हिनका पुत्रेष्‍टि-यज्ञक सम्‍पादन हेतु कौशिकी घाटामे आमंत्रित कयने छलथिन। ओ काश्‍यप शाखासँ सम्‍बद्ध छलाह। अत: जाहि मिथिलाक पावन भूमिपर ब्रह्मज्ञानक सर्वश्रेष्‍ठ महर्षि याज्ञवल्‍क्‍यक सिद्धता आदि मिथिलाक आध्‍यात्‍मिकताकेँ सिद्ध-प्रसिद्ध करैत अछि। स्‍मृतिकार याज्ञवल्‍क्‍य परम धर्मकेँ िनरूपित करैत कहने छथि-
“अयं तु मरमो धर्मो यद्योगेनात्‍मदर्शनम्।”
मिथिलाक सभ्‍यता आ संस्‍कृतिक प्रसंग महापण्‍डित राहुल सांकृत्‍यायन ऋृग्वेदकेँ ‘प्राचीन ऋृर्षि’ शीर्षक लेखमे कहने छथि जे गौतम, रहुगण, दीर्घतमा, कुक्षिवन्‍त, विश्वामित्र आदि पूर्वोत्तर बिहारक सभ्‍यता आ संस्‍कृति आदिक जनक छलाह। विश्वामित्र ‘कौशिक’ नामसँ प्रख्‍यात भेलाह तथा कौशिकी हिनकर शापभ्रष्‍टा सहोदरा छलथिन। एही कौशिकी क्षेत्रमे विश्वामित्र ब्राह्मणत्‍व प्राप्‍त कयने छलाह। आ ई कौशिकी क्षेत्र नि:सन्‍देह मिथिलाक भू-भाग रहल अछि।
मिथिलाक सामाजिक तथा सांस्‍कृतिक अवस्‍थाक सम्‍बन्‍धमे ज्‍योतिरीश्‍वर अपन ‘धूर्तसमागम’ तथा ‘वर्णरत्‍नाकर’ मे पूर्ण सामग्री प्रस्‍तुत कयने छथि। वर्णरत्‍नाकर महत्‍व ऐतिहासिक दृष्‍टिसँ भारतीय पुरातत्वक एकटा कोष अछि तथा मध्‍यकालीन पूर्वोत्तर भारतक एवं विशेषतया मिथिलाक जनजीवन एवं संस्‍कृतिक जीवन्‍त चित्रण प्रस्‍तुत करैत अछि। समाजमे संस्‍कृतक एतेक अधिक प्रभाव एवं प्रचार छल जकर उदाहरण स्‍वयं विद्यापति देने छथि। राजा हरि सिंहदेवक आदेश तथा प्रेरणासँ बनाओल पंजी-प्रबन्‍ध, जे तत्‍कालीन समाजमे अत्‍यधिक प्रचलित भेल, संस्‍कृतहिमे लिखल गेल।
एहिसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे तत्‍कालीन समाजक रीति-नीति, आचार-विचार, धर्म-कर्म सामाजिक बन्‍धन, क्रिया-कलाप, दर्शन, स्मृति आदि सम्‍बन्‍धी विषय-वस्‍तुक रचनाक माध्‍यम संस्‍कृते छल। तकर मूल कारण जे मिथिलाक राजन्‍य वर्ग संस्‍कृति, साहित्‍य, दर्शन, ललित कलामे रूचि रखैत छलाह ओ कतोक राजा संस्‍कृतक विद्वान सेहो छलाह। एहिठामक राजा लोकनि संस्‍कृत रचनाक अध्‍यापन तथा वद्वान लोकनिक आश्रयदाता रहैत अयलाह। महाराज महेश ठाकुर तँ अपन विद्वताक कारणेँ मिथिलाक राज्‍य प्राप्‍त कयने छलाह।
विद्यापतिक रचनापर दृष्‍टिपात कयलासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि जे तत्‍कालीन रचनाक माध्‍यम कोन भाषा छल तथा राज दरबारमे कोन-कोन विषय सबहक रचना होइत छल विद्यापति राज पण्‍डित छलाह। पण्‍डित वर्गक भाषा संस्‍कृत छल। अत: अपन पाण्‍डित्‍य प्रदर्शन करबाक हेतु संस्‍कृतेमे रचना करब अनिवार्य बूझि पड़लनि।
मिथिला तंत्र विद्याक प्रधान केन्‍द्र छल एवं कतेको तांत्रिक एवं वैज्ञानिक सेहो छलाह। मिथिलामे नवीन भक्‍ति मार्गक रूपमे तंत्र मार्गक बेस प्रचार भेल। फलत: जाहि वंशमे सिद्ध तांत्रिक रहथि, ओहि वंशमे सिद्ध तांत्रिकक उपास्‍य देवीक मंत्र ग्रहण कय ओही देवीक उपासना करबाक प्रथा मिथिलामे अद्यपर्यन्‍त प्रचलित अछि।
वस्‍तुत: प्राचीन धर्मशास्‍त्र आदिक मनन ओ चिन्‍तनकय युगक आवश्‍यकतानुसार आचार सूत्रक अन्‍वेषणक संगहि ओकरा नव व्‍याख्‍या देबाक आवश्‍यकता छल। ई ओहि समयक समाजक हेतु जीवन-मरण ओ अस्‍तित्‍वक प्रश्न छल। मिथिलाक पण्‍डित लोकनि एहि उत्तरदायित्‍वकेँ निष्‍ठापूर्वक विर्वाह कयलनि। अतएव महाकवि विद्यापति सेहो एही परम्‍पराक आश्रय ग्रहण कयलनि।
प्राचीन कालहिसँ मिथिलाक ई विशेषता रहल अछि जे एहिठामक राजा लोकनि जनक वंश, कर्णाट क्षत्रिय अथवा ओइनवार शासक होयबाक संग-संग धर्म-कर्म एवं सामाजिक आचार-विचारक नियामक सेहो होइत छलाह। एही कारणेँ स्‍मृति ग्रन्‍थक रचना एतेक सुदृढ़ भय गेल छल। अपन आचार रक्षाक हेतु संस्‍कृतक ज्ञान आवश्‍यक छलैक तेँ समाजक जनमानसमे सेहो संस्‍कृतक प्रचार-प्रसार छलैक। एवं प्रकारेँ भारतक धर्म, संस्‍कृति-साहित्‍य, संगीत ओ कलाक क्षेत्रमे कर्णाट शासक लोकनि जे प्रेरणा-पुंज लय अवतीर्ण भेलाह से ओइनवार कालमे गतिमान नहि रहल अपितु ओकर व्‍यापक प्रभावक समता परवर्ती कोनो शताब्‍दीमे नहि भय सकल।
कर्णाट आ ओइनवार वंशक पतन मिथिलाक हेतु कष्‍टकर सिद्ध भेल। राजनीतिक अद्य:पतनक संग-संग परवर्ती कालमे मिथिला सांस्‍कृतिक क्षेत्रमे सेहो अवनतिक दशामे आबि गेल। किन्‍तु आलोच्‍य कालमे साहित्‍य आ कलाक क्षेत्रमे मिथिलाक उल्‍लेखनीय अवदान रहलैक। एहि स्‍तरपर कर्णाट-ओइनवार-युगीन मिथिला जनक-याज्ञवल्‍क्‍य कालीन मिथिलासँ तुलनीय अछि।
ओइनवार काल भारतीय साहित्‍येतिहासमे वस्‍तुत: ‘स्‍वर्णयुग’क रूपमे गनल जाइत अछि, कारण उक्‍त काल पर्ववर्ती युगसँ एहि दृष्‍टिसँ भिन्न अछि जे एहिमे संस्‍कृत-विद्याक क्रमिक प्रचार-प्रसारक संग-संग लोक भाषा साहित्‍योक विकासक मार्ग प्रशस्‍त भेल। मिथिलाक विदेह राजा जनकक समयमे जाहि संस्‍कृतिक सूत्रपात भेल छल ओकर पूर्णोत्‍कर्ष महाकवि विद्यापतिक युगमे भेल।
ज्‍योतिरीश्वरक पश्चात् महाकवि विद्यापतिक कोमलकांत पदावलीक रसास्‍वादन कय सम्‍पूर्ण पूर्वोत्तर भारतवर्षक साहित्‍य-प्रेमी भाव-विभाेर भय गेलाह। मिथिलाक संग घनिष्‍ट सम्‍पर्क रहबाक कारणेँ एहिठामक चिन्‍तन, साहित्‍य तथा संस्‍कृति बंगाल, आसाम एवं उड़ीसाक प्रेरणा श्रोत बनि गेल। हिनक गीतक अनुकरणपर एकटा नवीन भाषा ब्रजबुलि साहित्‍यक जन्‍मभेल। आसामक प्रमुख वैष्‍णव भक्‍त शंकरदेव तथा बंगालक महा प्रभु चैतन्‍यदेव तँ सहजहि विद्यापतिक गीत गबैत-गबैत मूर्छित भय जाइत छलाह।
एगारहम ई.मे भारतमे मुसलमान सबहक आगमन भेलासँ हिन्‍दु समाजक अस्‍तित्‍व वस्‍तुत: संकटापन्न भय गेलैक। हिन्‍दू लोकनिक राजनीतिक स्‍वतंत्रता समाप्‍त भय गेल। एहि जातिक समाजिक श्रृंखला तथा पारस्‍परिक सौमन्‍स्‍यक अन्‍त भय रहल छलैक। एहि संकटसँ बचबा लेल ब्राह्मणवर्ग निबन्‍ध लिखि ओहि सामाजिक मन्‍दिरकेँ ध्‍वस्‍त होयबासँ बचयबाक प्रयास कयलक। राजनीति तथा अर्थ व्‍यवस्‍थापर कोनो अधिकार नहि रहि जयबाक कारणेँ उक्‍त ब्रह्मण लोकनि अपन ध्‍यानकेँ मुख्‍यत: सामाजिक तथा पारिवारिक जीवनपर केन्‍द्रित कयलनि। ओकर परिणति जीवनक विभिन्न क्षेत्रक नियमनक हेतु आचार संहिता तथा विधि-व्‍यवस्‍थाक सम्‍बन्‍धी निबन्‍धक ओ नियम-परिनियम निर्माण भेल। उक्‍त स्‍मृति विषयक रचना अपन आन्‍तरिक मूल्‍य, सार्थकता आ सबलताक कारणेँ अनेक शतकक दुर्दशा ग्रस्‍त स्‍थितिओमे हिन्‍दू समाजक स्‍वतंत्र व्‍यक्‍तित्‍वक रक्षा कय सकल। हिन्‍दू विद्याक एकटा प्रमुख केन्‍द्र रहबाक कारणेँ मिथिलामे निबन्‍ध लेखनक स्‍वतंत्र परम्‍पराक अस्‍तित्‍व आश्चर्यजनक अछि।
ओइनवार कालहुमे प्रशासनिक स्‍वरूप ओहिना रहल जे कर्णाट कालमे छल। मैथिल लोकनि वर्णाश्रम-व्‍यवस्‍थाक कट्टर अनुयायी रहलाह अछि। सम्‍बद्धकालक मैथिल समाजमे सनातन धर्मक पालनुक प्रति पर्ण निष्‍ठा परिलक्षित होइत अछि। विदेशी सभसँ आक्रान्‍त भेलहुँ मैथिल समाज अपन स्‍वतंत्र व्‍यक्‍तित्‍वकेँ सुरक्षित रखबामे पूर्ण सफल रहल।
महाकवि विद्यापति सेहो तत्‍कालीन समाजक विशद वर्णन कयलनि अछि। हुनक कीर्तिलताक विभिन्न स्‍थलसँ ज्ञात होइत अछि जे मुसलमानी आक्रमणक फलस्‍वरूप तिरहुतमे बहुत दिन धरि अराजकता तथा अव्‍यवस्‍था व्‍याप्‍त रहल। हिन्‍दू समाज उत्‍पीड़ित तथा अपमानित जीवन व्‍यतीत करबाक हेतु विवश छल। मुसलमान आक्रमकक आतंककारी प्रशासनसँ साहित्‍य साधना ओ परम्‍परा सेहो क्षत-वक्षत भय गेल छल। भारत पर मुसलमानी प्रभाव जाहि निर्मम ओ नृशंस रूपमे बढ़ि रहल छल ताहिसँ समस्‍त भारतीय जन-मानस आलोड़ित भय उठल छल। विद्यापति तत्‍कालीन समाजक विशद वर्णन ‘कीर्तिलता’ मे कयने छथि जे दृष्‍टव्‍य अछि-
“धरि आनए बाभन बड़ुआ।”
मथाँ चढ़ाबए गाइक चुड़ुआ।।
फोर चाट जनउ तोड़
ऊपर चढ़ाबए चाह घोड़।।”
एहि प्रकारेँ ईसाक तेरहम-चौदहम शतकमे एहि ब्राह्मण धर्म प्रधान प्रदेशकेँ एकटा सर्वथा भिन्न आ प्रतिकुल धर्मक सामना करय पड़लैक। ओ धर्म छल इसलाम जे मुसलमान विजेता सबहक संग एहि प्रदेशमे प्रवेश पओलक। निबन्‍धकार तथा धर्मिक नेता लोकनि बहुत दिन धरि एहि धर्मक प्रभावकेँ रोकबाक प्रयास कयलनि। किन्‍तु समयक प्रवाहक संग-संग इसलाम सेहो हिन्‍दू धर्म आ समाजपर अपन प्रभावक प्रसार करए लागल। मैथिलीमे व्‍यवहृत अनेक फारसी तथा अरबी शब्‍द, मिथिलाक आदालतिमे पारम्‍परिक हिन्‍दू विधिक अनुसार न्‍यायिक क्रिया-कलापक सम्‍पादन, तजिया, दाहा आदि मुसलमानी पर्व-त्‍योहारक प्रति हिन्‍दूक सम्‍मान तथा छठि, घड़ी आदि हिन्‍दू पर्व आ धार्मिक अनुष्‍ठानमे मुसलमान सबहक आस्‍था, अकबर द्वारा चलाओल गेल फसलीसालक राष्‍ट्रीय संवतक रूपमे मिथिलामे प्रचलन, अनेक मुसलमान सन्‍त द्वारा अपन राग तरंगिणीमे इमाम तथा फिरदासी नामक मुसलमानी रागक समावेश आदि कतिपय तत्‍व हिन्‍दू आ मुसलमान जन समुदायमे सांस्‍कृतिक तत्‍वक आदान-प्रदान तथा सम्‍मिश्रणक सूचक थिक।
ओइनवार काल तुर्क आक्रमणक युग छल। जखन मुसलमानी आक्रमणक पहिल बाढ़ि बिहार धरि पहुँचि गेल छल, मुदा तखनहुँ मिथिला ओहिसँ बचल रहल आ मैथिल राज सभामे संस्‍कृत काव्‍य साहित्‍य आदर पबैत रहल। यद्यपि उक्‍त युग-पूर्ववर्ती युग जकाँ प्रकाण्‍ड विद्वान सभकेँ जन्‍म नहि दय पओलक। एहि राजवंशक शासनकालमे जगधर, विद्यापति, शंकर मिश्र तथा वाचस्‍पति मिश्र ई चारिटा मिथिला विभूति भेलाह।
विद्यापतिक समयमे इसलाम एवं हिन्‍दू धर्मक बीच सेहो एक प्रकारक आदान-प्रदान प्रारम्‍भ भय चुकल छल। उत्तर बिहार ओहि समयमे सूफी लोकनिक एक प्रधान केन्‍द्र बनि चुकल छल। महाराज शिवसिंह मुसलमान सन्‍त एवं फकीरकेँ जे दान देने छलाह ओकर प्रमाण सेहो प्राप्‍त भेल अछि। ज्‍योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्‍नाकर’मे जे विदेशी अरबी-फारसी- शब्‍द भेटैत अछि जाहिसँ ई स्‍पष्‍ट होइत अछि जे राजनीतिक आधिपत्‍यक बहुत पूर्बहि मिथिलामे अरबी-फारसी भाषासँ सम्‍पर्क भय गेल छल। सूफी सन्‍त एवं फकीरक माध्‍यमसँ एहि प्रकारक सम्‍पर्क सम्‍भव भेल होयत। तिब्‍वती यात्री धर्म स्‍वामी जखन १२३६ ई.मे हिरहुतक राजा रामसिंह देवक ओतय आयल छलाह ओही समयमे एहि क्षेत्रमे मुसलमानक प्रकोप बढ़ि रहल छल। दुनू धर्मक समन्‍वय एवं समागमसँ नवीन दृष्‍ट्रिकोणक बीजारोपण भय रहल छल एवं विद्यापति युग धरि अबैत-अबैत एकर आओरो विकास भेल।
उन्नैसम शताब्‍दीक मध्‍यमे अबैत-अबैत मिथिलाक सामाजिक जीवनमे परिवर्तनक प्रक्रिया प्रारम्‍भ भेल। अंगेज लोकनिक राज्‍य तावतधरि नीक जकाँ प्रतिष्‍ठित भय गेल छल। एहि क्रममे ओलोकनि अपन धार्मिक तथा सांस्‍कृतिक प्रचार जोर-शोरसँ प्रारम्‍भ कयल। अपन धर्मग्रन्‍थक भारतक विभिन्न भाषामे अनुवाद कराय जनतामे प्रचार प्रारम्‍भ कयल। भारतक अनेक भागमे लोक सभ इसाई बनय लागल। एकरे प्रतिक्रियाक रूपमे प्राय:एतय ब्रह्म समाज एवं आर्य समाजक आन्‍दोलन आरम्‍भ भेल। राजा राममोहन राय, स्‍वामी विवेकानन्‍द ओ स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती आदि धर्मिक एवं सामाजिक नेता लोकनिक आन्‍दोलनक फलस्‍वरूप जन साधारणमे एक नवीन चेतनाक संचार भेल। फलत: पाश्‍चात्‍य साहित्‍यसँ प्रेरित भय अपन क्षेत्रिय आन्‍दोलनसँ उद्वोधित भय एहिठामक लोक अपन-अपन मातृभाषा साहित्‍यकेँ नवीन भाव-शिल्‍पसँ सम्‍न्‍वित करबाक हेतु अग्रसर भेल।१८५४ ई.मे चार्ल्‍स उड जाहि प्रणालीक शिक्षाक आधारशिला राखल ताहिमे मातृभाषाकेँ शिक्षाक माध्‍यमक रूपमे स्‍वीकार कयल गेलैक।
अंग्रेजी प्रशासनक समय मैथिली साहित्‍यक साधक लोकनि पुन: अपन प्रशस्‍त मार्गपर अग्रसित भेलाह जे स्‍वतंत्रता संग्रामक पृष्‍ठ भूमिमे पुन: नव चेतना ओ नव स्‍फूर्ति बीजरूपमे मैथिली भाषा ओ साहित्‍यक बहुमुखी उत्‍थानक प्रेरक होइत आबि रहल अछि। विद्यापतिक पश्चात् गोविन्‍ददास, मनबोध, हर्षनाथ, चन्‍दा झा आदि कविगण भेलाह। अत: मिथिला अपन वैभवपूर्ण साहित्‍यिक परम्‍पराक कारणेँ भारतवर्षमे अद्वितीय स्‍थान रखने अछि।
(१) बी.सी. ला ग्रन्‍थ भाग-१ १२८-१३९ तृ. सरकार, क्रीएटिव इण्‍डिया पृ. ४
(२) वृह. उप. ६, २-१-७ ऐ. पृ- ८५-८८
(३) मुखर्जी, मेल एण्‍ड थाट इन एनशिएन्‍ट इण्‍डिया- पृ- ५५
(४) दु. झा अभिनन्‍दन ग्रन्‍थ, पृ- २१६, महा. वनपर्व- ११०
(५) विद्यापति लिखनावली
(६) पंजी प्रबन्‍ध- श्‍लोक- १-२, मि. त.- पृ- १३६
(७) ज. ए. सी. ब. १९१५/ न. स./ पृ- ४३२
(८) ज. वि. ओ. रि. सो.- १३/ सर्च फॉर संस्‍कृत एण्‍ड प्राकृत मैन्‍यूस्‍क्रिप्‍ट्स इन ऐण्‍ड ओड़ीया/ ३-४
(९) वाचस्‍पति मिश्र- विवाद चिन्‍तामणि/ डॉ. गंगानाथ झाक अनुवाद/ भूमिका-९-२४
(१०) ज्‍योतिरीश्वर, वर्णरत्‍नाकर, सम्‍पादक डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी एवं बबुआ जी मिश्र, एसिएटिक सोसायटी आॅफ बंगाल, कलकत्ता, प्रथम संस्‍करण, १९४०
(११) रोयरिक द्वारा सम्‍पादित, वायोग्राफी ऑफ धर्मस्‍वामी, १९५९
अध्‍यक्ष-
मैथिली विभाग
हरि प्रसाद साह महाविद्यालय, निर्मली (सुपौल)
राजदेव मण्‍डल ‘रमण’-

Suggested citation: डॉ. श्रीमोहन झा. “मिथिलाक इतिहास.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 175, 2015-04-01. https://www.videha.co.in/research/2015/175/मिथिलाक-इतिहास.htm

मूल विदेह अंक / Original issue