समकालीन चेतनाक सम्वाहक :: अर्द्धांगिनी
पंकज कुमार प्रभाकर
शोध छात्र, ललित नारायण मिथिला विश्व-विद्यालय, कामेश्वरनगर- दरभंगा।
जीवनमे होइत नित्य नूतन परिवर्त्तनक खण्ड चित्रकेँ यथावत् प्रस्तुत करब श्री जगदीश प्रसाद मण्डलक अपन एक फराक शैली छन्हि। मण्डलजी वहुआयामी रचनाकार छथि। गद्य हो आकि पद्य विभिन्न विधामे जगदीश प्रसाद मण्डलजी अपन स्थान सुरक्षित कऽ लेने छथि। विभिन्न विद्वानक मत सेहो ऐ सन्दर्भमे आएल अछि। अर्द्धांगिनी कथा संग्रहक आमुखकार डॉ. योगानन्द झा लिखलनि अछि- “युगीन समस्या ओ समस्याक कारण एवं तेकर समाधानक प्रति चिन्तनशीलता हिनक वस्तु-विन्यासकेँ प्रेरक-प्रभावकारी बनौने रहलनि अछि जइमे परम्परित कथाधाराक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी दृष्टिकोण स्पष्ट रूपेँ प्रस्फुटित देखि पड़ैछ। मिथिलाक लोकजीवनक उत्थानक प्रति सम्वेदनात्मक अभिव्यक्ति कौशलक कारणे मण्डलजीक कथा सभ हिनका आधुनिक कथाकार लोकनिक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ कऽ देलकनि अछि।”
मण्डलजीक कथा सभ मिथिलाक माटि-पानिक कथा छी। हिनक कथा सभमे मिथिलाक ग्राम्य जीवनक आशा-निराशा, सुख-दु:ख, हर्ष-उल्लास आ जीवन-संघर्षक व्याख्या भेटैत अछि। मिथिलाक सामाजिक-आर्थिक ओ राजनीतिक जीवनमे होइत परिवर्त्तन सभकेँ सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण द्वारा ई अपन कथा सभकेँ प्रवाहमयता, रोचकता ओ विश्वसनीयताक संग प्रस्तुत करबामे सिद्धहस्त कलाकारक रूपमे प्रतिष्ठित छथि।
दर्जन भरि उपन्यास, दर्जनसँ बेसी कथा संग्रह, करीब दर्जन भरि नाटको तथा पद्यक (गीत, काव्य) पोथी सेहो आधा दर्जनसँ ऊपर प्रकाशमे आबि चुकल अछि, संगे-संग आलोचनात्मक आलेख सेहो पत्रिकादिमे पढ़बाक अवसरि भेटल अछि यथा- अवतारवाद, सगर राति दीप जरय :: एकटा यात्रा, मिथिलाक लोक बेवहार गीत एवं संस्कार गीत, उपन्यासमे ग्रामीण चित्रण, कामरूप आ मिथिला इत्यादि। तइ संग कएक गोट साक्षात्कार सेहो हिनकर आएल अछि।
ओना तँ हिनक विभिन्न कथा संग्रह अछि जेना, गामक जिनगी, सतभैंया पोखरि, उलबा चाउर, भकमोड़, पतझार, अप्पन-बीरान, बाल गोपाल, रटनी खढ़, लजबिजी, गामक शकल-सूरत, बजन्ता-बुझन्ता, तरेगन, शंभुदास तथा अर्द्धा्ंगिनी। मुदा अखन हम अर्द्धांगिनी कथा संग्रहमे संग्रहित कथा सबहक अध्ययन कऽ समकालीन बोधकेँ ऐ आलेखमे निरूपण करब।
‘अर्द्धांगिनी’ कथा संग्रहमे बीस गोट कथाक समावेश कएल गेल अछि। जइमे संग्रहक पहिल कथाक नाओं- ‘दोहरी मारि’ छी। दोहरी मारि कथा केर पुरुख पात्र गुलाब छथि। गुलाबक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भेल अछि। अवकाश प्राप्त प्रोफेसर गुलाब केतेको वर्षसँ डाइबीटीज ओ ब्लड-प्रेसर सदृश बिमारी सभसँ ग्रस्त छथि। गामक घर-घराड़ी पर्यन्त बेचि शहरमे बनौल मकानमे पति-पत्नी एकाकी रहै छथि। बेटा-पुतोहु परदेशमे रहै छन्हि तँए हिनकालोकनिक सुधि लेनिहार कियो नै छन्हि। हद तँ तखनि भऽ जाइत अछि जखनि पुत्र द्वारा ई समाद भेटै छन्हि जे पौत्रक मूड़न घरपर नै भऽ कऽ वैष्णो देवीमे हेतनि, जइ लेल हुनकोलोकनिकेँ ओहीठाम एबाक आमंत्रण भेटै छन्हि आ ओ अपनाकेँ अशक्य बूझै छथि।
दोसर कथा- ‘केना जीब’ सेहो अवकाशप्राप्त प्रोफेसरेक कथा अछि। प्रोफेसर साहैब बेटाकेँ पढ़ा-लिखा कऽ विदेश पठयबामे सफल तँ होइ छथि मुदा बेटा विदेशी सभ्यता ओ संस्कृतिक रंगमे रमि जाइ छन्हि आ हिनकालोकनिक खोजो-पुछारि नै कऽ पबै छन्हि। परिणामत: दुनू परानी एकाकी जीवन बितेबाक हेतु बाध्य होइ छथि।
तेसर कथाक नाओं- ‘नवान’ छी। ऐ कथामे मिथिलाक लोक जीवनक विभिन्न खण्डचित्र उपस्थित कएल गेल अछि यथा वृक्ष-लतादिक पहिल फड़ देवताकेँ चढ़ाएब, गाए बिआएलापर महादेवकेँ दूधसँ अभिषेक करब आदि ऐ कथाक विषय-वस्तु अछि।
चारिम कथा- ‘तिलासंक्रान्तिक लाइ’ पर लिखल गेल अछि। ऐ कथामे गामक जिनगीमे पसरल अन्धविश्वासपर प्रहार कएल गेल अछि।
पाँचम कथा- ‘भाइक सिनेह’ भाए-भैयारीक आपसी कलहपर केन्द्रित एक प्रकारक प्रेमक कथा छी।
छठम कथा- ‘प्रेमी’ वस्तुत: प्रेमकथाक रूपमे लिखल गेल अछि। मुदा ऐ कथामे रचनाकारक उद्देश्य समाजिक जीवनमे व्याप्त दहेज प्रथाक कुरीतिकेँ समाप्त करबाक संदेश अभिव्यक्त भेल अछि।
संग्रहक सातम कथा- ‘बपौती सम्पति’ कृषक जीवनमे जातीय बेवसायक महत्तवक अवधारणापर आधारित अछि। सम्प्रति कृषक-मजदूरक पलायनसँ जे गामक अर्थ-बेवस्था चरमरा गेल अछि तेकरा सुधारबाक हेतु ऐ कथामे चिन्तनक एकटा दिशा भेटैत अछि।
आठम कथा- ‘डंका’ लोकजीवनक अवमूल्यनकेँ रेखांकित करैत अछि।
नवम कथा- ‘संगी’ शिक्षा जगतमे भेल अद्य:पतनक कथा छी जइमे स्कूल-कौलेजमे शिक्षाक बेवसायीकरणक फलस्वरूप सामान्य जनसँ छीनल जाइत शिक्षाक समस्यापर विमर्श भेल अछि।
संग्रहक केन्द्रिय कथा “अर्द्धांगिनी”मे ऐ अवकाशप्राप्त शिक्षकक अत्यन्त सूक्ष्म मनोविश्लेषण भेल अछि। अपन कमाइक बलेँ ओ आजीवन अपन पत्नीकेँ दासीसँ आगू बुझबाक हेतु तैयार नै होइ छथि मुदा जखन नोकरी समाप्त भऽ जाइ छन्हि तखन पत्नीक आवयकतापर धियान जाइ छन्हि आ अर्द्धांगिनीक महत बूझि पबै छथि। लेखक नारीक सेविका स्वरूपकेँ मर्यादित कऽ ओकरा पुरुखक समानान्तर मूल्य प्रदान करैक पक्षपाती छथि, जेकर अभिव्यक्ति ऐ कथाक लक्ष्य रूपमे प्रदर्शित होइत अछि। अतिरिक्त आरो कथा सभ अछि जेना- “ठकहरबा”, “अतहतह”, “ऑपरेशन”, “धर्मनाथ”, “सरोजनी”, “सुभद्रा”, “सोनमाकाका”, “दोती बिआह”, “पड़ाइन” तथा अन्तिम कथा “केतौ नै”।
कथा सबहक विषयमे आमुखकार अपन विचार व्यक्त केने छथि- “मण्डलजी कथाक भाषामे मैथिलीक गमैया बोली-वाणीक सहज स्वरूप अभिव्यक्त भेल अछि। ई पात्रानुरूप भाषाक प्रयोग केलनि अछि जइसँ प्रत्येक पात्रक बौद्धिक ओ सामाजिक स्थिति स्पष्ट होइत चलि जाइत अछि। हिनक कथा सभमे कथाकारक भाषा सेहो मैथिलीक लोकजगतक भाषाहिक अनुगमन करैत अछि जइमे सहजता अछि। कनेको कृत्रिम प्रयोगसँ ई बँचैत रहल छथि। हिनक भाषामे तद्भव ओ देशज शब्दक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। युग्म शब्दक प्रयोग हिनक भाषाकेँ लालित्य प्रदान करबामे आ ओकर प्रवाहमयतामे सहायक रहलनि अछि। उदाहरणक हेतु माल-जाल, लेब-देब, दोकान-दौरी, चट्टी-बट्टी, ताड़ी-दारू, छहर-महर, चोरी-डकैती, बाल-बोध, बेटा-पुतोहु, भोज-काज, अन्हर-बिहाड़ि, दार-मदार, सुक-पाक, भूखल-दुखल, चीज-बौस, घुसका-फुसका आदिकेँ देखल जा सकैछ।
मण्डलजी कथा भाषाक ई अन्यतम विशिष्टता छी जे ई कोनो स्थितिकेँ पाठकक समक्ष अभिव्यक्त करैक हेतु चमत्कारिक उपमानक प्रयोग करै छथि जइसँ वस्तुस्थितिक स्पष्ट चित्र पाठकक सोझाँ आबि जाइत अछि यथा-
“जहिना खढ़ाएल खेतमे हरबाहकेँ हर जोतब भरिगर बूझि पड़ै छै तहिना सुशीलक मन समस्याक वोनाएल रूप देखलक। जहिना पहाड़सँ निकलि अनवरत गतिसँ चलि नदी समुद्रमे जा मिलैए तहिना ने टटघरक ज्ञान उड़ि कऽ सर्वोच्च ज्ञानक समुद्रमे मिलत।” आदि।
एतावता कहल जा सकैछ जे मण्डलजीक कथा वर्णनक दृष्टिएँ मिथिलाक ग्रामजीवनक यथार्थवादी चित्र, घटनाक दृष्टिएँ आदर्शक प्रति अभिभूत, सूक्ष्म मनोविश्लेषणक प्रति प्रतिबद्ध तथा उदेसक दृष्टिएँ लोक मंगलकारी अछि।”
युग्म शब्दक प्रयोग कथाकारक विशेषता होइत अछि संगे समकालीनताक द्योतक सेहो। कारण, भाषाक अनन्तकालिन यात्रामे शब्द अपन रूपमे परिवर्त्तन सेहो करैए। जहू दिसि ऐ संग्रहक कथाकारक कलम चललनि अछि। जइपर दृष्टिपात केला पछाति समकालीन रचनाक हँ-निहँस सेहो सहज भऽ सकैए।
सत्य आकि यर्थाथ एक ओहन शब्दावलीक नाओं छी जेकर परिधिमे सहज स्वरूप, सामाजक खाँटी स्थिति, स्वत: स्फुट पात्रक चरित्र, सहिष्णुता, समकालीनता आदिक समावेश सवत: रहैत अछि। मिथिलामे रहएबला सभ स्तरक समाजक पात्र ऐ संग्रहक विभिन्न कथा सभमे आएल अछि। विभिन्न समस्यासँ ग्रसत मनुख जे जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यक पात्र अछि, हिनका सभ लग एकमात्र अवलम्ब बँचि जाइ छन्हि- जिजीविषा ओ संघर्ष। यएह जिजीविषा ओ संघर्ष करबाक मानसिकता ऐ कथाक युग जीवनक अनुकूल संदेश दैत अछि। जे सद्य: समकालीन अछि।
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विदेह
मैथिली साहित्य आन्दोलन
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