मानव जीवनमे नारी स्वरूपक गरिमा
:: फागु लाल साहु
ई हमर माइयक सानिध्यक बात छी। हे माइ अहाँक सानिध्य पाबि हम जानि सकलौं जे नारी व्रह्मविद्या छी। श्रधा छी। कला, ममता, शान्ति, दया संगे पवित्रता सेहो छी। अहाँ सभटा छी जे संसारमे सर्वश्रेष्ठक दृष्टिगोचर होइत अछि। एतबे नै नारी कामधेनु अनुर्पर्णा सिद्धी-रिद्धी सेहो छी। नारी मानव प्राणीक समस्त अभाव कष्ट आ संकटसँ बाहर रखैक समयानुसार अपन स्वरूप बदलि-बदलि कऽ निष्ठापूर्वक सामर्थ्यवाण होइत अछि। जौं हुनक श्रद्धा-शक्ति आ क्षमताकेँ चिन्हल जाए, मानल जाए तँ समस्त विश्व भरिक कण-कणमे स्वर्गीय स्वरूप बहाल कऽ सकैत छथि।
माए अहाँक सिनेह पाबि कऽ हमरा ई बोध भेल जे नारी सनातन शक्ति छी। आदिकालसँ समाजिक दायित्वकेँ अपन कान्हपर उठौने आबि रहली अछि। जौं ई भार पुरुखक कन्हापर दऽ देल रहैत तँ कहिया ने डगमगा गेल रहैत। किन्तु विशाल भवनक नीब जकाँ ओतबे कर्तव्यनिष्ठ मनोयोग, संतोष, संगमकेँ प्रसन्नतापूर्वक अखनो घर चलबैत चलि आबि रहली अछि। ई तँ मानवीय मूलक साकार प्रतिमा छी।
हे जगत जननी अहाँक कृपासँ हम निम्न ऋृषि वाणीकेँ अन्त:करणमे बसौने रहै छी। कहल गेल अछि-
विद्या समस्तातव देवी भेदा:।
स्त्रिया: समस्ता सकला जगत्स।।
त्वयैकया पूरितमम्बएतत् काते।
स्तुति: स्तब्यपरा परोक्त्िा।।
हे देवी समस्त संसारक सभ विद्या अहींसँ निकलल अछि। सभ स्त्री अहींक स्वरूप छी। समस्त विश्व एक अहींसँ पुरित अछि। अहाँक स्तुती कोन रूपे कएल जाए, अन्त:करणमे ऐ भावक घनीभूत अनुभूतिसँ प्रेरित भऽ हम सभ अहाँक सन्तान...।
नास्ति मातृसमा छाया
नास्ति मातृसमा गति:।
नास्ति मातृसमा त्राणं:
नास्ति मातृसमा प्रिया।
माएक समान कोनो छाया नै अछि। माएक समान कोनो सहारा नै अछि। माएक सदृश कोनो रक्षक नै अछि। माएक सदृश कोनो प्रिय वस्तु नस्तु सहारा नै अछि। माएक समान 000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000000ै अछि।
सृष्टिक रचना आ ओकर पालन सेहो अहाँक कार्य रहल अछि। सन्तानो निर्माणमे माएक जे भूमिका रहैत रहल से पितासँ हजारो गुणा अधिक होइत देखल जाइत अछि।
देवी अशिज पुत्र कादिवानकेँ अपना संरक्षण सान्धियमे रखि कऽ शिक्षा देलखिन। हुनका विद्वान बनेबाक अतिरिक्तो योग्य विद्यामे प्रकाण्ड विद्वता सेहो हाँसिल भेल। मर्मज्ञ ऋृषि पंचशिख विषयपर अनेको गंथ लिखलनि तइमे स्वयं स्वीकार केने छथि जे ई ज्ञान माइ सुलभासँ भेटल अछि।
वनवासी शकुन्तला अपन पुत्र भरत जिनका नाओंपर ऐ देशक नाअों भारतवर्ष पड़ल अछि। हुनक पालन-पाेषण संगे प्रक्रमी बनेबाक श्रेय माएक अविरल अछि। भरत माइक सिनेह पाबि बचपनेसँ शेरक बच्चाक संग खेलैमे मस्त रहल।
निष्ठा आ लगनक प्रतिक ध्रुवक पालन-पोषण हुनक माइ सुनीति तपश्वनी वनमे रहि कऽ केने छेली। अपन शिक्षण द्वारा संस्कारित कऽ बचपनेमे जीवनक रहस्यक बोध करा देलखिहिन। तइसँ ध्रुव प्रमात्माक अनुभूितकेँ साक्षात् दिग्दर्शन प्राप्त कऽ लेला।
सत्यनिष्ठ सीता वनवासिनी अपन जीवनोपरान्त सातित्वक व्रर्त धारण करैत पतिव्रताक निर्वाहण करैत अभावग्रस्त स्थितिमे रहितो लव-कुशक पालन-पोषण वालमिकी आश्रम रहि केलनि आ लव-कुशकेँ एहेन योग्य सामर्थ पुरुषार्थ बनौलनि जे अजय हनुमान, तथा लक्ष्मण जैसन वीर महापुरुषकेँ लव-कुशक सोझहामे पराजित हुअ पड़लनि।
ज्ञान विज्ञान आ आध्यात्मिक प्रतिभावक क्षेत्रमे देखल गेल कि ढेर रास उदाहरणक पात्र सोझामे आबि जाइए। जेना महर्षि पुलोत्माक पुत्री शची, महर्षि वशिष्ठक आश्रममे रहि कऽ ज्ञान-विज्ञानक प्रवीणता हाँसिल केने छेली। शचीकेँ साधनाक प्रतिभासँ प्रभावित भऽ कऽ देवराज इन्द्र हुनका मंगबैले पुलोत्माक दुआरपर स्वयं पहुँचला। तथा शची इन्द्रानी भऽ इन्द्रपुरीक मर्यादाकेँ बढ़ौलखिन।
मनु एकबेर बजपेय यज्ञ केला। तँ कोनो योग्य पुरोहित नै मिल सकलनि। तखनि मनु अपन पुत्री इलाकेँ योग्य समझि यज्ञाचार्य नियुक्त केलनि आ अनुष्ठान सम्पन्न करौल गेल। इला अपन पिताक मर्यादाकेँ आगू बढ़ौलनि।
आदि शंकराचार्य आ मण्डन मिश्रक शास्त्रार्थमे धर्मपत्नी भारती अपन विद्वतासँ प्रभावित करि कऽ सरस्वतीक उपमा प्राप्त कऽ चुकल छथि। तथा पति मण्डन मिश्रक विजयी हेबाक गौरव प्राप्त करा चुकल छथि।
भारतक प्रसिद्ध जोतिष विद्वन भास्कराचार्य दुआरा रचित सिद्धान्त सिरोमणि पुस्तकेँ उत्तार्ध हुनक लड़की लिला दुआरा लिखल गेल छल। लिला अपन पिताक मर्यादाकेँ बढ़बैमे सदिखन तत्पर रहैत छेली।
महराजा जनकक दरबारमे महाविदुषी गांग्रीकेँ आ महर्षि याज्ञवल्यकायक शास्त्रार्थ प्रसिद्ध अछि। ओही शास्तार्थमे याज्ञवक्कयकेँ गार्गीक पण्डित आ वैदुष्यकेँ लोहा मानए पड़ल अछि। एहेन बहुतो समतुल्य नारी छथि जेना उदलिंका, विध्यगाथा, अनुसुइया, गौतमीयमी, विहुला आदि अनेक विदुषीगण प्रख्यात अछि।
ज्ञान, विज्ञानक क्षेत्रमे विश्वक अतिरिक्त शौर्य, साहस एवं पराक्रमीमे भारतीय नारीकेँ बढ़ल-चढ़ल देखल गेल अछि। अत: अवला कहबामे हास्यपद बुझना जा रहल अछि। उदाहरण स्वरूप तँ अनेको अछि जेना शिवक धनुषक शर्त राजा जनककेँ सीता स्वयंवरमे राखए पड़ि गेल जे ऐ धनुषक तोड़िनिहारेसँ सीताक बिआह करब। ई तँ सीताक पराक्रमक झलक छल।
दशरथक युद्धमे केकयी सार्थिक भार निर्वाह करैत अपना पतिकेँ संकटसँ प्राण बँचौने छेली।
कृष्णार्जुन युद्धमे अर्जुनक संग रथ संचालन द्रोपदी बड़ी कुशलताक संग निर्वाह केने छेलखिन।
अर्थशास्त्रमे सेहो धनुषधारी महिलाक उल्लेख आबि रहल अछि। संगे ईहो वर्णन आबि रहल अछि जे बेटी-बेटीकेँ समान शिक्षा देल जाइत छल। ई जागरूकता आब समाजमे आबि रहल अछि।
धर्म और समाज संस्कृतिक सेवामे नारी जाति बढ़ि-चढ़ि कऽ बलिदान प्रस्तुतक उदाहरण अछि।
आचार्य वृहस्पतिक पुत्री देवीहूति और भावभव्यक कन्या रोमशा अपन पिता तथा पतिसँ आज्ञा प्राप्त कऽ विभिन्न क्षेत्रमे धर्म प्रचार केने छेली। तथा समाज कल्याणक कार्यमे दक्षता प्राप्त केने छेली।
अभ्रण ऋृषिक कन्या एकटा गुरुकुल खोलि छात्र-छात्राक समान रूपे प्रवेशक अधिकार दऽ शिक्षा दान करबाक बेवस्था केने छेली। आइक जुगमे नारी रूपमे मदर टेरेसा भारतीय नारीकेँ गौरवान्ति सेहो केली अछि।
नेतृत्वक क्षेत्रमे सेहो महिलाक भूमिका अग्रसर रहल अछि। इन्द्रकेँ दिशा निर्देश इन्द्रानीसँ प्राप्त होइत रहल छल।
धृतराष्ट तँ राज्य संचालनमे अस्मर्थ छला। अही कार्मकेँ हुनक पत्नी गंधारी कऽ रहल छेली। ऐतिहासिक तथ्यकेँ देखलासँ स्पष्ट होइत अछि जे आइ धरि राजश्री रानी पद्मावती, लक्ष्मी वाइ, अहेल्या, सरोजनी नाइडू तथा कस्तुरवा गाँधी जकाँ अनगिनित उदाहरण अछि।
बात प्रतिभा प्रमाणित करबाक तथा स्वयं विकसित हेबाक तक सीमित नै अछि। प्रतिभासँ कहीं अधिक हुनक तियागक अछि जे असीमित अछि। जेतए स्वयं पर्दामे रहि कऽ अपन पतिक समाज निर्माण आ आत्म निर्णाणमे सहायता प्रदान करैत रहल अछि।
एतेबे नै, धर्मपत्नीक रूपमे योगदान प्रस्तुत करबामे सेहो मर्यादाक निर्वाह करैत रहल अछि। जेना महान विदुषी विधोतमाक बिआह अशिक्षित काली दाससँ भेल। विधोतमा एतेक विद्वान छेली जे बिआहक लेल शास्त्रार्थमे शर्त राखल गेल। अनेको विद्वान ओइठामसँ हारि मानैत आपस भऽ गेल। अन्तमे, क्षलसँ मूढ़ काली दासक संग हुनक बिआह करौल गेल। विधोतमाकेँ जब ऐ बातक पता चललनि तँ पति काली दासकेँ उत्तेजित करि कऽ ज्ञानक प्रति लगन पैदा केलनि आ हुनका अध्ययनक रूचि जगेलनि। फलस्वरूप मूढ़ मति काली दास अखनि महा कवि कालीदासक रूपमे विख्यात छथि।
ऐ तरहेँ तुलसी दासक पत्नी रत्नावली अपन सुख-सुविधाकेँ तिलांजलि दैत अपन पतिकेँ कामुक्तासँ इश्वरभक्तिक ओर मोड़ैत रामभक्त महा लेखक बनौलखिन। ई सत् साहस रत्नावलीकेँ छल जे छुद्र मानवसँ तुलसी दास जकाँ संत आ रामचरित मानस महा ग्रंथक रचियेता बनौलनि। स्वयं रत्नावली उच्च कोटिक साहित्यकार सेहो छेली।
मैत्रेयी महर्षि जाज्ञवल्कयक पत्नी छेली। ओ कोनो संसारिक सुखक वास्ते बिआह नै केने छेली। आपितु विशुद्ध आत्माक साधाना लेल हुनक सहधर्मीनी बनली। संसारिक सुखक इच्छाक विषयमे पुछलापर ओ साफ इन्कार कऽ गेली।
ऐ तरहेँ राजकुमारी सुकन्या आन्हर वृद्ध चमन महर्षि केवल ऐ खातिर बिआह केलखिन जे हुनक तपस्या आ शोधकार्य हेतु आवश्यक साधन जुटबैमे सहायता प्रदान कऽ सकनि।
राजा अश्वपतिक पुत्री विदुषी, अतिरूपनी राजकुमारी सावित्री एक वनबासी आ निर्धन सत्यवानसँ मात्र ऐ उदेशसँ बिआह केलनि जे हुनक बनौषधि शोधमे सहायक भऽ कऽ मानव मंगल हेतु महतपूर्ण योगदान करि सकनि।
ऐ तरहेँ असंख्य प्रमाण अछि जइसँ सिद्ध होइए जे प्राचिने कालसँ आदर्शवादी नारीमे अपन प्रतिभा, क्षमता आ योग्यताक लाभ समाजकेँ देबामे अपन योगदान दैत मानव विकासमे मुख्य भूमिका निभाबैत रहल अछि। जरूरतो तँ बुझाइते अछि।
नारी नर केर शक्ती अछि
सृष्टि केर अभिव्यक्ति
नारी बिना शिव सदृश
कण-कणक शक्ति केर भक्ति।
हमर समाजिक जीवन दाम्पति जीवनसँ आरम्भ होइत अछि। पति-पतिक बीच जेतेक प्रेम, सौजन्य, आत्म भाव, आत्म समर्पण आकि बफादारीक भाव रहत ओतबे मानवीय वा गृहस्ती जीवनमे आनन्दक प्राप्ति हएत। ओतबे अनुपातमे श्री समृद्ध एवं सुख-शान्ति भेटत। माएक स्वरूप धानण करैत गंगा सदृश भऽ जाइत अछि।
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