विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर

आशीष चमन · 2015-11-01 · अंक 189

अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर
-आशीष चमन
यदि अपन प्रथम काव्य संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि प्रकाशन वर्ष - 1993 के बाद श्री अरविन्द ठाकुर एतेक बरख धरि चुप रहलाह त हुनका प्रति हमर धरणा यैह बनैत छल जे ओ बहुत दिन घरि मोह भंगक स्थिति मे रहल होयताह मैथिली साहित्यक प्रति, जे जेबीक पाइ अकारथ गेल...। मुदा परमात्माक लीला देखल जाउ, ओ पुनः अवतरित भेलाह खूब चमकैत दमकैत संग्रह ‘अन्हारक विरोध् मे’ ल क...। हम स्पष्टीकरण दऽ दी जे हमर धरणा भौतिक उपलब्धिकेँ शून्यता पर छल मुदा जखनि आदरणीय भाइ श्री अजित कुमार आजादक ओहि लिपिबद्ध टिप्पणी पर नजरि गेल जाहि मे ओ लिखित गारन्टी सन देने छथि जे एक बेरि अहाँ मात्र एकटा कथा पढि़ क त देखू, अहाँक पाछाँ पोथी आ पोथीक पाछाँ अहाँ फेभीकोल जेकाँ खरकटि जाएब त सहज उत्सुकता जागि गेल...। जागि गेल ओहि व्यक्तिक प्रति जे सदति हमर नजरि के सोझाँ रहल छथि। जे किसान, दोकानदार आ परिवारिक कर्ता पुरूष रूपें अपन जय-पराजय दुनु के देखैत भोगैत रहल छथि आ चाबस्सी त देखियौक ओहि मर्दे के जे अपन समस्त कार्य व्यापार ओ व्यवहार केँ कोठीक ताक पर राखि अपना केँ खेतिहर कहबाक सामर्थ रखैत छथि जाहि में केवल पराजयक पीड़ा, जीवनक वर्तमान ओ भविष्य अन्ध्कारमय रहैत छैक...।
हम बिना आओर बेशी भूमिकाक कहि सकैत छी जे अजित आजाद गँहिकी नजरिबला छथि तेँ ओ एहि कथा संग्रहक एहन तीव्र प्रशंसा कयलनि अछि।
एहि संग्रहक पहिल कथा अछि ‘खिस्सा सियार यार।
ई कथा, बिहार मे आइ सँ किछु दिन पूर्व धरि जे लालटेन युग छलैक ओहि स्थितिक अयबाक पूर्व सँध्या केँ इंगित क रहल अछि...। व्यंग्यात्मक शैली में लिखल ई कथा मूलतः हमर लोकतांत्रिक परम्परा केँ मरणासन्न अवस्था मे दर्शाबैत अछि, जाहि मे नेतृत्वशून्यताक स्थिति छैक..., सत्ता, संगठन मे गुटबाजी छैक, भ्रष्टाचार केँ आम सहमति भेटल छैक..., पुरान नीति सिद्धान्त केँ माननिहार आइ परिदृश्य मे नहि छथि त सिद्धान्तहीन व्यक्ति सेहो कारूणिक स्थिति में रहि रहि क अबैत अछि...। एहि दुनू प्रकारक व्यक्तिक चरित्र चित्रण करबा मे रचनाकार तखनि सफल भेलाह जखनि नबका छओड़ा रामसोगारथ मंडल केँ कहैत अछि जे ‘नबका जमानाक नारा लगाबू...।’ माने सत्ता प्रतिष्ठानक अध्ष्ठिाताक जयकार करू त बूढ़ असोथकित मंडलजी उपेक्षा सँ प्रतिकार करैत छथि।
आइ लुच्चा लफाँडि़ अपराधी तत्व सभ निर्णायक आ नियन्ता बनल अछि आ सुच्चा जनसेवक सभ करोट लागल छथि...। एहि कथाक मूल तत्व यैह अछि, कथावस्तु प्रायः नवीन नहि अछि..., ई समस्या समान्यतः सभ केओ अवधारि नेने छथि तथापि प्रायः एक्कहि साँस में ई कथा लिखल गेल अछि एकदम निस्पृह ओ असम्पृक्त भ’ क’ तेँ कथा बहु रूचिगर। कथाकार अपन क्षमता आ अनुभव संग न्याय क लेलनि अछि।
‘‘पिआसल पानि’’ कथाकारक ओ रचना अछि जाहि मे हम अपन परिवेश, जाहि में रचल-बसल छी तकरा प्रति एकटा हीनता बोध होअए लगैत अछि...। एहि कथा मे कुल जमा तीन गोट पात्र छैक, प्रधानतः जाहि मे ‘‘नारायणपुरवाली’ ’ केन्द्रीय अछि...।
कथा मुख्यतः नारायणपुरवालीक चारूकात घुमैत अछि आ अपना सभक सामाजिक पाखण्ड पर सेहो फोकश दैत अछि...। हमर समाज स्त्रीक मामिला में बड्ड कोनादन रहलैक अछि, एकसरि पयला पर चीड़-फाडि़ क काँचे खा जयबा लेल उताहुल...। एहिठाम स्त्रीक दुइये गति होइत अछि, ओकरा संग बलात्कार करू जेना किछु मास पूर्वहि आ एखनि किछु दिन पहिने एक गोट स्त्री ससुर पर्यन्त सँ बलत्कृत भेलैक अछि, आ नहि त ओकरा विभिन्न कारण सँ व्याभिचारिणी घोषित क दिऔक...।
नारायणपुरवाली बलत्कृत त नहि भेलि मुदा ओ हत्भागिनी छलि जे ओकर स्वामी ओकरा भरि पेट अन्न नहि द सकल त ओ गिरहथ ओतऽ कमाब जा लागलि ओ संगहि अपन पति सँ दैहिक सुखो सँ वंचित छलि। विडम्बना त देखू जे प्रारम्भिक अवस्था में नारायणपुरवालीक प्रति एकटा वितृष्णाक भाव जगैत छनि गिरहथ राजा बाबू केँ, जे ई स्त्री की थिक त चरित्राहीना..., पाठकगणपर्यन्त नहि बूझि पबैत छथि आ अन्त में ओ स्त्री निराश भ पड़ा जाइत अछि, त ओकर स्वामी लखना दोसर बिआह करैत अछि।
ओकर दोसरकी स्त्री केँ बच्चा होनहारी छैक ई सूनि लखना अपन कप्पाड़ पफोडि़ लैत अछि जे ई हमर जनमल नहि अछि। आ प्रथमतः पर्दापफाश होइत अछि जे लखना नपुंसक अछि त अचानक नारायणपुरवालीक प्रति सभक करूणा जागि जाइत छैक जे ओ बेकसूर छलि...। ओकरा प्रति समाजक ई बदलल धरणा रामचरण केँ प्रवक्ता बना स्थापित कयल गेल छैक...।
एहिठाम कतेको प्रश्न उठैत अछि जे हमर सामाजिक मान्यता सेँ ढ़ाही लैत अछि जे एहि स्थितिक जिम्मेदार के ? स्वभाविक रूप सेँ पुरूष प्रधन ई समाज। जे पुरूष अपन पत्नी केँ कमा क खुआ नहि सकैत अछि, ओकर दैहिक आवश्यकता केँ पूरा नहि क सकैत अछि, तकर पत्नी केँ चरित्राहीन घोषित करू आ पुनः ओहि व्यक्ति केँ पाग, दोपटा, मौर पहिरा दोसर स्त्रीक वध करू वा कराबू...।
मुदा हमरा नारायणपुरवाली कायर लगैत अछि..., ओ कियैक पड़ाइलि ? गिरहथ नहि त, आन दोसरे केकरो पकडि़त भागैत नहि, वरन् ओहिठाम स्थापित भ रहैत आ साँयक कमजोरी क ओकर पाखण्ड क जगजियार करैत जे लखनाक दोसर बहु क सकबा में सफल भेलि...। त ई कथा नीक सुतरलनि अछि रचनाकार केँ आ सत्तहि अन्हारक विरोध मे ठाढ़ छथि ओ पेट्रोमैक्स ल ‘क’....।
कथा पाठ केरि क्रम मे जखनि हम कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ क देखैत छी त हमरा स्वाभाविक रूपे ई भान होइत अछि जे कथा कखनहु काल क बनाओल सेहो जा सकैत अछि...। कथाक केन्द्रीय पात्रा सूत्रधारक रूप में स्वयम् रचनाकार छथि...। ओ जे घटनाक भूगोल केँ दर्शोलनि अछि ताहि सँ ज्ञात होइछ जे ओ कुजड़टोलीक कातहि मे बसल छथि, संगहि इहो ओ देखबैत छथि जे ओहि समाजक जनानी सभ भरि दिनुक मामिला क नून तेल सानि क देर राति मे घुरैत अपन-अपन साँय क सुनबैत अछि...। तकर बाद कचका ताड़ी पीने कुजड़ा सभ अपना मे गारि-गंजन, मारि-पीट करैत रहैत अछि आ रातिक नीरवता भंग होइत रहैत अछि प्रायः।
मुदा हमरा जनैत कथा लिखबाक हड़बड़ी में रचनाकार कतहु-कतहु चुकि गेलाह अछि कियैक त ओ कहैत छथि ‘सभ राति स्त्री पुरूष सभ मारि-पीट करैत झौहरि करैत रहैत अछि आ तकरा ओ सामान्य रोजनमचा सन मानने छथि, माने अपन स्वीकृति द देने छथि मुदा ओहि राति ओ कियैक बहरेलथि ? जखनि की ओ हंगामा सभ केँ सामान्य सन मानैत छथि...। पुरूषवर्ग लड़ैत छैक अपना मे त जनानी सभ ओहिना चिकरैत छैक- ‘हौ बचाब..., मारि देलकैक..., लूटि लेलकै...।’ ई कथाक मादे सामान्य सन गप्प भेल मुदा एकर दोसरो पक्ष अछि जे एकर उपादेयता केँ रखैत अछि। लेखक एहि कथाक माध्यमे सामाजिक भाइचारा जाहि मे सभ एक दोसराक भाइ बहिन, माम, पित्ती अछि, धर्मिक, आर्थिक देवाल केँ तोडि़ क , तकरा दर्शोलनि अछि आ ताहि मे कमोबेश सफल रहलाह अछि...। ई कथा प्रायः हुनक उन्मेषकाल केँ दर्शाबैत अछि...।
अध्ययन यात्राक क्रम मे हमरा जाहि चीज सभ स बेसी अखरल ओ अछि तारतम्यताक अभाव... एहि संग्रह मे ‘‘मूस’’ पहिने आयल अछि ‘‘अय्यासी’’ बाद मे....।
हमरा विचार सँ ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स पहिने राखल जयतैक त दुनू कथा अपन अनिवार्यता केँ आओर बेसी सुसंगत बना सकैत छल...। कथा आब उद्देश्यपरक ओ उपदेशपरक भ गेल अछि तेँ...। चूँकि हमर अप्पन मान्यता अछि त हम ‘‘अय्यासी’’ के ‘‘मूस’’ स आ ‘‘मूस’’ के ‘‘अय्यासी’’ संग गेठजोड़बा क रहल छी...। अय्यासीक प्रधानपात्र अपन घरक कर्ता-धर्ता छथि, पत्नी छनि, पुत्र छनि, स्वयं अपने छथि, घरक खर्च छनि..., पत्नी केँ आवश्यकता छनि गैस चुल्हा के, पुत्र के चाही काँपी, पढ़ब लेल, अपनो मनोरथ छनि, मैगजीन पढ़ताह, दोस्तक संग सिकरेट पीताह..., घर मे तीमन तरकारीक खगता छनि ताहि पर ओ तेना ने लहोछि के बजताह जे श्रीमतीजी अपरतीव भ जाइत छनि, बच्चा सेहो आतंकित छनि हुनक मुख मुद्रा सँ...। मुदा अपना टाका ल’ क’ पत्रिका कीनैत छथि, सिकरेट कीनैत छथि, रिक्शा यात्रा करैत छथि...। वस्तुतः हम सभ एखनहुँ अपन आदिम भावना केँ प्रायः प्रकट करैत रहैत छी... जाहि मे हम अपना सँ दुर्बल मातहत केँ दबोचि क रखैत छी..., मुदा रचनाकार संवेदनशील छथि तेँ ओ मुख्यपात्र केँ अन्ततः विगलित देखबैत छथि...। ओ केन्द्रीय पात्रा के अन्ततः ई भान करबा देबा मे पूर्णतः सपफल होइत छथि जे ई समस्त कार्य-कलाप जाहि मे ओ अपना आप केँ खर्च कयलक अछि अन्ततः अर्थहीन अछि ओ हितगर नहि, सर्वथा गैर जिम्मेदार छथि...। एहि कथा अय्यासीक पूर्णता हमर दृष्टि मे ‘‘मूस’’ पर जा क होइत अछि...। दुनू कथा मादे पता नहि कियैक हमरा लगैत अछि जे दुनू केन्द्रीय पात्रा आ ओकर परिवेश दुनू परस्पर मिज्झड़ सन छैक...., एक पढ़ू आ दोसर केँ पढ़बैक त लागत जे - ‘अरे! इ मूस कथा त अय्यासीक उत्तर कथा अछि..., ठीक ‘‘गतांक से आगे’’ के स्टाइल मे...।
देखल जाइ त अय्यासीक मुख्य पात्रा मूसो मे ओहिना ‘‘वर्कलेस’’ छथि, हाँ आब ओ सोझ हुड़दंगी नहि अछि... ई जरूर जे ओ जमीन बेचि क स्कूटर लेलक अछि मुदा पेट्रोल खर्चक चिन्ता जरूर ओकरा मे छैक, ओकरा रोजी रोजगार के चिन्ता छैक, व्यवसाय कर्ज ल’ क’ कयने छलैक से मूलधन आब सूदि जोडि़ क पँचगुन्ना भ गेलैक अछि, लोक हँसैत छैक अलग, भाइ जे छैक सेहो एकदम्म गैर जिम्मेदार.... ओ पफटोपफट्ट मे अछि कोना जीवन जीअत ? खन ओ मार्केटिंग काँम्प्लेक्स, खन सिनेमाहाल त खन हालसेल दबाइ विक्रेता बनबाक लेल विचारमग्न अछि...। कुल्लम ई जे आब अय्यास व्यक्ति सद्गृहस्थ बनबाक प्रक्रिया मे अछि..., मुदा बाट नहि भेट रहल छैक...। कथा अपन ऊँचाइ पर तखनि सांकेतिक दृष्टि सँ अबैत अछि जखनि ओ अपन बुनल काल्पनिक संसार मे देखैत अछि कर्मठ मूस सभक बनाओल बिहरि मे एकटा अजोध विषधर अबैत अछि आ बलात् ओहि मे पैसि जेबाक यत्न क रहल अछि...।
ओ विषधर अछि, ओकरा विशालकाया छैक, ताकतवर अछि, मुदा ओ की नहि अछि त पुरूषार्थी..।
ओकर तुलना मे वएह हीन, स्वेदकणयुक्त मूस बेसी आकर्षक छैक, कियैक त ओकर जीवन बेश जीवन्त छैक... आ नायक के नजरि अपन पिताक फोटो पर जाइत छैक त ओकरा होइत छैक जे ओहो वएह मूस छलाह जे अपन अध्यवसाय सँ धनार्जन कयलनि हमरा लेल..., एकटा हम छी जे साँप जेकाँ सभ साधन सँ युक्त भेलाक बादहु रचनात्मकता सँ हीन छी, एना कियैक ? हम कियैक एहन छी जे पिताक सम्पत्ति केँ बेचि क गाड़ी लैत छी, त बैंक कर्ज अदाए करैत छी..., दोकान नहि चला पबैत छी, हम कर्महीन छी कर्महीन....। एकटा ग्लानि ओकरा आब चोट द रहलैक अछि आ ओ आब उठैत अछि संकल्पक संग आ केवाड़ फोलैत अछि, अपन खुरपी लैत अछि, तखनि जे नव आ टटका हवा छैक से बन्न कोठली केँ ऊर्जा स भरैत छैक...। वस्तुतः ओ हवा अछि कर्मशक्ति सँ भरल जे एकटा कर्महीन केँ कर्मठ बना दैत अछि...। ई कथा मनुक्खक स्वभाव केँ चित्रित करैत अछि। ई कथा मनुक्खक नैसर्गिकता केँ अद्वितीय रूप सँ चित्रित करैत अछि जे मानव दर्शन मे अछि चरैवेति - चरैवेति...।
ई कथा सवोत्कृष्ट अछि आ रचनाकार केरि प्रखर अनुभूति, प्रतिभाक संगहि जीवनक प्रति हुनक प्रचण्ड आस केँ इंगित करैत अछि...। संकलन यात्राक मध्य मे दुइटा कथा आगाँ अबैत अछि-प्रथम ‘‘ढ़ाँचा 1992’’ आ दोसर अछि ‘‘प्रजातन्त्र परिकथा’’। दुनू दुइ अलग-अलग कलेवर सेँ युक्त...। एकर विस्तार पर चर्चा बाद मे, पहिने एहि कथा संकलनक एक गोट मोहक आकर्षण पर हमर संक्षिप्त टिप्पणी ई जे ई संग्रह ‘‘आल इन वन’’ सन लगैत छैक...। प्रथम कथा ‘‘खिस्सा सियार यार’’ शुद्धतम रूप सेँ व्यंग्य मिश्रित हास्यक श्रेणी मे अवैछ, स्मरणीय अछि जे एहि विधा मे मैथिली मे बहुत कम रचना भेल अछि, कथा पढ़बैक त बहुतो काल धरि बिसबिस्सी सन लागत। आगाँ बढ़ू, त ‘‘पिआसलि पानि’’ सन विचारोत्तेजक रचना सेँ भेंट होइत अछि। पुनः आगाँ बढ़ला पर ‘‘मूस’’ आ ‘‘अय्यासी’’ सँ भेंट होइत अछि। एकर विषय मे आर विशेष की कहू, हमरा लगैत छल जे कथाकार संकलन मे श्रेष्ठ द‘ चुकल छथि मुदा हुनक झोरा मे बहुतो रास माल छनि...। ‘‘ढाँचा 1992’’ शिल्पक दृष्टि सँ आकर्षक अछि। पत्र लेखनक एकटा विद्या छैक जेकरा मैथिली मे बहुत कम्म स्थान भेटलैक। मुदा हम तीनटा पत्रक शैली मे लिखल रचना देखि चुकल छी आ सेहो मैथिलीक दुइ जाज्वल्यमान नक्षत्रा डा. हरिमोहन झा ओ स्व0 मणीन्द्र नारायण चौधरी उर्फ राजकमल द्वारा रचित...।
जतऽ डा0 झा ‘‘पाँच पत्र’’ ओ ‘‘रसमयीक ग्राहक’’ मे अपन बात केँ विनोदक शैली मे लिखलनि अछि ओतहि राजकमल अपन ‘‘पाँच पत्र’’ मे ममता, दारिद्रय, अभाव बिछोह केँ चित्रित कयलनि अछि। भ सकैत अछि जे आनो रचना एहि शैली मे आओल होइक मुदा से हमर सोझाँ नहि आबि सकल अछि, मुदा ई दुनू रचनाकार अपन रचना बलेँ माइल स्टोन छथि...।
एहि शैली मे ‘ढ़ाँचा 1992’ लिखल गेल अछि जाहि मे समष्टि रूपेँ एकटा राष्ट्र, एक राष्ट्रीय उपराष्ट्रवादक पीड़ा, ओकर जय, पराजय, ओकर इतिहास केँ अपन-अपन दृष्टि सेँ देखबाक प्रयत्न कयल गेल अछि। एहि कथा मे राष्ट्रीय पीड़ा केँ व्यक्तिगत पीड़ाक रूप मे अभिव्यक्त कयल गेल अछि...। अफसोच एहि बात के अछि जे स्व0 गणेश शंकर विद्यार्थी आ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीक बाद केओ एहि समष्टि पीड़ा केँ वैयक्तिक पीड़ा मे बदलि सकबाक सामरथ नहि प्रदर्शित कयलनि....। एहि राष्ट्ररूपी शरीर जाहि मे अनेकानेक व्याधि ; अबैत रहैत छैक, मारिते रास चाक-चौबन्द सुरक्षाक बादो तकरा हल करबा लेल कोनहुटा सर्वमान्य ओ सर्वग्राह्य उपचार नहि निकलि सकल अछि आ हमर सामाजिक ढाँचा भीतरे-भीतर घुनाइत अन्ततः माटि मे मीलि जाइत अछि आ हम सभ मात्रा ओहि विडम्बना पर अपन कप्पार पीटि क रहि जाइत छी....।
मुदा कने विलमि जाउ। लेखक केर वैचारिक श्रृंखला भंग नहि भेलनि अछि। जतय ‘‘ढाँचा 1992’’ मे लेखक सामाजिक चेतना केँ लुप्तप्राय देखौलनि अछि ओतहि एहि भकोभन्न अन्हार मे एकटा छोट छीन डिबिया ल’ क’ ठाढ़ छथि ‘‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे।
स्थिति प्रायः समाने छैक दुनू कथा मे, मुदा ओकर अन्वेषण ओकर हल करबाक शैली अलग-अलग अछि...। जतय ‘ढाँचा’ कथा मे उन्मादी भीड़ कुटिल नेतृत्व द्वारा संचालित भ आदमखोर बनल अछि, जत राजसत्ता तूर तेल ल’ क’ सूतल अछि आ एक गोट सांस्कृतिक ऐतिहासिक प्रतीक चिन्ह मेटाओल जा रहल अछि, ओकर ठीक विपरीत ‘प्रजातंत्र परिकथा’’ मे एकटा संवेदनशील प्राणी द्वारा भीड़ संचालित भ रहल अछि...। एहू कथा मे उन्मत राजसत्ता छैक, कुटिल नेतृत्व वर्ग छैक, मुदा एकर विरोध मे ठाढ़ अछि एकटा सजग प्रहरी जे ओहि समस्त वर्ग पर भारी आ हावी रहैत छैक। ई व्यक्ति ‘‘ढाँचा 1992’’ मे निपत्ता अछि...।
‘‘ढाँचा 1992’’ के संवेदना, आत्मचिन्तन, आमोद-प्रमोद मे लीन आत्मरतिक शिकार एक निवीर्य बौद्धिकक हाथ मे छैक त ढाँचा खसि जाइत अछि, मुदा जखनि ओ व्यक्ति उठि जाइत अछि त हमर प्रजातांत्रिक मूल्यक संरक्षणे टा नहि ओकर विकास सेहो होइत अछि...। दुनू कथा बहुत सशक्त बनल अछि अपना आप मे....।
कथा संग्रह अपना आप मे लगैत अछि जे ई कथा एवं उपकथा मे विभाजित अछि...। आदरणीय स्व0 प्रभाष कुमार चैध्री ‘‘अप्पन लोक’’ मे लिखैत छथि जे हम आ बैजू भैया परस्पर अभिन्न छलहुँ। आगाँ ओ अप्पन आ भाइक तुलना क्रमशः इंजन आ डिब्बा सेँ करैत छथि...। तहिना लगैत अछि जे एहि कथा-संग्रहक लेखक जे गप्प कह चाहैत छथि से ओ दृष्टिपफलक केर व्यापकता ओ संवेदनशीलताक कारणे एक गोट कथा मे नहि कहि पबैत छथि...। हुनक कथा यात्रा बहुत इत्मीनान संग आगाँ बढ़ैत अछि। ओ अप्पन बात केँ एक कथा ‘‘अथ गिरगिट गाथा’ सँ शुरू करैत छथि आ तकर समापन ‘‘बैकबा फोड़बा’’ मे करैत छथि, एकदम अलिपफ लैला सन...। ‘‘अथ गिरगिट गाथा’’ मे हमर महान ओ पुरान गणतांत्रिक व्यवस्था के कुरूप आनन केँ सार्वजनिक करबाक चेष्टा कयल गेल अछि। ओ व्यवस्था जेकर स्थापना नीक उद्देश्य सँ कयल गेल छलैक से आब पटरी पर सेँ हँटि गेल अछि...। त्याग तपस्याक क्षेत्रा मानल जाइबला राजनीति, शासन ओ समाज नीतिक नियन्ता पहिने नीचा खसल त अपराधी आ गुण्डावर्गक हाथ मे आइलि...। एकरा कमोबेश बर्दाश्त कयल जा सकैत छलैक मुदा आब त एहि बदनाम वर्गक बीच मे ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सेहो सभ आबि गेल अछि। वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ रामलखन पोद्दार दरोगा सँ ल’ क’ दारूबाज, रंगबाज रामलखन पोद्दार अछि। मुक्कन बाबू छथि पुरान आउटडेटेड, आ अपन अस्तित्वक लेल संघर्षरत सुब्रत मुखर्जी सेहो अछि...। इ लोक प्रकटतः सैद्धान्तिक रूपेँ एक दोसराक विरोधी छथि किन्तु तरे तर एक दोसराक हितचिंतक सेहो छथि...। हिनका सभक कुचक्र मे पडि़ नीक नारा हास्यास्पद भ जाइत अछि, लोक सभ मरैत कटैत रहैत अछि। वस्तुतः ई मात्रा एक नगरक टा नहि वरन् सम्पूर्ण देशक गाथा अछि...।
कथाकार आगाँ बढ़ैत छथि आ ‘‘बैकबा पफोड़वा’’ नामक कथाक लाथेँ सार्वजनिन चिन्ता केँ व्यक्त करैत छथि। एतहु वएह ‘स्पाइल्ड जीनियस’ सिकन्दर अछि त रामचन्दर मड़रक बेटा कालेश्वर छथि...। एत जत सिकन्दर अपन अतीत सेँ भागि श्रमसाध्य काज कर’ लेल उताहुल छथि ओतहि ओकरा बिनु जानकारी देने ओकर बाहुबल केँ अपन लाभ लेल दोहन करयबला ‘‘भंवरलाल वस्त्र भंडार’’ के मालिक प्रकाश अगरवाल छथि। नतीजा कालेश्वर आ सिकंदर के बीच पाइ असूलीक तगादा दुइगोट रंगबाजक लपफड़ा मे तब्दील होइत-होइत अगड़ा-पिछड़ाक लड़ाइ मे बदलि सम्पूर्ण नगर मे लूटपाट मचा दैत छैक...। ई दंगा वैचारिक समानता केँ सेहो झमाडै़त अछि जखनि पिछड़ा वर्ग सेँ आएल सर्वमान्य सर्वप्रतिष्ठित एक राजनैतिक दलक जिलाध्यक्ष पुरूषोत्तम मंडल मात्रा एहि आकस्मिक घटनाक चलैत अपनहि दलक अगड़ावर्ग सँ आइल कार्यकत्र्ता चिरंजीव सिंह स अपमानित होइत छथि...। लेखक केर चिन्ता आगाँ बढ़ैत अछि आ ओ देखबैत छथि जे वैचारिक दृष्टि सँ दृढ़ व्यक्ति एहि तात्कालिक उन्माद मे तहिना अप्रासंगिक होइत छथि जेना बिहाड़ि मे बगुला.।
एहि सभसँ लेखक तीव्र वेदनाक अनुभव करैत छथि, मुदा ओ पुनः आशाक एक किरण देखबैत छथि जे समाजक पैघ वर्ग एखनहुँ एहि वितंडा सेँ दूर अछि आ उत्साहक गप्प ई जे एकर संख्या बेसी छैक...। ई अछि एकटा विशाल श्रमिक वर्ग जेकरा लेल भरि दिनुक मेहनतिक बाद केवल ‘‘नून रोटी आ तानि कमरिया’’ सुतबाक अभिलाषा रहैत छैक।
एहि वितण्डा केँ मनोरंजन ओ खेलक रूप देनिहार नव मुकुलित सभ जाति ओ वर्ग सँ आइल बच्चा सभ सेहो अछि...।
एहि प्रकार सँ एहि दुनू कथा समेत सम्पूर्ण कथा-संग्रहक विषय मे यैह कहल जा सकैत अछि जे ई नीक ओ बेजाएक परीधिसँ बहुत दूर भ गेल अछि। अनन्य!!! अतुलनीय !!! अद्भुत !!! अद्वितीय !!!

Suggested citation: आशीष चमन. “अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/अन्हारक-विरोध-मे-अरविन्द-ठाकुर.htm

मूल विदेह अंक / Original issue