विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि

डा. योगानन्द झा · 2015-11-01 · अंक 189

अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि
-डा योगानन्द झा
श्री अरविन्द ठाकुर आधुनिक मैथिली साहित्यमे निविष्ट रचनाकारक रूपमे परिचिति बनौने छथि। हिनक एक गोट कविता संग्रह ‘परती टूटि रहल अछि’, एक गोट कथा संग्रह ‘अन्हारक विरोधमे’ आ एक गोट गज़ल संग्रह ‘बहुरुपिया प्रदेशमे’ प्रकाशित छनि। राजनीतिक चेतनासँ ओतप्रोत हिनक लेखन रचनाकारक ओहि प्रतिबद्धताकें इंगित करैत देखि पड़ैत अछि जकर निर्वाह कोनो रचनाकारकें मानव जीवन, समाज, राष्ट्र ओ सम्पुर्णतामे मानवताक हितैषी, मानवीय गरिमाक उन्नायकक रूपमे प्रतिनिधित्व प्रदान करैत अछि।
‘अन्हारक विरोधमे’ कथा संग्रह हिनक दस गोट कथाक संग्रह थिक। कथा सभक शीर्षक थिक क्रमश: खिस्सा सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध मे, ढाँचा-1992, मूस, प्रजातंत्र परिकथा, अथ गिरगिट गाथा, अय्यासी, बैकबा-फोड़बा आ विष-पान। एहि कथा सभक माध्यमे कथाकार आधुनिक परिवेश मे व्याप्त राजनीतिक, सामाजिक ओ प्रशासनिक विद्रुपताक खण्ड चित्र प्रस्तुत कऽ ओकरा प्रति असन्तोष, विरोध ओ विद्रोहक चित्रण मनोवैज्ञानिक विश्लेषणपुर्वक कयलनि अछि।
‘पियासल पानि’ नारी जीवनक करुण कथा थिक। पुरुष प्रधान समाजमे नारी-शोषणक अविशृंखल परम्परा रहल अछि। अन्धविश्वास सँ जकड़ल समाज नारीक मनोभाव केँ कहियो विशेष प्रश्रय नहि दैत रहल अछि आ अपन संस्कारक कारणे नारी निरन्तर उत्पीड़नक शिकार होइत अयलीह अछि। एहि कथाक नायिका नारायणपुरवाली सेहो उत्पीड़नक शिकार छथि। ओ अपन क्लीव पतिक कारणे अपन कामवासनाक परितृप्ति नहि कऽ पबैत छथि आ ओकर आलम्बनक दिस उन्मुख होइत देखि पड़ैत छथि। तथापि सामाजिक व्यवस्थाक कारणे ओ सीदित जीवन जीवैत छथि आ मानसिक रूपें रुग्ण भऽ जाइत छथि। हुनक एहि रुग्णता कें हुनका पर डाकनी सवार होयब बुझल जाइछ आ हुनक झाड़-फूक शुरु कयल जाइछ। भगैत हुनका झोंटा पकड़ि लिरयअबैत अछि, मरचाइक झोंक दैत अछि आ सौंसे पीठक चाम काँच करची सँ पीटि उधेसि दैत अछि। परिणामत: ओ घर छोड़ि पड़ा जाइत छथि आ कुलकलंकिनीक उपाधिसँ विभुषित होइत छथि, अपवाद मे पड़ि जाइत छथि। मुदा हुनक पति लखना कें केओ क्लीव कहि प्रताड़ित नहि करैत अछि। बात तखन फुजैत अछि जखन लखना दोसर विवाह करैत अछि आ एहि दोसर विवाहसँ ओकरा पुत्ररत्नक प्राप्ति होइत छैक। क्लीव लखना ओहि पुत्र कें अनजनुञा जानि अपन दोसर पत्नीक चरित्र पर आक्षेप करैत ओकरा जान सँ मारि देबाक प्रयास करैत अछि। एहि तरहें कथाकार पुरुष प्रधान समाज मे नारी मात्र कें दोषी मानबाक रूढ विचारक प्रतिरोध कय समाज मे नारी-स्वातंत्र्यक स्थापनाक आग्रही देखि पड़ैत छथि। नारी मनोविज्ञानक क्रमिक विकासक दृष्टिञे ई कथा कथाकारक सिद्धहस्तताक परिचय दैत अछि।
पोथीक शीर्षक रूप मे व्यवहृत कथा ‘अन्हारक विरोध मे’ स्वातंत्र्योत्तर भारत मे विकासमान सम्प्रदायवाद सँ सम्बद्ध अछि। अनेकता मे एकता भारतीय जीवन-पद्धतिक अन्यतम विशिष्टता थिक। एहि ठाम अनेक धर्म-सम्प्रदायक लोककें आन सम्प्रदायक लोकक संग अपने सम्प्रदायक लोक जकाँ सम्बन्ध रहैत अछि। विभिन्न सम्प्रदायक लोक एक दोसराक दु:ख-सुख, हानि-लाभ, जीवन-मरण मे संग देखि पड़ैत छथि। यैह भावनात्मक समन्वय एहिठामक राष्ट्रीय समन्वयक कारक तत्व थिक। मुदा आधुनिक राजनीति जे वोटक राजनीति थिक, संख्याबलक राजनीति थिक क्रमश: सामाजिक समरसता मे विष घोरि देलक अछि। ई समाज कें छिन्न-भिन्न कऽ रहल अछि। हिन्दू आ मुसलमान कें दू खीमा मे बाँटि देलक अछि। परिणामत: राष्ट्रीय ओ सामाजिक एकता नष्ट भऽ रहल अछि। कथाकार एहि राजनीतिक विद्रुपताक प्रतिरोध करैत छथि।
अन्हारक विरोध मे कथाक नायक रंजनक हिन्दू होइतो मुसलमानक बस्तीमे निशाभाग राति मे जायब, ओहिठामक लोक सभक ओकरा प्रति सम्बन्धिक जकाँ व्यवहार तथा अलीमुद्दीनक उक्ति ‘कक्का ! ओहि हरमजादाक खूने गरम भेल रहै त` हमरा मारितय, हम सहि लेतौं। खुदा कसम, हम सहि लेतौं मगर अप्पन टोल मे हमर यारक भाइ…… हमर भाइ कें………आ सभ सँ बढि एक गोट हिन्दू केँ ओ मारलक। बाप-दादाक देल मोहब्बतक तालीम कें माती मे मिला देलक ई हरमजादा। कोन इज्जत रहि गेलै एहि टोलक आ हमरा सभक……।‘मे सामाजिक समरसताक आह्लादकारी आस्वाद भेटैत अछि। दोसर दिस खलनायक बिकुआक कृत्य जे हिन्दू कें नहि केवल मारैत अछि अपितु हिन्दू-मुसलमानक शगुफा छोड़ि दंगा करबय चाहैत अछि, सम्प्रदायवादी घृणाक अभिव्यक्ति थिक। एहि कथाक माध्यमे लेखक ओही सम्प्रदायवादी घृणाक प्रतिकारक संदेश देलनि अछि जे हुनक राष्ट्रवादिताक प्रतीक थिक आ सम्प्रदायवादी राजनीतिक विद्रुपताक प्रति विद्रोही प्रवृतिक निदर्शन सेहो।
श्री अरविन्द ठाकुर लोकजगतक अत्यन्त गंभीर पारखी छथि। हिनक कथा ‘विष-पान’ हिनक एहि प्रवृति कें जगजियार कयन्र अछि। साम्प्रतिक न्याय-व्यवस्था कोना अर्थबलक वशीभूत भऽ गेल अछि आ अर्थहीनक हेतु अर्थहीन भऽ गेल अछि तकरा ई एहि कथा मे अभिव्यक्ति प्रदान कयलनि अछि। समाज मे जे गुण्डा तत्व अछि से खुलेआम अपराध करैत अछि आ न्यायप्रणाली ओकर किछु बिगाड़ि नहि पबैत छैक। दोसर दिस पीड़ित व्यक्ति अर्थाभाव मे न्यायालयक प्रक्रिया मे झुरझमान होइत अपन अर्जितो सम्पत्ति बोहाबैत रहैत अछि आ सीदित भेल रहैत अछि। अन्तत: विजय गुंडे तत्वक होइत छैक जे अर्थबल सँ प्रशासन ओ न्यायतंत्रहु कें किनबा मे समर्थ रहैत अछि। ‘विष-पान’क गोपाल जी चतुरानन द्वारा पिटलो जाइत छथि, न्यायालय मे जयबाक कारणे अपन व्यक्तित्वक अवमुल्यन सेहो अनुभव करैत छथि, वकीलक फज्झति सेहो सुनैत छथि मुदा न्याय हुनका सँ दूरे रहैत छनि। जखन कि चतुरानन पाइक बलें ने तं पुलिसक द्वारा पकड़ले जाइत अछि, ने ओकरा विरुद्ध गवाहिये भऽ पबैत छैक आ अन्तत: विभिन्न छल-छद्म द्वारा ओ गोपाल जी कें सुलहनामाक हेतु बाध्यो कऽ दैत छनि। एतावता कथाकार न्यायपालिकाक विद्रुपता पर एहि कथाक माध्यमे कशाघात कयने छथि।
‘अय्यासी’ कथा मे निम्नमध्यवर्गीय जीवनक मनोविश्लेषण कयल गेल अछि। ई कथा समकालीन आर्थिक परिवेश मे जीबैत मानवक संक्रान्त मन:स्थिति कें उजागर करैत अछि। व्यक्ति सापेक्ष ई कथा निम्नमध्यवर्गीय मनुष्यक आर्थिक विडम्बनाक यथार्थ सँ अवगत करबैत अछि। एक दिस ओकरा घर मे दैनन्दिन आवश्यकतोक वस्तुक अभाव छैक तं दोसर दिस बच्चाक शिक्षा हेतु किताब-कापी सेहो ने जुटि पाबि रहल छैक। तथापि ओ अपन शौकक वस्तु सिकरेट, पत्रिका कीनब ओ रिक्शाक सवारी करब नहि छोड़ि पबैत अछि आ आत्मवंचना सँ प्रतारित होइत रहैत अछि।
‘मूस’ कथा सेहो यथार्थक अन्वेषण थिक। एकर पात्र खने पेट्रोलक बढैत दाम सँ खिन्न अछि तँ खने पत्नीक हेतु गैस चुल्हा नहि कीनि सकबाक कारणे चिन्तित। खनहि ओ ड्रग इन्सपेक्टरक भ्रष्टाचारी प्रवृति पर विचार करैत अछि तँ खनहि अपन आर्थिक दु:स्थिति पर जकर कारणे ओकर कतोक मनोरथ पूर होयबा सँ रहि जाइत छैक। अन्तत: ओ अपन सकल दैन्य सँ पार होयबाक एकमात्र उपाय अपन पुरखाक अरजल जमीन कें बेचि पाइ एकट्ठा करबा मे तकैत अछि। मुदा जेँ लऽ कऽ ई ओकर अकर्मण्यताक प्रतीक होइतैक, ओ ओहि जमीन कें जोत-कोड़ कऽ उत्पादन करबाक विचार करैत अछि। एहि तरहें ई कथा वर्तमान कालक युवा लोकनि मे कर्मयोगक प्रति निष्ठाक सिद्धान्त कें प्रतिपादित करैत अछि। एहि कथा मे मूस कर्मशील मानव समुदायक प्रतीक थिक जे सर्वहारा वर्ग जकाँ निरन्तर कर्मठतापुर्वक श्रम कय बीहरि बनबैत अछि आ साप सुविधाभोगी वर्गक प्रतीक थिक जे सर्वहाराक श्रम सँ अर्जित सम्पदा पर छल-बल द्वारा कब्जा कऽ लैत अछि आ ओकर श्रमक शोषण करैत अछि। कथाकार श्रमजीवी मानव समुदायक प्रति एतय संवेदनशील छथि।
‘ढाँचा-1992’ कथा ओहि त्रासद घटना सँ सम्बद्ध अछि जे भारतीय हिन्दू आ मुसलमानक भावनात्मक एकता पर एकटा प्रहार सदृश छल। ई घटना छल बाबरी मस्जिदक विध्वंशक घटना जाहि सँ समस्त भारतीय समुदाय जेना मानसिक रूपें बीमार ओ स्तब्ध रहि गेल छल। एहि कथा मे कथानक सँ बेसी सामयिक यथार्थ कें नूतन शैली मे प्रकट कयल गेल अछि जे पाठककें सहजहिं प्रभावित कऽ दैत अछि।
राजनीति व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रक प्रगति एवं चतुर्दिक विकासक हेतु अत्यावश्यक तत्व थिक्। मुदा वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य अत्यन्त विकृत देखि पड़ैत अछि। जे राजनीतिक चिन्तन सामुहिकता ओ एकताक प्रतीक होइत छल से सामाजिक वैमनस्य, अलगाव ओ पारस्परिक संघर्षकें प्राथमिकता दैत देखि पड़ैत अछि। विभिन्न सामाजिक असमानता कें आधार बना कऽ व्यक्ति-व्यक्ति ओ जातिगत समूहक बीच राजनीति द्वारा जे रेखा खींचल जा रहल अछि से ततेक गहींर भऽ गेल अछि जे परस्पर दुर्भावना, विद्वेष ओ विनाशक प्रवृतिक कारक भऽ गेल अछि। जाति, धर्म ओ सम्प्रदायक नाम पर समाज कें खण्डित कऽ वोटक संख्या स्थिर ओ पर्याप्त करब आधुनिक राजनीतिक धर्म भऽ गेल अछि। जाहि राजनेता कें शासन, सत्ता ओ अधिकारक उपयोग जनताक भलाइ आ कल्याणक हेतु करबाक चाहियनि से अपन क्षुद्र स्वार्थ ओ अहंकारक हेतु व्यक्तिक भावना कें भड़का कऽ सामाजिक ढाँचा कें क्षतिग्रस्त करबापर तुलल छथि। कथाकारक ‘बैकबा-फोड़बा’, ‘खिस्सा सियार यार’, ‘प्रजातंत्र परिकथा’ आ ‘अथ गिरगिट गाथा’ मे आधुनिक राजनीतिक यैह यथार्थ अंकित-टंकित भेल अछि।
‘बैकबा-फोड़बा’ मे सिकन्दर अगड़ा जातिक अछि आ कालेश्वर पिछड़ा जातिक। कालेश्वर एकटा कपड़ाक दोकान सँ उधारी लेने छैक आ सिकन्दर ओहि दोकानक उधारी ओसुलबाक काज करैत अछि। मुदा सिकन्दर जखन कालेश्वर सँ तगादा करैत छैक तँ ओ एकरा अगड़ा जाति द्वारा पिछड़ा जाति कें अवमानित करबाक हवा दैत छैक। परिणामत: कालेश्वर ओ सिकन्दरक बक-झक दुनू जातिक बीच वैमनस्यक कारण भऽ जाइत छैक आ दुनू समूह ओझरा जाइत अछि। वर्तमान राजनीति कोन तरहें जातीय विभेद कें प्रश्रय दऽ समाज कें तोड़ने जा रहल अछि तकर यथार्थपरक दृश्य उपस्थापित करब एहि कथाक उद्देश्य अछि।
एहिना ‘खिस्सा सियार यार’ मे निजी स्वार्थक हेतु निरन्तर विभिन्न क्रियाकलाप मे लागल आधुनिक राजनेता सभक चरित्र कें उद्घाटित कयल गेल अछि। एकर पात्र गरीबदास एकटा एहन राजनेताक चरित्रक प्रतिनिधि अछि जे पार्टीक कोनो पैघ नेताक चमचागिरी कऽ कऽ नीक पद प्राप्त कऽ लेने अछि आ चुनावी टिकट प्राप्त करबामे सफल होइत अछि। ओ लायसेंस, परमिट आ चंदा-कमीशनक धंधा कऽ कऽ येन-केन-प्रकारेण जनप्रतिनिधि बनबाक लेल उताहुल अछि। दोसर पात्र राजनाथ झा निरन्तर पार्टीक काजमे लागल रहलोपर अपन पुत्रक हेतु नोंकरी प्राप्त करबामे पार्टी-नेताक अभिरुचि नहि देखि मोहभंग कें अङेजि लैत छथि। तेसर पात्र सदानन्द विद्रोही पार्टीक वाइस प्रेसिडेन्ट बनबाक लेल छात्र संगठन ओ युवा मंच कें हथकण्डा बनौने छथि। चारिम ओ पाँचम पात्र क्रमश: राजमंगल श्रीवास्तव ओ सतीश सिंह परमार अपन स्वार्थसाधन करबाक हेतु फुसिक सहारा लैत छथि। छठम ओ सातम पात्र क्रमश: शनिचर ‘शनि’ आ गणेश गुरमैता आत्मप्रशंसी छथि आ अपन कद बढयबाक हेतु विभिन्न उच्चपदस्थ राजनेता सँ अपन सम्पर्क होयबाक फुसि कथन द्वारा लोक कें मुड़बाक व्यापारमे लागल रहैत छथि। आठम पात्र माखन बाबू एम एल सी बनबाक सपना पोसने छथि आ अपन पुत्रो कें नेता बनयबाक हेतु प्रयत्नशील छथि। एहि तरहें कथाकार अनेकानेक स्वार्थी राजनेता सभक चरित्र प्रस्तुत कयलनि अछि जे सभ पार्टी कार्यालयक कार्यक्रममे समुपस्थित भेल छथि। हिनका लोकनिक चरित्रक अंकन कऽ कथाकार आधुनिक राजनीतिक विद्रूप चेहरा कें समक्ष अनबाक प्रयास कयलनि अछि। स्वार्थपुर्ण राजनीतिक ई यथार्थ व्यक्ति, समाज ओ राष्ट्रक उन्नति, समृद्धि ओ विकासक हेतु उपयुक्त नहि भऽ सकैछ। मुदा कथाकार एकटा एहनो राजनेताक उपस्थापन कयलनि अछि जे स्वतंत्रता सेनानीक रूपमे राष्ट्रक हेतु बलेदान देलाक बादो पेंशन एहि आधारपर अस्वीकार कऽ चुकल छथि जे ओ स्वतंत्रताक युद्ध सम्मानक हेतु नहि अपितु राष्ट्रसेवाक भावना सँ लड़ने छलाह। एतावता कथाकार साम्प्रतिक स्वार्थपुर्ण राजनीति ओ स्वतंत्रता सँ पूर्वक राष्ट्रहितक हेतु राजनीतिक वर्णन कऽ हेय ओ प्रेय दिस पाठकक ध्यान आकृष्ट कयलनि अछि। हेय राजनीतिज्ञ लोकनिक समूहक तुलना ई सियारक समूह सँ कयलनि अछि जे अपन स्वार्थ मात्र मे तल्लीन अछि आ समाज, राष्ट्र कें खखोरि कऽ चिबा जयबाक हेतु यत्नशील अछि।
‘ प्रजातंत्र परिकथा ‘ सेहो राजनीतिक कथा थिक। एहिमे प्रजातंत्रक दुरुपयोगक चित्रांकन भेल अछि। शहरमे अपराधी लोकनि दू टा परिवारक सम्पत्ति लूटि लैत छथि आ एकटा गृहस्वामीक हत्या कऽ दैत छथि। जनिक हत्या कयल जाइत छनि से डाक्टर छलाह आ गरीब सभ कें मुफ्त आ सस्त इलाज करबाक कारणें डाक्टरी व्यवसायमे लागल एहन लोकक हेतु बाधा छलाह जे रोगीक अधिकाधिक शोषण करबाक हेतु कुख्यात छलाह। दोसर गृहस्वामी जनिका ओहिठाम केवल लूटपाट भेल छलनि से राष्ट्रपति पदक प्राप्त सम्मान्य शिक्षक छलाह। एहि हत्या ओ लूटकाण्डक सूचना पाबि पुलिस प्रशासन अपन खानापुर्ति कऽ चुकल छल्। तत:पर केमिस्ट एण्ड ड्रगिस्ट एसोशिएसन एहि हत्याक विरुद्ध जुलूस निकालैत अछि जाहिमे शहरक अधिकांश भ्रष्टेलोकनि सम्मिलित होइत छथि। परिणामत: जुलूसक लोकसभ अनुमंडलाधिकारीक जीप कें क्षतिग्रस्त कऽ दैत अछि आ अनुमंडलाधिकारी कें सेहो कूहि दैत अछि। क्रमश: अनुमंडलाधिकारीक आदेश सँ जुलूसपर लाठी चार्ज होइत छैक आ अनेक एहने लोक प्रताडित होइत अछि जे कानूनकें अपना हाथमे लेबाक दुस्साहस नहि कऽ सकैत छल। पछाति गुंडा तत्व सभक द्वारा पुलिस पर सेहो रोड़ाबाजी होइत छैक। किछु गोटे गिरफ्तार होइत छथि। ओहि गिरफ्तार लोकसभ कें छोड़यबाक हेतु प्रशासनक संग वार्ता कयल जाइत छैक आ प्रशासन ओकरा सभ कें छोड़ि कऽ जुलूस आ नारेबाजी सँ त्राण पबैत अछि। एहि तरहें ई कथा प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे सामाजिक-सार्वजनिक हितक हेतु कयल गेल प्रयास कें नेतागिरीक धंधा किंवा निजी उद्देश्यक हेतु कयल गेल अनुशासनहीनताजन्य अराजकता ओ भटकावक चित्र प्रस्तुत करैत अछि जे साम्प्रतिक राजनीतिक यथार्थ थिक।
‘ अथ गिरगिट गाथा ‘ सेहो राजनेतालोकनिक अपन स्वार्थपुर्तिक हेतु भ्रष्टाचरणक अतिरेक कें उद्घाटित करैत अछि। एहि कथाक पात्र मुकुन्द जायसवाल आ रामलखन पोद्दार परस्पर विरोधी छथि आ हिनका दुनूक समूहक बीच निरन्तर मारि-पीट होइत रहैत छनि जाहि सँ शहर अशांत रहैत छैक। मुदा जखन नगरपालिकाक चुनावक अवसर अबैत छैक तँ ई दुनू परस्पर यारी कऽ लैत छथि आ जाहि वार्डमे जनिक समर्थकक संख्या अल्प रहैत छनि ताहि वार्डमे अपन प्रतिद्वन्दीक समर्थन कऽ दैत छथि आ दुनू गोटे नगरपालिकाक क्रमश: चेयरमैन आ वाइसचेयरमैन बनि जाइत छथि।
एतावता संकलनक कथा सभकें पढला उत्तर ई स्पष्ट होइत अछि जे श्री अरविन्द ठाकुर कथालेखन मे वस्तुवादी ओ वास्तविकतावादी छथि। ई यथार्थकें यथावत प्रस्तुत कऽ ओकर विरूपताकें पाठकीय संवेदना सँ जोड़ि लोकजगत मे व्याप्त विसंगति सभ पर कशाघात करैत छथि। वस्तु, पात्र, परिवेश ओ घटनाक निर्माण मे अपन कुशलता द्वारा ई कथाक मूल कथ्य कें सहृदयजनसंवेद्य बना दैत छथि आ सामाजिक- राजनीतिक जगत मे व्याप्त विसंगति सभहिक पोल खोलि ओहिमे सुधारक हेतु सुझाव किंवा चिन्तन प्रस्तुत करैत छथि।

Suggested citation: डा. योगानन्द झा. “अन्हारक विरोधमे: एक दृष्टि.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/अन्हारक-विरोधमे-एक-दृष्टि.htm

मूल विदेह अंक / Original issue