अरविन्द ठाकुर : व्यक्तित्व आ कृतित्व
अरविन्द मिश्र नीरज
व्यक्ति-व्यक्तिक अपन व्यक्तित्व होइत छैक आ एहि मे कोनो व्यक्ति अपन कृतित्व ल` क` व्यक्तिक जेर मे पंक्ति सँ फराक अपन पहिचान बना लैत छथि। जेहन व्यक्तित्व आ तेहने हुनक कृतित्व। ओ सभ संस्कारजन्य संस्कृति केँ अपना लैत छथि। सहजा, जेकर दोसर नाम संस्कार थिक, ओ जन्म-जन्मान्तर सँ संचित होइत अछि। संस्कृति होइत अछि ओहि सहजा प्रतिभाजन्य व्यक्तिक वंश, परिवार, पितृत्व प्रभाव आदि। समाज, संगी आ अध्ययन आदिक सहयोग जकरा उत्पाध्या कहल जाइत अछि आ जकर दोसर नाम थिक अभ्यास, तँ सहजा आ उत्पाध्या दुनू परस्पर मिलि व्यक्ति केँ एक सृजनकर्ता बना दैत अछि आ हुनका द्वारा ‘क्रिएशन’ यथार्थ होइत अछि – वर्तमान मे प्रशंसनीय जे भविष्य मे कालजयी भ` जाइत अछि।
एतेक बात कहबाक अभिप्राय ई जे हमर जे एखन आलोच्य थिक से एक एहने काव्य-प्रतिभा सँ प्रभावी रचनाधर्मक पालन मे प्रतिबद्ध एवं प्रसिद्ध व्यक्तित्व एवं कृतित्व। हम कह` चाहब जे मात्राक दृष्टिकोण सँ ओ कतेक लिखने छथि आ ओ किताबक रुप मे छपि क` पाठकक सोझाँ कतेक आयल अछि, से तँ बुझल नहि अछि। मुदा जे दू-चारि पोथी हमरा कोनो ने कोनो रुप मे प्राप्त भेल अछि तकर आधार लैत स्थालीपुलाक न्याय सँ रचनाकारकक व्यक्तित्व पर पहिने दृष्टिपात होइत अछि। रचना पढैत-पढैत जखन आगू बढैत छी तँ रचनाकारकक व्यक्तित्वक परिचय मानसपटल पर सिनेमाक रील जकाँ उभर` लगैत अछि आ कोनो कविक पांति मनहि मन गुनगुना उठैत छी – “ जिनकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा ”।
तेँ रचनाक आधार पर व्यक्तित्वक परिचय सुनिश्चित भ` जाइत अछि। आगू बढैत छी तँ बरबस पता लगैत अछि कि कोना नहि ! कोसी अंचलक एक कस्वानुमा गाम सुपौलक चकला निर्मली नामक एक टोल जे आइ नगर परिषदक वार्ड मे अछि, ताहि टोल परक एक रचनाधर्मिताक पालन करैत बहुआयामी व्यक्तित्वक धनी महान समाजसेवी, प्रगतिक नव-नव बाटक अन्वेषी कोसीक शलाका-पुरुष स्वनामधन्य महनीय बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ जीक जिनक आत्मज इएह अरविन्द ठाकुर थिकाह तँ अरविन्द जीक यथार्थक पता लागि जाइत अछि। विप्लव जी केँ जनैत छलहुँ। हुनकर लेखनी मे समाजवाद की राष्ट्रवाद आ जे से मुदा अरविन्द हुनक रचनाक स्वरुप थिकाह से नहि बुझल छल। विप्लव जीक एक परिचय हुनक “ उद्बोधन गीत “ शीर्षक सँ –
साथियो, तुम रो रहे क्यों ?
कौन है उसका सहारा
कर्म को जिसने बिसारा
सत्य है संसार ही यह
तुम अकर्मठ हो रहे क्यों ?
साथियो, तुम रो रहे क्यों ?
हम विषयान्तर नहि छी। हम रचनाक कारण पर चलि गेल छलहुँ। आउ, कनी अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ देखी, स्वरुप आ स्वभाव केँ परखी। गौर वर्ण, प्रसन्न मुद्रा पर चश्माक तर मे गंभीर आँखि, प्रत्यक्षहु मे परोक्ष होइत, अत: केर भाव, लगहु रहैत किछु क्षणक लेल दूर चलि जाइत स्वभाव। आ जाहिठाम छथि ताहिठाम ठेकानल वस्तुजात। चारू कात रैक पर सैंतल पुस्तकक बीच मे कुर्सी आ टेबुल। टेबुल पर पिताक परम्परा केँ प्रतिष्ठित करैत अरविन्द जी। परिष्कृत परिसर, कण-कण मे आकर्षण आ ओहि सँ टपकैत सहितस्य केर भावना मे साहित्य साधना अरविन्द जीक व्यक्तित्व केँ आकर्षित करैत अछि। बेटा-पुतहु आ अंगना मे डेगा-डेगी दैत पोता-पोती केँ देखि हिनक सहज मन साहित्य साधना दिस खिंचा जाइत अछि। अपन साधना कक्ष ( स्टडीरुम ) मे आसन जमा लैत छथि साधक जकाँ आ बिसरि जाइत छथि अपन संसार केँ। बरबस लेखनी सँ नि:सरित होम` लागैत अछि – “ बहुरुपिया प्रदेश मे”। आ तेँ ने भुमिका मे कहि उठैत छथि अपन पौत्री आर्या, क्षिति आ पौत्र दिव्यांशु केँ शुभकामना दैत जे ओ सभ एहि बहुरुपिया प्रदेश केँ नीक जकाँ चिन्हथु आ चिन्हि केँ अपना लेल सुन्दर आ सुगम मार्ग प्रशस्त करथु। आ इएह भाव मे आगू बढैत गजल संग्रह केर एक एक गजल कि शेर यथार्थहि वर्तमान मे भविष्यक द्रष्टा बनि आब`बला स्थिति सँ चेतैबाक प्रयास करैत छथि –
नइ पूजीक आन-बान नहि ओकर शान बचत
नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत
हरदी नइ, हर्रे नइ, बनियाँ सरकार मे
‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत
कहू, कतेक चेतनायुक्त संकेत देलनि कवि। एहिठाम कविक/शायरक दृष्टि भारतक भविष्यक हेतु कतेक चिन्तित अछि। किताबक पहिले गजल मे गजलक परिभाषा परिपुर्ण होइत अछि। गजल मे दर्द होइत अछि, वर्तमान मे भविष्यक चिन्ता होइत अछि। यथार्थ समवाद होइत अछि। जाहिठाम किछु कल्पने टा नहि, किछु आधार होइत अछि। पुन: देखू एकटा एहि गजलक पांति मे कविक उक्ति-वैचित्र्य जकरा काकोक्ति कहल जाइत अछि, प्रकारान्तर सँ यथार्थक भाव –
छोड़िक` सत्यक डगर बइमान बनबह
हओ कोना केँ आब तों बलमान बनबह
पुन:-
आब अयोध्या मे पुजाबय छथि दशानन
जान नहि बचतह जँ तों हनुमान बनबह
केहन कटगर लोकोक्ति सन गजल भेल अछि ! कवि अरविन्द जीक गजल मे सहज शब्दक संगति एकर सुन्दरता केँ कोना बढा रहल अछि, बानगीक रुप मे देखू –
कलयुग असवार अछि ‘अरबिन’ कपार पर
जे हमर ठोंठ धरत, तकरे भगवान कहब
दोसर उदाहरण देखू –
दिन मे पाकेट मारै छै
राति मे जे छै पहरेदार
बेचिक` घोड़ा सुतल बुड़ि
सिरहौना सँ तकिया पार
केहन सहज शब्दक सहज यथार्थ ! कियो-कियो कहैत रहलाह अछि जे मैथिली मे गजल की, ओ तँ अरबी, तुर्की, उर्दूक आ कनी-कनी हिन्दीक थिकै। मुदा अरविन्द जी एहि अनरगल प्रलाप केँ निराधार क` गजल केर जे यथार्थ परिभाषा थिक तकरा अक्षरश: समेटैत एहि चुनौती केँ स्वीकार केने छथि, से देखू –
चान पर बस्ती बसाओल जा सकै छै
मैथिली मे गजल लिखल जा सकै छै
असीमित विस्तारक आकास छल सपना हमर
आसक ताग मे ओ बान्हल जा सकै छै
आ तखने ई गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ पोथीक रुप मे प्रकट भ` सकल।
एहि गजल संग्रह “ बहुरुपिया प्रदेश मे “ सँ पहिने कथाकारक रुप मे अरविन्द जीक परिचय भेटैत अछि। हुनक कथा संग्रहक नाम अछि – “ अन्हारक विरोध मे “। ‘खिस्सा सियार यार’ शीर्षक सँ ‘विष-पान’ शीर्षक धरि दस गोट कथा एहि पोथी मे गुथल गेल अछि। कथा मे कथानकक भाषा मे प्रांजल्यता शीर्षकक अनुकूले अछि। कथा मे जिज्ञासा कथाक महत्ता बढा दैत अछि। सभ सँ बढि क` बात ई जे कथाक पहिल पांति बिना थकानक कथाक अंतिम पांति तक यात्रा करा दैत अछि। कथाकार केँ अपन माटि-पानि संग, आत्मीयताक संग समाजक हर वर्गक गतिविधि सँ परिचय कथाक विशेषता प्रकट करैत अछि। अभिजात वर्गक संग रचल-पचल लेखकक सर्वहारा समाजक प्रति संवेदना कोना साकार भ` उठल अछि, कथासभमे तेकर यथार्थ परिचय अछि।
“ अन्हारक विरोध मे “ कथा-संग्रह नामक पोथी सँ पहिने लेखक कविक रुप मे प्रस्तुत भेला – “ परती टूटि रहल अछि “ नामक कविता संग्रह ल` क`, जाहि पोथी मे कविक आध शतक सँ उपर ‘यात्रा’ शीर्षक सँ प्रारम्भ होइत ‘बुलबुल’ शीर्षक सँ अंत होइत कविता सभ अछि। मुक्त रचना मे उन्मुक्त भावधारा कविताक विशेषता मे कविक सहज स्वभावक परिचय होइत अछि। जतय धरि हम एहि संग्रहक कविता पढि सकलहुँ ताहि मे कोनो वादक प्रभाव नहि, कविक व्यापक यथार्थभाव परिलक्षित होइत अछि। एतबा धरि अवश्य जे यथास्थिति बनल नहि रहय, ओ टूटय। तखने जड़ता सँ त्राण होयत, गति प्राप्त करैत दुर्गति सँ दूर करत, तेँ परती टुटबाक चाही। ‘यात्रा’ कविताक ‘मा’ शब्दक संबोधन मे कवि आत्मभावक यथार्थता देखै चाहै छथि। ओ कहैत छथि – ‘हम’ केर रुप मे के ‘हम’, सांसारिक मकड़जाल मे ओझराओल हमर आचरण आकि आचरण मे आत्मबोध?
‘सुखि गेल गाछ’ कविता मे पुरखा द्वारा लगाओल गाछ पर कविक झुलैत नेन्हपन आ ओ गाछ सुखैलाक बाद घरक बनल उपकरण मे कविक संवेदना, जखन ओ उपकरणक रुप मे सुखाओल गाछ सँ बनल चौकी पर कविक जुआनीक थकान केँ मेटाबैत अछि, पुरखाक लगाओल आ पुन: सुखाओल गाछक बनल उपकरणक उपभोग करैत कविक संवेदना देखू –
‘कहियो नेन्हपन मे
एहि ठारि सभ पर झुलैत
हँसैत-गबैत
चिबौने छलहुँ टिकुला
लाल-पीअर-सनहुला फलमे
गड़ौने छलहुँ दांत
पओने छलहुँ अमृत-रस
तृप्त भऽ गेल छल मोन-प्राण…………’
आ ओ गाछ जखन सुखा जाइत अछि तखन कविक ओहि गाछ सँ आत्मिक भाव आत्मसंतुष्टि प्रदान क` रहल अछि। यथा –
‘………
दिन भरिक भागमभागसँ
थाकल आ निस्तेज
पड़ैत छी अपन चौकी पर
आ जखन अबैत नहि अछि निन्न
तखन थपकी दैत
आ लोरी सुनबैत अछि
पुरखाक ममत्वसँ लबालब
ओ सुखि गेल गाछ’
अन्तत: इएह जे कवि-कथाकार श्री अरविन्द ठाकुरक साहित्य-साधना सहितस्यक भावना केँ पल्लवित आ पुष्पित करैत अछि। जखन पल्लवित आ पुष्पित होइत अछि ओ साहित्य-साधना रुपी वृक्ष, तखन तकर जे फल अबैत अछि, ओ अमरत्व प्रदान करैत अछि अर्थात कालजयी होइत अछि। एहन कालजयी रचनाकार अरविन्द ठाकुरक प्रति हमर शतश: साधुवाद। बदला मे समर्पित हमर अभावक भाव।
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