विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब: ‘ट्रान्सफर्मर’ कथा-संग्रहक सन्दर्भ

अरविन्द ठाकुर · 2015-11-01 · अंक 189

एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब
( सन्दर्भ : हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ ट्रान्सफर्मर “ )
-अरविन्द ठाकुर
ई मानल जाइत अछि जे साहित्य मे कोनो चीज बेमतलब नहि होइत अछि, शब्द त शब्द, अर्धविराम, विराम वा विस्मयाधिबोधक चिन्ह तक, आ तेँ जखनि कोनो कथाकार अपन संग्रहक प्रस्तुतिकरण करबा लेल कथा-क्रम सँ पहिने कोनो वरिष्ट लेखकक लिखल भुमिका संग-संग अपनहुँ दिस सँ किछु बात कहैत अछि त ई मानल जएबाक चाही जे ई साभिप्राय अछि आ ओ एहि दुनूक संग अपन कथा-जगत केँ बुझबाक लेल पाठक लोकनिक सहायता हेतु कुंजी प्रदान कए रहल अछि, एकटा औजार दए रहल अछि जे एकरे माध्यम सँ हुनकर रचना-भंडारक ताला खोलल जाय, ओकर कपाट खोलल जाय। ई परम्परा वेद-काल सँ आबि रहल अछि, जेकर वाचिक परम्परा मे अंगुरीक माध्यम सँ उदात्त, अनुदात्त आ त्वरितक संकेत कएल जाइत रहै आ तेकरे अनुसार बाजल गेल शब्द वा वाक्यक अर्थ ग्रहण कएल जाइत रहै। आजुक लिखित वा मुद्रित परम्परा मे ई काज भुमिका आ लेखकीय वक्तव्यक माध्यम सँ होइत अछि। एहि प्रक्रिया मे किन्तु कएकटा खतरा अछि। कोनो रचनाकार लग ओकर जन्म सँ अद्यावधि तक के अनेक अनुभव संचित रहैत अछि जे ओकर चेतनाक अर्ध वा अव अवस्था मे रहल भए सकैत अछि। ई आवश्यक नहि जे रचनाकार सचेतन रुप मे स्वयं अपन रचना केँ आपादमस्तक बुझि लिअए। तखनि भुमिका लेखक वा प्रस्तुतकर्ता ओकर गत्र-गत्र केँ ओकरहु सँ नीक जकाँ बुझि लेता से मानब त आओर कठिन अछि। आ जँ हुनक ( प्रस्तोताक ) उदात्त, अनुदात्त वा त्वरितक संकेत मे कनिओ एने-ओने भेल कि अर्थक अनर्थ निकलए लागत, प्रस्तुत रचनाक अन्तर्वस्तुक माने ओझराबए लागत। आधुनिक युग तक आबैत-आबैत साहित्य विकासक विभिन्न सोपान सँ गुजरल अछि आ तेँ अजुका साहित्यक नाप-तौलक लेल आदिकालीन बटिखरा उपयोगी हएत कि नहि से विचारणीय। कविता आ कथाक विधाक जे अंतर अछि से अलग, आ अजुका साहित्य वेद सेहो नहि अछि से त आओर अलग।
हीरेन्द्र कुमार झाक कथा-संग्रह “ट्रान्सफर्मर“ के प्रस्तुतिकरण लेल दू-दू टा अकादमी-पुरस्कृत साहित्यकारक टिप्पणी, भुमिका आ स्वयं कथाकारक अपन पक्ष राखबाक काज कएल गेल अछि। तेँ पारम्परिक मान्यतानुसार हिनक संग्रहक कथा सभ मे पैसबाक लेल ई तीनू वस्तु प्रमुख उपकरण भए जाइत अछि। एतय एकरहि आधार मानि एहि संग्रहक अन्तर्वस्तु दिआ किछु कहबाक प्रयास कएल जाए रहल अछि।
एहि संग्रह मे तेरह टा कथा संग्रहित अछि जाहि मे पाँच कथा विध्यार्थी जीवन मे लिखल बासी आ आठ कथा साहित्यकार जीवनक लिखल टटका बताएल गेल अछि। टटका कथा मे पहिल “परिचिति” नैहर मे सुधाक विवाहपूर्व आ विवाहोपरांत बदलल स्थिति दिआ अछि। कथाक लेल ने ई विषय नव अछि आ ने एकर प्रस्तुतिकरण मे कोनो नवीनता अछि। अपना सभक जे समाज अछि ताहि मे ई एकदम सामान्य गप अछि आ प्राय: सभ संबंधित पक्ष एकर अभ्यस्त अछि। दोसर कथा “सोन त कान नहि” सामाजिक-साम्प्रदायिक सौहार्द्य पर एक नीक कथाक संभावना तक सिमटि कए रहि गेल अछि। कथावाचकक ममिऔत द्वारा हुनका घर नहि लए जाए कए गामक पीपरक गाछ लग छोड़ि झाड़ा फिरए चलि जाएब व्यवहारिक शिष्टाचारक विरुद्ध त अछिए, अतार्किक आ असहज सेहो अछि। कथा केँ आगू बढैबाक लेल एहन बेतुक प्रयोग कथाकारक विश्वसनीयता कम करैत अछि। कोनो केन्द्र नहि बनला सँ ई कथा अपेक्षित प्रभाव नहि छोड़ैत अछि। “आत्मा वा अरे द्रष्टव्य:” सोल्हकन आ द्विज पात्रक तुलनात्मक कथा कहैत अछि। आदर्शवादिताक छौंक संग समताक संदेश देबाक कथाकारक प्रयास बनावटीपनाक चलते कारगर नहि भए सकल अछि। “धनात धर्मम्” वनक्षेत्रक जनवास मे बदलब, कंक्रीटक जंगल सँ प्रकृतिक पलायन आ धर्मक नाम पर क्षुद्र स्वार्थी तत्वसभक कठखेल सन महत्वपूर्ण विषय पर लिखल कथा अछि। कथाकारक चेतनाक विभिन्न स्तर पर बहुत रास स्मृतिसभ छनि आ से एहि कथा मे प्रचूर मात्रा मे आएल अछि किन्तु तारतम्य आ मात्रा-संतुलनक अभाव मे बनल मिश्रण पाठकोचित वांछित स्वाद सँ वंचित रहि गेल अछि। ”उभयचर” दीर्घ-कथा बला विस्तार लेने ग्रामीण आ शहरी मानसिकताक विरोधाभास आ द्वन्द्वक कथा अछि। एहि कथाक अनावश्यक विस्तार अपन औचित्य सिद्ध करबा मे विफल भेल अछि आ अंत मे नायक द्वारा अनिताक कन्हा पर हाथ राखि ठंढा पीबाक प्रस्ताव देब त एकदम फिल्मी भए जाइत अछि। “ट्रान्सफर्मर” राजनीतिक लम्पटपना आ प्रशासनिक लरगुजपना पर एकटा उत्तम कथा बनैत-बनैत रहि गेल अछि। एहि कथा मे किन्तु पठनीयता छै आ एहि कथा तक आबैत-आबैत कथाकार अपन विस्तारणक फार्मूला पर नियंत्रण साधैत परिपक्व होइत देखाइ छथि। “कम्प्रोमाइज” मे एकटा स्त्रीक भावना व्यक्त करबाक प्रयास भेल अछि जेकर विवाह लेल ओकर इच्छा-अनिच्छा नहि पुछल गेल अछि। ई कथा पुरुष लेखक द्वारा नारी-मनोविज्ञानक गलत आ असफल विश्लेषणक साक्ष्य अछि। कथाक असफलताक मूल कारण अछि नायिका पुतुलक चरित्रक विकास मे कथाकारक अक्षमता। ओकर चरित्र एकदम लरगुज सन लगैत अछि, संघर्षक लेशमात्र नहि अछि एहि पात्र मे। एहि कथा मे एकटा अपचनीय गप ई छै जे कालेज मे पुतुलक एगारह बजे घुरबाक बात ओकर भाइ केँ कहल गेलनि, तखनि पुतुल मार्निंग शो सिनेमा देखए केना गेलीह? “भीआरएस” मे गज्जू बाबूक रहन-सहन, हुनक सम्पत्ति, नौकर-चाकरक विस्तारित विवरण औपन्यासिक संरचना जकाँ आ कथा लेल अनावश्यक बुझाइत अछि किन्तु ओकर युक्तिसंगतता बाद मे बुझाइत अछि। मशीनीकरण सँ मानव आ ओकर श्रमक घटैत महत्व पर ई बहुत योजनाबद्ध, सुविचारित आ सोंटल कथा अछि।
बासी आ खिच्चा घोषित कएल गेल एहि संग्रहक अन्य पाँच टा कथा अपन कथ्य आ संरचनाक दृष्टि सँ कथा-तत्व आ विषय-वैविध्य सँ बेसी भरल-पूरल रचना अछि। “रोगही” नैतिकता-अनैतिकताक झमेल सँ मुक्त एकटा अतिनिम्नवर्गीय परिवारक कथा अछि जे बहुत नापल-जोखल आ पठनीय अछि। “असमंजसक अंत” एकटा हास्य कथा अछि आ एहि मे हास्य छै। “डाइरीक एक पन्ना सँ” एकटा घटनाक विवरण अछि जे कथा नहि बनि सकल अछि किन्तु एहि मे जे भावनात्मक तत्व छै से पाठक केँ छुबै छै। एहि कथा मे ई बात नहि पचैत अछि जे घर मे पीसी छथिन आ ओ नायक केँ राखी बान्हि लेबाक लेल कहै छथिन, तखनि नायक कोठरी मे ताला लगाए कए होटल मे खाइ लेल किऐ जाइत अछि। “भोट” चोराकए आनल गेल लीची आ लुटिकए आनल गेल जिलेबी खाइत बेदरा सभक खेलौरक बीच वोटक गपक विवरण अछि जाहि मे ओ सभ वोटक खरीद-बिक्री आ दलबदलक चर्चा करैत अछि। राजनीतिक चरित्रहीन दोगलपनी आ लोकक विरोधाभासी चेतनाक झलक संकेत रुप मे, किन्तु बहुत स्पष्टताक संग एहि कथा मे आएल अछि। एहि कथा पर ललितक “प्रतिनिधि” कथा के विषय आ शैलीक प्रभाव देखाइ दैत अछि। “भसान” एकटा मानव शरीर आ पूजाक निमित्त बनल प्रतिमाक माध्यम सँ अनश्वरताक कथा कहैत अछि।
आलोच्य संग्रहक कथाकार हीरेन्द्र कुमार झा घोषित करै छथि जे ओ पाठक छथि, पाठके रहै चाहै छथि आ इहो जे ओ वस्तुत: जीवन केँ पढै छथि। हुनक ई घोषणा महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बेसी लेखक केँ पढै सँ परहेज रहै छनि। बेसी लेखक मैथिली मे चारि पंक्ति लिखलाक बादे स्वयं केँ वेदव्यास मानै लागै छथि। एतय पाठक लेल कम गुरू-आचार्य-महंथ-पीठाधीश आदि-इत्यादि सँ परिचिति, प्रमाण-पत्र, सम्मान आ पुरस्कारक आकांक्षा-लिलसाक वशीभूत भए बेसी लेखन भेल अछि। आ से स्तरीय लेखन सँ नहि साहित्य लेल वर्जित आन-आन तरीका सँ भेटि जाएब मैथिलीक दस्तावेज मे दर्ज अछि आ तेँ मैथिली साहित्यक बहुलांश पोखरि-माछ-मखान, भांग, सामा-पौती, अरिपन, तिलकौर, अरिकंचन आदि मे घुरिआइत रहैत अछि। तेँ हीरेन्द्र जीक पाठक हएबाक घोषणा स्वागत योग्य। आलोच्य संग्रह एकर लेखकक पाठक हएबाक संकेत दैत अछि किन्तु कने दोसर तरहेँ। ओ पाठक छथि किन्तु मैथिलीक प्राय: किछु खास अंशक। अन्तर्राष्ट्रीय वा अन्य भारतीय भाषा साहित्यक गप अलग, मैथिलिओ मे हुनका प्राय: शैलेन्द्र कुमार झा, रमेश, नारायण जी, अरविन्द अक्कू, शैलेन्द्र आनन्द, कुमार पवन, श्याम दरिहरे, अजित आजाद, विभा रानी आ आशीष चमन सन-सन अनेको नीक किस्सागो सभक कथा साहित्य नहि पढल बुझाइ छनि। सुभाष चन्द्र यादव आ जगदीश मंडलक कथा त ………। जँ पढल छनि त हुनक ई संग्रह तेकर प्रमाण नहि दैत अछि। एहि लेल किन्तु हीरेन्द्र जी केँ असगरे दोषी नहि ठहराएल जाए सकैत अछि। मैथिली मे लेखक त लेखक, कथा साहित्य पर समीक्षा लिखनिहार, सम्पादक-संग्रहकर्ता मे अनेक एहेन नामवर विद्वान सभ छथि जिनकर दृष्टि अपन टोल, गाम, आ लगपासक कथाकारक कथा सँ बाहर नहि जाए पाबैत अछि। किछु ज्ञानी महानुभाव एकरे प्राय: “मैथिल आँखि” कहै छथि। एहि तथाकथित विद्वान आलोचक-प्रवर सभक आलोचना पोथी सभ मे घुमाए-फिराए कए ओतबे कथा आ कथाकारक चर्चा भेटैत अछि जेकरा संग हुनक ऊठ-बैठ छनि वा जे सभ हुनक लगुआ-भिरुआ छथि, अनचोक्के कोनो आन नाम चलि आएल त से अलग बात। मैथिलीक इएह चलनक प्रताप अछि जे ललित केँ हुनक मृत्यूक बाद चिन्हल गेलनि आ शैलेन्द्र कुमार झा (आरोह-अवरोह) सन महत्वपूर्ण कथाकार अपरिचित रहि मुख्यधारा सँ कटि गेला। पुस्तक प्रकाशन आ वितरणक संग-संग पाठक तक पहुँचबाक समस्या सेहो मैथिली लेल कोंढ जकाँ भए गेल अछि किन्तु कोनो समीक्षक एकरा बहाना बनाए अपन अज्ञानक लेल एकरा अपन अढ बनाबथि, सेहो स्वीकार्य आ क्षम्य नहि अछि। “ट्रान्सफर्मर” के उदाहरण लिअ जे अखनि तक हमरा अप्राप्य छल आ कमल मोहन चुन्नू जीक माध्यम सँ समीक्षार्थ हमरा उप्लब्ध कराएल गेल। हमर अपन व्यक्तिगत पुस्तकालय मे पोथीसभक प्रचूरताक अछैतहु जँ हमरा मैथिलीक समग्र कथा-साहित्य पर लिखबाक रहितए त की हमर कर्तव्य नहि बनैत छल जे हम अपन प्रयास सँ ई आ अपना लग अनुप्लब्ध आन-आन कथा-संग्रह एकठ्ठा करितहुँ आ तखनिए ओहि विषय पर अपन कलम चलैतहुँ?
आलोच्य पोथीक अध्ययन सँ हीरेन्द्र कुमार झाक पाठक होएबाक घोषणाक पुष्टि हएब कने कठिनाह बुझाइत अछि। खबर केँ अखबार बुझि लेब एकटा अलग गप अछि। ओना “ट्रान्सफर्मर”क कथा-जगत सँ गुजरैत ई कहल जाए सकैत अछि जे एहि संग्रहक माध्यम सँ हीरेन्द्र कुमार झा मैथिलीक बहुत रास प्रायोजित कथाकार सभ सँ बहुत आगू गेल छथि। हीरेन्द्र जीक आग्रह छनि जे हुनक कथासभ केँ मैथिली कथा-साहित्यक धारा केँ ध्यान मे नहि राखि, सामाजिक परिवेश आ ओहि मे जीबैत उपभोक्तावादी मनुष्य केँ ध्यान मे राखि पढल जाय। हुनक एहि आग्रह मे जँ किनको गर्वोक्ति जकाँ बुझाबए त हमरा कोनो अचरज नहि हएत। ओ एकर माध्यम सँ अपन कथाक विराट फ़लक दिआ संकेत करैत बुझाइ छथि किन्तु हुनक पोथीक अन्तर्वस्तु एहि बातक कनिको टा समर्थन करैत नहि देखाइत अछि। हुनक कथासभ निस्सन्देह सामान्य सँ उपर अछि किन्तु मैथिलीक वायवीय आलोचना-समीक्षाक पटल पर अखनि तक अचर्चित आ अनठिआएल अनेक रास प्रतिभावान कथाकार जाहि मे किछु गोटेक चर्चा उपर कएल गेल अछि, तक पहुँचबा मे अखनि हुनका समय लगतनि, अपन घोषणाक प्रवृत्ति पर नियंत्रण राखि प्रयासरत रहए पड़तनि।
ई ध्यान राखल जएबाक प्रयोजन अछि जे सामान्य पाठक आ रचनाकार पाठक मे मौलिक अंतर होइत छै। सामान्य पाठक जे पढैत अछि तेकरा ओ स्थूल रूप मे ग्रहण करबा लेल, स्मरण राखबा लेल स्वतंत्र अछि, स्वच्छन्द अछि। रचनाकार पाठक जँ एना करत त ओकरा मे भटकाव एतै। रचनाकार पाठक कोनो पोथी पढओ कि जीवन केँ पढओ, ओकरा लेल ओ सभ कच्चा माल जकाँ अछि आ ओकरा सँ ई अपेक्षा रहैत अछि जे ओ एकरा सभ केँ शुद्धता सँ ग्रहण कए अपना भीतर मथि कए, पचा कए अपन काज जोगर सूक्ष्म-तत्व केँ निकालि लिअए। आलोच्य संग्रह ई संकेत दैत अछि जे हीरेन्द्र जी एहि प्रक्रिया केँ अखनि तक साधि नहि सकल छथि आ तेँ ओ अखनि भटकावक शिकार होइ छथि। ई भटकाव हुनक कथा सभ मे विभिन्न रूप मे आबैत अछि जाहि मे अनावश्यक आ अनौचित्यपूर्ण विस्तार एकटा कारक अछि। साहित्यक कोनो विधा मे कोनो वाक्य, कोनो शब्द फाजिल नहि होइ छै आ जँ भेलै त ओ पाठक केँ वा त भ्रमित करैत अछि वा बोर। रचनाकारक काज पाठकक धैर्य वा समझदारीक परीक्षा लेब नहि होइ छै, से ध्यान राखल जएबाक चाही। पाठक हएबाक घोषणाक बाद त हीरेन्द्र जी सँ किछु बेसीए अपेक्षा हएबाक चाही। “सोन त कान नहि”, “धनात धर्मम्”, “उभयचर”, “भीआरएस”, आदि एहि संग्रहक कथा सभ एहि विस्तारजनित भटकावक शिकार भेल अछि।
एहि संग्रहक अनेक कथा एहि महत्वपूर्ण तथ्य दिस सेहो संकेत करैत अछि जे कथाकार शीर्षकक महत्व केँ गंभीरता सँ नहि लेलनि अछि। ई ध्यान राखल जएबाक चाही जे कथाक शीर्षक कथाक ताला केँ खोलबाक सटीक कुंजी होइत अछि, संग्रहक भुमिका नहि। एकटा सटीक शीर्षकक उपयोग कोनो कथाक अर्थ केँ व्यापकता, रूप केँ वास्तविकता आ अन्तर्वस्तु केँ समग्रता सँ भरि दैत अछि। कखनिओ-कखनिओ त जे बात संपूर्ण कथा मे प्रत्यक्षत: कतहु नहि देखाइत अछि से ओकर शीर्षक जगजियार कए दैत अछि। उदाहरण लेल शैलेन्द्र कुमार झाक “आरोह-अवरोह”, शैलेन्द्र आनन्दक “घरमुहाँ”, अरविन्द ठाकुरक “अन्हारक विरोध मे” (अपन पोथीक चर्चा लेल क्षमासहित), श्याम दरिहरेक “बड़की काकी एट हाटमेल डाट काम”, विभा रानीक “खोह सँ निकसैत”, रमेशक “दखल” आ “समानान्तर” आदि संग्रहक कथा आ नारायण जी, अरविन्द अक्कू, कुमार पवन, अजित आजाद, आशीष चमन आदिक विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित कथा सभ केँ देखल जएबाक चाही। पुरनका पीढी मे ई खासियत आ सजगता ललित, धूमकेतु, राजकमल चौधरी, बलराम, प्रभास कुमार चौधरी आदिक कथा मे देखाइ पड़ैत अछि। हीरेन्द्र जीक “सोन त कान नहि”, “कम्प्रोमाइज” सन कथा सटीक शीर्षकक अभाव सँ ग्रसित भेल अछि। “कम्प्रोमाइज” शीर्षक केँ जस्टिफाइ (न्यायोचित सिद्ध) करबाक लेल त कथाकार एहि कथाक दशे-दिशा बिगाड़ि देने छथि। एना लागैत अछि जे शीर्षक पहिने देल गेल आ कथा बाद मे लिखल गेल अछि। एहि मे कथाकार पुतुलक मानसिक उहापोहक (जेकर कोनो तर्कसंगत औचित्य नहि बुझाइत अछि) वर्णन करैत-करैत, नारीवादक अनेरुआ पैरोकार बनैत-बनैत एकदम सँ पुरुषक पक्ष मे चलि जाइ छथि। बिगड़ल केँ सम्हारए आ स्वयं केँ आधुनिक आ नारीवादी देखैबाक चक्कर मे कथाकार एकटा प्रेम-मनुहारक कथा केँ गलत शीर्षक दए आ फेर ओहि शीर्षक केँ जस्टिफाइ करबाक लेल कथाक अंत मे पुतुल सँ कम्प्रोमाइज बला गप कहबा कए अनेरे भ्रमित होइतहु छथि, करितहु छथि। कथाक समापन जाहि भावनात्मक ढंग सँ होइत अछि ताहि मे कम्प्रोमाइज सन गप कतय सँ अएलै से पाठक सोचितहि रहि जाइत अछि। कथाकारे जँ अपन कथाक कथ्यक प्रति भ्रमित रहत त ओ मूल रूप मे पाठक केँ केना पचतै?
हीरेन्द्र जीक दुराग्रहक हद तक जाइत एकटा आओर आग्रह अंगरेजी शीर्षकक प्रति एहि संग्रह मे देखाइत अछि। जँ एकरासभ केँ लोक-वेदक बीच प्रचलित हएबाक तर्क केँ सोझाँ राखिओ ली त एकर भ्रष्ट प्रयोगक की औचित्य? ट्रान्सफार्मर, वोट, क्वार्टर, रिजर्वेशन,वीआरएस शुद्ध प्रयोग हेतै, ट्रान्सफर्मर, भोट, क्वाटर, रिजर्भेशन, भीआरएस नहि, जेनाकि लेखक कएने छथि। ओना त मैथिली मे प्रचण्ड-शुद्ध रामराज छै। जेकरा जेना मन होइ छै तहिना लिखै ए, अपन वर्तनी अपने बनबै ए। मैथिलीक पुरोधा साहित्यकार-व्याकरणाचार्य लोकनि वर्तनीक एकरूपताक नाम पर फाइव-स्टारी मौज लैत लाखक-लाख यात्रा-भत्ता उठाए रहल छथि आ फेर अपन कबीला मे घुरि अपनहि धुन-ताल पर गाबले गीत गाबि रहल छथि। तेँ असगरे हीरेन्द्र जी पर दोष किऐ देल जाए?
हीरेन्द्र कुमार झा जन-जीवनक नीक पर्यवेक्षक छथि आ से बात हुनक घोषणाक अनुसार हुनक एहि संग्रह मे परिलक्षित सेहो होइत अछि। किन्तु एतहि हुनक एकटा कमजोरी सेहो अभरि कए सोझाँ आबैत अछि। रचनाकारक चहुतरफ बहुत रास चीज अपन बहुआयामी रूप मे उपस्थित अछि आ बहुत रास उथल-पुथलक संग अनेक रास घटना घटैत रहैत अछि। स्रृष्टिक ई विविधता आ व्यापकता जे छै से रचनाकारक लेल रा-मैटेरियल अछि आ तेकरा मे सँ रचनाकार अपन रचनात्मक बुद्धि-विवेक सँ अपन काजक वस्तु चुनि समुचित मात्रा मे रचनाक विभिन्न विधाक बेगरतानुसार ओकर उपयोग करैत अछि। क्वालिटी आ क्वान्टिटी (गुण आ मात्रा) के सटीक समिश्रणे सँ कोनो नीक आ अमोल रचना बनि कए बहराइत अछि। से नहि भेने रचना धड़ाम! रचनाकारक आब्जर्वेशन (पर्यवेक्षण) के क्रम मे जे किछु पकड़ाएल ताहिसभ केँ एकहि ठाम जेना-तेना ठुसने जाइ त ओ साहित्य नहि भए कए किदन-कहाँदन त भैए जाएत, रचनाकारक चयन-ग्रहण-विवेक पर प्रश्न सेहो ठाढ करत। कथाकार हीरेन्द्र जीक पर्यवेक्षण क्षमताक गवाही त आलोच्य संग्रह दैत अछि किन्तु गुण आ मात्राक तालमेलक समझ अखनि तक हुनक सम्हार मे आएल नहि बुझाइत अछि। एकर नतीजा ई भेल अछि जे ओ कथा कहबाक सत्ती कथा बनबै मे लागल बुझाइ छथि आ ओकर विश्लेषण आ निष्कर्षक काज सेहो संगे-संग करैत चलै छथि। संभव अछि जे ई प्रयासपूर्वक नहि, अपन अवचेतनक निर्देश पर करैत होथि, किन्तु एहि प्रवृत्ति पर नियंत्रण साधबाक लुरि त हुनका अपने विकसित करै पड़तनि। किऐक त एहि सँ कथाक रोचकता आ पठनीयता पर नकारात्मक असर पड़ैत अछि। हीरेन्द्र कहै छथि जे हुनक कथा मे “एकटा ढंगक चरित्र निर्माण नहि भए पबैत अछि”। जँ ओ अपन एहि कमजोरी केँ चिन्है छथि त हुनका “कम्प्रोमाइज” सन कथा लिखए सँ परहेज करबाक चाही। शीर्षक आ कथाकारक मंशाक अनुसार एहि कथा मे नायिकाक सक्कत आ संघर्षशील चरित्र अभरि कए अएबाक चाही छल किन्तु तेकर विपरीत ओ एकदम सँ लरगुज भए गेल अछि।
तखनि, संग्रहक भुमिका मे भीमनाथ झा लिखै छथि जे हीरेन्द्र जी केँ विकासक आर आवश्यकता छनि, कथा केँ कसब सीखथु, मर्म केँ स्पर्श त करैत अछि मुदा प्रभाव केँ आर तीव्र बनयबाक चेष्टा करथु, भाषा केँ आर माजथु ; आ ओतहि विभुति आनन्दक मन मे ओ एकटा खिच्चा सपना बनि कए डिभिआएल छथि ; आ आओर त आओर स्वयं कथाकार अपन एहि संग्रह केँ कथा-संग्रह नहि कहि, कथाक मोटरी वा बोझ सनक कोनो वस्तु कहब केँ बेसी उपयुक्त बुझै छथि ; तखनि कोनो पाठक वा समीक्षक लेल आओर किछु विशेष कहबाक जोगर बचैत की अछि – शुभकामनाक अतिरिक्त। 1995 मे मराठीक सुप्रसिद्ध साहित्यकार कुसुमाग्रज (वि वा शिरवाडकर) सँ नासिक(महाराष्ट्र) मे भेंट आ दीर्घवार्ताक सौभाग्य भेटल छल। ओ एकटा मंत्रवाक्य कहने छला – “ लिखू, खूब लिखू, लिखले सँ भाषा समृद्ध होइत अछि”। कुसुमाग्रजक ओहि मंत्रवाक्यक परिपेक्ष्य मे ई त कहले जाए सकैत अछि जे हीरेन्द्र कुमार झाक “ट्रान्सफर्मर” सँ मैथिली साहित्य समृद्ध भेल अछि – श्रीवृद्धि करओ नहि करओ, मात्रावृद्धि त भेबे कएल।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: अरविन्द ठाकुर. “एकटा खिच्चा सपनाक डिभिआएब: ‘ट्रान्सफर्मर’ कथा-संग्रहक सन्दर्भ.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/एकटा-खिच्चा-सपनाक-डिभिआएब-ट्रान्सफर्मर-कथा-संग्रहक-सन्दर्भ.htm

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