परती टूटि गेलै
-मुन्नाजी
सनातनी रचना प्रकियामे आबि रमि गेला। अगिला पाँतिक पछिला सेवक जकाँ नै। अपन लूरि-बुद्धिसँ बनाओल लीख धऽ लेलनि। आगाँ बढ़ि संगोरभेटलनि। मुदा ओइ संगोरसँ उत्साहित रहितो चौबटिया तकैत रहलाह। जतै गर लगलनि अपनाकेँ कतिया अपन सोच-विचारसँ अड्डा जमा लैत छलाह।संगबैया सभकेँ लागनि कठाइन। तखन ओ सभ शुरू कऽ दै छलाह हुनक अदगोइ-बदगोइ। अपन आन-बान-शानक रक्षार्थ सोचि आगाँ बढ़बाक चेष्टाकरैत रहैत छलाह। मुदा फेर वएह रामा वएह कठोलबा। किएक तऽ अपनाकेँ कतिया कऽ रखबामे हानि होइन। कियो अहंकारी तँ कियो निरंकारी कहनि।मुदा हम हुनकर सोचें हुनका चमत्कारी बुझै छी।
अपन नव आँखि-पाँखिसँ ओ उत्कृष्ट रचनाकारक रूपें देखार भेला। अरविन्दजी जखन कविता लिखब शुरू केलनि तखन ओ खेत उपजाउ नै छलै। उस्सरछलै, परती पड़ल छलै। अपने नित नव रचनासँ ओकरा जोति कोड़ि दूनू पक्षकेँ चित्रित करबाक सफल-असफल प्रयास करैत रहलाह। एक दिस वंशानुगतवा परंपरानुगत अपन सनातनी सोचकेँ रखलनि तँ दोसर दिस सामंती सोचसँ पीड़ित समाजक ओइ वर्गकेँ चिन्हित कऽ रचनात्मक रूपें चरियबैत रहलाह।हुनक रचनामे उच्च वर्गक संग निम्न वर्गक समाजिक दशा-दिशा एकै संग अभरि कऽ सोंझा अबैत रहल।कतौ अहंकारक समावेश नै। सगरो अपन सोचकचिरहारा खेलैत सब रचना समाजक सब वर्गसँ उखड़ि सोंझा आएल अछि। एक कविक मानसिकता जे झाँपल चीजकेँ उघारि सोंझा आनए तकर माँजलकलाकार छथि अरविन्द जी। एखनो अपन उत्कृष्ट समाजिक आ गमैया परिवेशकेँ सहेजि कऽ रखने छथि। समाजक सब पक्ष जाहिमे अपन समवेत स्वरउभारबाक प्रयासमे सफल देखाइ छथि।
गाममे रहि कऽ अरविन्दजी गमैया सोचकेँ उभारबाक पूर्ण प्रयास करैत रहलाह। ओ जमींदार मात्र नै एकटा गिरहथक भूमिकाक निर्वाह करैत रहलाहअछि। तें हिनकर रचनामे गमैया जीवन आ गामक आचार-विचार संस्कार प्रस्फुटित भऽ सकलनि। किछु गोटे अपनाकेँ गाममे रहि गमैया रचनाकारकदंभ भरैत छथि मुदा अरविन्दजी गामसँ शहर, महानगरक जीवनक सुख-दुख भोगियो कऽ गमैया जीवनक उत्कृष्टता अपन रचनामे देखबै छथि। गमैयाशब्दक ठाम-ठीम प्रयोग जगदीश प्रसाद मंडलजीक पछाति हिनक रचनामे सहजहिं अभरत। 2011 मे विहनि कथापर किछु गोटे जहन झौहरि शुरू केलथितखन अरविन्दजी ओहि शब्दक पुरान प्रयोगी रहथि। बात विहनि शब्द दऽ उठलै तँ अरविन्दजी कहलखिन जे झौहरि करऽ बला सभ गिरहत नै हेता।बटैयापर खेती करबैत हेता। हम अपने खेतपर रहि सभ दिनसँ "विहनि" केर उपभोगी छी। आगाँ कहलनि जे हमर कविता आ गजलमे विहनि शब्द आओकर अभिप्राय बहुत पहिने अभरि सोझा आबि चुकल अछि। हमरा कहबाक जे अरविन्दजी गमैया शब्दवलीपर सेहो मजगूत पकड़ बनौने छथि।
कविताक पछाति अपन कथामे सेहो ई गमैया परिवेशकेँ देखौने छथि। गामक समाजिक रूपरेखाके उजागर करैत रहलाह अछि। हिनक कथा समाजक सभवर्गक प्रतिनिधित्व करैए। कविते जकाँ उच्चा आ निम्न वर्गीय सोचक बीच पुल जकाँ काज करैए हिनक रचना। कविता संग्रह "परती टूटि रहल अछि" केरहिन्दी (अनुवाद अजित अजाद)सँ हिंदी जगतमे सेहो हिनक रचना पसरल। ऐ सभहँक पछाति आएल "बहुरुपिया प्रदेशमे"। ई गजल संग्रह हिनकारचनात्मक रूपें आरो सक्कत केलक अछि। ओना तँ ऐमे प्रकाशित गजल सनातनी गजल वा संगोर जकाँ बहरहीन, छंद मुक्त अछि। मुदा बहरनुक्तोहोइत हिनक गजल सभमे गमैया सोच, गमैया शब्दक समावेश अछि जै कारणसँ हिनक गजलमे प्रवाह जकाँ आबि गेल अछि। ऐ तरहें अरविन्दजीरचनारत रहि गमैया शब्द आ एकर चित्रणसँ परती पड़ल रचनाक जमीनकेँ तोड़बाक सफल प्रयास केलनि। तँइ हिनका गामक कथाकार वा कवि कहबामेहमरा कोनो संकोच नै। विशेष कऽ गाम-समाजक आ ओकर शब्दक कोनो घटनाकेँ देखार करबाक नीयत हिनका अपन समकालीन रचनाकार सभसँ बेसीआगू बढ़ा दैत अछि।
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