विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

बहुरुपिया प्रदेश मे: एक दृष्टि

राम चैतन्य धीरज · 2015-11-01 · अंक 189

बहुरुपिया प्रदेश मे : एक दृष्टि
-राम चैतन्य धीरज
‘एकोऽहं बहुस्याम‘ क अवधारणा ई अछि जे आत्मा एकहिटा होइत अछि, मुदा प्रवृतिभेदक कारणेँ ओ बहुतो रूप मे देखार पड़ैत अछि। वस्तुत: जे भिन्नता अछि ओ भिन्नता प्रकृति वा प्रवृतिक थिकै, आत्मा वा चेतनाक नहि। प्राय: प्रवृतिए भोग आ युद्ध मे लिप्त होइत अछि मुदा जखन प्रवृति आत्मस्थ होइत अछि तँ ओ निर्द्वन्द्व अवस्था केँ प्राप्त क` लैत अछि। वर्गहीन भ` जाइछ। अर्थात प्रवृति अपन अज्ञानता सँ मुक्त भ` जाइत अछि ; तखने व्यक्ति केँ वास्तविक मुक्ति वा स्वाधीनता भेटैत छैक।
संयोग सँ एम्हर तीन-चारिटा मैथिली कार्यक्रम मे भाग लेबाक अवसर भेटल। प्राय: देखबा मे आएल जे हमर उपस्थिति नगण्य अछि। जहिना राजनीति मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक, तहिना प्राय: साहित्यकारो मे विचार आ व्यवहारक द्वैधता छैक। जहिना राजनेताक लेल जनताक भूख, गरीबी आ ओकर रोजगार समस्या राजनीतिक लेल गरमागरम मुद्दा होइत अछि, तहिना प्राय: साहित्यकारोक लेल यैह सभ कथ्य वस्तु होइत छैक। कोनो वैचारिक क्रांति नहि, कोनो व्यवहारिक आन्दोलन नहि। लगैत अछि सभ किछु थम्हि जकाँ गेल अछि। टोली-टोली आ व्यक्ति-व्यक्ति मे बँटल साहित्यकारक लेल अपन-अपन मथनियाँ छनि, जाहि मथनियाँ सँ ओ साहित्यिक सृजन आ क्रिया-प्रतिक्रिया करैत छथि। सुन`बला, पढ`बला आ बूझ`बलाक सर्वथा अभाव। लगैए जे साहित्य साहित्यकारेक लेल रहि गेल अछि।
हमर उपस्थिति नगण्य अछि माने – दर्शन-दृष्टि सँ सृजन करैबला साहित्यकार नगण्य छथि। दर्शनक एकहिटा दिशा छैक, जे विश्वशांतिक ताना-बाना बुनैत अछि आ प्रेम तथा संघर्षक भाव मे सहयोग आ सहानुभूतिक विवेक प्रस्तुत करैत अछि – ओ थिक वेदांत। वेदांत चेतनाक अखण्डता मे ‘ सर्वे भवन्तु सुखिन:। सर्वे सन्तु निरामया’क आकाश सजबैत अछि आ ओहि आकाश मे सभक सुखक कामना ओहिना करैत अछि, जेना तारा अपन प्रकाश सँ प्रकाशित हो। कविता हो, गीत वा गजल जे हो सगरे उत्साह आ उत्सवक अभाव बुझना जाइत अछि। सगरे प्रभाहीन तारा देखार दैत अछि। मुदा प्रतिरोध आ यथास्थितिक वर्णन, चित्रन सगरे देखार दैत अछि।
की कविता वा साहित्य कलात्मक रेचन मात्र थिक, जे बिना व्यवहारिक सोच-विचारक अभिव्यक्त होइत अछि ? एखनो साहित्यकारक लग संस्कृति चुनौती बनल अछि आ साहित्यकार सहित अन्य सभ वर्गक लोक हजारो-हजार वर्ष पूर्वक संस्कार मे बन्हाएल छथि – ई प्रश्न गंभीर बनल अछि। एक मात्र सर्वहाराक पक्षधरता मे लिखब साहित्यक उद्देश्य नहि होएबाक चाही, अपितु एकरा संगहि व्यवहार मे ओहि रुढिवादी जड़ता केँ तोड़ब सेहो उद्देश्य होएबाक चाही, जे आत्मोत्कर्ष मे बाधा बनल अछि। तेँ आत्म खोज आवश्यक अछि, जकर सर्वथा अभाव सन लगैत अछि। एही सँ भोगवाद आ अंधविश्वासक परिधि नष्ट होएत, जाहि मे लोक सभ घेराएल अछि।
मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो सर्वहारे प्रेमक अभिव्यक्ति थिक, जे हमरा समाजक अंतिम आदमी आ ओकर आर्थिक मुक्ति तक ल` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे आत्मवत भाव मे वर्गभेद नहि होइत छैक, मुदा प्रवृतिगत भाव मे वर्गभेद छैक। उपभोग आ संतुष्टिक बाजार गर्म छैक, एहि स्थिति मे वैचारिक दृष्टिक उपयोगिता प्रश्नांकित अछि। अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि क्रय-शक्ति, बाजार आ वस्तु पर निर्भर होइछ। वैचारिक दृष्टि मे तँ आवश्यकता निर्धारित अछि, मुदा अधिकाधिक उपभोग आ अधिकाधिक संतुष्टि जीवनक मापदण्ड भ` जाइक तँ नैतिक पाठ पढाबएबला साहित्य क्षणभंगूर आ मनोरंजनक दृष्टि बनि जाएत आ कि नहि ? भोग आ युद्ध मे सभक मन स्थिर भ` गेल अछि, ओहि स्थिति मे दर्शन आ विचारक की हेतैक? मनुष्य केँ की चाही – बाजार, वस्तु आ क्रयशक्ति – तखन विचार ल` क` की हेतैक? यैह कारण छैक जे राजनीतिक दृष्टि असफल भ` रहल अछि। क्रयशक्तिक वृद्धि होअए तेँ राजनीति मे अनीति आ पाप बढि रहल अछि। अपराध प्रवृति वा हिंसात्मक मनोभावक पाछू एकमात्र कारण क्रयशक्तिक होड़ अछि ; प्रतिस्पर्धा अछि आ अन्तत: अनैतिकता अछि – जे कोनो वर्ग केँ छोड़ि नहि रहल अछि। तेँ ओ साहित्यकार आइ प्रभावी छथि जे साहित्यक व्यवसाय करै छथि। यैह अज्ञानता थिकै, तेँ दर्शन-दृष्टिक आवश्यकता स्पष्ट भ` गेल अछि ; जाहि सँ प्रवृति आत्मस्थ भ` सकय। वस्तुत: एहि अज्ञानता केँ भेदरहित ज्ञाने समाप्त क` सकैत अछि। जाधरि मानव मे ज्ञानक संबर्द्धन नहि होएत, बौद्धिक निष्ठा नहि होएत आ निश्चयात्मक चेतनाक व्यवहार नहि होएत, ता धरि मुक्ति संभव छै की? मित्र अरविन्द ठाकुरक गजल संग्रह ‘ बहुरुपिया प्रदेश मे’ जे कह` लेल चाहैत अछि, ओकर चित्र एहि गजल-संग्रहक नामकरणेँ सँ स्पष्ट भ` जाइछ जे कोनो एहन ज्ञान नहि छैक, जे मानव मे एकात्मकता आनि सकय।
एकहि राजनेता बहुरुपियाक भूमिका मे स्वयं केँ प्रदर्शित करै छथि आ एकर प्रभाव मे जनसामान्यक बाध्यता सेहो छैक। तेँ ओ सर्वहारा हो वा अन्य वर्ग सभ मे क्रयशक्तिक होड़ मचल अछि। बौद्धिक रुप सँ जे पिछड़ि रहल छथि, आजुक परिवेश मे वैहटा पछुआएल छथि, नहि तँ प्रतिस्पर्धा मे सभ लागल अछि। श्री ठाकुर स्वयं साहित्य मे द्वैध चरित्रक स्थिति केँ स्वीकार करैत एहि पोथीक भूमिका ( अर्ज करक अछि जे………) मे लिखलनि अछि जे –“ बहुत रास रचनाकार कलाक अनेकानेक आवरण मे स्वयं केँ प्रस्तुत क` अपन रचना मे अपन वास्तविक जीवन सँ भिन्न जकाँ व्यक्त होएबाक बाजीगरी करैत छथि।“ विचार आ व्यवहारक सामंजस्य जखन टुटि जाइत छैक तँ एहीठाम सँ वैचारिक स्खलन प्रारंभ होइत अछि आ संवेदनशीलताक समस्या उत्पन्न होएत छैक। हमर ई अनुभव अछि जे कविता मे, गीत वा गजल मे जे भाव व्यक्त होइत अछि ओहि मे प्रतिरोध तँ अवश्य होइत छैक, मुदा व्यवहार मे ओहो क्रयशक्तिक बढोतरीक लेल अपस्याँत होइत छथि। चारित्रिक द्वैधता मे वैचारिक समस्याक जन्म होएब स्वाभाविक अछि। जे विचार व्यक्त करै छथि वैह जखन प्रोफेशनल छथि तँ फेर हुनक विचारक प्रभाव जनसामान्यपर जतेक होइ। तेँ साहित्य नहि तँ अंधविश्वास सँ लड़ि सकैत अछि आ नहि भोगवाद वा अधिकाधिक संतुष्टिवाद सँ।
विज्ञानक कारणेँ जे परिवर्तन भ` रहल अछि आ ओकर प्रभाव जे समाज पर पड़ि रहल छैक आ ओहि सँ जे खतरा उत्पन्न हेतैक तकर भविष्यवाणी करैत श्री ठाकुर अपन गजलक पाँति केँ सजबैत छथि, देखबाक थिक –
नइ पूजीक आन-बान, नहि ओकर शान बचत
नइ जखन खेतिहरक ठोर परहक गान बचत
दूध लेल नेना आ रोगी हाकरोश करत
नइ जखन गाम मे मालक बथान बचत
यूरो आ डालर सँ पेट भरैक भांज करू
जँ खेतक आरि नइ आ ने मचान बचत
आयातित बीया आ पटौनी अकास सँ
दैव आ विदेश बलेँ कोना किसान बचत
हरदी नइ हर्रे नइ बनियाँ सरकार मे
‘अरबिन’ पेटेन्ट सँ की बासमती धान बचत
समाजक अंतिम आदमी कथी लए अंतिम आदमी अछि? वस्तुत: शारीरिक सेवा लए अंतिम आदमी होइत अछि। जाहि ठाम बौद्धिक चालाकी छैक वा तकनीकी ज्ञान छैक, ओहि ठाम पूंजीवादी क्रयशक्ति होइत छैक आ जाहि ठाम नहि छैक, ओहि ठाम शारीरिक सेवा होइत छैक। आइयो समाज मे शारीरिक श्रम करयबलाक विपन्नता छैक, किएक तँ ओ तकनीकी ज्ञान नहि राखैत अछि। एहि वर्गक क्रयशक्ति सभ सँ कमजोर होइत छैक। ई सत्य छैक जे पूंजीपति वा मालिक वर्गक शान खेतिहर मजदूर होइत अछि, मुदा ओकर महत्व सामाजिको दृष्टि सँ कमजोर अछि – श्री ठाकुर एकर पक्षधरता मे अधिकाधिक गजलक भाव केँ प्रस्तुत कयलनि अछि। हिनक चिन्ता भारतक ओहि अवस्था सँ अछि, जाहि अवस्था मे भारत साम्राज्यवादी शक्तिक उपनिवेश बनल जा रहल अछि। देश आ गामक चिन्ता हिनक गजल मे प्रमुखता सँ आयल अछि आ सभ सँ बेसी प्रभाव ओहि चिन्ता मे अछि जाहि मे भारतीयता नष्ट भ` रहल अछि।
व्यक्तिक इच्छा आ ओकर संतुष्टिक प्रश्न पर हिनक लेखनी बहुत किछु कहैत अछि, मुदा अज्ञानता सँ मुक्तिक बाट नहि देखा पबैत अछि। तेँ सामाजिक यथार्थक चित्रन आ वर्णन होइतो कुण्ठा, संत्रास, निराशा आ प्रतिरोधक स्वर हिनक गजलक मूल राग बनल अछि। संगहि वर्तमान समाजक बदलैत चित्र आ पूंजीवादी मानसिकता मे उबडुब करैत व्यक्ति-व्यक्तिक इच्छा आ ओकर कार्यरुप तथा प्राचीन उत्पादन-व्यवस्थाक टूटैत स्थिति हिनक अभिव्यक्तिक प्रतिमान बनल अछि, संगहि हथियारक होड़ आ विश्वस्तर पर शान्तिक समस्या सेहो हिनका प्रभावित करैत छनि। तथापि हिनक चेतना अन्तत: साम्राज्यवादी खतरे सँ आहत होइत अछि। वस्तुत: ई प्रभावन ओहि वर्गक प्रति वैचारिक प्रेमक आख्यान थिक, जे मानवीय रुप सँ उपेक्षित अछि।
परमात्माक इच्छा थिकै संसार, तेँ द्वन्द्वक स्थिति बनिते अछि। मुदा सत्यक प्रत्यक्षणक संगहि द्वन्द्व निवृत भ` जाइत अछि – तेँ सत्यक अनुभव मे परमात्माक अस्तित्व इच्छा रहित भ` जाइत अछि, कामना रहित भ` जाइत अछि। अर्थात इच्छा आ कामना सँ मुक्ति। वास्तविक मुक्ति यैह थिकै, एहि मे क्रयशक्तिक चाहना आवश्यकतानुकूल उपभोग आ क्षमतानुसार कार्य मे सीमित भ` जाइत अछि। तेँ राग-द्वेषक प्रवृत्यात्मक परिधिक बन्हन टूटि जाइत छैक आ लोक परम्परागत कर्मकाण्डो सँ मुक्त भ` जाइत अछि। ई बात सत्य छैक जे वेदांत आत्माक अस्तित्व सँ अभेद केँ स्वीकार करैत अछि ; मुदा लोक ई नहि बुझैत अछि जे आत्मा प्रवृति कारण सँ भेदात्मक जगत मे होइत अछि। तेँ आत्माक अभेद होइतो प्रवृतिक भेद भ` जाइत अछि आ एही लेल प्रवृतिक दोष सँ उतपन्न आक्रामकता आ अराजकताक प्रतिकार वा प्रतिवाद अवश्य भ` जाइत अछि। अस्तु, ई नहि मानबाक चाही जे आत्मोत्कर्ष मे शांतिक लेल प्रयत्न एवं मानव मात्र मे समान भावक चेतना वेदांतेक थिक। यैह चेतना विश्व मानवताक स्थापना करैत अछि।
गजलकार श्री ठाकुर वस्तुत: वेदांत केँ एहि विचार सँ नहि देखलनि अछि, तेँ लिखैत छथि –
निगमागम-पुराण सम्मत छै- जीव अंश परमात्मा के
मच्छर लेल कछुआ सुनगाबी, ई केहन दन गप लगैए
ओना वेदांत सभहक रक्षक अछि आ विवेक सम्मत विचारक प्रधानता दैत अछि, तेँ दोसरा केँ उत्पीड़ित करबा एहन प्रवृतिक विरोध करैत अछि। आजुक रिश्ता-नाता वस्तुत: विवेक वा ज्ञान सँ नहि अछि, अपितु अर्थप्राप्ति आ भूख सँ अछि। एहि अर्थ मे मनुष्य सेहो वस्तुए मानल जाइछ, तेँ भेद-भाव सामान्य गप थिक। जा धरि इच्छा वा भूख ज्ञान वा विवेक सँ नियंत्रित नहि होएत ता धरि की वर्गहीन आत्मा वा चेतनाक समाज भ` सकैछ ; ई प्रश्न हमरा सभक समक्ष मुँह बौने ठाढ अछि। श्री ठाकुर वर्तमानक बास्तुक-विद्रुपता केँ रेखांकित करैत लिखैत छथि –
मारू, मारू, मारि भगाबू – सगर टोल मे एक्के बोल
तखन करी रक्षक के दाबी, ई केहन दन गप लगैए
पेट बनाबैछ अपन ढंग सँ सभटा रिश्ता-नाता, तेँ
हम बिहारी, तू पनिजाबी, ई केहन दन गप लगैए
वस्तुत: ठाकुर जी अपन गजल मे सामाजिक यथार्थ केँ आ व्यवसायिक विद्रुपता केँ सूक्ष्म रुप सँ रेखांकित कयलनि अछि। महत्वपुर्ण तथ्य ई अछि जे गजलक व्याकरण केँ ई ओतेक स्थान नहि देलनि जतेक शब्द आ भावात्मकता केँ। तेँ भावक क्षोभ हिनकर गजल मे नहि अछि। प्रतीक, बिम्ब आ नव उपमानक सृजनशीलता एवं कलात्मकता हिनक गजल मे महत्वपुर्ण रुपेँ व्यक्त भेल अछि, जाहि सँ व्यंजनाक मार्मिकता सिद्ध भ` जाइत अछि। अस्तु, मित्र श्री ठाकुरक दृष्टिक पैनापन मे वेदांतक समीचीन बोध अयबाक चाही, एही विश्वासक संग हिनक सारगर्भित भावक प्रति संवेदनशील छी – एही बातक संग हिनका बहुत-बहुत साधुवाद !
मानस नगर, हटियागाछी
सहरसा, बिहार

Suggested citation: राम चैतन्य धीरज. “बहुरुपिया प्रदेश मे: एक दृष्टि.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/बहुरुपिया-प्रदेश-मे-एक-दृष्टि.htm

मूल विदेह अंक / Original issue