विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलामे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य

अरविन्द ठाकुर · 2015-11-01 · अंक 189

मिथिला मे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य
अरविन्द ठाकुर
एक बेर मैथिलीक एकटा नामी-गिरामी चर्चित कवि मित्रा अपन नवप्रकाशित कविता पोथी पठएलनि आ ओहि पर किछु लिखबाक आग्रह सेहो कएलनि। आलोचक-समालोचक हेबाक लूरि नहि रहितो हम हुनक आग्रहक सम्मान करैत पोथीक पाठ कएलाक उपरान्त एकटा पत्राक माध्यम सँ ओहि पोथी पर हुनका किछु टिप्पणी लिखि पठएलियनि। ओहि पत्रा मे अनेक रास बातक संग हम इहो लिखलियनि जे ‘‘मैथिल समाजक कहियो कोनो आन्दोलनी चरित्र नहि रहलैक अछि तथापि अहाँक आक्रोश अहाँक कविता सभ मे खूब नीक जकाँ खपि जाइत अछि आ सर्वाधिक विलक्षण बात ई जे कविता मे जतय कतौ आन्दोलनी तेवर आएल अछि से कतौ सँ ओढ़ल नहि लगैत अछि।’’
हमर एहि तात्कालिक पाठकीय टिप्पणीक ओहि अंश पर कवि मित्रा दिस सँ प्रतिवाद आएल जाहि मे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्रा नहि रहबाक बात कहल गेल छल। हमरा दुनू गोटे मे दीर्घ-वार्ता भेल, दुनू गोटे बहसा-बहसी कएलहुँ आ दुनू गोटे अपन-अपन गप पर अटल रहि गेलहुँ। हुनक अपन तर्क छलनि आ हमर अपन। ओ अपन तर्क पर अखनिओ अटल छथि की नहि से हमरा नहि बुझल अछि। किन्तु हम आइयो अपन विचार, पक्ष आ तत्सम्बन्धी तर्क पर दृढ़ छी, बल्कि बाद मे भेटल प्रमाण आ अनुभव सभ सँ ओ विचार आओरो दृढ़तर भेल जाइत गेल अछि। तेँ हम आइयो एहि बातकेँ मानय छी आ तेकरा व्यक्त करए मे हमरा कोनो संकोच नहि अछि जे मैथिल समाजक आन्दोलनी चरित्र नहि अछि, नहि रहल अछि आ जाहि प्रपंची आ कपटी जीवन शैलीकेँ ई समाज आइयो अपनैने अछि, तेकरा देखैत भविष्यो मे एकर आन्दोलनी होइक कोनो संभावना हमरा कतहुँ सँ नजरि नहि आबैत अछि।
जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहियो आ आइ लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, आइयो, मैथिल समाज सत्तामुखी, सत्तापेक्षी आ सत्तापोषित रहल अछि। जहिया राजतंत्रा रहै, राजा-महाराजा-नबाब-जमीन्दारक युग रहै, तहिया वर्ण वा जाति व्यवस्थाक आधर पर ई समाज राज-संपोषित बनल रहल। आइ जखनि लोकतंत्र छै, सांसद-विधायक-मुखिया आदि जनप्रतिनिधिक युग छै, तखनि अपनावेफँ बुद्धिजीवी वर्ग कहि ई समाज राजपोषणक विशेषाधिकारक आकांक्षी बनल अछि। ई भिन्न बात जे पछिला दू-तीन दशक सँ जे सामाजिक-न्यायक दौर चलल अछि ताहि मे एहि समाजकेँ राजपोषण सुतरि नहि रहल अछि। किन्तु अहू सँ ई समाज कोनो शिक्षा वा सीख हासिल केने हुअए, से देखाइत नहि अछि। दिग्भ्रमित भेल ई समाज आब एहि पोषण-प्राप्तिक लेल नव औजार सभ खोजि रहल अछि। एहि खोजक प्रथम चरण मे ई भेल अछि जे जेना भुखल रहला पर शरीर अपन पोषण लेल शरीर मे संचित वसाक उपयोग करैत अछि, तहिना ई समाज, जेकरा वर्ग कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि, पोषण लेल बाह्य उपकरणक अभाव मे अपन भाषा रूपी वसाक भक्षण कए अपन दिन काटब शुरू केलक आ ताहि सँ संतुष्ट नहि भेला पर आब मिथिला राज्यक डुगडुग्गी पीट कए अपन पोषणक नव खोराककेँ आनबाक जोगार मे लागि गेल अछि। भाषाक महंथ आ घरानाक संग संग मिथिला राज आन्दोलनक अघक्की छुटभैया कर्त्ता-धर्ता सभक नामावली, कार्यावली देखू, महीनी सँ देखू आ अहाँकेँ सभटा कठखेल अयना जकाँ झलकए लागत। अनेक रास विरोधभास, पूर्वाग्रह-दुराग्रह सँ ग्रसित एहि वर्गकेँ अखनि भनहि ई लागओ जे ओ कोनो आन्दोलन कए रहल अछि, किन्तु जँ एहिना चलैत रहल तँ भविष्य मे ई प्रमाणित हएब सुनिश्चित मानू जे एहि हु-ले-ले-ले सँ ऊर्वरताक संभावना सँ भरल एहि धरतीकेँ उसट्ठ करबाक ई एकटा भूल मात्रा अछि।
तर्क-वितर्क आ शास्त्रार्थक निरर्थक आ परिणामहीन उद्योगक ई क्षेत्र रहल अछि आ तेँ शास्त्रार्थ लेल उताहुल बहुत गोटे तर्कस्वरूप मारिते रास आन्दोलन आ आन्दोलनकारी लोकनिक नाम गिनबाए दए सकै छथि। किन्तु ई आवरण आ मुखौटाकेँ वास्तविकताक रूप मे प्रस्तुत करबाक प्रयास मात्रा रहै, छै आ रहतै। आन्दोलन कोनो शारीरिक बाहरी प्रक्रिया नहि छै जेकरा कोनो नामकरण कए आ मुक्का देखबैत फोटो खिचबा कए हुलेलेले कएल जाए। ई चरित्रा, मन आ आन्तरिक व्यक्तित्व सँ नाभि-नाल जकाँ जुड़ल प्रक्रिया अछि आ तरे-तर निरन्तर प्रवहमान रहैबला परिवर्तनकामी प्रवृति अछि। मैथिल समाज मे एहि प्रवृतिक प्रवाहक गप जाए दिअ, एकर उत्पत्तिक श्रोतेकेँ भोथल गेल अछि आ भोथबाक ओ प्रक्रिया निरन्तर जारी अछि आ एकर प्रमुख कारक रहल अछि एहि क्षेत्राक बौद्धिक नियन्ता वर्गक द्वैध आ द्वैधीकरण।
अपन एहि व्यक्त भावना आ मान्यताक पुष्टि लेल हम किछु उदाहरणक खोज मे पुनः घुरि कए ओहि कवि मित्रा आ हुनक काव्य संग्रह पर आबए चाहए छी जिनकर उल्लेख हम एहि आलेखक प्रारंभ मे कएने छी। एहि पोथीक प्रारंभ होइत अछि कवि द्वारा व्यक्त आभार सँ। एहि मे कवि प्रायः एक दर्जन गोटेक नामक चर्चा कएने छथि जे सभ पोथीक सामग्री जुटयबा मे सहयोग आ पांडुलिपि अवलोकन एवं परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श कवि मित्राकेँ देलथिन। दोसर दिस हमरा पठाएल पोथीक प्रति मे कवि मित्रा अपन हस्तलिपि मे जे लिखने छथि, से अविकल रूप मे एना अछि - ‘मैथिलीक समर्थ रचनाकार प्रिय भाइ अरविन्द जीक लेल जे सभ सँ पहिने एहि पोथीकेँ छापबाक प्रस्ताव कयने रहथि।’ ई कवि मित्रा स्वयं आ जाहि एक दर्जन लोकक अपन पोथी मे मुद्रित रूप सँ आभार प्रकट कएने छथि से सभ मैथिल महासभा सँ संरक्षित आ पंजीकृत जाति सँ छथि आ जिनकर स्मरण अपन हस्तलिपि मे ;अमुद्रित रूप मे कवि करै छथि अर्थात् हम, तेकरा मैथिल महासभा गैर-मैथिल घोषित कए पंजीयनक महापुण्य सँ वंचित कएने अछि। एकर की माने ? ई स्थिति तखनि आओर विचारणीय छै जखनि कि कवि मित्र स्वयंकेँ वामपंथी मानय छथि, गर्व सँ एहि बातक घोषणा करय छथि, कएकटा वामपंथी आन्दोलन सँ जुड़ल रहबाक दाबी करय छथि आ कतिपय लोक एकरा सकारितो छथि। दुनियाक सम्पूर्ण तर्कशास्त्राक कोनो टा तर्क सँ की ई प्रमाणित कएल जाए सकैत अछि जे सभ सँ पहिने पोथी छापबाक प्रस्ताव देनिहार व्यक्तिक महत्व पोथीक लेल सामग्री जुटएबाक सहयोगी वा पांडुलिपि अवलोकन-परिमार्जन मे मूल्यवान परामर्श देनिहार सँ कम होइ छै। मूल्यांकनक ई विभेदी बटिखरा राजनीति वा कूटनीतिक अहितभाव सँ दूषित माहौल मे त चलिओ सकैत अछि, किन्तु साहित्य त सहित-भावक द्योतक अछि।
एहि उदाहरणकेँ हमर व्यक्तिगत मामला मानि टारल वा अनठिआएल जाए सकैत अछि किन्तु एकरा हमरा सभक द्वैध भावनाक उदाहरण त मानले जाए सकैत अछि। भौतिक आ मानसिक द्वैध। व्यक्तित्वक द्वैध। आ, ई द्वैध मैथिल समाज मे अदौं सँ रहल अछि। मैथिल महासभाक विघटनकारी आ आत्मघाती आयोजनक काल घरि आबैत-आबैत ई द्वैध अपन चरम परिणति पर, पराकाष्ठा पर, पारावार पर पहुँचैत अछि आ एतहि सँ द्वैधीकरणक प्रक्रियाक दस्तावेजी अध्यायक प्रारंभ भए जाइत अछि। एतय सँ शुरू भेल विध्वंशक पंजीकृत खेल आइयो मैथिल समाजकेँ भुतलहरी खेलाए रहल अछि। कर्मकाण्ड, पाखण्ड आ आडम्बर सन-सन रोग सँ मैथिल समाज पहिनो ग्रसित छल, मैथिल महासभाक जहरी मदिराक प्रभाव सँ ओहि मे श्रेष्ठताबोध सँ भरल छल, छद्म आ छुआछुतक महामारी सेहो पसरि गेल। मिथिला-मैथिली सँ अखण्ड रूप सँ जुडि़ एकर पर्याय बनल समुदाय एहि मैथिल महासभाक माध्यम सँ स्वयंकेँ समाज सँ काटि लेलक, अपनाकेँ मैथिल घोषित कए देलक आ आन सभ समुदायकेँ दस्तावेजी रूप सँ गैर-मैथिलक श्रेणी मे पेफकि देलक। एहि प्रयासमे ई समुदाय एकटा समन्वयवादी समाजकेँवर्ग, वर्ण, जातिक टुकड़ी-टुकड़ी मे, कूड़ी-कूड़ी मे, खल-खलमे पेफर सँ बांटि देलक आ सेहो एकटा केन्द्रीय सत्ताक दलाल शासकक छत्राछाया मे एक तरहे विध्वित रूप मे। एकर भयंकर दुष्परिणाम सभ आइ नग्न आ निर्लज्ज रूप मे एहि भूभागक कण-कण मे अपन उपस्थिति दर्ज कए रहल अछि।
भाषा आ संस्कृतिक नाभि-नाल सम्बन्ध अछि। आइ एहि भूभागक भाषा मैथिली पर मैथिल महासभाइ सभक वर्चस्व बनल अछि। साहित्य अकादमीक मैथिली पुरस्कार 44 मे सँ 42 बेर मैथिल महासभाइकेँ देल गेल अछि त वर्चस्वक आओर कोने प्रमाण देब आवश्यक नहि रहि जाइत अछि। साहित्य अकादमीक अनुवाद आदि अन्य पुरस्कारोक इएह स्थिति अछि। मिथिला-मैथिलीक नाम पर बनल पंजीकृत वा गैर-पंजीकृत सभटा संस्था मैथिल महासभा द्वारा पंजीकृत जातिक लोक सभक अधिकार मे छै आ मिथिला-मैथिलीक नाम पर आयोजित अधिकांश आयोजन मे सम्मानित, प्रशंसित, पुरस्कृत भेनिहार सभ मे महासभाइए सभक वर्चस्व छै। द्वैधीकरणक एहि प्रक्रियाक चलते गैर-मैथिल घोषित भेल आन सभ समुदाय एहि भाषाकेँ अपन बुझिते नहि अछि त एकरा संग ओ अपन तादात्म्य कोना स्थापित करत आ जखनि तादात्म्य स्थापिते नहि हएत त एकरा लेल लड़बाक, संघर्ष करबाक, आन्दोलित हेबाक प्रश्न कहाँ उठै छै ? मैथिल महासभाक आयोजनक अनेक दुष्परिणाम मे सँ एकटा इहो अछि जे किछु खास जातिक रिवाजकेँ सम्पूर्ण समाजक संस्कृतिक रूप मे परिभाषित आ क्रियान्वित करबाक प्रयास भए रहल अछि आ एहि प्रयास सँ शेष समाजक आक्रोशक आगि मे घी पडि़ रहल अछि। पाग-दोपटाकेँएकर उदाहरणक रूप मे देखल जाए सकैत अछि।
द्वैधीकरणक चरम स्थिति ई अछि जे मिथिला राज्यक तथाकथित आन्दोलनी सभ दरभंगा जिला सँ बाहर अपन कार्यक्षेत्र मानिते नहि छथि। बहुत भेल त कनी मधुबनीक पीठ हँसोथि देलौं । कोशी नदी सँ पूरब दिशाक भूभाग हुनका अपन नहि लागय छनि । ई प्रायः एहि कारण अछि जे हुनका सभक परिकल्पना मे मिथिला राज्य ने जनक के मिथिला अछि आ ने लोकतंत्रात्मक मिथिला । ओ सभ मैथिल महासभाक आयोजक दरभंगा महराजक राजक परिकल्पना आ कामना सँ क्रियाशीलताक छद्म ओढ़ने छथि । ओ सभ जनक वंशक श्रम आ कृषि-संस्कृतिक नहि, वर्त्तमानक लोकतंत्री संस्कृतिक नहि, दरभंगा महराजक बिचौलिया आ खैराती संस्कृतिक अभिलाषी छथि । मैथिली भाषाक स्थिति सेहो एहि द्वैधीकरण सँ सुरक्षित नहि रहल अछि। गैर मैथिलक गप जाए दिअ, दरभंगा-मधुबनीक मैथिली घराना, मठ आ महंथक नजरिमे कोशी जनपदक मैथिल सभ सेहो मैथिली लेखक नहि छथि, अछोप छथि । द्वैधीकरणक एहि विस्तार सँ जातिवाद, कुटुम्ब-गोधियावाद, गुट-गिरोहवादक झाड़-झंखाड़ उगायल जाए सकैत अछि, समतावादी समाजक पफसिल नहि उपजाएल जाए सकैत अछि । आ कोनो आन्दोलनक प्रथम आ अनिवार्य शर्त्त होइ छै जे ओहिमे सम्पूर्ण समाजक अखण्ड सहभागिता हुअए । कोनो आन्दोलन तखनिएँ आन्दोलनक श्रेणी मे आबि अपन लक्ष्यकेँ प्राप्त करए मे सफल भए सकैत अछि जखनि ओहि मे जाति-सम्प्रदाय, गुट-गिरोह सँ अलग हटि सर्वहाराक भागीदारी हुअए। आन्दोलन ओहि अखण्ड समाजक औजार होइ छै जे भविष्य दिस देखैत अछि आ जेकर सोच आधुनिक आ वैज्ञानिक होइ छै। एकर विपरीत हम सभ मानसिकताक बहुमत मे अतीतजीवी, पुरातनपंथी आ जड़ समाजक उत्तराधिकारी छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे परिवर्त्तनकामी होइ छै। एकर विपरीत हम सभ यथास्थितिवादक पोषक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे अपन समूल संसाधन पर समग्र समाजक अधिकार मानै छै । एकर विपरीत हम सभ जमाखोरीक मानसिकता बला लोक बनल छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे समतामूलक विचार सँ सम्पन्न आ आत्मविश्वासी होइ छै । एकर विपरीत हम सभ विभेदकारी श्रेष्ठताबोध सँ ग्रसित आ परमुखापेक्षी चरित्र राखय छी । आन्दोलन ओहि समाजक औजार होइ छै जे जोड़बाक नीति पर चलैत समन्वयवादी दृष्टिकोण राखैत अछि । एकर विपरीत हम सभ मैथिल महासभाक विखण्डनवादी नीति आ क्षेत्राीयतावादक रोगाणुक वाहक बनल छी ।
आइ ई अत्यन्त दुखद स्थिति अछि जे जाहि मिथिलाक हम सभ बेर-बेर दोहाइ दै छी से भूगोलहीन मिथकीय क्षेत्रा मात्रा अछि आ हमर सभक भाषा मैथिली किछु खास घरानाक खतियानी वस्तु बनल अछि । डीह अछिए नहि आ भाषा-संस्कृति पर धूल-धुसरित भेल एकटा राजतंत्राक प्रेत-छाया चकभाउर दए रहल अछि । एहि भाषा आ संस्कृतिकेँ व्यापकता आ सर्वस्वीकार्यता देबाक बदला किछु सीमित लोक द्वारा अपन भरण-पोषण आ अहं-पोषणक लेल दुरूपयोग कएल जेबाक परम्परा जकाँ बनि गेल अछि । मैथिल महासभाक पंजी सँ बहरूका आन बड़का जाति, छोटका जाति, दलित, आदिवासी आदि जेकरा राड़-रोहिया, सोल्हकन, वर्णसंकर आदिक कलंकित उपमासँ घिनाएल जाए रहल अछि,केँमिथिला, मैथिलीक मुख्य धरा सँ काटि-बारि देल गेल अछि । जखनि समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तानी-भरनीकेँदस्तावेजी रूप सँ राइछित्ती कए देल गेल हुअए, तखनि एतय कोनो सांस्कृतिक आन्दोलनक कोनो भविष्य कोना भए सकैछ ? जाघरि हम सभ भूतक ऐतिहासिक भूलकेँ चिन्हित कए सकारब नहि, ओहि भूल सभक परिमार्जन कए वर्त्तमानकेँ पवित्र आ उदार मानसिकताक संग निष्कंटक नहि करब, त्रुटिकेँ किन्नहु नहि दोहरयबाक सप्पथ नहि लेब, सप्पथ पर दृढ़ नहि रहब, नीक आ सकारात्मक भविष्यक कामना पफलीभूत नहि हएत ।

Suggested citation: अरविन्द ठाकुर. “मिथिलामे सांस्कृतिक आन्दोलनक भविष्य.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/मिथिलामे-सांस्कृतिक-आन्दोलनक-भविष्य.htm

मूल विदेह अंक / Original issue