विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव

अरविन्द ठाकुर · 2015-11-01 · अंक 189

लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव
अरविन्द ठाकुर
भक्ति आन्दोलनक साहित्य आ गोसांइजी
जाहि काल एहि देशक भक्ति साहित्य बनब शुरू भेल ओ काल एकटा युग संधिक काल छल। प्रथम बेर भारतीय समाज केँ एकटा एहन परिस्थितिक सामना करए पडि़ रहल छल जे ओकर चिन्हल बुझल नहि छल। अखनि तक वर्णाश्रम व्यवस्थाक कोनो प्रतिद्वन्द्वी नहि छल। आचार भ्रष्ट लोक समाज सेँ अलग कए देल जाइत छला आ ओ सभ एकटा नव जातिक रचना कए लैत जाइत छला। एहि तरहेँ यद्यपि सैकड़ों जाति या उपजाति सभ बनैत जाए रहल छल, तथापि वर्णाश्रम व्यवस्था कोनो ने कोनो तरहेँ चलैत जाए रहल छल। आब एकर मुकाबला मे एकटा एहन सुसंगठित समाज छल जे प्रत्येक व्यक्ति आ प्रत्येक जाति केँ अपना भीतर समान आसन देबाक प्रतिज्ञा कए चुकल छल। एक बेर कोनो व्यक्ति ओकर विशेष धर्म-मत केँ जँ स्वीकार कए लेलक तँ इस्लाम समस्त भेद-भाव केँ बिसरि जाइत छल। ओ राजा सँ रंक आ ब्राह्मण सँ चाण्डाल तक सभ केँ धर्मोपासनाक समान अधिकार देबाक लेल राजी छल। एहने समय मे दक्षिण सँ भक्तिक आगमन भेल जे बिजलीक चमक जकाँ एहि विशाल देशक एहि कोना सँ ओहि कोना तक पसरि गेल। भारतक जातीय तथा धर्मजीवनक एक महान संधिक्षण मे शंकराचार्यक अभ्युदय भेल। ता तक बौद्ध धर्म भारत मे लगभग 1200 वर्ष तक उन्नति-अवनतिक विविध स्तरक अतिक्रमण कए एक एहन परिस्थिति मे पहुँचि गेल छल जे भारतीय धर्म आ संस्कृतिक लेल मात्र अप्रयोजनीय नहि, हानिकारक दबाव सँ सनातन हिन्दू धर्म बलहीन, विध्वस्त आ विछिन्न भए गेल छल। एकदम अस्त-व्यस्त भेल एहि भारतीय समाज मे एक दिश चिल्लरक चउ निकालनिहार कट्टर कर्मकाण्डी सभ छला जे शास्त्रादिक अन्तर्निहित भावक उपेक्षा कए एक-एक शब्द पर कपार पफोड़बाक लेल उताहुल रहैत छलाह त दोसर दिश शून्यवादी, नास्तिक आ रूढि़भंजक लोक छला जे ओहि सभ केँ जडि़-मूल सँ उखाडि़ पफेकबाक लेल पफांड़ा बान्हने छला जे किछो पूज्य, पवित्र आ प्राचीन छल। दार्शनिक मत-मतान्तरक बीच प्रचण्ड संघर्ष छिड़ल छल आ विभिन्न धर्मिक सम्प्रदायक बीच शत्रुता विद्यमान छल। एहने विकाल मे शंकराचार्यक उद्भव भेल। शंकराचार्यक उद्भव केँ प्रचलित शब्द या अर्थ मे व्यक्त करब असंभव अछि। एकटा श्लोक मे हुनका दिआ कहल गेल अछि जे आठ वर्षक अवस्था मे ओ चारू वेदक अध्ययन कए लेलनि, बारह वर्षक अवस्था मे ओ सकल शास्त्र मे पारंगत भए गेला, सोलह वर्षक अवस्था मे ओ अपन भाष्य लिखिकए पूर्ण कए देने छला आ बत्तीस वर्षक अवस्था मे एहि संसार सँ विदा भए गेला। इएह बात शंकराचार्यक जीवन आ कर्म केँ ईश्वरीय अर्थात अलौकिक स्वरूप प्रदान कए देने अछि। शंकराचार्य सम्पूर्ण विश्वक इतिहास मे एहन एकमात्रा विजेता छथि जे ज्ञानबल केँ युद्धक औजार बनैलनि आ एकटा विशाल साम्राज्य स्थापित कए लेलनि। हुनक चलायल भक्तिक धरा दू रूप मे स्वयं केँ प्रकाशित केलक। इएह ओ दू धरा अछि जेकरा निर्गुण धरा आ सगुण धरा नाम दए देल गेल अछि आ जेकर प्रभाव भक्ति साहित्य पर हजारो वर्ष सँ पडि़ रहल अछि आ आगुओ पड़ैत रहत। साहित्यक इतिहास मे जाहि कालावधिकेँ भक्तिकालक संज्ञा देल गेल अछि ओ एहि देशक समाज आ साहित्य दुनूक लेल महान परिवर्तनकारी युग रहल अछि। कर्मकाण्ड आ जाति पातिक भ्रमजाल मे फंसल सनातन धर्मक विरूद्ध परिवर्तनवादी स्वर दएबला बौद्ध धर्म वामाचारादि घृणित कर्म सँ स्वयं पथभ्रष्ट भए गेल छल आ ओकर उच्छिष्ट सँ भारतीय चिन्तनधरा केँ परिशुद्ध करैत मुस्लिम धर्मक आक्रामक प्रभाव सँ सफलतापूर्वक लड़ैत शंकराचार्यक बनाएल पथ निरन्तर प्रशस्त भेल गेल आ ओहि पर चलनिहारक संख्या मे निरन्तर वृद्धि होइत गेल। ई अद्भुत संयोग अछि जे आसाम मे शंकरदेव, बंगाल मे जयदेव आ चण्डीदास, बिहारक तिरहुत मे विद्यापति, मध्यदेश मे कबीर, सूर, तुलसी आ जायसी, राजस्थान मे मीरा, गुजरात मे नरसी मेहता, महाराष्ट्र मे तुकाराम आदि अनेक सन्त भक्तक आविर्भाव किछुए दिनक अभ्यन्तर भेल। भक्तिसाहित्यक ई परम्परा अनेक धरा मे विभाजित होइतो अग्रगामी रहल। कबीर, रैदास, नानक, दादू, मलूकदास आदि सँ निर्गुण परम्पराक ज्ञानाश्रयी शाखा समृद्ध भेल त मुसलमान कवि कुतबन, मंझन, जायसी, शेख नबी आदि सँ निर्गुणक प्रेममार्गी सूफी धरा प्रवाहित भेल। रामानुज आ तुलसी आदि सँ राममार्गी सगुण परम्परा आ वल्लभाचार्य आ सूरदास आदि सँ कृष्णमार्गी सगुण परम्परा केँ बल भेटैत गेल। एहि भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक प्रारंभक सन्धिस्थल पर कोशी नदीक लीला क्षेत्रा मे सन्त लक्ष्मीनाथ गोसांईक आविर्भाव होइत अछि। गोसांई जीक जन्म आ रचनाकाल केँ दुनू कालक सन्धिस्थल नहि कहि रीतिकालक परिपक्वताक काल कहब बेसी उपयुक्त कहि सकै छी आ एकर असर केँ गोसांई जीक रचनासभ मे बहुत स्पष्ट रूप सँ देखल जाए सकैत अछि जाहिमे सिद्ध साहित्य, नाथपंथी साहित्य, भक्तिक ज्ञानाश्रयी आ प्रेममार्गी सूपफीधरा, सगुण परम्पराक राममार्गी आ कृष्णमार्गी धराक संग-संग कोशी-कमला-बलान अंचलक व्रात्य-किरात संस्कृति सँ प्राप्त शिव आ दुर्गा अराध्ना परम्पराक मिश्रित प्रभाव अछि।
एतय काल-विभाजनक आधर भारतीय भाषा साहित्य, विशेषतया हिन्दी केँ मानि ई बात कहल जा रहल अछि। तिरहुता वा मैथिली मे एहि भक्ति आन्दोलनक कोनो विशेष प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनि प्राकृत केँ अपन पुर्वज भाषा कहि यत्रा-तत्रा ओहि सँ लाभ लेबाक अवसरवादिता त देखबै छथि किन्तु प्राकृत मे लिखल सिद्ध लोकनिक भक्ति साहित्य केँ अपन कहबा मे हुनका सभ केँ असोकर्य होई छनि किएक त ओ निम्न जातिक लोक द्वारा लिखल गेल अछि आ पुरोहितवादक विरूद्ध जाइत अछि। एकटा विद्यापति जिनकर चर्चा विभिन्न भारतीय भाषा साहित्य मे होइत अछि, हुनकरो रचना मे भक्ति आन्दोलन सन कोनो तत्व नहि अछि। ओ मूलतः दरबारी कवि छला आ हुनक रचनासभ जनमुखापेक्षी नहि शासक मुखापेक्षी अछि आ ओहि मे अपन पालनकर्ताक मनोरंजनार्थ श्रृंगार-राग भरल अछि। लक्ष्मीनाथ गोसांई एहि मामला मे बेछप एहि रूप मे छथि जे भक्तिकालक समापन आ रीतिकालक यौवनकाल मे ओ एला आ अपन रचना सभ केँ लोक हितार्थ, लोक मनोरंजनार्थ लिखलनि, संगीत सँ बान्हलनि आ ओकरा गाबि-गाबि आमजन धरि पहुँचलाह। एतय ई कहबा मे कनिको संदेह नहि अछि जे गोसांई जी पर तिरहुता भाषाक रचनासभक प्रभाव नगण्य आ हिन्दीक साहित्य संसारक प्रभाव तीव्र आ प्रचूर मात्रा मे पड़ल अछि। गोसांई जीक शिक्षा संस्कृतक माध्यम सँ भेल छल आ ओ अपन संस्कृत ज्ञानक उपयोग शंकराचार्यक रचनाक अनुवाद लेल सेहो केलनि। भाषा तत्व बोध नाम सँ शंकराचार्य विरचित तत्व बोधक भाषानुवाद आ शंकराचार्येक विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद अद्वैतवाद आ वेदान्तदर्शनक प्रति गोसांईजीक आस्था केँ प्रगट करैत अछि। ई आस्था भाव गोसांईजीक अपन रचना सभ मे बहुत मुखर नहि भए सकल अछि त एकर पाछाँ ओ समाज अछि जेकर ओ एक इकाइ छला आ साध्ुकर्म अपनएलाक बादो जेकर बन्धन सँ ओ स्वयं केँ मुक्त नहि कए सकला। ‘गंगा को नहाये कहो को नर तरिगे, मछरी न तरी जाको पानी में घर है’ - एक निर्गुणपंथी संतक ई बात गोसांई जी पर नीक जकाँ लागू होइत अछि। तिरहुता आकि मैथिलीक गंगा मे के के महासभाइ नहि तरि गेल, किन्तु माछ जकाँ गोसांईए जी तरे सँ वंचित रहि गेला। आब गोसांई जी केँ मैथिलीक रचनाकार मानि हुनका पर परिसंवाद आदिक आयोजन भए रहल अछि से स्वागत योग्य किन्तु एहि मे जे आपराधिक बिलम्ब भेल अछि तेकर दोषी केँ चिन्हित करब सेहो अपेक्षित अछि।
गोसांईजीक रचना भाषा आ मैथिली
हिन्दी साहित्यक इतिहास लेखन एहि मामला मे इमानदार कहल जाए सकैत अछि जे ओ स्वीकार करैत अछि जे प्राकृतक अंतिम अपभ्रंश अवस्थे सँ हिन्दी साहित्यक आविर्भाव मानल जा सकैत अछि। मैथिली केँ एहन स्पष्ट धरणा निर्धरित करबाक सौभाग्य अखनि धरि प्राप्त नहि भेल अछि। मिथिला आ मैथिलीक अखनि धरि लिखल इतिहास पोथी सभ फूसि, भ्रम आ विरोधभासक पुलिन्दा ;गठरीबद्ध बनि कए रहि गेल अछि। हमरा सभ केँ बंगाल बतबैत अछि जे विद्यापति हमर छला आ तखनि हम सभ धड़फड़ा कए अपन भंगिआएल निन्न तोड़ैत विद्यापति केँ भरि-भरि पांज पकड़ै छी। ई त भेल क्षेपक, एतेक धरि जे हमर सभक भाषाक की नाम अछि सेहो हमरा सभकेँ अंग्रेजीक तथाकथित विद्वान/भाषाविज्ञानी कोलबु्रक आ जार्ज ग्रियर्सन सन लोक बतबैत अछि। किछु पाश्चात्य विद्वान एहि भाषाक लेल तिरहुतिया शब्दक प्रयोग केलनि। 1771 ई0 मे वेलिगत्तीक लिखल पोथी मे एकर एहि रूपेँ उल्लेख भेटैत अछि। हाल-हाल तक एहि भाषाक लेल तिरहुतिया आ एकर लिपिक लेल तिरहुता शब्दक उपयोग होइत रहल अछि आ अखनिओ जनसाधरणक बीच ई शब्द लोकप्रिय अछि। ठाम-ठाम एकरा लेल विदेह भाषाक प्रयोग सेहो भेल अछि। एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग 1801 ई0 मे कोलबू्रक केलनि। एहि भाषाक प्रथम उपयोग वा उल्लेख वर्णरत्नाकर आ विद्यापतिक कीर्तिलताक प्रारंभिक पद मे भेटैत अछि जेकरा विद्यापति देसिल वयना एवं अवहट्ट कहने छथि। ई देसिल वयना वा अवहट्ट मैथिलीक ओ रूप नहि अछि जेकर प्रयोग हमसभ आइ वर्तमान मे कए रहल छी। सुभद्र झाक अनुसार अवहट्ट कहला सँ ताहि जमाना मे भद्रलोकक भाषा बुझल जएबाक चाही। ई भद्रलोकक भाषा आ आम लोकक भाषा दू तरहक छल की ? सुभद्रे झाक कहब छनि जे मैथिली अपन निजी क्षेत्रा मे मुंडा आ संथाली एहि दू अनार्य भाषा सँ मिलैत अछि। दोसर शब्द मे एकरा मुंडा आ संथाली सँ बहरायल आ विकसित भेल किऐक नहि मानल जाए ? भाषाविद पंडित गोविन्द झा एकर विकासक क्रम अवहट्ट सँ प्राचीन मैथिली, मध्य मैथिली, नवीन मैथिली आ समसामयिक मैथिली क संज्ञा दैत बतबै छथि। आधुनिक काल तक आबिओ कए मैथिलीक कोनो सर्वमान्य वर्तनीक निर्धरण नहि भए सकल अछि। एहि भाषा पर सभसँ बड़का एहसान जार्ज गियर्सन केने छथि आ हुनके सँ मैथिली शब्द केँ व्यापकता भेटल। 1910 ई0 मे जखनि मिथिलेश महाराज कामेश्वर सिंहक आजीवन सभापतित्व मे मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक जातीय संस्था ‘मैथिल महासभा’ के स्थापना भेल त एहि भाषाक लेल मैथिली शब्दक आग्रह बढ़ल। एकर आर जे कोनो अन्य परिणाम भेल हुअय किन्तु एकर बादे सँ मिथिला, मैथिल आ मैथिली शब्द भ्रम सँ आप्लावित भए व्यापकता सँ दूर हटि गेल आ ‘तिरहुता’ सँ ‘मैथिली’ होइते ई भाषा सर्वहाराक खाता सँ खारिज भए मैथिल महासभाक खतिआन मे दाखिल भए मात्रा दू जातिक जमाबन्दीक वस्तु भए गेल। एकर परिपेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना भाषाक अवलोकन करै छी त अत्यन्त असन्तोषजनक आ दुखद तथ्य सभ सोझाँ आबैत अछि आ ई समझ आ बुद्धि मे नहि आबैत अछि जे ओ मैथिली मे स्वीकार्य किऐ नहि छथि। सिद्ध साहित्यक किछु उदाहरण द्रष्टव्य अछि। सरहपा कहै छथि - ‘पंडिअ सअल सत्त बक्खाणइ। देहहि रू( बसंत न जाणई। अमणागमण ण तेन विखंडिअ। तोवि णिलज्ज भणई हउँ पंडिअ।।’ विरूपा कहै छथि - ‘सहजे थिर करि वारूणी साध। अजरामर होइ दिट काँध। दशमि दुआरत चिह्न देखइया। आइल गराहक अपणे बहिआ। चउशठि घडि़ए देट पसारा। पइठल गराहक नाहि निसारा।’ तहिना कण्हपाक ई पांति - ‘एक्क पा किज्जइ मंत्रा ण तंत। णिअ धरणी लइ केलि करंत। णिअ घर घरणी जाब ण मज्जइ। ताब कि पंचवर्ण बिहरिज्जइ।’ कुक्कुरिपा - ‘ससुरी निंद गेल, बहुड़ी जागअ। कानेट चोर निलका गइ मागअ। दिवसइ बहुणी काढ़इ डरे भाअ। रति भइले कामरू जाअ।’ लुहिपा कहै छथि - ‘भाव न होइ, अभाव ण जाई। अइस संबोहे को पतिआइ ?’ बौद्ध सिद्ध सभक एहि उदाहरण सभक भाषाक तुलना विद्यापतिक कीर्तिलताक पांति ‘बालचंद बिज्जावइ भासा, दुहुहु न लग्गइ दुज्जन हासा। सो परमेसर सेहर सोहइ, इ णिच्चउ णाअर मन मोहइ।।’ सँ करी त दुनू मे कोनो बहुत अन्तर नहि अछि। तखनि प्रश्न ई अवश्य उठबाक चाही जे हम सभ स्तरचयनक कोन दोहरापन राखने छी जे विद्यापति मैथिली लेखक मानल जाई छथि आ सिद्ध सभ एहि सौभाग्य सँ बारल जाइ छथि। सिद्ध सभक एहि रचना सभक भाषा देशभाषामिश्रित अपभ्रंश अछि। ओ सभ भरिसक ओहि सर्वमान्य व्यापक काव्यभाषा मे लिखलनि जे ओहि काल गुजरात, राजपुताना आ ब्रजमंडल सँ लए कए बिहार तक लिखै - पढ़ैक शिष्ट भाषा छल। ओहि सभ मे स्थान विशेषक भेदक कारण किछु स्थानीय प्रयोग आ शब्द सभ आबि गेल अछि। एहि सिद्ध लोकनिक साहित्य जेकरा चर्या पद कहल जाइत अछि तेकरा मैथिली मे सम्मिलित करबाक डा0 जयकान्त मिश्र विरोधी छला, जखनि कि डा0 दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ एकरा सम्मिलित करबाक पक्ष मे छला। तार्किकता सँ एकदम अलग भए कए एहने आग्रह-दुराग्रह मैथिलीक भाग्य तै करैत रहल अछि। मैथिली अकादमी, पटना द्वारा प्रकाशित कविता संग्रह ;प्रथम संस्करण 1977द्ध मे सरहपा ;690 ई0 केँ सम्मिलित करबाक साहस देखाएल गेल अछि आ एकरा आगाँ बढ़बैत चैरासियो सिद्ध केँ मैथिलीक रचनाकार मानल जेबाक चाही। एतबे किए, कतिपय जैन आचार्य आ नागपंथी सभक अनेक रचनाक एहने भाषा अछि आ हुनको सभक स्वागत एहि टोल मे हेबाक चाही। हँ, जातिगत रूढि़ सँ ग्रसित एहि समाज केँ ई बात अखरि सकैत अछि जे अधिकांश सिद्ध लोकनि निचलका जाति अर्थात सोल्हन वर्ग सँ आबैत छथि। किन्तु मैथिली केँ पुरोहिती संस्कार आ मैथिल महासभाक समाजतोड़क व्यवस्था सँ बाहर निकालि विस्तृत आ विराट आकास देबाक समय नहि आबि गेल अछि की ? अमीर खुसरोक एकटा प्रसिद्ध गजलक किछु पांति द्रष्टव्य अछि -
‘जे हाल मिसकी मकुन तगापफुल दुराय नैना, बनाय बतियाँ।
कि ताबे हिज्राँ न दारम, ऐ जाँ! न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।
शबाने हिज्राँ दराज चूँ जुल्पफ व रोजे वसलत चूँ उम्र कोतह।
सखी! पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ।।
एहि गजल मे फारसी आ ठेठ खड़ी बोलीक समिश्रणक ठाठ अछि आ एकर बादो खुसरो हिन्दीक लेल तहिना स्वीकार्य छथि जेना विद्यापति। एहि सभ उदाहरणक परिप्रेक्ष्य मे जखनि लक्ष्मीनाथ गोसांई क रचना भाषा पर दृष्टि जाइत अछि, तखनि मैथिलीक पुरोध-महंथ सभक असमंजस बुधिमे घुसिआबय सँ परहेज करए लगैत अछि। तखनि त आओर जखनि मैथिली आ हिन्दी दुनू केँ सजातीय मानै मे कोनो भाषाविद्, कोनो पंडित केँ कोनो उजूर नहि छनि। पंडित छेदी झा ‘द्विजवर’ गोसांई जीक रचना भाषा केँ बिकृत ब्रजभाषा कहै छथि अर्थात मैथिली मिश्रित ब्रजभाषा। किन्तु ई बात बहुत गंभीरता सँ कहल गेल नहि बुझाइत अछि। ई सत्य अछि जे भारतीय साहित्य मे एकटा दीर्घ अवधि तक काव्य-लेखन लेल ब्रजभाषा मात्रा केँ उत्तम मानल जाइत रहल। किन्तु गोसांई जीक रचना भाषा केँ कोनो स्थापित श्रेणी वा व्याकरण मे बान्हब कठिन अछि। एकरा बबजिया वा सधुक्कड़ी भाषा कहब बेसी उपयुक्त बुझाइत अछि। घुमक्कड़ीक चक्कर मे बाबाजी सभ विभिन्न पंथक, विभिन्न क्षेत्राक, विभिन्न संस्कारक साधु समाज आ जन समाजक संपर्क मे आबैत अछि आ ओकर भाषा एहि सभक मिश्रणक प्रभाव सँ एकदम विलक्षण भए जाइत अछि। एहि विलक्षण आ अपरिभाषेय तत्वक असरि गोसांई जीक भाषे टा पर नहि हुनक रचना संसारक अंतर्वस्तु मे सेहो देखाइत अछि। सुभद्र झा Journal of the Bihar University मे प्रकाशित अपन एकटा आलेख मे कबीर केँ मैथिल सिद्ध करबाक प्रयास कएने छथि। कबीरक तुलना मे गोसांई जीक रचना-भाषा केँ मैथिलीक बेसी करीब त दाबी सँ कहले जाए सकैत अछि। बनगाँवक संत लक्ष्मीनाथ परमहंस राष्ट्रीय समिति द्वारा प्रकाशित ‘भजनावली’ केँ गोसांई जीक सर्वाधिक विश्वसनीय संग्रह एहि कारणें मानल जेबाक चाही जे ई हुनक भक्त सभक निष्कलुष आ समर्पित प्रयासक फल अछि आ एहि पर मैथिली साहित्यक राजनीति, पुर्वाग्रह आ निहित स्वार्थी षड्यंत्राक कोनो प्रभाव दृष्टिगोचर नहि होइत अछि। एहि संग्रह मे मात्रा पांच-छह टा नचारी एहन अछि जेकर भाषा केँ वर्तमान प्रचलित मानकक अनुसार मैथिलीक कहि सकै छी। अन्य सात-सवा सात सय रचनासभ मे ओएह मिश्रित बबजिया भाषा अछि, जाहि मे सँ किछु मे मैथिलीक कम-बेसी पुट उपस्थित अछि। एतय ई चर्चा कए देव समीचीन बुझाइत अछि जे कबीरदासक हिन्दू होइ मे सन्देह छलै, रैदास चमार छला, नानक केँ क्षत्री आ दादू केँ मोची वा धुनिया मानल गेलै आ हिनका सभक रचना भाषा मे सेहो कोनो भाषिक व वैयाकरणीक साम्य नहि छलै तखनिओ हिनका लोकनिक रचना केँ पंजाबी समुदाय गुरूग्रंथ साहिब सन पूज्य ग्रंथ मे श्रद्धापूर्वक सम्मिलित केलक। तेँ लक्ष्मीनाथ गोसांईक रचना सभक मैथिलीकरण करबाक अनैतिक आ आपराधिक कृत्य करबाक बदला ओकरा अपन मौलिकता मे मैथिली साहित्यक सम्पत्ति मानल जएबाक चाही। कहल गेल अछि- ‘यत्रापि कुत्रापि भवति हंसाः, हंसा महीमंडलमण्डनानि। हानिस्तु तेषां हि सरोवराणां येषां मरालैः सह विप्रयोगः।।’ अर्थात हंस जतए कतओ रहए, ओतहि पृथ्वीक भूषण भए कए रहत, हानि त ओहि सरोवर सभक हेतै जेकर ओकरा सँ वियोग भए जेतै। गोसांई जीक रचना मे निर्गुण भाव
देश मे सगुण आ निर्गुण नामक भक्तिकाव्यक दू धरा विक्रम पन्द्रहम शताब्दीक अंतिम भाग सेँ लए कए सतरहम शताब्दीक अंत तक समानान्तर चलैत रहल। ई कालावधि भक्तिकाल केँ इंगित करैत अछि किन्तु एकर बादो भक्ति काव्य रचल जाइत रहल, रचल जाइत रहल अछि। एहि मे निर्गुणधराक तत्परता आ व्यवस्थित रूप मे प्रवर्तन केलनि कबीरदास जिनका लेल नाथपंथी जोगीसभ आ वज्रयानी सिद्ध सभ अर्थशून्य बाहरी विधि विधान, तीर्थाटन, पर्वस्नान आदिक निस्सारताक संस्कार पसारबाक काज कए बहुत किछु मार्ग प्रशस्त कए चुकल छला। कबीरदास स्वामी रामानन्द जीक शिष्य बनि भारतीय अद्वैतवादक किछु स्थूल तत्व ग्रहण केलनि आ दोसर दिस नाथपंथी जोगी आ सूफी फकीर सभक संस्कार सेहो ग्रहण केलनि। वैष्णव लोकनि सँ ओ अहिंसावाद आ प्रपत्तिवाद लेलनि। तेँ हुनकर तथा निगुर्णवादी अन्य दोसर संत सभक वचन मे कतओ शंकराचार्यक अद्वैतवादक झलक भेटैत अछि, कतओ नाथपंथी सभक नाड़ीचक्रक, कतओ सूफी सभक प्रेमतत्वक, कतओ पैगम्बरी कट्टर खुदावादक आ कतओ अहिंसावादक। एहि परिप्रेक्ष्य मे जँ देखी त लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ शुद्ध निर्गुणपंथी कहब त कठिन अछि किन्तु ओ कने प्रकारान्तर सँ कबीरपंथी कहल जाए सकैत छथि। प्रकारान्तर ई जे गोसांई जीक साहित्य साधना आ भक्ति भावना पर हुनक अपन समाजक पुरोहिती संस्कार सेहो हावी रहल अछि आ से हुनक रचनासभ मे खूब देखार अछि।
गोसांईजीक एकटा भजन ‘कौन कहे प्रभु कैसा मुरति, कदही कोउ न देखा है’ सँ शुरू होइत अछि आ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, आदि त्रिदेवक चर्चा करैत ‘कर्ता, कर्म सबनि से न्यारा, साक्षी होके देखता है। ‘लक्ष्मीनाथ’ अनाथ के स्वामी, पवन रूप मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। निर्गुण भावक सर्वाधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति एहि भजन मे भेटैत अछि। गोसांई जी एहि भजन मे सगुण साकार केँ नकारैत निर्गुण-निराकारक पैरोकारी करैत देखाइ छथि। हुनका सरूप नहि ब्रह्मक पवन रूप भाबए छनि। पवन रूप अर्थात जेकरा अनुभव कएल जाए सकैत अछि किन्तु जे दृष्टिक परिधिसँ बाहर अछि। सगुणोपासनाक मजाक उड़बैत गोसांई जी एहि भजन मे सगुणोपासक केँ आन्हरक संज्ञा दै छथि - ‘अन्धे के पुर हाथी जैसे अकिल सरूप बताता है’। एहि भजन मे शंकराचार्यक पंक्ति उपालभ्यते हि मायाहस्ती हस्तीव, हस्तिनमिवमात्र समाचरन्ति बन्धनारोहणादि हस्ति संबंधिभिर्धर्मै:, हस्तीति चोच्यते असन्नपि यथा ....’ क प्रभाव स्पष्ट देखाइत अछि। एहिना ‘है तो स्वामी सबके भीतर लेकिन लखा न होता है। जैसे रंग रहे मेहदी में वैसे मालूम होता है’’ सँ प्रारंभ भेल एकटा भजन ‘जैसे बुद-बुद जल से होता, जलही माह समाता है। ‘लक्ष्मीपति’ झूठी यह माया, ब्रहम सत्य मन भाता है।’ पर समाप्त होइत अछि। एहि मे गोसांई कहै छथि जे जेना मेहदी मे रंग नुकाएल रहैत अछि तहिना अदृश्य स्वामी अर्थात ब्रह्म सभक भीतर अछि। एहि भजन मे ‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ क भावना आएल अछि। एकर बीचक पद मे गोसांई संसारक तुलना मकड़ाक जाल सँ करै छथि जेकर भीतर खोजला पर कोनो सूत नहि भेटैत अछि। फेर ओ कहै छथि जे जगत इन्द्रजाल अछि आ मानवरूपी पुतली केँ ओकर भीतर बैसल कोनो दोसर अर्थात ब्रह्म नाच नचबैत अछि। अंतिम पद मे ओ जल सँ बनल बुलबुलाक पुनः जलहिक भीतर समाए जेबाक गप कहैत ब्रह्महिटा केँ सत्य मानैत ओकरे भावैक गप कहै छथि। लक्ष्मीनाथ गोसांई पर विभिन्न संत कविक संग-संग शंकराचार्यक प्रभाव सेहो यथेष्ट मात्रा मे छनि। एकर एकटा प्रमाण इहो अछि जे ओ शंकराचार्यक तत्व बोध् आ विवेक रत्नावलीक भाषानुवाद सेहो कएलनि। ई प्रभाव कतओ-कतओ हुनक अपन रचना मे तेना कए आएल अछि जे ओ प्रायः अनुवादहि जकाँ लागैत अछि। आचार्य शंकरक माण्डूक्यकारिकाभाष्यम् क एकटा श्लोक अछि -‘यथा च प्रसारित पण्यापण गृहप्रसाद श्रीपुंजनपदव्यवहाराकीर्णमिव गन्धर्वनगरं दृश्य मानमेव सत् अकस्मादभावतां गतं दृष्टम्, यथा च स्वप्नमाये दृष्टे असदु्रपे, तथा विश्वमिदं द्वैतमसद् दृष्टम्।’ गोसांई जीक एकटा भजन मे एहि भावना केँ ‘खामिन्द खासे शहर बसाये’ सँ शुरू कए ‘नगर, बाजार, दुकान विचारे, सौदा नाना हाट लगायेः तीन चैदवीं, चार महाजन, दश बनियां व्यापार चलाये’ आदिक रूप में व्यक्त कएल गेल अछि। गोसांई जी एकटा भजनमे ‘निर्गुण महिमा सुनो रे कोई’ क माध्यम सँ निर्गुणक महिमा बतबैत कहै छथि जे निर्गुणहि अपन नानारूप धरि सगुण बनि आबैत अछि। अनेक विध सँ विविध होइत ई स्वयंहि मे समाहित भए जाइत अछि। ब्रह्म भुइयां, हवा, आगि, पानि आ आकाश मे परिणत अछि, वएह चित्त आ बुद्धि अछि आ वएह विषय-विहार सेहो करैत अदि। वएह जीव, वएह देवता अछि आ भोगनिहारो वएह अछि। वएह बन्धनो अछि, वएह मोक्षो अछि आ अनहद नाद सेहो वएह अछि आ जे कोय ब्रह्मक निर्गुण तत्व केँ जानि जाइत अछि वएह सभ चीजक रसास्वादन कए सकैत अछि।
निर्गुणक एहन स्पष्ट अभिव्यक्तिबला गोसांई जीक भजन मात्राक दृष्टिकोण सँ कमे अछि। किछु भजन मे त भावक तीव्र विरोधभास सेहो अछि। ई मानल जाइत अछि जे वज्रयानक अनुयायीसभ अधिकत निम्नजातिक छला आ तेँ जाति-पातिक व्यवस्थासँ हुनक सभक असंतोष स्वाभाविक छल। नाथ सम्प्रदाय मे सेहो शास्त्राज्ञ विद्वान सभ नहि छलाह। तेँ एहि दुनूक बनाएल लीक पर अग्रसर भेल निर्गुण पंथ दिस जाइबला जे पहिल प्रवृति लक्षित भेल से ऊंच-नीच आ जाति-पातिक भावक त्याग आ ईश्वरक भक्ति लेल मनुष्यमात्राक समान अधिकारक स्वीकार छल। किन्तु गोसांई जी अनेक जगह एहि व्यवस्थाक पोषक वा पैरोकारक रूप मे देखाई पड़ै छथि। ‘सदा एक रामनाम सत सार... ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, शुद्र के कर्म किन्ह परचार’, ‘ब्रह्मा वेद चारि के मालिक जाति, वरन बिलगाया है’ आदि पंक्ति एहि दिश संकेत करैत अछि। तेँ ई कहै मे कोनो संकोच नहि जे गोसांई जीक रचना मे जतय जतय निर्गुण भाव अछि से सप्रयास वा हुनक आस्थाक प्रतिपफल नहि, कबीर आ हुनक निर्गुणपंथक देखाउंस मे आएल अछि। एकर एकटा महत्वपूर्ण कारण अछि गोसांई जीक समाज, हुनक जाति आ ओ जाहि भूभागक निवासी छला तेकर संस्कार। कोशीक ई भूभाग अनेक मामला मे कमला बलानक भूभागक राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परम्परा सँ एकदम अलग रहल अछि। इतिहासक एकटा विराट कालावधिमे ई भूभाग बड़का-बड़का साम्राज्यक अधीनता सँ मुक्त अपन स्वतंत्राताक आनन्द लैत रहल अछि। मिथिलाक नक्शा बनबैत काल पुरातन आ आधुनिक दुनू आधर पर मनमाना सीमा रेखा खींचल जेबाक हास्यास्पद प्रयास निरन्तर भए रहल अछि किन्तु कोशी अंचलक एहि सुपौलक राजधानी कहियो जनकपुर, दरभंगा वा पाटलिपुत्र नहि रहल। एतहुका शासन कर्णाटवंशी गन्हवरिया, गढ़बनौली स्टेटक द्रोणवार आ स्थानीय निचलका जातिक विभिन्न मानिजन शासकक हाथ मे समय-समय पर रहल अछि आ तखनो एकर राष्ट्रीय चेतना विकसित रहल अछि। गोसांई जीक रचना भाषा एकरे प्रतिपफल अछि। किन्तु धर्मिक आधर पर ई भूभाग कर्मकाण्डी पुरोहित समाजक प्रभाव मे रहल अछि। ई पुरोहित वर्ग प्रायः वैदिक संस्कृति सेँ च्युत व्रात्य आ विदेह छला जे एहि क्षेत्राक पुरान बासिन्दा किरात, कोल-भील-मछुआरा आदि आ विभिन्न वनवासी जाति समाजक संगतिक प्रभाव मे आबि मूर्ति पूजाक पालक, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक अस्तित्व माननिहार, टोना-टोटका, झाड़-फूक मे विश्वास राखनिहार आ माछ माउसक भक्षक भए गेला। निर्गुणधराक कवि सुंदरदास भिन्न-भिन्न प्रदेशक आचार पर अत्यन्त विनोदपुर्ण उक्तिसभ कहने छथि। कोशी-कमला-बलानक क्षेत्रा पर हुनक उक्ति छनि ‘ब्राह्मण क्षत्रिय बैसरू सूदर चारोइ बर्न के मच्छ बधरत’। एहि पुरोहित वर्ग द्वारा एहि भूभागक बहुजन समाजक संस्कार ग्रहण कए लेब बहुमतक प्रभाव सँ त भेबे कएल, अपन भरण-पोषणहुक लेल एना करब हुनका सभ केँ लाभकारी बुझैलनि। मिथिला-मैथिलीक विद्वान इतिहासकार लोकनि एहि समाजक सनातनी हेबाक बात केँ बेर-बेर घोसलनि अछि किन्तु ई सत्य नहि अछि आ जँ सत्य अछि त एकर बहुलांश केँ जानि बुझि कए झांपल गेल अछि। सनातनी समाज अपन सर्वांग मे उदारचेता होइत अछि जे ई नहि अछि। एतय कर्मकांडक कट्टरता अछि, मूर्ति-पूजा, भूत-प्रेत-डाइन-जोगिनक उपचार हेतु टोना-टोटका-झाड़-पफूंकक अंधविश्वास अछि, श्राद्धक नाम पर प्रेत-मुक्तिक भ्रमजाल अछि, वर्णाश्रम-व्यवस्थाक पतित रूप जाति व्यवस्थाक अढ़ मे श्रेष्ठता बोधक पाखण्ड अछि। एहि सभक वाहक जे पुरोहित वर्ग अछि तेकरे एकटा अंश लक्ष्मीनाथ गोसांई छला आ तेँ हुनक जे जातिगत आ जन्मजात संस्कार छल से हुनक ज्ञान, बुद्धि, विवेक आ ताहि सँ प्रसूत हुनक साहित्य पर तात्विक रूप सँ हावी रहल। ई मानल तथ्य अछि जे सगुणोपासक भक्त भगवानक सगुण आ निर्गुण दुनू रूप केँ मानैत अछि किन्तु भक्ति आ उपासनाक लेल सगुणहि रूप केँ स्वीकार करैत अछि आ निर्गुण रूप ज्ञानमार्गी सभक लेल छोडि़ दैत अछि। खास तौर सँ उपासनाक क्षेत्रा मे ब्रह्म निर्गुण नहि बनल रहि सकैछ। तेँ सभ सगुणमार्गी भक्त भगवानक व्यक्त रूपक संग-संग हुनक अव्यक्त आ निर्विशेष रूपक सेहो निर्देश करैत आएल छथि जे बोध्गम्य नहि अछि। ओ अव्यक्त दिस संकेत मात्रा करै छथि, ओकर विवरण मे प्रवृत नहि होइ छथि। ओहुना निर्गुणपंथक प्रभाव शिष्ट आ शिक्षित वर्गक लोक पर नहि पड़ल, किऐक त ओकरा सभक लेल ने त एहि पंथ मे कोनो नव बात छल आ ने नव आकर्षण। किन्तु अशिक्षित आ निम्न श्रेणीक लोक पर निर्गुणपंथक एकटा बड़का उपकार अछि। एहि पंथक संतलोकनि अपन रचना मे किछु उच्च विषयक अबूझ सन आभास दए, आचरणक शुद्धता पर जोर दए, पाखण्ड, आडम्बर आ कर्मकाण्डक तिरस्कार कए एहि अशिक्षित निम्नवर्ग मे आत्मगौरवक भाव उत्पन्न कएलनि आ एकरा सभ केँ उपर उठएबाक स्तुत्य प्रयास कएलनि। लक्ष्मीनाथ गोसांईक संकट ई छलनि जे ओ जाहि पुरोहित वर्गक जन्मजात अंश छला तेकरा ई चीज नहि रूचैत छल आ ने रूचैत अछि। एहि दुनू पंथ पर चर्चा करैत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहै छथि जे सगुण भावक भक्त सभक महिमा हुनक असीम धैर्य आ अध्यवसाय मे अछि किन्तु निर्गुण श्रेणीक भक्त सभक महिमा हुनक उत्कट साहस मे अछि। एकरा ध्यान मे राखैत ई बात निस्संकोच कहल जा सकैत अछि जे यथास्थितिवादक खिलापफत मे कबीर दुस्साहसक जाहि सीमा धरि गेला से हुनक बादक निर्गुणपंथक अनेक भक्त मे दुर्लभ अछि। निर्गुण भावक कतिपय भजनक रचनाक बादो तहिना लक्ष्मीनाथ गोसांई सेहो एकरा अपन मुख्य स्वर बनैबाक साहस नहि देखाए सकला। गोसांई जीक संपुर्ण रचना-साहित्यक अवलोकन सँ जे बात अभरिकए सोझाँ आबैत अछि से ई जे हुनका पर भक्तिक विभिन्न मार्ग, विभिन्न पंथ आ विभिन्न धरासभक मिश्रित प्रभाव अछि। संख्याक दृष्टिकोण सँ राम आ कृष्णक भजन सभ पर भारी अछि। प्रभावक प्रकार सँ हुनका कर्मकाण्डी-कबीरपंथी कहि सकै छी किन्तु जँ हुनका शुद्ध कीर्तनियां आ भक्त मानल जाए तखनिए हुनक रचना संसारक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन भए सकैत अछि। हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ कोशी अंचलक अन्वेषक साहित्यकार छथि आ ओ लक्ष्मीनाथ गोसांई केँ वाग्येकार भक्त कवि कहै छथि। वाग्येकार अर्थात् एहन कवि जे स्वयं पद के रचना करैत अछि आ ओकरा संगीत मे आबद्ध कए विभिन्न राग-रागिनी मे गाबैत अछि। जेना कोनो कीर्तनियाँ सँ मौलिकताक अपेक्षा करब ओकरा संग न्याय नहि अछि, तहिना गोसांईजीक रचना-संसार सँ सेहो ई अपेक्षा नहि कएल जएबाक चाही। हुनक अलौकिकताक कल्पित-प्रचलित कथा, गोरखनाथ सँ भेल काल-विरोधभासी तथ्य, नौ तरहक सिद्धिक प्राप्ति सन-सन गप हुनक भक्त सभ पर छोडि़ देबाक चाही। हुनक रचना-संसारक रसास्वादन करबाक लेल एतबे यथेष्ठ अछि जे हुनका भक्त आ हुनक रचना केँ शुद्ध भजन-कीर्तन मानि लेल जाए।

Suggested citation: अरविन्द ठाकुर. “लक्ष्मीनाथ गोसांई: परम्परा, भाषा आ निर्गुण भाव.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 189, 2015-11-01. https://www.videha.co.in/research/2015/189/लक्ष्मीनाथ-गोसांई-परम्परा-भाषा-आ-निर्गुण-भाव.htm

मूल विदेह अंक / Original issue