सामंती सभहँक विरुद्ध तैयार कवि
-अरविंद श्रीवास्तव
लगतार तेज होइत संगीतक कारणें लोक बहीर भऽ रहल अछि मुदा ओ सभ बहीर छथि तँइ आर बेसी जोरसँ संगीत बजाबऽ पड़ि रहल छै- मिलान कुंदेरा
अरविंद ठाकुरक रचनात्मक धमक साहित्यिक क्षेत्रमे एहानिते सुनाइ पड़ि रहल अछि। अरविंद अपन रचनाकालमे संवेदनहीन उत्तर आधुनिकता संगे-संग साम्यवादी सत्ता के खंडित होइत देखने अछि। ई साम्यवादी सत्ता जे पूरा संसारमे अपन बात छाती ठोकि कहबाक तागति राखै छल। ई साम्यवादी सत्ता जे धरतीपर सह-अस्तित्व केर भावना आ ओकर पक्षमे ठाढ़ छल। ई साम्यवादी सत्ता जे जनताक संग ठाढ़ छल सएह साम्यवादी सत्ता आइ अपन घर तोड़ि लेलक।आ आब जखन की केबाड़ खोलिते हाट-बजार चौअनियाँ मुस्कानक संग वेलकम करैए हमरा ई कहबामे कोनो संकोच नै जे अरविंद ठाकुरक रचनात्मक दुनियाँ एही परिस्थिति सभहँक उपजा अछि। हम ऐ उपजा के नव नै कहि सकै छिऐ किएक तँ ई रचनाक्रम कोनो एक काल खंडमे नै अबैए आ ने ई रचनाक्रम कोनो एकटा सत्ता, विधा वा विचारधारापर अछि। अरविंदक बहुरंगी लेखनक सभसँ बड़का विशेषता अछि -सच लिखबाक साहस।
अरविंद ठाकुरकेँ पहिल बेर हम करीब पचीस बर्ख पहिने पूर्णियासँ प्रकाशित "कला" पत्रिकामे पढ़ने छलहुँ। आ ओही दिनक आस-पास ओ हमर साहित्यिक परिचयमे एला। मधेपुरामे पुलिस कप्तान मनमोहन सिंहक पोथी "मेरे में चांदनी" केर लोकार्पण आ कवि सम्मेलन आयोजित करबाक क्रममे अरविंदकेँ आमंत्रित करबाक अवसर भेटल छल। ऐ सम्मेलनमे पटनासँ गीतकार गोपीवल्लभ सहाय, सिद्धेश्वर आ पंजाब किछु शाइर सहित कोसी इलाकाक अधिकांश कवि-रचनाकारक भागीदारी छल। अरविंदसँ एही आयोजनमे पहिल भेंट भेल आ अपन पत्रिका "सिलसिला"मे हुनक गजल प्रमुखतासँ प्रकाशित केलहुँ। अरविंदक संग विरासतक गहींर संबंधक चर्चा हम अपन पिता हरिशंकर श्रीवास्त "शलभ"सँ कतेको बेर सुनैत रहलहुँ। अरविंदक पिता बलेन्द्र नारायण ठाकुर "विप्लव"जीक कतेको खिस्सामे हुनक समाजवादी विचारधारा, समाजिक समरसता, नैतिकता आ आत्मसम्मानक विचार भरल छल। अरविंद अपन लेखनमे एही विरासतकेँ बचा कऽ रखलक अछि। परती टूटि रहल अछि नामक पोथीसँ --- "मान्यवर हम अहाँक नै दोसर पार्टीक कूकुर छी" ऐ अढ़ाइ पाँतिमे कतेक दर्द कतेक आत्मसम्मान छै तकरा शब्दमे कहनाइ मोश्किल छै।
अरविंद अपन कवितासँ समाजिक बदलावक जरूरतिकेँ सोझाँ-सोझी जोड़ैए। ओकर कविता सामंती मोहफिलसँ निकलि जनताक पक्षमे ठाढ़ होइत अछि आ ओकरा संघर्षक हिस्सा बनबासँ आपत्ति नै छै।अरविंदक लेखकीय सक्रियता साहित्यिक आ समाजिक सरोकारसँ प्रेरित रहल अछि इएह कारण अछि जे साहित्यिक सृजनक संग-संग ओ समाजिक प्रतिबद्धताकेँ सेहो अपन सजगताक हिस्सा मानलक। अरविंद पटनासँ प्रकाशित "प्रवक्ता"मे "ठाकुर का ठाँव" नामक शीर्षकसँ समसामयिक राजनीतिक घटनाक्रमकेँ बहुत बेबाकी आ बेखौफ भऽ कऽ पाठक सामने आनैत रहल।
दरभंगासँ प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र "मिथिला आवाज" मे बतौर संपादक अरविंद साहित्य आ समाजक प्रति अपन दायित्वक निर्वाहमे कनिको पाछू नै हटल। बिहार प्रगतिशील लेखक संघक प्रति ओकर समर्पण देखैत ओकरा उपाध्यक्ष पदक जिम्मेवारी देल गेलै। मूलतः कवि अरविंद ठाकुरक व्यक्तित्व हिंदीक कवि राजेश जोशीक एक पाँतिमे समेटल जा सकैए-- "हम कविक ब्रहमांडक एकटा नुकाएल अकासगंगा छी"।
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