स्खलनक प्रतिरोधमे -अन्हारक विरोधमे
परमानन्द प्रभाकर
आधुनिक मैथिली कथा-साहित्यमे जाहि कथाकार सभपर गर्वसँ निघोख माथ उठाओल जा सकैछ ताही पाँतिमे मन्द-मन्द मुस्कैत उन्नत ग्रीव ठाढ़ छथि श्री अरविन्द ठाकुर ।
मनुखक सभ्यताक विकास कालहि सँ अन्हारक विरोध होइत आयल अछि । वेद मे अही बातकेँ किछु दोसर तरहेँ कहल गेल छै जे द्रष्टव्य अछि -
‘‘असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।’’
सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व प्रकृतिमे पसरल अन्हारकेँ दूर करबाक लेल, ओहि सँ सुरक्षाक लेल मशालक आविष्कार भेल छल । हिन्दी साहित्यक कथाकार बेनीपुरी जीक एहि माँदे कहब छनि -
‘‘जिस दिन मशाल बनी, दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति उसी दिन हुई’’
मशाल भौतिको छै आ आत्मिको । आत्मिक मशाल ज्ञानक प्रतीक छै, जकरा माध्यमे अज्ञानताक अन्हारकेँ मिटाओल जा सकैत अछि । आजुक वर्त्तमान परिस्थिति मे प्रकृतिक सभटा अन्हार मनुखक चेतना मे समाहित भ’ गेल छै आ तैं चारूकात उत्पीड़न, मारि-काट, खून-खराबी, झूठ-पफरेब, छटपटाहटि, शोषणक त्रासद स्थिति पसरल छै । मनुख एहि स्थिति सँ अपना केँ उबारि सकत तकर ज्ञान सेहो ओकरा मे छै। ओ सभ किछु जनैत अछि, तखने त राष्ट्रकवि दिनकर कहै छथि ‘कुरूक्षेत्राक’ षष्ठम् सर्ग मे -
‘‘यह मनुज विज्ञान मे निष्णात
ज्ञान का, विज्ञान का, आलोक का आगार ।’’
तथापि मनुख छटपटा रहल अछि आ उपर्युक्त त्रासदक स्थिति सँ त्राणक दिशि ओकर प्रवृति नइँ भ’ रहल छै। दुर्योधनक उक्ति छै -
‘‘धर्म को जानता हूँ प्रवृत्ति नहीं है।
अधर्म को जानता हूँ निवृत्ति नहीं है।’’
एहि मानसिकताक कारणें मनुखक दशा ओ दिशा दिनानुदिन खरापे भेल जा रहल छै । मनुख सभ्यताक विकास काल सँ पूर्व जतेक आतंकित नइँ छल ओहि सँ बेसी आतंकित एखन अछि । तै
त हिन्दी साहित्य मे ‘कलम के जादूगर’ नाम ख्यात बेनीपुरी जी कहै छथि । ‘‘अब जहाँ अन्ध्कार है, वहाँ पहले से भी ज्यादा भयानक और वीभत्स है ।’’ बेनीपुरी जीक इशारा मनुखक हृदय मे व्याप्त अज्ञानता रूपी अन्हारेक दिशि छनि।
समाज मे पसरल बहुत रास जे चारित्रिक स्खलन, सामाजिक विद्रुपता रूपी अन्हार छै तकरे विरोध मे श्री अरविन्द ठाकुर ठाढ़ छथि, अपन पोथी ‘अन्हारक विरोधमे’ हाथ मे नेने । मुदा ओ जे बाट पकडि़ क’ चलि रहल छथि आ जाहि क्राँतिकारी तेवर मे बढि़ चुकल छथि, ताहि लेल त हम एतबे कहबनि-
‘‘शीशे का महल आपने बनवा तो लिया है
पत्थर का जमाना है मगर ये नहीं सोचा’’
सम्पूर्ण पोथी केँ पढ़ला सन्ताँ ज्ञात भेल जे ठाकुरजी एकटा कुशल शब्द शिल्पीए नहि अपितु एक गोट मसिजीवी क्रांतिकारी व्यक्ति छथि । हम एहि बातक लेल पूर्ण आश्वस्तो छी जे जै अरविन्द ठाकुर जी कलम सँ क्रांति करबाक लेल निकलि चुकल छथि त’ क्रांति हेतै आ खूब नीक जकाँ हेतै । किऐक त कलम मे बड्ड तागति छै । तखने त हिन्दी साहित्य मे ‘नेपाली’ नाम सँ प्रख्यात कवि कहै छथि -
‘‘हम धरती क्या आकाश बदलने वाले हैं
हम तो कवि हैं, इतिहास बदलने वाले हैं
हर क्राँति कलम से शुरू हुई सम्पूर्ण हुई
चट्टान जुल्म की, कलम चली, तो चुर्ण हुई’’
प्रस्तुत पोथी मे दसटा कथा संकलित अछि । एहि कथा सभ मे कथाकार समाज मे परिव्याप्त सभतरहक समस्याकेँ उठौलनि अछि । जिनगीक सभटा पक्ष अभरिक’ आयल अछि । हम एतय उदाहरणक लेल खिस्सा-सियार यार, पियासल पानि, अन्हारक विरोध् मे, ‘मूस’, विषपान कथाक किछु प्रसंगक मादे समाजक वर्त्तमान दशाक दिग्दर्शन करा सकैत छी ।
पोथीक पहिल कथा ‘खिस्सा-सियार यार’ वर्त्तमान राजनीति सँ जुड़ल अछि । एहि मे जनता आ राजनेताक बीच उपजल नवका संस्कृतिकेँपफरिछाक’ राखल गेल अछि । राजनाथक ई कथन ‘‘हमर अहाँक महत्व ओकरा सभक नेता लेल तखने घरि अछि जा घरि हमरा सभक नसमे खून अछि । खून खतम-सम्बन्ध खतम’’ राजनेताक सौंसे चरित्रा उघारि क’ राखि दैत अछि । एहि ठाम हमरा मोन पड़ैत अछि एक गोठ ढ़ीठ नेताक उक्ति जे उपर्युक्त बातक पूष्टिए करैत बुझि पड़ैत अछि -
‘‘रूसवा करो जलील करो, सब कबूल है।
बन्दा तो उम्मीदवार है, चरणों की धूल है।
लेकिन रहे यह याद कि चुनाव जीतकर,
मुड़कर न देखना मेरा पहला वसूल है।। ’’
अही कथा मे सदानन्दक चरित्रा ठाढ़ क’ क’ लेखक महोदय ई कहबा मे सार्थकता प्राप्त केलनि अछि जे प्रजातान्त्रिाक व्यवस्था मात्रा कहबाक लेल छै, ओना ई व्यवस्था छै शक्ति तंत्राक । अथवा एकरा अहुना कहि सकैत छी जे ‘‘जक्कर लाठी तकरे भैंस ।’’ ई कथा राजनीति मे पसरल भाइ-भतीजा वादक नीति केँ सेहो उघार करैत अछि ।
कथा कृतिक दोसर कथा ‘पियासल पानि’ नारी शोषण पर आधरित अछि । एहि मे नारायण पुरवालीकेँजाहि रूप मे प्रस्तुत कैल गेल छै ओहि सँ नारीक दशा-दिशा ओ पुरूष वर्गक किरदानी जगजियार भेल अछि । एतबे नइँ ई कथा अन्ध्विश्वास सँ जकड़ल सामाजिक सोचकेँनाघ्ट करैत अछि ।
तेसर कथा अछि ‘अन्हारक विरोध् मे’ । ई कथा हिन्दु-मुस्लिमक टकराहटिक समस्या केँ जगजिआर करैत अछि । सामाजिक एकता केँ खण्डित कर’ वाली प्रवृति पर ई कथा सोझे प्रहार करैत अछि। हमरा लगैत अछि जे ई कथा जिनगीक सान्ध्य बेला मे लेखक महोदय सँ किछु आओर चिन्तन आ समयक लेल लेखक दिश टुकुर-टुकुर ताकि रहल अछि ।
‘मूस’ नामक कथा वंश परम्परा पर आधरित रहितो प्रकारान्तर सँ राजनीति मे उपजल वंश परम्पराक नबका संस्कृति पर चोट करैत अछि । गहन चिन्तन केला पर स्पष्ट होइत अछि जे एखनो राजतंत्रा व्याप्त अछि । तखने त’ बहिनोई, सार, बाप-बेटा, बेटी-पुतोहु सभक जमावरा छैक राजनीति मे ।
अहिना ‘विषपान’ नामक कथा न्यायालय मे पसरल भ्रष्टाचारकेँनाँगट करैत अछि । ओकीलक छुद्रता केँ उघार करैत अछि ।
एहि तरहेँ एहि कथा संग्रह मे सामाजिक सभ तरहक समस्याकेँ उठाक’ लेखक महोदय अपन खोजी प्रवृतिक तथा क्रांतिकारी व्यक्तित्वकेँ जगजिआर केलनि अछि ।
एहि ठाम बच्चन जीक पाँती लेखक महोदय पर सटीक बैसैत अछि ‘‘बूँद के उच्छ्वास का भी अनसुनी करता नही वह’’
अर्थात् लेखक कोनो वर्गक छोट आ पैघ सामाजिक समस्या सँ मुँह पेफरि क’ नइँ चलैत छथि। आ ने एहि कथाकृतिक कथाकार चलला अछि ।
एक गोट मैथिलीक अध्येता हेबाक कारणे हम एहि कथाकृतिक स्वागत अभिनन्दन करै छी आ लेखक महोदयक लेल किछु अपन शुभकामना हम अपन एहि पाँती मे दैत विराम लैत छी -
‘‘ सृजन-शीलता राति-दिन अहिना चलै अमन्द
कहियो पड़ै बेराम नइँ कविता जीवन छन्द
तन-मन पौरूष मे रहै ऊर्जस्वित नव हर्ष
रचना मे सभदिन रहै भरल सौम्य उत्कर्ष ।।’’
परमानन्द प्रभाकर
द्वारा - संत पॉल्स हाई स्कूल
बंगाली टोला, समस्तीपुर
पिन - 848101
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